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बुधवार, ९ दिसम्बर २००९

एक और अन्दाज अपना - अपना [लघुकथा] - सूरजप्रकाश

वे एक वरिष्ठ कवि हैं। शहर में उनका नाम है। कई फिल्मों और भजनों के एल्बमों के लिये गीत लिख चुके हैं। उनकी अल्मारी कई तरह के सम्मान प्रतीकों से भरी पड़ी है। यहां तक पहुंचने के लिये उन्हें लम्बा संघर्ष करना पड़ा है।

पिछले साल एक पारिवारिक किस्म की संस्था ने उन्हें साहित्य - सेवा के लिये पुरस्कार दिया। यह संस्था उस किस्म की थी जिसके लिये इस तरह के पुरस्कार देना एक शगल की तरह था और उनके लिये पुरस्कार पाने वाले की कोई अहमियत नहीं थी। अहमियत थी उनकी जो इन पुरस्कारों को देने के बहाने मंच पर सवार होते थे। लेखक तो बेचारे सामने श्रोताओं में से उठ कर पुरस्कार लेने आते थे।
रचनाकार परिचय:-
सूरज प्रकाश का जन्म १४ मार्च १९५२ को देहरादून में हुआ। आपने विधिवत लेखन १९८७ से आरंभ किया। आपकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हैं:- अधूरी तस्वीर (कहानी संग्रह) 1992, हादसों के बीच (उपन्यास, 1998), देस बिराना (उपन्यास, 2002), छूटे हुए घर (कहानी संग्रह, 2002), ज़रा संभल के चलो (व्यंग्य संग्रह, 2002)। इसके अलावा आपने अंग्रेजी से कई पुस्तकों के अनुवाद भी किये हैं जिनमें ऐन फैंक की डायरी का अनुवाद, चार्ली चैप्लिन की आत्म कथा का अनुवाद, चार्ल्स डार्विन की आत्म कथा का अनुवाद आदि प्रमुख हैं। आपने अनेकों कहानी संग्रहों का संपादन भी किया है। आपको प्राप्त सम्मानों में गुजरात साहित्य अकादमी का सम्मान, महाराष्ट्र अकादमी का सम्मान प्रमुख हैं। आप अंतर्जाल को भी अपनी रचनात्मकता से समृद्ध कर रहे हैं।

अब संकट यह हुआ कि इन कवि जी को दूसरा पुरस्कार दिया गया था जो कि सिर्फ पांच हजार का था। ग्यारह हजार का पहला पुरस्कार किसी गुमनाम शहर के गुमनाम किस्म के लेखक के हिस्से में आया था और संस्था के नियमों के अनुसार मंच से अपनी बात भी पहले पुरस्कार विजेता के रूप में उसी लेखक को कहनी थी।

कवि महोदय कसमसा रहे थे। यह साफ - साफ उनका और उनकी दीर्घ साहित्य - साधना का अपमान था। उन्हें अज्ञात शहर के अज्ञात लेखक से भी एक सीढ़ी नीचे मान लिया गया था।

पुरस्कार तो वे खैर ले आये लेकिन दुखी मन से। अपनी व्यथा मित्रों के बीच अलग - अलग तरीके से व्यक्त कर ही चुके थे लेकिन मन पर रखा बोझ किसी तरह कम नहीं हो रहा था। यह पहली बार हो रहा था कि वे पुरस्कृत भी हुए, दुखी भी।

तभी गुजरात में भयंकर भूकंप आ गया जिस में हजारों लोगों की जान गयी। पूरी की पूरी बस्तियां तबाह हो गयीं। पूरे देश ने खुले हाथों से पीडित व्यक्तियों की मदद करनी शुरु कर दी।

कवि जी ने आव देखा न ताव, पुरस्कार में मिले पांच हजार रूपए भूकंप सहायता कोष में जमा करा दिये और शहर के सभी समाचार पत्रों में प्रमुखता से छपवा दिया - कवि जी ने फलां संस्था से मिले दूसरे पुरस्कार की पांच हजार की राशि भूकंप सहायता कोष में दान कर दी।

सभी समाचार पत्रों में अपनी तस्वीर के साथ छपी आशय की खबर पढ क़र उनके सीने पर इतने दिनों से रखा पत्थर अब हट चुका था।

7 comments:

नंदन ९ दिसम्बर २००९ १:३० PM  

लेखकों की मानसिकता और पुरस्कार लोलुपता पर कटाक्ष है।

राजीव रंजन प्रसाद ९ दिसम्बर २००९ १:३८ PM  

सूरज जी से हमेशा सीखने को मिला है जिस वर्ग के लेखकों पर यह व्यंग्य है वह आज "समकालीनता" के ठेकेदार हैं और गाहे बगाहे एक दूसरे को पुरस्कार बाँटते और पाते यहाँ वहाँ दिखाई पडते हैं।

आभार।

रंजना ९ दिसम्बर २००९ ३:१९ PM  

KATHA KE BAHANE BADHIYA KATAKSH KIYA HAI AAPNE....

महेन्द्र मिश्र ९ दिसम्बर २००९ ३:५४ PM  

अंदाज अपना अपना बढ़िया लघु कथा है ......

rashmi ravija ९ दिसम्बर २००९ ६:४१ PM  

इसी वजह से किसी को पुरस्कार मिलने की सूचना पर,ख़ुशी से ज्यादा शक होता है..जरूर अच्छी पहुँच रही होगी...यथार्थ से रूबरू कराती कहानी

Mired Mirage ९ दिसम्बर २००९ ८:१७ PM  

बहुत जानदार कहानी है। दान भी हुआ, सीने से पत्थर भी हटा।
घुघूती बासूती

मोहिन्दर कुमार ११ दिसम्बर २००९ १०:१७ AM  

सुन्दर रचना... आजकल समय बदल गया है... खुद ही पुरस्कार की रचना कीजिये और खुद ही अपना नामाकंन भी कर दीजिये... आज के पुरस्कारों का यही भेद है.

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
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फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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