ऑनलाईन चैटिंग के फायदे [व्यंग्य] - आलोक पुराणिक
5-अगर आपके आसपास के लोग पर्याप्त अज्ञानी हों, तो कंप्यूटर पर आपकी चैटिंग को भी ज्ञानवर्धक गतिविधियों का हिस्सा मान लिया जायेगा।
साहित्य शिल्पी एक पूर्णतया अव्यावसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसके सफलतापूर्वक संचालन हेतु आपका रचनात्मक तथा वित्तीय सहयोग अपेक्षित है। इसके लिए आप अपनी रचनाएं हमें भेजने के साथ साथ अपने और अपने परिचितों के विज्ञापन साहित्य शिल्पी को प्रकाशनार्थ भेज सकते हैं। यदि आप किसी अन्य तरीके से हमें सहयोग करना चाहें तो भी आपका स्वागत है।
आप अपने विज्ञापन या रचनाएं भेजने अथवा किसी अन्य संदर्भ मे हमें इन ई-मेल पतों पर संपर्क कर सकते हैं:
[email protected]
[email protected]
[email protected]
या फिर हमें फोन भी कर सकते हैं:
राजीवरंजन प्रसाद:09910966474
अभिषेक सागर: 09818479320
अजय यादव: 09899429987
.....आईये कारवां बनायें....
©सर्वाधिकार सुरक्षित- "साहित्य शिल्पी " एक अव्यवसायिक साहित्यिक ई-पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। प्रकाशित रचनाओं के विचारों से "साहित्य शिल्पी" का सहमत होना आवश्यक नहीं है।
किसी भी रचना को प्रकाशित/ अप्रकाशित करना अथवा किसी भी टिप्पणी को प्रस्तुत करना अथवा हटाना साहित्य शिल्पी के अधिकार क्षेत्र में आता है।
© Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008
Back to TOP
21 comments:
व्यंग्य लेखन की आपकी शैली लाजवाब है।
सही लिखा है.
वाह,
मज़ा आ गया।
मजेदार, सही विवेचना है :)
प्रातः उठते ही कम्पूटर पर बैठने के इतने सारे फायदे ..... परन्तु आलोकजी उनका क्या जिनकी पत्नी कम्पू अज्ञानी तो है किंतु .. वह भी चैटिंग के मतलब जानकर, यदि आप ऑफिस का कामकर रहे हों तब भी यही समझती है की आप किसी से चैटिंग कर रहे होंगे. इधर बन्दा आलोकजी से किसी पोस्ट पर डिसकस कर रह होता है और वह 'अनामी' के साथ चैटिंग का उपालंभ दे रही होती है. अस्तु .... यह जो आनलाइन पिटाई जैसे बचे खुचे सॉफ्टवेर शीघ्र ही मार्केट में आ जायेंतो शायद कुछ बात और बने .. बिगडे ..
वाह .....
इतने फायदे पता चले, अब तो यह शगल पालना ही पडेगा।
आलोक जी की कटाक्ष करने की अपनी ही शैली है। छहों विन्दु याद रखने योग्य हैं।
नया नज़रिया पुरानी बात और शानदार प्रस्तुतीकरण !
नमस्ते जी ,
एक दम सटीक लिखा है। और ऐसा होता भी है।(गाहे बगाहे मै भी कर लेता हूं)
इतने उम्दा लेख के लिये कोटिश: धन्यवाद और और भविश्य मै भी आप ऐसा ही लिखते रहेंगे ऐसी शुभेक्षा के साथ आपका शुभेक्षुक
विकास श्रीवास्तव
A/28, शास्त्री कोलोनी
भिण्ड, (म.प्र.)
+919893308324
बहुत अच्छा फोटो व् लेख
कभी इस दूम हिलाने वाले की भी पोस्ट पर आए
regards
liked it.
Alok Kataria
आलोक जी के व्यंग्य आलेखों की बात ही अलग होती है। आपकी पंच लाईनें व्यंग्य को बहुत उँचाई पर ले जाता है। साधारण प्रसंगों का भी आप असाधारण प्रस्तुतिकरण करते हैं..
***राजीव रंजन प्रसाद
बधाई आलोकजी
ऑन लाइन पिटाई न सही,
ब्लॉग पर जो जूतम-पैजार होती रहती है..
उस पर आपकी क्या राय है...???
मजेदार व्यंग्य लेख है।
:) एकदम सही लिखे हो जी, एक फ़ायदा हम भी बता दें उस छात्र को( आप को नहीं जी) आप दफ़तर से घर आते ही अपने कमरे में बंद हो जाइए अपने कंप्युटर के साथ और पड़ौसी सोचते हैं कि बहुत अंतर्मुखी व्यक्तित्व है इनका किसी से बात ही नहीं करते, उन्हें क्या पता कि सारी दुनिया जहां से बतिया रहे हैं जनाब
वाह वाह पैनी बात
बधाईयाँ
बहुत अच्छा है. इसमें असीम संभावनाएं हैं सामने वाले या वाली को बुद्धू बनाये रखने की लेकिन ख्यालरहे आप भी इसी तरह की ऑनलाइन बेवकूफियों के शिकार बनाये जा सकते हैं
ऑनलाइन चैटिंग के फायदों से अवगत कराने का शुक्रिया। अब तो चैटिंग को मजा वास्तव में बढ जाएगा।
"कवि बेहिचक, बेखटके, हूट होने के खतरे की चिंता किये बगैर ही कविताएं ठेल सकता है।"
इसके मज़े तो मैने कई मर्तबा लिये हैं
और
"आनलाइन वाह वाह के लिए सच्ची में कविता में टाइम खल्लास करना जरुरी नहीं है।" इसका भी शिकार हुआ हूँ।
एकदम अपनी-सी बात लगी। बधाई स्वीकारें।
सशक्त व्यंग्य...आपकी रचना हमें चैटिंग के लिये उकसा रही है.. :)
बहुत रोचक। नये विषय नये व्यंग्य,वाह खूब
एक टिप्पणी भेजें