23 जनवरी 1960 को नगीना, मेवात में जन्मे भगवानदास मोरवाल नें हिन्दी कथा जगत में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। आपनें राजस्थान विश्वविद्यालय से एम.ए. किया साथ ही आपको पत्रकारिता में डिप्लोमा भी हासिल है। आपके प्रकाशित उपन्यास हैं - रेत, काला पहाड़ एवं बाबल तेरा देस में। आपके चार कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह और कई संपादित पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं। आपके लेखन में मेवात क्षेत्र की ग्रामीण समस्याएं उभर कर सामने आती हैं।

भगवानदास मोरवाल के उपन्यास “रेत” का पंद्रहवे अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान के लिये चयन हुआ है। इस उपलब्धि के अवसर पर प्रस्तुत है साहित्य शिल्पी की श्री मोरवाल से बातचीत -
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सबसे पहले पन्द्रहवें अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के लिये आपको हार्दिक बधाई!

मोरवाल: जी, बहुत बहुत धन्यवाद!

आप कहानी को कैसे परिभाषित करते हैं?

मोरवाल: ये बड़ा पेचीदा सवाल है। देखिये, कहानी हो या उपन्यास मूल तत्व दोनॊं में कहानी ही होता है। उसके लिये बहुत सारे कारक, बहुत सारे तत्व महत्वपूर्ण होते हैं। मेरी जो अपनी लिखने की प्रक्रिया है; मैं जो भी विषय उठाता हूँ उसकी पूरी तैयारी करता हूँ। उदाहरण के लिये “काला पहाड़” मेरा पहला उपन्यास था और उसने मुझे पहचान दी। बहुत कम लेखक अपनी पहली ही रचना से अपने लिये एक पुख़्ता ज़मीन तैयार कर पाते हैं। इसकी वज़ह मुझे लगती है उपन्यास का कथानक जो एसे विषय पर है जिस पर कि हिंदी समाज की नज़र कभी गई ही नहीं। उपन्यास की जो पृष्ठभूमि है वह हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं में बसा हुआ मेवात क्षेत्र है। इस क्षेत्र की विशेषता है कि यहाँ का जो मेव समाज है वह वैसे तो मुसलमान है और उसने हिंदू धर्म को छोड़कर इस्लाम स्वीकार किया है, लेकिन उनके जो रीति-रिवाज़ हैं, जो उनकी पूरी जीवन पद्धति है वो........यहाँ मैं संस्कृति शब्द का इस्तेमाल जान-बूझकर नहीं करूँगा क्योंकि आमतौर पर हमारे यहाँ इस शब्द को अलग संदर्भों में प्रयोग किया जाता है। हालाँकि मेरा मानना है कि संस्कृति मूल रूप से किसी व्यक्ति या समाज की जीवन-पद्धति ही है जिसमें उसका रहन-सहन, खान-पान और रीति-रिवाज़ सब शामिल होते हैं। तो मेव समाज एक ऐसा समाज है कि जिसके बारे में हिंदी पाठक बिल्कुल नहीं जानता।

इसी तरह मेरा दूसरा उपन्यास “बाबल तेरा देस में” की पृष्ठभूमि आप कह सकते हैं कि मेवात की हो सकती है लेकिन उसका जो कथ्य है वो मूलत: हमारे भारतीय ग्रामीण समाज की एक स्त्री और अपने धर्म को ले कर उसकी जो समझ है; उसे मैंने दिखाने का प्रयास किया है। अब मेरे इस उपन्यास में जो परिवार है, जो समाज है वो मेव समाज है और क्योंकि ये इस्लाम धर्म को मानने वाले हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि उनकी जो पूरी जीवन-पद्धति है वो इस्लाम पर आधारित है। इसके मद्देनज़र मैंने कुरान को कई बार पढ़ा और शरीयत जो इस समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, उसके विविध पक्षों का अध्ययन किया। इसके अलावा मैंने जिस पुस्तक का अध्ययन किया उसके बारे में हिंदी समाज ही नहीं मुस्लिम समाज का भी एक बड़ा तबक़ा नहीं जानता। इस पुस्तक का नाम है “बहिश्त के ज़ेवर” और इसके रचयिता हैं मौलाना असगर अली ख़ान। ये पुस्तक कहा जा सकता है कि मूलत: स्त्रियों के लिये एक धार्मिक संहिता है जिसमें स्त्रियों को घर कैसे चलाना चाहिये, बच्चे कैसे पालने चाहिये वगैरह बताया गया है।.....। तो ये सब जो मुद्दे हैं, इन सब विषयों को मैंने उसी अनुसार लिया है.....जैसे तलाक़ के बारे में हम लोग उतना ही जानते हैं जितना हिंदी फिल्में या धारावाहिक दिखाते हैं। लेकिन असल में तलाक़ इतना आसान नहीं होता जो हम समझते हैं। जिस स्त्री को तलाक़ दिया जाता है उसके ससुराल पक्ष और मायके पक्ष की महिलाओं और उस महिला विशेष के बीच जो लगाव होता है उसे भी मैंने दिखाने का प्रयास किया है।

मेरा जो तीसरा उपन्यास "रेत" है, जिसको कि अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान से भी नवाज़ा गया है, उस में मेरे लिये बड़ी चुनौती यह थी कि मैं मेवात के बाहर निकलूँ। इसके लिये मुझे लगभग तीन वर्षों तक मेहनत करनी पड़ी। ये उपन्यास पूरे उत्तर भारत में एक अपराधी जनजाति माने जाने वाले कंजर समुदाय पर लिखा गया है। इसमें मैंने उनके सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक पक्षों की बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन करने की कोशिश की है और निरपेक्ष भाव से उन विषयों को उठाने की कोशिश की है जो स्त्री-अस्मिता से जुड़ी हैं।

तो कहानी को मैं कैसे परिभाषित करता हूँ? इस पर अगर मैं राजेन्द्र यादव के शब्दों में कहूँ; उन्होंने इसी वर्ष एक समाचारपत्र में कहा था कि “मैं भगवानदास मोरवाल को समकालीन कथा साहित्य का इसलिये महत्वपूर्ण कथाकार मानता हूँ कि वे जो भी विषय उठाते हैं उसमें पूरी तरह उतरकर गहराई तक चीजों का अध्ययन करते हैं”। मैं किसी कहानी को परिभाषित करने के लिये, उसकी सफलता या कि वो कैसे पाठकों में अपनी जगह बना सकती है, इसके लिये तीन चीजों को महत्वपूर्ण मानता हूँ; पठनीयता, प्रामाणिकता और विषयोपयोगिता।

आप दिल्ली जैसे महानगर में रहते हैं किंतु आप के अधिकतर पात्र राजस्थान या हरियाणा के किसी गाँव से आते हैं। वे दिल्ली आते तो हैं पर वापस लौट भी जाते हैं। ऐसा क्यों?

मोरवाल: देखिये दो चीजें हैं। मानव जिस जगह का मूल निवासी है वहाँ की मूलभूत विशेषतायें उसके स्वभाव में बनी रहतीं हैं। अगर शहर में आकर उसकी मूल संवेदना नष्ट होने लगे तो वो लेखक न गाँव का रहता है, न शहर का रहता है। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात भी मैं आपको बताना चाहता हूँ। मैं पिछले पच्चीस वर्षों से दिल्ली में रह रहा हूँ जो अपने आप में एक बहुत लंबा वक़्त होता है, लेकिन मैं आज भी खुद को दिल्ली वाला नहीं मानता। मेरे पात्रों की जो मूल संवेदना, मूल चेतना है वह दरअसल लोक से ली गई है। मेरा मानना है कि जो लेखक अपने लोक को नहीं समझ सकता, उसकी संस्कृति को नहीं समझ सकता वो न किसी स्त्री-विमर्श को समझ सकता है, न दलित-विमर्श को और न हीं किसी अन्य समाजशस्त्रीय विषय को।

मूल रूप से आपके कथा-पात्र होते कौन हैं; वो वही होते हैं जो आप खुद होते हैं। किसी रचना के पात्र वही होते हैं जो हमारे आस-पास हैं। लेखक की जो स्मृतियाँ हैं, वही इन चरित्रों और पात्रों का रूप ले लेती हैं। तो ऐसी कोई शर्त नहीं है कि जो गाँव का लेखक शहर में या शहर का लेखक गाँव में जाकर बदल जाये क्योंकि बदलने की यह प्रक्रिया कोई दस दिन में हो जाने वाली नहीं होती। मूल बात है कि उस विशिष्ट लेखक की लोक संवेदनायें क्या हैं, उसके सरोकार क्या हैं, उसकी चिंतायें क्या हैं? सबसे बड़ी चीज ये कि लेखन कोई करियर बनाने का माध्यम नहीं है। अगर मैं ये कहूँ कि मैंने पिछले दस सालों में तीन उपन्यास लिखे हैं और दस साल का समय कोई कम तो नहीं होता?

यहाँ मैं आपसे जानना चाहूँगा कि आपकी नज़र में समकालीन लेखन क्या है या लेखन और विचारधारा के अंतर्संबन्धों को आप कैसे देखते हैं? ये सवाल मैं आपसे इसलिये भी पूछना चाहता हूँ कि आप इतने समय से लेखन में हैं लेकिन आप कभी विवादों में नहीं पड़े।

मोरवाल: समकालीनता की कोई एक सतह नहीं होती। समकालीनता की परिभाषा जहाँ तक मैं समझता हूँ घूम-फिर कर फिर सरोकारों पर आती है। मान लीजिये आपके समाज में परिवर्तन हो रहे हैं। जैसे हमारे यहाँ एक बडी नास्टेल्जिक अप्रोच होती है गाँवों को लेकर। आज भी हमारे अंदर ये छवि बनी हुई कि वहाँ राम-राज्य है। गाँव का आदमी बहुत सुखी रहता है। जबकि स्थिति एकदम इससे उलट है। आज आप गाँव जाकर देखें तो वहाँ के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि आने वाले दो दशकों में गाँव की परिभाषा एकदम बदल जाये। प्रोफैसर मैनेजर पांडेय के शब्दों में आज आप शहर में रहकर तो अपने पड़ोसी से बगैर दुश्मनी या दोस्ती रखे निर्वाह कर सकते हैं लेकिन गाँव में आपको अपने पड़ोसी से या तो दोस्ती रखनी पड़ेगी या दुश्मनी रखनी पड़ेगी। बगैर इसमें से किसी एक के आप वहाँ नहीं रह सकते। दूसरी बात; दूसरा जो इससे जुडा हुआ आपने सवाल किया था लेखन और विचारधारा के संबन्ध में, तो इसमें दो चीजें हैं। विचारधारा कोई ऐसी चीज नहीं है कि आप किसी विशेष विचारधारा वाली पार्टी के सदस्य हो जायें या उससे जुड़ जायें। सबसे बड़ी बात यही है कि समाज को देखने का आपका नज़रिया क्या है और ये नज़रिया बनता है आपके सामाजिक परिवेश से। आपका जो सामाजिक परिवेश है वो किस तरह का है। उदाहरण के लिये अगर मैं अपने मेवात की ही बात करूँ तो मेवात को हमारे हरियाणा में काला पानी कहा जाता है। क्योंकि मेव बाहुल्य क्षेत्र है, ये कहा जाता है कि वो तो मिनी पाकिस्तान है। और ऐसी ही अन्य धारणायें बनी हुई हैं जबकि असलियत यह है कि आज भी अगर आप मेवात में जायें तो जो साम्प्रदायिक सौहार्द, जो रहन-सहन, जो निष्कलुषता, ईमानदारी दैनिक जीवन और आचार व्यवहार में है वो बिल्कुल वही है जो एक गाँव-देहात में होती है।.......। मान लीजिये कि अगर आप ऐसे समाज के हैं कि जहाँ के लोग बगैर किसी धर्म और संप्रदाय का भेदभाव किये आपके सुख-दुख में शामिल होते हैं तो विचारधारा इससे बनती है और आपके लेखन में वही विचारधारा होती है। मेरा यह मानना है कि आपको अगर किसी लेखक की विचारधारा को जानना है तो वो उसके लेखन में पता चल जायेगी। ज़रूरी नहीं है कि नारों या वादों में फँस कर ही कोई लेखक विचारधारा का पोषक हो सकता है।

आज की तारीख में तो विचारधारा को एक तरह से हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। जहाँ तक विवादों का सवाल है, तो यहाँ मैं कहूँगा कि हमारा जो हिन्दी का लेखक है वो दिल्ली आने को बेचैन रहता है। उसे लगता है कि वो दिल्ली आकर सारे किलों को फतह कर लेगा। ऐसे में दिल्ली में रहकर भी आपको विवादों से बचना है ............इस बारे में मुझे “काला पहाड़” के बाद अहसास हुआ कि अगर आपके लेखन में ईमानदारी, अनगढ़ता है और कोई छल-प्रपंच नहीं है तो वो उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। जहाँ तक विवादों का सवाल है तो अगर मुझे विवाद पैदा करना होता तो मेरे उपन्यास “बाबल तेरा देस में” में इसके लिये बहुत गुन्ज़ाइश थी, कुरआन या बहिश्त के ज़ेवर या शरीयत के उद्धरणों की व्याख्या कर के ऐसा करना मेरे लिये बहुत आसान था।

दिल्ली में ही लगभग हजार या पन्द्रह सौ लेखक रहते हैं और जहाँ तक लेखकों की गुटबाज़ी से उठे विवादों का सवाल है तो मेरा मानना है कि गुटबाज़ी या विवादों का सहारा वही लेता है जिसे अपने लेखन पर विश्वास नहीं होता। विवाद चर्चा में आने का एक शार्टकट तो हो सकता है लेकिन वो कोई दिशा तय करने में सक्षम नहीं हो सकता। हिन्दी का पाठक इतना संवेदनशील और साथ ही निर्मम होता है कि वो ऐसी बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देता।

आपके लेखन में अलग क्या है?

मोरवाल: अगर कोई लेखक खुद ये बात कहे तो ये एक आत्मश्लाघा वाली उक्ति होगी। हर लेखक कोशिश तो यही करता है कि वो अलग दिखाई दे लेकिन सवाल है कि ये अलग है क्या? अगर किसी लेखक को अपने पाठक की नब्ज़ का नहीं पता है कि वो आपसे चाहता क्या है; उसकी अपेक्षायें आपसे क्या हैं तो मैं समझता हूँ कि वो लेखक जिस “अलग” शब्द का आपने इस्तेमाल किया उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। रचनायें तो अब हिन्दी में बहुत आती हैं जिनमें से कुछ की प्रायोजित चर्चा भी हो जाती है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि कोई लेखक इतना चर्चित हो जाता है कि हर तरफ उसका ही डंका बज रहा होता है लेकिन दस साल बाद वो लेखक कहीं नहीं होता। असल बात है कि अगर आपने अपने पाठको की नब्ज़ को पकड़ लिया है और आपको उसकी स्मृति और विवेक पर भरोसा है तो आपकी कोशिश ये रहेगी कि आप उसको पढ़ने के लिये विवश कर दें। मेरा काम करने का तरीका है कि मैं जब कोई विषय चुनता हूँ तो मेरी कोशिश होती है कि उस पर पूरा रिसर्च, पूरा अन्वेषण करके सामग्री इकट्ठी की जाये। लेखक के विचार कई बार पात्रों के संवादों में या वातावरण के चित्रण में कहाँ कैसे निकल जायेंगे, ये प्राय: लेखक को भी पता नहीं होता। तो “अलग” की जो बात है तो हर लेखक कोशिश तो करता है लेकिन ये तो पाठक पर निर्भर है कि वो उसे कैसे परखता है।

अपने जीवन और कृतित्व के बारे में साहित्य शिल्पी के पाठकों को कुछ बतायें।

मोरवाल: जीवन तो हमारा बड़ा टेढ़ा-मेढ़ा रहा है। मैं तो विशुद्ध रूप से दलितों में आता हूँ हालाँकि लोग हमें दलित नहीं मानते और दलित शब्द की संवैधानिक परिभाषा जिसके तहत आरक्षण प्राप्त होने पर ही व्यक्ति दलित माना जाता है और उसके अनुसार भी हम दलितों में नहीं आते। दरअसल मेवात को हमारे यहाँ काला-पानी कहा जाता है और ऐसे में आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस क्षेत्र को लोग काला-पानी की संज्ञा देते हों, वहाँ का जीवन और परिवेश कितना ऊबड़-खाबड़ होगा। और लेखन की बात करें तो कभी सोचा ही नहीं था कि हम लेखक बन भी सकते हैं। हमारी जो लेखकीय प्रगति हुई है, जो चीजों को देखने की एक दृष्टि विकसित हुई है वो बहुत कुछ हमारी वाचक परंपरा वाली ट्रेनिंग का नतीज़ा है। आपको जानकर हैरानी होगी कि सारिका आदि कथा पत्रिकाओं का नाम तो हमने दिल्ली आकर सुना। हाँ, आप ये कह सकते हईं कि हमारे परिवेश के चलते हमारे पास कच्चे माल की जो संपन्नता है, उसी का असर है कि चीजें कहानियों या उपन्यासों के रूप में आ पाईं।

आपकी भविष्य की क्या योजनायें हैं? अभी क्या लिख रहे हैं?

मोरवाल: हमारे देश में जो एन.जी.ओ. कल्चर या स्वयंसेवी संस्कृति बड़ी तेजी से पनपी है, इस पर कुछ काम करने का मन है। उस पर सामग्री इकट्ठी हो गई है और एक-आध वर्ष और लगाने की ज़रूरत है। जैसा कि कुछ लोग कहते हैं कि साहित्य हमारा ओढ़ना है, साहित्य हमारा बिछौना है; तो ऐसा भाव हमारे अंदर बिल्कुल नहीं है। और ऐसा भी कुछ नहीं है कि कोई विधिवत रूप से हमने अपने लिखने का कोई टाइम-टेबल बनाया हुआ है। ये मौसम पर भी निर्भर करता है, पारिवारिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है और आपका जो मानस है; कि मानसिक रूप से आप इसके लिये कितने तैयार हैं, इस पर भी निर्भर करता है। हाँ, आप ये ज़रूर कह सकते हैं कि वो जो विषय है, उसको लेकर मन में बहुत सारी चीजें इकट्ठी हो रही हैं। बाकी तो भविष्य बतायेगा कि किस रूप में चीजें निकल कर सामने आती हैं।

इंदु शर्मा कथा सम्मान के आपके लिये क्या मायने हैं?

मोरवाल: पिछले दो सालों में मुझे दो सम्मान मिले हैं जिनमें इंदु शर्मा कथा सम्मान भी एक है। पहला सम्मान जो २००७ में मिला था ’कथा-क्रम सम्मान’ और दूसरा ये इंदु शर्मा कथा सम्मान। हालाँकि इससे पहले हिंदी अकादमी, दिल्ली का भी साहित्य का सम्मान मिल चुका है। क्योंकि हमारे यहाँ ये माना जाता है कि जो सरकारी संस्थानों द्वारा जो पुरस्कार संचालित होते हैं, उनकी विश्वसनीयता हमारी नज़र में बड़ी संदिग्ध होती है; उनकी चयन-प्रक्रिया में हो सकता है कि कुछ झोल होता हो। लेकिन ये दो पुरस्कार ऐसे हैं; और भी हैं इस तरह के; कि उनमें लेखक की रचनायें हैं, लेखक नहीं है। क्योंकि अगर इनमें लेखक आता तो मैं समझता हूँ कि ये सम्मान हमें ज़िन्दगी भर नहीं मिल सकते थे। जो एक देहातीपन, एक गँवईपन हमारे व्यवहार में है, उसके चलते कोई भी आदमी एक नज़र में देख कर ये कह ही नहीं सकता कि ये आदमी लेखक भी हो सकता है। हमें सुनके बड़ा अच्छा लगा जैसा कि हमें कुछ मित्रों ने बताया, संजीव जी ने बताया, वीरेन्द्र यादव जी ने बताया और सुनते हैं कि खुद तेजेन्द्र शर्मा जी ने अपने सोविनियर में भी यह बात स्वीकार की है कि जब हमारा “काला पहाड़” आया था तो दो वर्षों तक ये शौर्टलिस्टिंग में दूसरे नम्बर पर रहा है। और ये बात संभवत: सन २००१-२ की रही होगी। जब हमें इस बात का पता चला, मैंने तभी मान लिया था कि मुझे सम्मान मिल चुका है। क्योंकि अगर आपको पता लगता है कि आपकी रचना उस सम्मान के लिये लगातार दूसरे नम्बर पर रही तो इसका मतलब है कि ये जो चयन-प्रक्रिया है वो पारदर्शी है। तो अब कोई हमको लेकर भी कोई ऐसी बात सोचता है तो ये उसकी कुंठा या बचकानापन है।

पुरुस्कारों की अगर बात करें तो मेरा मानना है कि अगर उसकी चयन-प्रक्रिया पारदर्शी है तो ये लेखक के लिये संजीवनी का काम करता है। अब इस सम्मान की खबर जब अखबारों में छपी तो ऐसे-ऐसे मित्रों के हमें फोन आये कि जिनसे मुलाकात हुये हमें बीस-बीस वर्ष हो गये। और ये जो २००९ का पन्द्रहवाँ इंदु शर्मा कथा सम्मान है ये हमें बिल्कुल उचित समय पर मिला है जब कि “रेत” की खूब चर्चा हो रही है, विवाद भी उठ रहे हैं और एक वर्ष पूरा होते-होते इसका दूसरा संस्करण भी आ चुका है। हमें ये इंदु शर्मा सम्मान ऐसे समय में मिला है जो आने वाले समय में हमें शिथिल नहीं होने देगा। क्योंकि होता क्या है कि कभी कभी आदमी को लगता है कि उसकी बहुत उपेक्षा हो रही है और ये बात उसमें एक अवसाद सा पैदा कर देती है, एक अकर्मण्यता आ जाती है कि आप अकारथ ही अपना जीवन इसमें दे रहे हैं। अचानक जब ऐसे सम्मान आपको मिलते हैं तो आपको लगता है कि नहीं, लेखन ही सर्वोपरि है। लेखक की बजाय अगर किसी रचना को सम्मान दिया जाता है तो ये उसके लिये सबसे बड़ी उपलब्धि है।

साहित्य शिल्पी के पाठकों के लिये आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

मोरवाल: पाठकों के साथ-साथ मैं साहित्य शिल्पी के संचालकों, जिनके कन्धों पर इसे चलाने की जिम्मेदारी है को कहना चाहता हूँ कि आप इस मंच के माध्यम से जैसी सामग्री प्रस्तुत करेंगे, वैसा ही आपका पाठक-वर्ग तैयार होगा। आजकल ब्लाग और साइट्स ने बहुत सारे लेखक पैदा कर दिये हैं। आज जो भी व्यक्ति लेखक बनने की महत्वाकांक्षा रखता है और तकनीकी रूप से थोड़ा भी सक्षम है वो सबसे पहले अपना ब्लाग बना लेता है। मैं मानता हूँ कि साहित्य शिल्पी यदि विचारशील है और अपनी भाषा के प्रति संवेदनशील है और वो यदि मित्रों को उपकृत करने के बजाय अच्छी सामग्री दे पाता है, पाठकों की एक अच्छी रूचि का निर्माण करता है तो न केवल साहित्य शिल्पी ही एक कहना चाहिये कि लंबी रेस का घोड़ा बन सकता है और उसका संवेदनशील पाठक-वर्ग भी उतना ही विस्तृत होगा। इसके लिये इसके चयनकर्ताओं को निष्ठुर और निर्मम होना होगा अन्यथा इसमें और बाकी ब्लागों में क्या अंतर रह जायेगा? जैसा अभी आपने मुझसे सवाल किया कि आपके लेखन में क्या अलग है; तो यही शर्त लगभग साहित्य शिल्पी पर भी लागू होती है क्योंकि दोनों ही सृजन के माध्यम हैं। आप पाठकों को जैसी मानसिक खुराक दोगे, वैसा ही आपका पाठक तैयार होगा। ये आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप उसे क्या देते हो। मैं ऐसे-ऐसे ब्लाग भी देखता हूँ जिनमें बस चुटकलेबाजी होती है। कविता तो जैसे आलू की सब्जी हो गई है कि जो चाहे खा ले। साहित्य के लिये साधना और तपस्या की ज़रूरत होती है। ये मैराथन दौड़ है। आदमी के स्टेमिना का तभी पता लगता है जब वो बाइस या बयालीस किलोमीटर दौड़ता है। ये कोई सौ मीटर की दौड़ नहीं है जहाँ सैकंड्स में लोग रिकार्ड बना लेते हैं।
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25 comments:

  1. भगवान दास मोरवाल जी को इंदु शर्मा सम्मान के लिये बधाई। अच्छा साक्षात्कार है। मोरवाल जी नें भी विषय में पूरे और गहरे उतर कर विस्तार से उत्तर दिये है।

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  2. आम आदमी और उनके सरोकारों से जुडा लेखक अपनी पहचान बनाये रख सकता है। मोरवाल जी सम्मान के लिये बधाई स्वीकारें।

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  3. Indu Sharma Samman se sammNit Shri Bhagwandas Morwalji ko dher saaree badhai aur oonhone jis belaag tareek se apne mun ki baat iss saakshatkaar mein kahi hai, yahi oonke mun ki pardarshita ko darshata hai. morvaljika kahna bilkul sahi hai hum pahale apne lok ko jaan lein stree vimarsh ya kisi aur vimarsh kibaat baad mein jaaneiN.badhia interview hai.


    rajeevji aur ajay ka aabhar ki itne kam samay mein itna badhia interview liya aur hum tak pahunchaya bhee.

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  4. भगवान दाल्स मोरवाल जी से बातचीत को पढना अच्छा लगा। उन्हे पुरस्कार की हार्दिक बधाई। साहित्य शिल्पी यदि पुरस्कृत उपन्यास का "अंश" भी प्रस्तुत करे तो लेखक और और जानने का सु-अवसर आपके माध्यम से मिल सकेगा।

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  5. पंकज सक्सेना15 मई 2009 को 2:32 pm

    "मूल रूप से आपके कथा-पात्र होते कौन हैं; वो वही होते हैं जो आप खुद होते हैं। किसी रचना के पात्र वही होते हैं जो हमारे आस-पास हैं। लेखक की जो स्मृतियाँ हैं, वही इन चरित्रों और पात्रों का रूप ले लेती हैं। तो ऐसी कोई शर्त नहीं है कि जो गाँव का लेखक शहर में या शहर का लेखक गाँव में जाकर बदल जाये क्योंकि बदलने की यह प्रक्रिया कोई दस दिन में हो जाने वाली नहीं होती। मूल बात है कि उस विशिष्ट लेखक की लोक संवेदनायें क्या हैं, उसके सरोकार क्या हैं, उसकी चिंतायें क्या हैं? सबसे बड़ी चीज ये कि लेखन कोई करियर बनाने का माध्यम नहीं है।"
    सोलह आना खरी बात कही है आपनें। मेरी भी बधाई स्वीकार करें।

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  6. sahityashilpi team ka ek ghalti ki taraf dhyan aakrasht karna chahatee hooN ki morwal ji ka naam Indu Sharma Samman ke liye namit nahin balki ghoshit kiya gaya hai. pl isko correct kar leejiye. he is not nominated. he has been selected amongst so many writers. pl. correct it.

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  7. Nice Interview. Congrats Morwal ji.

    Alok Kataria

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  8. भगवानदास मोरवाल जी को इंदुशर्मा कथा सम्मान के लिये बधाई। मोरवाल जी के विचार पढ कर अच्छ लगा।

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  9. हिन्दी साहित्य का दुर्भाग्य

    इन्दु शर्मा सम्मान का इतिहास उठाकर यदि देखा जाये तो अपवादस्वरूप नासिरा शर्मा , असगर वजाहत और संजीव को छोड़कर शेष सभी लेखकों को या तो उनके जुगाड़ के कारण या देनेवालों के अपने किन्हीं हितों के कारण यह सम्मान दिया गया.

    हिन्दी साहित्य में भगवानदास मोरवाल भी एक ऎसा ही नाम है जो अपने जुगाड़ों , जोड़-तोड़, और राजनीति के लिए जाना जाता है. ’रेत’ जैसे स्तरहीन उपन्यास को यह सम्मान देकर एक बार फिर इन्दु शर्मा समिति ने यह सिद्ध कर दिया है कि उनकी अपनी भी कोई राजनीति है.

    क्या आज तक उदयप्रकश जैसे प्रतिभाशाली कथाकार की कोई कृति इन्दु शर्मा अंतर्रास्ष्ट्रीय सम्मान के योग्य समिति को नजर नहीं आयी? और पुरस्कार की रपट के साथ आखिर किन कारणॊं से निर्णायक मण्डल के लोगों के नाम घोषित नहीं किए जाते! वैसे यह जिनके द्वारा दिया जाता है उन्हें यह पूरी स्वतंत्रता है कि वह जैसा चाहें करें, क्योंकि यह एक निजी संस्था द्वारा दिया जानेवाल सम्मान है और इस संस्था की राजनीति जनता के सामने अब छुपी नहीं रही है.

    प्रफुल्ल कुमार

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  10. BHAGWAN DAAS MORWAL JEE KO INDU
    SHARMA SAMMAAN MILNE KEE AGRIM
    BADHAAEE.RAJIV RANJAN PRASAAD AUR
    AJAY YAADAV KAA UNSE SE SANVAAD
    BAHUT ACHCHHA HAI.SAARE KE SAARE
    PRASHN AUR UTTAR SANTOSH JANAK
    HAIN.BADHAAEE

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  11. भगवान दास मोरवाल जी...." इंदु शर्मा " सम्मान के लिये ...

    बधाई।

    साक्षात्का रपढ कर अच्छ लगा |

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  12. मोरवाल जी को बहुत बहुत बधाई। प्रफुल्ल कुमार जी की आलोचना भी पढी। साहित्य जगत बहुत निर्विवाद तो नहीं रह गया है लेकिन तथ्यहीन आरोप भी लगाने की प्रवृत्ति भी उसी खेमेबाजी का हिस्सा जान पडती है। जिस खेमे का साहित्यकार छूट गया उसे दूसरे को पुरस्कार मिलने पर हिन्दी साहित्य का दुर्भाग्य नजर आता है।

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  13. मोरवाल जी बधाई। साहित्य शिल्पी का इस साक्षात्कार को प्रस्तुत करने के लिये धन्यवाद।

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  14. इंदु शर्मा कथा सम्मान के आयोजकों, कथा यू.के की पूरी टीम को पंद्रहवें आयोजन की शुभकामनायें। मोरवाल जी को बधाई।

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  15. प्रफुल्‍लजी,

    इस तरह की बातें करना शोभा नहीं देता। यद‍ि आप किसी का सम्‍मान नहीं कर सकते तो अपमान करने का अधिकार किसने दिया है। निजी संस्‍था होकर भी पूरे विश्‍व में इसका डंका बजता है। यह संस्‍था अपने पारदर्शी चुनाव के लिये मशहूर है। आपसे किसी की खुशी नहीं देखी जाती तो यह आपका प्राब्‍लम है।

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  16. विवाद क्यों? साहित्य और हिन्दी को एसे और भी पुरस्कारों की आवश्यकता है। हम हिन्दी सेवी ही हिन्दी की दुर्दशा भी करते हैं।

    मोरवाल जी को बधाई।

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  17. Morwal ji ka interview bahut achha raha
    unhone ghare aur bhaut achhe uttar diye

    khas kar ek baat bahut pasand aayi

    ye koi 100 meetar ki dodh nahi.........

    aur jaisa padhne ke liye denge waise hi pathak honge.......

    bahut achhi baat

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  18. भगवानदास मोरवाल जी का इंटरव्यू पढ़ा.'' रेत '' उपन्यास अभी मैंने Pustak.org से मँगवाया है,कल ही मेरे पास पहुँचा है.अभी पढ़ा नहीं. पर बिना पढ़े ही इंटरव्यू से बहुत कुछ समझ गई हूँ . स्पष्ट सोच, सच्ची और ईमानदार बातचीत- उत्तम प्रश्नों के लिए राजीव रंजन प्रसाद एवं अजय यादव को बहुत -बहुत बधाई . मोरवाल जी, पन्द्रहवें अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के लिये आपको हार्दिक बधाई!

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  19. bhagwaan das ji ko is samman ke liye badhai aur sahityashilpi ko bhi is prastuthi ke liye badhai ...

    kaafi rochak vaarta hai ,,bahut si baato par prakash padha hai ..

    aabhar

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  20. प्रफुल्ल जी,
    आपने जो कहा ठीक है आप जैसा चाहें कह सकते हैं सबको स्वतंत्रता है पर उदय प्रकाश का नाम लेकर उन्हें बेकार ही बदनाम किया। किसी भी पुरस्कार से लेखक बड़ा या छोटा नहीं हो जाता। क्या जिन हज़ारों लेखकों को इंदु-शर्मा पुरस्कार नहीं मिला वह सब अयोग्य हैं? हर संस्था के अपने मानदंड होते हैं। पुरस्कार किसी लेखक को महान नहीं बनाते। साहित्य की दुनिया में प्रेमचंद ऐसा नाम है जिसे कोई तत्कालीन पुरस्कार नहीं मिला पर वे निर्विवाद रूप से हिंदी से सर्वश्रेष्ठ कहानी और उपन्यास लेखक हैं।

    सुपर्णा यू.एस.ए.

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  21. मोरवाल जी को बहुत-बहुत बधाई । किसी भी पुरस्‍कार की गरिमा को बनाने-बिगाड़ने वाले हम साहित्‍यकार ही हैं । वो साहित्यिक कृति ही क्‍या जिसका सामान्‍य पाठक से कोई लेना-देना ही न हो, बिना उसके वो कृति कुछ दिनों में ही लुप्‍त हो जाती है । मोरवाल जी का यह विचार कि लेखन कोई करियर बनाने का माध्‍यम नहीं है, बिल्‍कुल ठीक है और पुरस्‍कारों की होड़ में रचना की भाषा और शैली के साथ'साथ उसका समाज से जुड़ाव भी अत्‍यंत आवश्‍यक है ।

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  22. बेनामी या छद्म नामों से टिप्पणियाँ वही करते हैं जो सामने आने से डरते हैं। जिनके अपने पांवों के नीचे ज़मीन नहीं होती, वे दूसरों के पांवों के नीचे की ज़मीन खिसकाना चाहते हैं। कौन है ये प्रफुल्ल कुमार ? और कौन है ये सुपर्णा ? प्रफुल्ल कुमार की टिप्पणी भी छ्द्म टिप्पणी है तो सुपर्णा जी की(अगर कोई हैं इस नाम से) भी तो छद्म ही प्रतीत होती है। नेट पर हिन्दी ब्लॉग/वेब पत्रिकाओं से जो परिचित हैं और इनपर आते-जाते हैं, वे सब जानते हैं कि इन नामों से पहले कहीं किसी ब्लॉग या वेब पत्रिका में टिप्पणी दिखाई नहीं दी। ब्लॉगर या वेब पत्रिकाओं के संपादकों को ऐसी विवादास्पद टिप्पणियों की प्रामाणिकता को जांचे बगैर नहीं लगाना चाहिए। कुछ लोगों को विवादों को ज्न्म देने की आदत होती है, पर जो लोग काम में यकीन रखते हैं वे चुपचाप अपना काम किए जाते हैं। "साहित्य शिल्पी" को टिप्पणी छापने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखना चाहिए और अगर टिप्पणी सार्थक और प्रामाणिक प्रतीत हो तभी उसे प्रकाशित करे। इससे व्यर्थ के विवाद नहीं उठेंगे और पाठक भी ऐसी बेसिरपैर की टिप्पणियों पर अपनी ऊर्जा व्यर्थ में नहीं गवांएंगे।

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  23. इन्दूशर्मा सम्मान से विभूषित श्री भगवान दास मोरवाल जी के साथ इस साक्षात्कार के लिये राजीव जी व अजय जी बधाई के पात्र है.

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