........साहित्य शिल्पी एक पूर्ण वेबसाईट में परिवर्तित हो चूका है। अब हमारी रचनाये यहाँ पढ़े... - www.sahityashilpi.in तथा कृपया हमें अपनी प्रतिक्रिया एवं सुझावों से अवश्य अवगत करायें जिससे हम आवश्यक सुधार कर सकें.....

बुधवार, १८ फरवरी २००९

ताजमहल केवल पत्थरों से नहीं बनते [इंदु शर्मा जी से जुड़े तेजेन्द्र शर्मा के संस्मरण] - राजीव रंजन प्रसाद

ताजमहल को देख घंटों खड़ा रहा था। पिघलती हुई शाम ताज पर इस तरह झुकी हुई थी जैसे उसे चूम कर अलविदा कहना चाहती हो। मैंने दूर उस महल की ओर भी देखा जहाँ शाहजहाँ ने अपने आख़िरी दिन ताजमहल को निहारते हुए काटे थे; उसकी खामोशी अब भी कुछ कहती है। ताजमहल तब से मेरे भीतर शाहजहाँ का दिल बन कर रहा है। मैंने हमेशा यह महसूस किया है कि प्रेम जीना सिखाता है, प्रेम वह जिजीविषा पैदा कर देता है जिससे कुछ कर गुज़रने की हूक उठती है। बात यहाँ से इस लिये आरंभ कर रहा हूँ क्योंकि जब तेजेन्द्र शर्मा कहते हैं कि “ताजमहल केवल पत्थरों से नहीं बनते” तो पाता हूँ कि हर आदमी का अपना ताजमहल है और वही उसे कहता है चरैवेति-चरैवेति।

उस सारे दिन तेजेन्द्र जी के साथ था। शाम एक कार्यक्रम से लौटते हुए हल्की हल्की थकान सब पर हावी थी। ऐसे में या तो कुछ गुनगुनाने की इच्छा होती है या अपने ही भीतर डूब जाने की। शायद तेजेन्द्र अपने ही भीतर डूबे हुए थे। मेरे हाथ में एक पुस्तक थी जिस पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था “इंदु शर्मा कथा सम्मान” और मुखपृष्ठ पर एक चित्ताकर्षक तस्वीर मुद्रित थी। मैं यह तो जानता था कि इंदु जी, तेजेन्द्र शर्मा जी की दिवंगत पत्नी हैं और इंदु शर्मा कथा सम्मान उनकी स्मृति में स्थापित किया गया है। यह भी जानता था कि गहरे रिश्तों के कारण ही ताजमहल बना था और यह सम्मान….केवल इंदु जी को याद रखने की कोशिश भर नहीं है। तेजेन्द्र शर्मा से कहानी पर बात करना तो आसान है लेकिन इंदु जी पर बात करना...मेरे मन में एक हिचक थी। लेकिन माहौल ने मुझमें हिम्मत भरी और मैंने उनसे यह बेहद निजी सवाल पूछ ही लिया - “इन्दु जी के बारे में कुछ बतायें।“ कुछ पल वातावरण शांत रहा।

मुझे लगा जैसे मुझे यह प्रश्न नहीं करना चाहिये था। किंतु अगले ही क्षण ख़ामोशी टूटी और तेजेन्द्र जी ने कहना आरंभ किया “इन्दु जैसे व्यक्तित्व बहुत कम पैदा होते हैं। मैं जैसे एक तरह का ‘रॉ-मैटीरियल’ था - इंसान के तौर पर; इन्दु ने मुझे तराशा, ज़िंदगी के वो फ़ाइन ऐलीमेंट्स सिखाये जिनसे मैं एक बेहतर इंसान बन पाया। उसने मुझे एक चीज़ बताई कि मैं जीवन में कभी उतावला न होऊँ। मेरी एक आदत थी कि आई कुड नेवर स्टैंड मीडियोकर्स। वो मुझे हमेशा कहती थी कि आप हर व्यक्ति को अपनी इंटैलीजेंस से कैसे नाप सकते हैं? आप हर व्यक्ति को ये लिबर्टी दीजिये कि वो अपनी इंटैलीजेंस के हिसाब से जिये और आप अपनी इंटैलीजेंस के हिसाब से।”

बात एक दर्शन से आरंभ हुई थी। लेकिन स्वयं कथाकार के लिये इस दर्शन से इतर इंदु जी क्या थीं, यह भी मैं समझना चाहता था। तेजेन्द्र जी ने अपनी बात जारी रखी “कोई भी व्यक्ति इन्दु को एक बार मिल ले तो ये हो ही नहीं सकता कि वो इन्दु का मुरीद न बन जाये.....और मुझे इस बात से फ़ख्र महसूस होता था कि कोई भी राह चलता आदमी इन्दु को देख के दोबारा मुड़ के ज़रूर देखता था। उसकी जो अपीयरेंस वाली खूबसूरती थी, वो हर आम आदमी को दिखाई देती थी किन्तु उसकी भीतरी ख़ूबसूरती मैं महसूस कर सकता था। मेरे मित्र-वर्ग में जितनी पत्नियाँ थीं, उन सबके राज़ इन्दु को मालूम थे; इन्दु क्या है ये कभी किसी को नहीं पता चला। किन्तु इन्दु के ज़रिये कभी किसी के राज़ किसी को पता नहीं चलते थे। उसमें पता नहीं क्या था कि जो भी उससे मिलता, अपने राज़ उसे बताने को आतुर हो जाता। उसने बच्चों में अच्छे संस्कार डाले.....

इन्दु ने मुझे एक बेहतर इंसान बनाया; इन्दु ने मुझे कहानीकार बनाया। इन्दु को मेरे सभी दोस्त पसंद करते थे। कम शब्दों में सटीक बात कहती थी; एक अक्षर फ़ालतू नहीं बोलती थी। ए परफ़ेक्ट सोल, इन ए परफ़ेक्ट बौडी।“

मैं वाक्यों के बीच बीच ली गयी गहरी साँसों के अर्थ जानता था। लेकिन बहुधा ऐसे अवसर नहीं मिलते कि किसी लेखक को इतनी अंतरंगता से समझा जा सके। मैं उन्हें ध्यान से सुन रहा था। थोड़ा रुक कर वे बताने लगे “ये जो ’इन्दु शर्मा कथा सम्मान’ है, ये चालीस साल से कम उम्र के लोगों के लिये शुरू किया गया था। मुझे लगता था कि जिस तरह इन्दु ने मुझे गाइड किया, चालीस साल से कम उम्र के लोगों को अपनी याद से गाइड करेगी। ये जो टुकड़ा-टुकड़ा इन्दु बाँटने वाली बात थी, ये चालीस साल से कम उम्र के लोगों के लिये थी कि तुम इतने लकी नहीं हो कि इन्दु तुम्हारे पास हो। चलो मैं अपनी इन्दु का कुछ हिस्सा तुम्हें देता हूँ। पर मैं कभी भी इतना नहीं कर पाऊँगा कि मैं कह सकूँ कि "इन्दु! देखो तुमने जो किया था, उसका हिसाब मैंने पूरा कर दिया; क्योंकि ये हिसाब-किताब का रिश्ता था ही नहीं, ये भावनाओं का रिश्ता था और भावनाएं तब तक रहेंगी जब तक कि सीने में दिल है। जब वो धड़कना बंद कर देगा तो... ..इन्दु का नाम आसमान पे लिखना चाहता था; जब हर साल ’हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स’ में नाम लिखा जाता है तो लगता है कि जो चाहा था उसका कुछ हिस्सा तो पूरा हो गया। शायद आगे भी कुछ हो पाये!।

“आपका ये प्रेम-विवाह था?” मुझसे रहा नहीं गया। तेजेन्द्र शायद इस प्रश्न से कुछ असहज हुए और बताने लगे “ये ऐसा प्रेम-विवाह था जो माँ-बाप की मर्ज़ी से, सामाजिक तरीके से हुआ। हमने अपनी माँ को बताया कि हमें ये लड़की पसंद है और ब्राह्मण होते हुये... ये जात-पात की बात नहीं है, ये एक फैक्चुअल स्टेटमेंट है। इन्दु का परिवार ’सूद’ परिवार था जो बनिये होते हैं। पर मेरे माँ-बाप ने कोई अड़चन पैदा नहीं की। उन्होंने कहा कि लड़की इतनी अच्छी है.. एक्चुअली हमारा बेटा ब्राह्मण नहीं है, हमारी बहू ब्राह्मण है। तो ये प्रेम-विवाह इस तरह हुआ।” फिर कुछ पल कोई कुछ न बोला।

बड़े बड़े प्रश्नों से मैं तेजेन्द्र जी को बाधित नहीं करना चाहता था सो इतना ही पूछा - इन्दु जी का कृतित्व... वो लिखतीं भी थी? तेजेन्द्र बताने लगे “इन्दु को सिर्फ़ लिखने का शौक था। वो अपनी फीलिंग्स, अपने विचार काग़ज़ पे लिख लेती थी लेकिन उसने कभी छपने के एंगिल से उन्हें पॉलिश नहीं किया। मेरे बहुत कहने पर उसने अपनी दो कहानियाँ फेअर की थीं। एक तो ’सारिका’ में छपी थी और एक ’नवभारत टाइम्स’ में। एक कहानी का मुझे नाम याद है "मध्यान्ह के बाद"। उसकी दो-तीन कवितायें जो फ़ेअर की हुईं थीं, वो उसकी मृत्यु के बाद ’जनसत्ता’ की मैगज़ीन सबरंग में छपीं थीं....मेरी हिम्मत नहीं थी कि मैं उसके लिखे को बदलूँ या उसे तराशूँ। क्योंकि मुझे लगता था कि जो मुझे तराशती थी, मैं भला उसके लिखे को कैसे तराश सकता हूँ। जो उसका लिखा हुआ था वो साफ़ पता लगता था कि अभी दिमाग में कुछ आया और उतार दिया..... बस यही कुछ डायरियों में कुछ पन्ने हैं... वो कहती थी कि "आपको छपने का शौक है, आप छप रहे हो न! ज़रूरी तो नहीं कि एक घर में दो हों।" बस ....”

“इन्दु जी पर कभी कोई कहानी लिखी आपने?” मैने बात आगे बढ़ाई। कुछ सोचने की ख़ामोशी दे कर तेजेन्द्र जी ने कहा “मेरी कई कहानियों में उसका प्रतिबिम्ब है। चित्रा मुद्गल ने एक बार मुझे कहा था "तेजेन्द्र! तुम्हारी कहानियों में पत्नी की जो छवि है, उससे मुझे जलन होती है। अवध (अवध नारायण उनके पति हैं) की कहानियों में पत्नी बिल्कुल अलग होती है।" मैंने कहा था कि जिसकी पत्नी इन्दु होगी, उसकी कहानियों में छवि भी वैसी ही आएगी।

अगर आप मेरी कहानी पढ़ेंगे... कैन्सर, ईंटों का जंगल या अपराधबोध का प्रेत, पासपोर्ट का रंग..... इन्दु जैसे लोग ज़्यादा दिन नहीं जीते। वो तो जैसे कोई महान आत्मा थी जो कुछ समय के लिये धरती पर आ गई थी.... ताजमहल सिर्फ ईंटों के नहीं बनते, ताजमहल भावनाओं के भी बनते हैं; और मेरी भावनाओं का ताजमहल है कि मैं इन्दु का नाम आसमान पर लिख सकूँ.......

मैं ज़्यादातर बाहर दौरे पर रहता था। तो एक बड़ा अच्छा फायदा इसका ये था कि हमारी रिलेशनशिप हर दस दिन के बाद एक नई रिलेशनशिप होती थी। अगर बीच में ब्रेक मिलता रहता है तो यू कैन गेट ब्रीदिंग स्पेस। मैंने महसूस किया है कि जब आप दूर होते हैं तो आपको अपने पार्टनर की अच्छी बातें याद आती हैं। और जब रोज़ साथ में रहते हैं तो उसकी नेगेटिव बातें भी दिखाई देती हैं। मुझे पता रहता था कि मैं जब फ़्लाइट से वापस आऊँगा तो उस शाम या नेक्स्ट शाम पूरा परिवार बाहर खाना खाने जाएगा। उसका एक भी कपड़ा ऐसा नहीं था जो उसने स्वयं ख़रीदा हो। उसकी हर चीज़ मैं पसन्द करता था, उसके सूट, उसकी साड़ियाँ; डिजाइनिंग करवाने भी मैं उसके साथ जाता था।

जब शादी हुई तो उसके बाल लम्बे थे। एक बार हमें फिल्म देखने जाना था। मैंने कहा कि चलो तैयार हो जाओ। उसके बाल बहुत घने और कर्ली थे तो जब वो कंघी करने खड़ी हुई तो आधा घंटा तो कंघी करने में ही लग गया। उस दिन तो हम फ़िल्म देखने नहीं गये, मगर मैं उसको ओबेराय होटल ले गया और वहाँ जाकर उसके बाल कटवा दिये। मैंने कहा कि अब कभी बालों की वज़ह से फिल्म नहीं छूटेगी। उसने कहा कि "अगर मैं तुम्हें ऐसे ही अच्छी लगती हूँ तो ऐसे ही सही।" आलदो वी हेड ए लव-मैरिज; तो ये नैचुरल था कि वो मुझे नाम लेकर बुलाती, पर उसने कभी मुझे नाम ले कर नहीं बुलाया। हमेशा "सुनो" ही कहा करती थी.....

एक बार की बात है; मेरा एक दोस्त था, धीरेन्द्र अस्थाना, जो कि एक अच्छा कहानीकार है, उसके घर की छत उड़ गई। वो कांदिवली के चारकोप इलाके में रहता था। उसका फ़ोन आया। उसने कोई दस-पन्द्रह लोगों को फोन किया होगा; सबने अफ़सोस किया और बस.... इन्दु को मैंने बताया कि अभी धीरेन का फोन आया है कि घर की छत उड़ गई। उसे एक मिनट भी नहीं लगा, बोली कि उन्हें फ़ोन कीजिये कि हम दोपहर का खाना लेकर आ रहे हैं। उसने जल्दी से खाना बनाया और जब हम लोग चलने लगे तो अलमारी में से दो हज़ार रुपये निकाले और बोली कि "ये जेब में रखिये।" मैंने पूछा, "क्यों" तो बोली कि "ये उन्हें दीजियेगा कि वो अपनी छत ठीक करा लें।"......आमतौर पर मैंने ऐसी बीवियाँ देखीं हैं कि आप किसी दोस्त के लिये कुछ पैसे माँगे तो वो लड़ पड़ें कि भई क्या मतलब है। यहाँ दूसरी ही बात थी... ....

उसको मुझसे ये शिकायत भी रहती थी कि "यू आर नॉट पोज़ेसिव अबाउट मी"। मैं कहता था कि इसका क्या मतलब है। "नहीं, कोई मेरे से बात करता है तो आप जैलस नहीं फ़ील करते।" इन्दु की सोच के मुताबिक जो आदमी प्यार करता है, उसे जैलस होना चाहिये। मैं उसको कहता था कि "भई देखो! क्योंकि मैं जैलस नहीं हूँ, इसलिये तुम इसकी क़दर नहीं करतीं।" मैंने अंग्रेज़ी लिटरेचर में एक नाटक पढ़ा था "ओथेलो"; वह एक जैलस आदमी था। मुझे वह चरित्र कभी अच्छा नहीं लगा। लगता था कि अगर ऐसे नेचर की वज़ह से मेरे साथ ऐसा कुछ हुआ तो मैं अपने आप को माफ़ नहीं कर पाऊँगा। .... तो ये कुछ बातें हम आपस में किया करते थे..........

उसको लेक्चरर की नौकरी मिल गई थी। पर बच्चे छोटे थे, उनका कुछ इन्तज़ाम नहीं हो पा रहा था, तो उसने वो अपाइन्टमेंट लैटर वापस कर दिया...... कई बातों में हमारे विचार एकदम अलग-अलग थे। उसे नौशाद और शकील बदायूँनी के गीत अच्छे लगते थे और मुझे शंकर-जयकिशन और शैलेंद्र के। वो अमिताभ बच्चन को दुनिया का सबसे श्रेष्ठ अभिनेता मानती थी। उसका कहना था कि जिस सीन को अमिताभ सरलता से कर लेते हैं, उसे कोई और नहीं कर सकता। उनकी प्रिय अभिनेत्री नूतन थी। राजकपूर की ब्लैक एण्ड व्हाइट फ़िल्में हम दोनों को अच्छी लगती थीं। बहुत अच्छा गाती थी... बहुत सुरीली थी और बहुत सुघड़ भी। घर की हर चीज़ सिलनी आती थी उसे। वो पर्दे सिल लेती थी, कपड़े सिलती थी, कढ़ाई करती थी, स्वैटर बुन लेती थी। जैसी पत्नी हर मध्यवर्गीय व्यक्ति चाहता है कि पत्नी मॉड भी हो और ट्रैडीशनल भी; तो वो बिल्कुल ऐसी ही थी... एकदम परफ़ैक्ट। और पढ़ाई में इतनी कमाल थी कि हायर सैकेन्डरी में पूरे सैन्ट्रल बोर्ड में फ़र्स्ट आई तो बी.ए. ऑनर्स में पूरी यूनिवर्सिटी में। एम.ए. में भी आती पर उसके पिताजी की मौत हो गई और फिर मैं मिल गया उसको।

[तेजेन्द्र जी व उनका परिवार:- बायें - यश (तेजेन्द्र जी के नाती), मध्य उपर- दीप्ति, मयंक व तेजेन्द्र जी, मध्य नीचे - मयंक व उन्नति, दायें - अरुण व दीप्ति]

विवाह के बाद हम दोनों मुंबई रहने के लिये आ गये। हमने अपना जीवन एक किराए के कमरे से शुरू किया था - 800 रूपये महीने; कफ़ परेड, मुंबई में। बीस रुपये महीने किराए पर एक अल्मारी ली थी और एक डोली (दूध वगैरह रखने के लिये) पन्द्रह रुपये महीने किराए पर। हमारा संघर्ष साझा था। उन दिनों की यादें आज भी ज़िन्दा रखे हैं। जब इंदु अपनी अंतिम यात्रा पर निकली तो हमारे पास एक फ़्लैट मुंबई में था और एक दिल्ली में। और मेरे पास थे मेरी बेटी दीप्ति और बेटा मयंक। आज दीप्ति का विवाह हो चुका है अरुण के साथ और उनका एक छोटा सा पुत्र है यश। मयंक का विवाह मुंबई की उन्नति के साथ तय हो चुका है।

इंदु ने करीब करीब सा़ढ़े चार वर्ष तक कैंसर से लड़ाई की। मुझे याद है कि हम लोग पूरा परिवार लंदन छुट्टियां मनाने गये थे; शायद 1990 की बात है। वहाँ उसने मुझे बताया था कि उसे बाईं ब्रेस्ट में एक लम्प महसूस हो रहा है। वापिस मुंबई आकर चेक करवाया। जिस दिन उसे बायोपसी का रिज़ल्ट मिलना था, मैं रोम की उड़ान पर गया था। जब वहां से फ़ोन पर इंदु से बायोपसी के बारे में पूछा तो बहुत ही सधी हुई आवाज़ में जवाब मिला - अच्छा रिज़ल्ट नहीं है। बता रहे हैं कि कैंसर है। मैं उसी पल भारत वापिस पहुंचा। इंदु की सर्जरी महीने भर के भीतर हो गई। सर्जरी के पहले और बाद की हमारी आपस की बातों से मुझे पता चला कि वह कितनी बुलंद इन्सान है और मैं कितना छोटा। इस विषय को लेकर ’कैंसर’ और ’अपराध-बोध का प्रेत’ नाम की दो कहानियाँ लिखी हैं मैंने। उसके अंतिम दिनों तक टेलिफ़ोन पर कभी कोई नहीं महसूस कर सकता था कि यह आवाज़ कुछ ही दिनों बाद हमेशा के लिये चुप हो जाने वाली है।

इंदु अपने अंतिम दिनों में एक विचित्र स्थिति से गुज़र रही थी। वह जानती थी कि अब कुछ ही दिनों का जीवन बाक़ी है। वह पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखती थी। उसका कहना था जो है बस इसी जीवन में है। मुझे कहा करती थी कि अपने आपको सुधार लो। जब मैं नहीं रहूंगी, कौन तुम्हें याद दिलाएगा कि दराज़ बन्द कर लो, अलमारी बन्द कर दो। मैं रद्दी अख़बार बैठक में रख कर भूल जाता था। कई कई दिन वो अख़बार वहीं पड़े रहते। इंदु की मृत्यु के पश्चात दो हफ़्तों तक अख़बार वहीं प़ड़े रहे। किसी ने डांट लगा कर उठाने के लिये नहीं कहा। सोच सोच कर रोता रहा और एक कविता लिख डाली।

ज़िन्दगी के हर पहलू के साथ इंदु जुड़ी है। उससे अलग हो की जीवन के बारे में सोच ही नहीं सकता। उसके कमरे में जब उसे ऑक्सीजन लगा दी गई तो वह कमरे में लगी दीवार घड़ी को देखती रहती थी। उस घड़ी के डायल में मकड़ी का एक जाला बना था। बस उस जाले का अर्थ समझने का प्रयास करती रहती। अपनी कहानी ‘बेघर आंखें’ में मैनें उस घड़ी और इंदु का चित्रण किया है।

इंदु का जो चित्र पूरी दुनिया देखती है, उसकी मृत्यु से करीब पाँच महीने पहले का है। उन दिनों वह अपनी बाज़ू ऊपर उठा कर ब्लाउज़ तक नहीं बदल सकती थी। उस फ़ोटो में इन्दु ने जो चेन पहन रखी है वो मेरी एअर इंडिया की मित्र मीनाक्षी की है। मीनाक्षी ही हमें जगदीश माली के पास ले कर गई थी फ़ोटो सेशन के लिये। इंदु जैसे लोग रोज़ रोज़ जन्म नहीं लेते। इंदु की मृत्यु के बाद मैंने कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं कि -

दरख़्तों के साये तले
करता हूँ इन्तज़ार
सूखे पत्तों के खड़कने का
बहुत दिन हो गए
उनको गए घर बाबुल के।

रास्ता शायद यही रहा होगा
पेड़ों की शाखों और पत्तों में
उनके ज़िस्म की ख़ुशबू बस के रह गई है

पत्ते तब भी बेचैन थे
पत्ते आज भी बेचैन हैं
उनके कदमों से लिपट के खड़कने के लिये

पर सुना है
कि रूहों के चलने से
आवाज़ नहीं होती...

गाड़ी चलती रही। हमने इस कविता के बाद इस संदर्भ पर बात नहीं की। मैं पूछना चाहता था कि जब इंदु जी कैंसर से जूझ रही थीं तो उनकी मनोदशा क्या थी? लेकिन मैं उस शाहजहाँ से क्या पूछता जिसे ताजमहल देख कर ही जीना था?


तेजेन्द्र शर्मा आज के समय के प्रमुख कथाकारों में हैं। प्रस्तुत है उनका साक्षात्कार जिसे मधु अरोरा जी ने साहित्य शिल्पी के पाठकों के लिये प्रस्तुत किया है। तेजेन्द्र के व्यक्तित्व व रचना प्रक्रिया को समझने में सहायक इस साक्षात्कार को पढने के लिये प्रस्तुत चित्र पर चटखा लगायें।

 </span> title=

49 comments:

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

एसा साक्षात्कार है जिसमें प्रस्तुत संस्मरण को पढ कर कहानीकार की अपनी कहानी भी पता चलती है और यह भी ज्ञात होता है कि इस कहानीकार के कथानकों के पीछे की वेदना का सच क्या है। ताजमहल के उपमान से लेख में सुन्दरता बडी है।

Arvind Mishra २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

तेजेंद्र शर्मा से बातचीत और इंदु शर्मा से जुड़े संस्मरणों को आपने बहुत सलीके से लिपिबद्ध किया है -सुंदर प्रस्तुति !

madhu २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

श्री तेजेन्‍द्र शर्मा के इन्‍दु शर्मा से जुड़े संस्‍मरण पढ़कर दिल भर आया। अपनी पत्‍नी के प्रति इतना समर्पण विरला ही देखने को मिलता है। इंदुजी की याद में शुरू किया गया सम्‍मान अपनी पराकाष्‍ठा पर है। तेजेन्‍द्रजी आपकी भावनाओं की कद्र करती हूं। इंदुजी की यादों को अपने पाठकों के साथ शेयर किया, आपका आभार। राजीवजी, आपने एक लेखक की भावनाओं से पाठकों को रूबरू कराया, शुक्रिया।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

It is a truth that behind every successful man there is a women.

Alok Kataria

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

"लेकिन मैं उस शाहजहाँ से क्या पूछता जिसे ताजमहल देख कर ही जीना था?"
-----
अच्छा लेख और साक्षात्कार है।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

इन्दु जी जैसा मधुर व्यक्तित्व और उनसे बिछोह अनुभव करते तेजेन्द्र जी पर
श्रध्धा और ज्यादा बढ गई -
मेरे श्रध्धा सुमन अर्पण करती हूँ और बच्चोँ को स स्नेह आशिषे देती हूँ
- लावण्या

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

"जब तेजेन्द्र शर्मा कहते हैं कि “ताजमहल केवल पत्थरों से नहीं बनते” तो पाता हूँ कि हर आदमी का अपना ताजमहल है और वही उसे कहता है चरैवेति-चरैवेति।" इस कथन में निचोड है सारी बातचीत का।

अतुल्य २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

कुछ चीजों को मानव बनाता है तो कुछ चीजें मानव को बनाती हैं। ऐसी चीजें निस्संदेह मानव-निर्मित चीजों से श्रेष्ठ होती हैं। आदरणीय तेजे्न्द्र जी को कथाकार बनाने वाली प्रेरणा के विषय में स्वयं उनसे ही जानना बहुत अच्छा लगा।
इस भावपूर्ण संस्मरण के लिये तेजेन्द्र जी के साथ-साथ इसकी सुंदर प्रस्तुति के लिये राजीव जी और साहित्य शिल्पी को आभार!
और हाँ, तेजेन्द्र जी का ताजमहल इस अर्थ में वास्तविक ताज से भी बढ़कर है कि वो स्वयं खूबसूरती की मिसाल है और ये औरों की् खूबसूरती को भी आगे लाता है।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

सच है कि तालमहल केवल पत्थरों से नहीं बनते।

नीरज गोस्वामी २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके जाने के बाद भी उनके हमेशा साथ होने का एहसास रहता है...जो आंखों सामने नहीं होते लेकिन आँखें बंद करो तो नजर आते हैं....तेजेंद्र जी के लिए इन्दू जी एक ऐसा करिश्माई इंसान थीं...जिस इंसान में इतने गुन एक साथ हों उसे भगवान् अपने से अधिक दिनों तक दूर नहीं रखता...

बहुत मार्मिक संस्मरण लगे...इन्दू जी आत्मा को इश्वर शान्ति दे और और तेजेंद्र भाई को इस सदमे को सहने की क्षमता...

नीरज

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

तेजेन्द्र जी के संस्मरण पढ कर बहुत अच्छा लगा। बधाई।

अनिल कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

लेखन हर लेखक के निजी जीवन से आरंभ होता है उसकी पीडा के साथ संवरता है और उसका चिंतन बनता जाता है। इस साक्षात्कार में प्रस्तुत संस्मरण पढ कर तेजेन्द्र जी के जीवन के वे पहलु सामने आये जिन्हे आम तौर पर किसी साक्षात्कार में सम्मिलित नहीं किया जाता उस लेखक का निजी मान लिया जाता है। मैं यह समझ गया हूँ कि प्रेम आगे बढने की जिजिविषा का नाम है हर उस व्यक्ति के लिये जो मानता है कि ताजमहल केवल पत्थरों से नहीं बनते।

rachana २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

bahut achchha likha hai padh ke ankh bhar aai
rachana

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

राजीव जी साक्षात्कार को इस शैली में प्रस्तुत करने के लिये आपको धन्यवाद। रोचकता बनाये रख कर इतना संवेदनशील संस्मरणात्मक लेख आपने हम पाठकों के सम्मुख रखा।

तेजेन्द्र जी के प्रति मेरी श्रद्धा बढी है। अपनी दिवंगत पत्नि के प्रति अपने मनोभाव उन्होंने जैसे अभिव्यक्त किये हैं पढ कर विह्वल हो उठी। ईश्वर अच्छे लोगों को पता नहीं अपने पास क्यों बुला लेता है ।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

तेजेन्द्रजी ने जैसी ईमानदारी से इंदुजी के साथ अपने रिश्तों की किताब के पन्ने पलटे हैं वह बेमिसाल है। मैं भी पहली मुलाक़ात में ही इंदुजी का मुरीद हो गया था। उनका स्नेह और आशीष आज भी मेरे जीवन की पूंजी है-

चले तो चाँद रुके तो हवाओं जैसा था ,
वो शख़्श धूप में देखो तो छाँव जैसा था।
देवमणि पाण्डेय, मुम्बई

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

तेजेन्द्र जी के साथ हुये इस भावुक संवाद के समय मैं भी उसी कार मैं मौजूद था. हम तेजेन्द्र जी के आभारी हैं कि उन्हॊंने अपने दिल की किताब को हम सब के सामने खोल कर हमें उन्हें और करीब से जानने का अवसर दिया. क्रूर नियति ने इन्दू जी को छीन लिया परन्तु यादों की जो पूंजी वो छोड गई हैं वह अमूल्य व अविस्मरणीय है. उनके नाम और यादों को चिरकाल तक जीवित रखने के लिये तेजेन्द्र जी द्वारा किये जा रहे प्रयास सराहनीय हैं.

अनुज २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

बहुत अच्छा साक्षात्कार/संस्मरण।

अनुज कुमार सिन्हा

Vijay Kumar Sappatti २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

i ma speechless..

meri aankhen bheegi hui hai aur ek chubta hua aur khamosh maun mere ird gird hai ..

main eeshwar se poochna chahunga ki kuch insaano ki zindagi itna kam kyon hoti hai , jab unki jarurat is darti ke liye hoti hai..

mai tejendra bhai saheb ko sirf itna kahunga ki .. indu ji kahin nahi gayi hai .wo aapke paas hi hai ..aapke baccho ke roop men aur aapke lekhan ke roop men ..

aur kuch kya kahun....man udaaas sa hai ..

योगेश समदर्शी २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

ऐसी रचनाएं न तो पढने को मिलती है आसानी से और न ही बनती है आसानी से. एक मन: स्थिति की जरूरत होती है जब इस तरह कि अभिव्यक्ति होती है और उसे उसी धरातल पर बैठ कर एकचित्त हो कर लिखा जा सकता है. राजीव जी ने बहुत मह्त्त्वपूर्ण रचना लिखी हैं.. तेजेंद्र जी ने अपने जो अनुभव हम सबसे बांटे है वह भी अपने आप मे सराहनीय हैं..

दृष्टिकोण २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

कहानीकार तेजेन्द्र जी नें आत्मा उडेल कर रख दी है। साहित्य शिल्पी को इस प्रस्तुति के लिये धन्यवाद।

Kewal Krishna २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

एसे साक्षात्कार नहीं पढने को मिलते।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

राजीव जी

लेख पढ़ा। इस तरह के लेख हिन्दी साहित्य में विरले ही देखने को मिलते हैं। इतना खुल कर कोई अपनी निजि बातें नहीं कह पाता। लेख पढ़ते समय इंदु सामने खड़ी मुस्कुरा रही थीं। तेजेन्द्र जी ने उनका नाम तो आसमान पर लिख दिया उसके साथ स्वयं भी अमर हो गये।

एक अच्छे कहानीकार, कवि और सच्चे इन्सान की हैसियत से, मुझे यक़ीन है, तेजेन्द्र जी को दुनियां हमेशा याद रखेगी। इतने संवेदनशील लेख के लिये आप सब को बधाई।

काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी
लन्दन।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

पत्ते तब भी बेचैन थे
पत्ते आज भी बेचैन हैं
उनके कदमों से लिपट के खड़कने के लिये

पर सुना है
कि रूहों के चलने से
आवाज़ नहीं होती...

bahut khoob.

Dr. Subodh Pandey
N. Delhi

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

भावुकता अच्छे रचनाकार की निशानी है। तेजेन्द्र जी की जिन्दगी का यह पहलु जानना अच्छा लगा। इंदु जी सुकून महसूस करती हूँ कि उन्हें तेजेन्द्र जी मिले जो उन्हे अमर करने को प्रयासरत हैं।

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

श्री तेजेन्‍द्र शर्मा अपने आप मे एक बहुत बड़ा नाम है. एक कथाकार , एक अभिनेता,एक शायर और सबसे बड़ी बात ये कि दूसरे साहित्यकारों की मदद के लिए हमेशा आगे आते हैं.साहित्य-शिल्पी का धन्यवाद इस पेशकश के लिए.
सादर
ख्याल

चण्डीदत्त शुक्ल २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

आपने तेजेंद्र जी के घर तक बुलाया...मैं रो पड़ा...इससे बड़ा ताज़ शाहजहां क्या बनवाएगा, जो उनके दिल में बना है और जहां अश्कों की, यादों की यमुना बहती है...अच्छा लिखा...

रंजना [रंजू भाटिया] २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

बहुत अच्छा साक्षात्कार बहुत भावुक कर देने वाला है यह सब ..प्यार यूँ ही यादो में महकता है शुक्रिया इसको यहाँ पढवाने का

Dr. Sujit Kumar Bajpayee २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

तेजेंद्र शर्मा से बातचीत और इंदु शर्मा से जुड़े संस्मरणों को इतने सहज तरीके से प्रस्तुत करने के लिए आपको बधाई। तेजेंद्र जी का भी आभार कि उन्होने अपनी पत्नी से जुडे संस्मरण पाठकों के साथ बाँटा

अविनाश वाचस्पति २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

सोचता रहा मैं कविता में ही होती हैं भावनाएं
पर यहां पर तो कहानीकार में भी आप वही पाएं

ताजमहल की ख्‍याति से ज्‍यादा की तमन्‍ना की है
या नहीं की है पर यह दुआ यह हमने तो की है

जो नाम लिख रहे हैं आप आसमान पर जनाब
वो बरस दर बरस दिलों पर बरस रहा है आफताब

संस्‍मरण नाम इनका पर सांसों को देते हैं नवजीवन
मेरी सलाह है इन्‍हें दिया जाए नाम अब संसजीवन

न यह सदमा है न यह दमा है यह लिखने की कला को निखारने की दवा है और दवा तो हुजूर कड़वी ही होती है


सच्‍चाई है यह जो होता है मंजूरे खुदा होता है
नहीं किसी के चाहने से, और न चाहने से कभी पत्‍ता भी कोई हिला सकता है।

ताजमहल बनाना तो बहुत दूर की बात है और यादों का ताजमहल तो कोई इन्‍द्रतेज (देव) ही बना सकता है।

दिव्यांशु शर्मा २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

साहित्य शिल्पी पर पिछले कुछ दिनों में कई साक्षात्कार पढे और ये समझा की एक अच्छे साक्षात्कार के लिए दोनों पक्षों की एक परस्पर समझ कितनी महत्त्वपूर्ण है | यह साक्षात्कार यही दर्शाता है | तेजिंदर जी के निजी अनुभवों में छुपी कितनी ही बातें थीं जो पता नही कब बाहर आतीं .. या आती भी नही | एक बेहद खूबसूरत साक्षात्कार और अपने आप में अनूठा भी क्यूंकि साक्षात्कार तेजिंदर जी का था लेकिन आब्जेक्ट उनकी स्वर्गीय पत्नी इंदु जी |
यह साक्षात्कार एक लेखक के जीवन में उस की पत्नी की भूमिका को भी दर्शाता है जो कि बहुधा उस की लेखनी से झांकती है |
शुक्रिया

Deepy २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

Papaji,

This is a beautful article! Brought back some lovely memories. Mammaa was just too good to be true...wasn't she! With Best wishes bole to haardik shubhkaamnaayen and all that good stuff!- Deepu.

रूपसिंह चन्देल २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

बातचीत के आधार पर अपनी दिवगंत पत्नी इन्दुशर्मा पर तेजेन्द्र के संस्मरण से मन भावुक हो उठा . उनका कहना ठीक ही है इन्दु जैसे इंसान दुनिया में लंबे समय के लिए नहीं आते. मैं इन्दु जी के प्रति तेजेन्द्र के प्रेम को समझता हूं और उनका समर्पण भी. साहित्य शिल्पी में इसे प्रकाशित करने के लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं.

रूपसिंह चन्देल

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

वस्तुतः भाव महल है यह ।
श्रद्धेय तेजेंद्र जी के संस्मरण के साथ संवेदनात्मक स्तर पर सहभागी बन पाना मेरे लिये भीगी सी अनुभूति था।
सद्गत को मेरा नमन ।

प्रवीण पंडित

विश्व दीपक ’तन्हा’ २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

कुछ विषय ऎसे होते हैं, जिन्हें बस महसूस किया जा सकता है,पसंद किया जा सकता है , पर कितना पसंद आया- यह कहा नहीं जा सकता। इंदु जी के बारे में तेजेन्द्र जी के संस्मरण पढकर मुझे कुछ ऎसा हीं लगा रहा है।

नि:शब्द हूँ मैं।
-विश्व दीपक

अजय यादव २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

तेजेन्द्र जी के इस संस्मरण को स्वयं उनसे ही सुनना मेरे लिये एक यादगार है। एक बार फिर उसी अनुभव से गुज़रना हुआ।
अधिक कुछ कहने के लिये शब्द शायद नाकाफ़ी होंगे!

Ila २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

इस तरह के अंतरंग साक्षात्कार कम पढ़ने को मिलते हैं। लेखक को बधाई!
इंन्दु जी चली गईं वरना वे दुनिया की सबसे भाग्यशाली पत्नी होने का गौरव पालतीं। ऐसे समर्पित पुरुष भी कम ही होते हैं जो अपनी पत्नी का ऐसा सम्मान करें, जबकि वास्तविकता यह है कि एक दूसरे के प्रति यह विश्वास और सम्मान ही दोनों को पूर्णता प्रदान करता है।
साहित्यकार तेजेन्द्र जी इस क्षेत्र में भी प्रशंसा और आदर के हकदार हैं!
इला प्रसाद

Dr. Sudha Om Dhingra २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

तेजेन्द्र जी का संस्मरण पढ़ कर पूरा शरीर भीग गया,भावनाओं से अभिभूत आँखें भी टपकती रहीं. राजीव जी का व्यवस्थित और सशक्त रूप से लिखना और तेजेन्द्र जी का अंतरंगता से मधुर ,कोमल स्मृतियों का वर्णन करना एक अद्भुत ,
आलोकिक संस्मरण बन गया है. कोई किसी को इतना चाह सकता है सिर्फ बचपन में कहानियाँ सुनी थीं या परी कथाएँ पढ़ी थीं पर प्रेम का अनोखा स्वरूप इस संस्मरण में पढ़ कर द्रवित हो गई. परी इंदु जी तेजेन्द्र जी की कहानियाँ में
रहती दुनिया तक रहेंगीं. इस आत्मीय स्नेह और प्रेम के उच्चतम रूप को प्रणाम! श्रद्धा से सिर झुक गया. इस संस्मरण को पढ़वाने का साहित्य शिल्पी को धन्यवाद!

कथाकार २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

मैं तेजेंद्र को पिछले 14 बरस से जानता हूं। इंदु जी को एक बार देखा भर था लेकिन परिचय या संवाद नहीं हो पाया था। तेज के साथ इतने बरसों के संग साथ के बावजूद मैं इंदु जी को इतने बेहतर तरीके से नही जान पाया था। मैं आपका और आपकी टीम का आभारी हूं कि इस साक्षात्‍कार के जरिये इंदु जी से मेरा विधिवत परिचय करा दिया।
सूरज

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

तेजेन्द्र जी का संस्मरण पढ़ कर पूरा शरीर भीग गया,
भावनाओं से अभिभूत आँखें भी टपकती रहीं. राजीव जी
का व्यवस्थित और सशक्त रूप से लिखना और तेजेन्द्र जी का
अंतरंगता से मधुर ,कोमल स्मृतियों का वर्णन करना एक अद्भुत ,
आलोकिक संस्मरण बन गया है. कोई किसी को इतना चाह सकता है
सिर्फ बचपन में कहानियाँ सुनी थीं या परी कथाएँ पढ़ी थीं पर प्रेम का अनोखा स्वरूप
इस संस्मरण में पढ़ कर द्रवित हो गई. परी इंदु जी तेजेन्द्र जी की कहानियाँ में
रहती दुनिया तक रहेंगीं. इस आत्मीय स्नेह और प्रेम के उच्चतम रूप को प्रणाम!
श्रद्धा से सिर झुक गया. इस संस्मरण को पढ़वाने का साहित्य शिल्पी को धन्यवाद!

सुधा ओम ढींगड़ा
नॉर्थ कैरोलाईना (यू.एस.ए)

chandan २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

taji ji ka sansmaran padha, isey padhtey hua kuch nayee batain pata chalen. baki toa unki life khuli kitaab hai

राजीव तनेजा २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

सच है कि ताजमहल सिर्फ पत्थरों से नहीं बना करते...

Wanderer २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

Love is all about sensitivities of our soul. Reading Tej talking about his wife one could feel the depths of his emotions. Very rare to have such a wonderful soulmate.

आलोक शंकर २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

राजिव जी , एक श्रेष्ठ रचनाकार की प्रेरणा से हमारा साक्षात्कार कराने के लिए बहुत आभार

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

तेजेन्द्र शर्मा जी आप कौन सी दुनिया के आदमी हो?

सार्थक दीवान

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

इंदुजी की यादों को
पाठकों के साथ शेयर किया,


तेजेन्द्र जी
आभार।

सुंदर प्रस्तुति |

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

Love is a rare feeling.
I can feel the soul of LOVE...here.....

Thanks.....

श्रद्धा जैन २३ नवम्बर २००९ ६:५७ PM  

Sri tejndra ji ke sansmarn ki pad kar aankh nam ho gayi

rajiv ji aapke sada abhaari rahenge ki aapne itne anmol lamhon ko ham sabko pdwaya

aur tejendra ji ne in lamhon ko ham sabse share kiya hum sabhi unke bhaut abhari hai


is sansmaran ka bhaut dino se intezaar tha

shukriya

Rajesh Jakhal २३ नवम्बर २००९ ७:०७ PM  

वास्तव में, यह संस्मरण ह्रदय उद्वेलित करने वाला, मार्मिक चरित्र चित्रण है। इसे पढकर तो मेरा ह्रदय ही भर आया।
- राजेश जाखल, द्वारका, नई दिल्ली

zakia २३ नवम्बर २००९ ७:१२ PM  

Tejendra ji kay bhawuk shabdoN ko amar bananay ka shraye Rajeev ji ko samarpit.

Zakia Zubairi

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:-
श्रद्धांजलि:-
साक्षात्कार:-
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-
संस्मरण:-
वीडियो:-
बाल साहित्य:-
पुस्तक चर्चा:-
अनुवाद:-

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP