सुषमा दास लखनऊ और कानुपर के थियेटर, आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए एक सुपरिचित नाम है। बेहद खूबसूरत आवाज़ और सहज अभिनय से अपनी छाप छोड़ने वाली सुषमा ने कई फिल्मों में भी अभिनय किया है। सुषमा दास ने शास्त्री य संगीत, लोक संगीत और ग़ज़ल गायकी की बाकायदा ट्रेनिंग ली है और वे कानपुर में बच्चोंे के लिए थियेटर वर्कशाप चलाती रही हैं।

आओ धूप में सुषमा दास की पहली कहानी का स्वांगत है। आश्चकर्य होता है कि सुषमा पहली ही बार इतनी मैच्योसर कहानी ले की आओ धूप में आ रही हैं। बेशक कहानी हमारे सामने घटती चलती है और हम अपने अनुभवों, देखे सुने किस्सों की बातों और पूर्व धारणाओं के चलते कहानी का अंत अपने आप तय करते चलते हैं लेकिन कहानी अंत तक पहुंचते पहुंचते जिस तरह का मोड़ लेती है, उससे लेखिका इस बात के प्रति आश्विस्त करती है कि उनके लिए लिखना बैठे ठाले का काम नहीं, लेखन उनके लिए एक सरोकार और एक सामाजिक दायित्व भी है। - सूरज प्रकाश


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आज 28 जुलाई है। तुमसे मिले हुए पूरे दो साल हो जायेंगे, और न मिले हुए पूरे चार सौ सत्ता इस दिन। तुम्हारी सहूलियत के लिये थोड़ा आसान कर देती हूँ। एक साल दो महीने और दो दिन। यूँ तो यह अवधि बहुत लम्बी है, पर तुम इस तरह मेरे जीवन का अंग बन चुके हो कि आज भी मुझे लगता है जैसे अभी अभी तुम मेरे पास ही थे। शायद तुम्हें न याद हो वो दिन जब मैं तुमसे पहली बार मिली थी, पर मुझे बहुत अच्छी तरह से एक एक पल याद है। उस दिन अनुराधा के नये घर में गृह-प्रवेश का समारोह था और सिर्फ़ बहुत करीबी दोस्त और रिश्तेदार बुलाये गये थे।
अनुराधा मेरे बचपन की सहेली है। मैं राधा और वो अनुराधा। मैं सपरिवार आमन्त्रित थी, पर परिवार के नाम पर, मेरा बेटा विशाल बारहवीं की पढ़ाई के सिलसिले में देहरादून में था और वरुण, मेरे पति, थे तो इसी शहर मैं, पर आफिस के कार्य में व्यस्त होने के कारण नहीं आ सकते थे। रह गई मैं, तो अकेले ही पहुँच गई सबका प्रतिनिधित्व करने।

मुझे अनुराधा के यहाँ बहुत अच्छा लग रहा था। कुछ समय के लिये सब कुछ भूलकर मैं बस वहीं की हो गई थी। वक्त फ़िसलता रहा और धीरे धीरे काफ़ी रात हो गई। वरुण मुझे लेने आने वाले थे, पर शायद वो कुछ अधिक ही व्यस्त हो गये होंगे, क्योंकि करीब करीब सभी अतिथियों के जाने के बाद भी मुझे ले जाने वाला कोई नहीं आया था। मैंने घर पर फोन किया, कोई घर पर होता तो फोन उठाता न। आफिस का फ़ोन छ: बजे के बाद कार्य नहीं करता था और मोबाइल वरुण रखते नहीं थे। प्रतीक्षा करने के अलावा मेरे पास रास्ता नहीं था।

अनुराधा तो बहुत खुश हो रही थी, वो तो कब से मुझसे रात वहीं रुकने को कह रही थी। "रुक भी जाओ न। इतने दिनों का स्टाक है, रात भर बातें करेंगे।" मुझे ही घर की चिन्ता सता रही थी। आखिर, उसने मेरे वापस जाने का बन्दोबस्त कर ही दिया। उसने तुम्हें बुलाया था और सख़्त हिदायत दी थी "देखो रोहन, ये मेरी सबसे प्यारी सहेली है। इसे औल इन वन पीस इसके घर पहुँचा दो। "

"ऐट योर कमाण्ड अनु दी.....!" कहकर तुम झुके थे, एक हाथ पीछे कमर पर रखकर दूसरा हाथ सामने की तरफ़ से एयर इण्डिया के महाराजा की तरह, हल्के से लहराकर तुमने बड़ी ही विनम्रता से मुझसे आगे चलने को कहा था,
"आफ्टर यू प्लीज़, आइये .......... मदाम।"

मैं मुस्कराये बिना न रह सकी थी, और शायद तुम्हारी वही बाँकी अदा मेरे मन को छू गई थी, पर तब मुझे इसका कतई एहसास न हुआ था। तुम मुझे कार से छोड़ने आये थे। बैठते वक्त शायद मुझसे दरवाज़ा ठीक से बन्द नहीं हुआ था। कार चलाने पर जब तुम्हें इसका इल्म हुआ तो तुमने गाड़ी धीमी करके मेरे सामने ही से झुकते हुए मेरी ओर का दरवाज़ा खोल कर पुन: ठीक से बन्द किया था।

"सौरी राधा जी, पर मेरी अनु दी ने आपको 'ऑल इन वन पीस' पहुँचाने का आदेश दिया है।" करीब बीस मिनट का रास्ता था। कुछ पल ख़ामोशी के, फ़िर तुमने ही पूछा था-

"म्यूज़िक...?"

"जैसी आपकी मर्ज़ी ... " मैंने कहा था और तुमने जगजीत सिंह की गायी गज़लों का कैसेट लगा दिया था। एयरकन्डीशन कार के बन्द शीशों के अन्दर के 'कोज़ी' माहौल पर बिखरी हुई ख़ामोशी को अपने में समेटते हुए गज़ल गूँजने लगी थी - "प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है....—"

फ़िर हमारे बीच कोई बातचीत नहीं हुई थी, सिवाय इसके कि मैं निर्देश देती रही और तुम दायें-बायें मुड़ते रहे और थोड़ी ही देर में मैं अपने घर के सामने थी। गेट पर कोई ताला नहीं था। कारण, हमारा घर एक काफ़ी बड़े कम्पाउण्ड के अन्दर था। मैं अन्दर आ गई, पर तुम गेट खुला होने के बावजूद बाहर ही खड़े रहे, कार के पास। बरामदे की धीमी रौशनी में मैंने देखा, अन्दर दरवाज़े पर भी ताला नहीं था, मतलब वरुण घर पर ही थे ! मैंने बाहर आकर तुम्हें धन्यवाद कहते हुए विदा दी थी। पता नहीं क्यों पर मैनें तुम्हें अन्दर नहीं बुलाया।

तुम्हारे जाने के बाद मैंने कालबेल बजाई। करीब दो मिनट प्रतीक्षा के बाद बेल एक बार फिर बजायी। वरुण अगर घर पर ही हैं तो लेने क्यों नहीं आये, पर मुझे कुछ जवाब न सूझा। दो चार मिनट तो इसी उधेड़बुन में बीत गये, जब दरवाज़ा फिर भी न खुला तब मैंने ज़ोर से घण्टी बजायी। इस बार घर के अन्दर रौशनी हुई और दरवाज़ा भी खुला।

"ओह तुम। आ गई..?" वरुण ने उनींदे स्वेर में कहा।

"वरुण तुम घर पर ही थे तो अनुराधा की पार्टी मे ही आ जाते, अरे पार्टी में न सही, मुझे लेने ही आ जाते।" मैंने अन्दर आते हुए कहा था।

"अरे ठीक है न, अब तो तुम आ ही गई हो।"

"तुम कब आये। मैंने कितनी बार फ़ोन किया तुम्हें, पर हर बार सिर्फ़ रिंग जाती रही। क्या अभी आये हो ?"

"ओह फ़ोन.. !" और वरुण ने फ़ोन का प्लग वापस लगा दिया।

"यार बहुत नींद आ रही थी। देखो मैंने कपड़े तक नहीं बदले। फिर पार्टी तो तुम्हारी दोस्त की थी, मैं वहाँ करता भी क्या ?"

"क्यों, 'क्या करता' क्या मतलब ? अनुराधा से मिलते, उसका घर देखते, उसके घर के लोगों से मिलते, बातें करते, खाते पीते- - - -¨ठाठ से, तुमने कुछ खा तो लिया ही होगा ? "

"खाता कैसे; मैं तो सो रहा था।"

"ओह वरुण- - - -! अब मैं तुम्हें क्या कहूँ - - -! " और मैं सैण्डिल किनारे रखती हुई किचेन में चली गई। थोड़ी ही देर में मैं वरुण के लिये ब्रेड आमलेट और कॉफ़ी तैयार कर लाई। तब तक उन्होंने भी कपड़े बदल लिये थे और खाने बैठ गये।

जब तक मैं कपड़े बदल कर आई, वरुण खा चुके थे और बस उठ ही रहे थे। मैंने बरतन समेटे और वरुण सोने चले गये। जब तक मैं किचेन व्यवस्थित करके और बत्तियाँ बन्द करके आई, वरुण गहरी नींद में सो चुके थे। डबल-बेड के एक किनारे मैं लेट गई, कितना कुछ था कहने को पर सुनने वाला कोई नहीं था। तभी नज़रों के सामने अनायास ही तुम्हारी सूरत घूम गई और कानों में वही गज़ल गूँजने लगी।

अगले दिन वही दिनचर्या। वरुण की सुबह की एक्सरसाइज़ेज़, फिर अख़बार और साथ में चाय। थोड़ी देर में कामवाली आ गई, मैं उसके साथ लग गई और वरुण टी.वी. देखने में व्यस्त हो गये। नौ बजते बजते नाश्ता तैयार हो गया था, उधर वरुण भी नहाने चले गये। उनके उस दिन के पहनने के कपड़े वहीं पलँग पर रखे थे। ये तो वो स्वयँ निकालते हैं क्योंकि अपनी अलमारी को वो किसी को हाथ भी नहीं लगाने देते हैं।

कामवाली के लड़के ने कार साफ़ कर दी, और थोड़ी ही देर में वरुण ऑफिस चले गये। मैं वरुण को छोड़ने बाहर तक गई थी। अन्दर आ ही रही थी कि चौकीदार ने आवाज़ दी -
" मेम शाब जी "

मैं रुक गई, बहादुर ने पास आकर मुझे वॉलेट पर्स दिखाते हुये कहा, "ज़े आपका घोर का तो नई है ? रात को आपका गेट के शामने पड़ा था। "

मैंने वॉलेट लेकर देखा, अन्दर तुम्हारा कार्ड था। मैंने बहादुर को धन्यवाद देते हुए तुम्हारा वॉलेट रख लिया। कार्ड में तुम्हारा नाम पता फ़ोन नम्बर सभी तो था। जब घर के सारे काम हो गये तब मैंने तुम्हें फ़ोन किया था। करीब डेढ़ बजे कॉलबेल बजते ही मैं समझ गई तुम ही होगे। मेरा अनुमान सही था।

उस दिन दोपहर का खाना तुमने मेरे साथ खाया था। मैंने भी न जाने कितने दिनों बाद उस दिन दोपहर को खाना खाया था, क्योंकि दोपहर का खाना मेरे घर में एक तरह से बनना बन्द ही हो गया था। वरुण लन्च नहीं ले जाते थे, ऑफिस में ही मित्रों के साथ खा लेते थे। मैं नाश्ता देर से करती थी, दोपहर को बचे हुए नाश्ते के साथ यूँ ही कुछ भी थोड़ा बहुत और खा लेती थी।

उसी दिन तुमने अपना परिचय भी दिया था।

"मैं रोहन, अनुराधा दी की मम्मी और मेरी मम्मी बचपन की छोटी बड़ी सहेलियाँ। मेरी मम्मी छोटी इसलिये मैं भी छोटा और आपकी दोस्त, मेरी अनु दीदी। फ़िलहाल पढ़ाई पूरी करके नौकरी की तलाश में हूँ। दो तीन जगह एग्ज़ाम भी दिया है। समय बिताने के लिये कोचिंग क्लासेज़ में पढ़ाता हूं। ठीक ठाक खर्च निकल ही आता है। वैसे किराये के घर में रहता हूँ, बनारस में मेरा अपना घर है, जिसमें मम्मी पापा और छोटी बहन रहते हैं।"

मैंने तुम्हें अपने बारे में बताया था। अपने परिवार की तस्वीरें दिखाई थीं। हम तुम बातों में यूँ ही मशगूल थे कि तुम्हारे कोचिंग का समय हो गया और तुम चले गये।

शाम को चाय पाते वक़्त मैंने तुम्हारे आने के बारे में वरुण को बताया था। वो हां हूँ करते रहे।

"तुम मिलना नहीं चाहोगे रोहन से ?" मैंने पूछा था, "मिल लेंगे कभी।" और वो उस दिन की नई पत्रिका देखने में मशगूल हो गये। मैं चाय के बरतन लेकर चली गई और रात के खाने की तैयारी में लग गई।
करीब आठ बजे हम लोग खाना खाने बैठे, पर उस दिन मुझे भूख नहीं थी। अनमनी सी मैंने एक रोटी खायी।

" क्या बात है? डाइटिंग शुरू कर दी ?" वरुण ने पूछ ही लिया, "नहीं, वो शायद आज दोपहर का खाना ज़्यादा हो गया। "

"कुछ खास था क्या ? "

" नहीं, थी तो दाल रोटी ही, पर दोपहर को इस तरह खाती नहीं हूँ न।"

"क्यों नहीं खाती हो ? कोई मना करता है क्या ?"

" नहीं वो बात नहीं, पर - - - -" बात वहीं ख़त्म हो गई, वरुण हाथ धोने के लिये उठ गये और मैं रोज़ की तरह बरतन इत्यादि उठाने सहेजने लगी। थोड़ी देर बाद जब मैं बेडरूम में आई तो ये बिस्तर पर बैठे टी.वी. देख रहे थे, मैं भी बगल में बैठ गई। थोड़ी देर में ये बैठे बैठे झपकियाँ लेने लगे। इससे पहले कि नीचे गिर जाये, मैंने टी.वी. का रिमोट इनके हाथ से ले लिया। ये लेट गये और जल्दी ही गहरी नींद में सो गये।

अगले दिन से सब कुछ वही पहले की तरह चलने लगा। हाँ, दोपहर को खाते वक़्त ज़रूर तुम्हारी याद आई थी। एक हफ़्ता यूँ ही बीत गया। एक रविवार को अचानक अनुराधा अपने पति के साथ आ गयी। तूफ़ान की तरह आई थी वो। कोई पूर्व सूचना नहीं कोई भूमिका नहीं।

"क्या राधा .........! ये भी कोई बात हुई? उस दिन के बाद कोई खोज ख़बर ही नहीं। पार्टी ओवर का ये मतलब थोड़े ही होता है कि पलट कर आना ही नहीं है............!"

" वो.......मैं........", कुछ कहने के लिये मैं शब्द ढूँढ रही थी कि उसे वरुण दिख गये और मैं बच गई।

" और आप ? आप कहाँ थे उस दिन ? कितना इन्तज़ार किया था हम सबने आपका ! वो तो अगर राधा ने ज़िद न की होती तो मैं उसे वापस ही न भेजती।"

वरुण हल्का सा मुस्करा कर बोले " तो अब ले जाइये न।"

" वो जाये तो मैं ज़रूर ले जाऊँ, मगर मेरी सिनड्रैला का तो ये हाल है कि घड़ी का काँटा अपनी जगह पर आते ही वैसे ही घबड़ाने लगती है, जैसे शादी के बाद वाले दिनों में घबराती थी।"

अनुराधा के और कुछ कहने के पहले ही उसके पति संजीव बीच में बोल उठे, " अब लेक्चर ही देती रहोगी या कुछ काम की बात भी करोगी ? "

"हाँ हाँ क्यों नहीं, देखो मैं उस दिन वाले फोटोग्राफ़स लाई हूँ। मैंने सोचा इसी बहने तुमसे मिलना भी हो जायेगा। वर्ना तुम तो बस ओकेज़न्स पर आने वालों में से हो।"

अनुराधा और मैं तस्वीरें देखने लगे और वरुण और संजीव औपचारिक वार्तालाप में व्यस्त हो गये। उस दिन अनुराधा की ज़िद पर हम खाना खाने बाहर गये। उसने तो मुझे घर पर चाय भी नहीं बनाने दी।

सोमवार को अचानक घण्टी बजने पर मैंने दरवाज़ा खोला, तो सामने तुम थे, चेहरे पर वही परिचित और मनोहारी मुस्कुराहट लिये। पता नहीं क्यों, पर तुम्हें देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा था।

" सरप्राइज्.ड !" उसी मुस्कान के साथ तुमने पूछा था।

"और क्या ? बिना ख़बर किये......."

'हम तो ऐसे ही हैं। बिना बताये ही आ जाते हैं।' कहते कहते तुम अन्दर तक आ गये थे। तुम्हारे हथ में कुछ पैकेट्स थे जो तुमने मेज पर रख दिये थे। उन्हीं में से एक पैकेट उठाकर तुमने मेरी तरफ़ बढ़ाया, " आपके लिये।"

" मेरे लिये ?" मैंने अचकचाते हुये पूछा था, फिर पैकेट खोला तो उसमें बहुत ही ख़ूबसूरत साड़ी थी, आसमानी रंग की जिस पर छोटे छोटे फूल बने थे।

" पर किसलिये ?"

" किसलिये क्या, असल में मैंने एक रैप़ेल टिकट लिया था, उसी के लकी ड्रा में ये मिली है। मैं इसका भला क्या करता, फिर इसे देखते ही मुझे लगा कि ये आप पर बहुत अच्छी लगेगी और मैं यहाँ ले आया।" और तुमने पैकेट से निकाल कर तह खोलते हुये साड़ी मेरे ऊपर डाल दी थी और बोले थे, "मेरा अनुमान बिल्कुल सही था। ये तो यूँ लग रहा है, जैसे नीले आसमान के बीच से आज दिन में ही चाँद झाँकने लगा हो।"

" रोहन ! " मैंने तुम्हारी पीठ पर हल्की सी चपत लगा दी थी।

" एक तो तारीफ़ करो, वो भी सच्ची ऊपर से पिटाई खाओ। नो नो नो नो, ठीक बात नहीं है।

इसकी सज़ा तो आपको अवश्य मिलेगी। तो अब आप अपने नरम नरम हाथों से गरम गरम रोटियाँ, कुछ अपने लिये बाकी मेरे लिये फ़टाफ़ट बनाइये, क्योंकि मैं पनीर की बेहतरीन सब्ज़ी साथ में ले आया हूँ, जो देर करने से ठण्डी हो जायेगी। परन्तु, रोटियाँ तो आपके हाथों की ही अच्छी लगेगी।"

तुम्हारी नाटकीयता पर मुझे हँसी आ गई थी, और मैं हँसते हँसते किचेन में चली गई थी। उस दिन शाम को तुम्हारा जाना बहुत खराब लग रहा था। मैं हिम्मत करके पूछ ही बैठी " फिर कब आओगे ?"

" बहुत जल्दी ...बाय "जाते जाते तुमने कहा था। मैं वहीं दरवाज़े के पास खड़ी तुम्हें जाते देखती रही थी। उस दिन वरुण से मैंने तुम्हारा कोई ज़िक्र नहीं किया, बस तुम्हारी बातें याद करकर के अपने में ही मुस्कराती रही।

अब मुझे तुम्हारा इन्तज़ार सा रहने लगा था। मैं घर को सजा कर रखती, क्या पता तुम कब आ जाओ। अनजाने में ही सही पर अब मैं साज सिंगार और कपड़ों का भी विशेष ख़याल रखने लगी थी।

एक रविवार को मैं और वरुण बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे तभी तुम्हारी गाड़ी घर के सामने आकर रुकी थी। उसे देखते ही मेरा दिल धड़क उठा था। एक एहसास जो कब का ख़त्म हो चुका था, फिर से महसूस किया था। मैं तुम्हारे लिये चाय बनाने अन्दर चली गई थी, और तुम वहीं वरुण के पास बाहर ही बैठ गये थे। न जाने तुम कौन कौन सी बातें करते रहे थे। जाते समय तुमने पूछा था " मैं अनु दी के घर जा रहा हूँ। आप लोग चलेंगे मेरे साथ? वापसी पर मैं आपको छोड़ता जाऊँगा।"

"आज नहीं फिर कभी ज़रूर चलेंगे। हफ़्ते में एक दिन मिलता है आराम करने को। आज मैं घर पर ही रहना चाहता हूँ।"

मेरा मन होते हुए भी मैं नहीं जा सकती थी, क्योंकि वरुण नहीं जा रहे थे। अगले दिन दोपहर को तुम नहीं तुम्हारा फोन आया था, "राधा कल तुमहें अनु दी के यहाँ जाना चाहिये था।"

" क्यों ?"

" क्यों क्या ? हर बात का कारण थोड़ी न होता है। "

" ..............." मैं खामोश रही।

" अगर मैं कहूँ कि .... आई मिस्ड यू दैर, तो ? "

" रोहन !"

" मैं सच कह रहा हूँ। पूरे समय हम लोग तुम्हारी ही बातें करते रहे। "

" और तुम लोगों के बारे में मैं सोचती रही।" न जाने कैसे हिम्मत करके मैंने कह ही दिया था।

" राधा तुमने मुझे बताया नहीं कि तुम गाती भी हो ,"

" इसमें बताने वाली क्या बात है ?"

" नहीं सुनाने की। अगली बार मैं आऊँगा तो तुम्हारा गाना ज़रूर सुनूँगा।"

" कब आ रहे हो ?"

" अभी आ जाऊँ ?"

" अभी !" मैंने फिर वही कसक महसूस की।

" अच्छा घबड़ाओ मत , अभी नहीं आ रहा हूँ। पर जल्दी ही आऊँगा।"

" ठीक है।"

और तुमने फोन रख दिया था, पर मैं रिसीवर हाथ में पकड़े जैसे जड़वत हो गई थी। मैंने अपने दोनों हाथों पैरों में एक झनझनाहट सी महसूस की। मेरा दिल बहुत तेज़ी से धड़क रहा था। ये मुझे क्या होता जा रहा था। मैं जानती थी, जो कुछ भी हो रहा था वो, वो उचित नहीं था, पर दिल के किसी कोने में अपने ज़िन्दा होने का, अपनी भावनाओं, संवेदनाओं के जीवित होने का एहसास मुझे तुम्हारी ओर खीँचे लिये जा रहा था।

उसी पल से मैं बेसब्री से तुम्हारा इन्तज़ार करने लगी। एक एक दिन एक एक बरस के समान बीत रहा था। आखिर आते रविवार को तुम आ ही गये। तुमने मुझसे कम और वरुण से ज़्यादा बातें की थीँ। मेरी बारी तो तब आई जब गीत संगीत की बात चली।

" हाँ ये गुनगुनाती तो रहती है कभी कभी।" वरुण ने कहा और तुमने झट मुझसे गाने की फ़रमाइश कर दी थी। थोड़ी ना नुकुर के बाद मैंने कॉलेज में सीखा हुआ भजन गाना शुरू कर दिया था। सुर, ताल दोनों भटक रहे थे। एक अरसा गुज़र गया था यह सब छोड़े हुए। तभी तुम मेज को तबले की तरह बजाने लगे। मेरे बिखरते सुरों को तुम्हारी ताल का सहारा मिला और मैं खुलकर गाने लगी थी। तभी वरुण को शायद कोई काम याद आ गया था और वे उठकर अन्दर चले गये थे।

" तुम गाओ राधा, मैं जरा आता हूँ अभी।" और रह गये थे बस हम दोनों और आपस में समन्वित होते मेरा गीत और तुम्हारी ताल। पता नहीं कब और क्यों, गाते गाते मेरा गला रुँध सा गया और आँखों से अनायास ही आँसू निकलने लगे थे। तुमने उठकर अपने रुमाल से मेरे आँसू पोंछे थे, और मेरे कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा था "बस राधा, अब और नहीं। मैं हूँ तो तुम्हारे साथ।"

मैंने गर्दन एक ओर झुकाकर अपना गाल तुम्हारे हाथ पर रख दिया था। कितना कुछ कह दिया था तुमने उस एक वाक्य में। और मुझे उस स्पर्श में जिस अपनेपन और सहारे का एहसास मिला था, न जाने कब से मैं उसके लिये तरस रही थी। कुछ पल के लिये मैं बाकी सब कुछ भूल गई थी, तभी मुझे वास्तविकता का भान हुआ और मैं झट उठकर अन्दर कमरे में चली गई थी। वहाँ वरुण एक फ़ाइल में कुछ देख रहे थे।

" हो गया तुम्हारा रंगारंग कार्यक्रम ?" कमरे में मेरे पहुँचने की आहट पाकर वे फ़ाइल से बिना सर उठाये मुझसे बोले थे।

" तुम बाहर कब चलोगे ?" मैंने पूछा था।

" चलो तुम, मैं बस अभी आया। वो क्या नाम है उसका.......... हाँ , रोहन। है कि गया ? "

" है।"

" क्या खाना वाना खाकर जायेगा ? "

" पता नहीं। "

" पता करो भाई ! आखिर तुम्हारा मेहमान है। "

" मेरा ? "

" और क्या, पहली बार तुम्हारे साथ ही तो आया था। "

" हाँ। "

तभी तुम अंदर आ गये थे, " क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ ? "
" आओ भई आओ। " वरुण फ़ाइल रखते हुए बोले थे। तुम जाकर वरुण के पास खड़े हो गये थे और मुझे देखते हुये बोले थे, " मैं सोचता हूँ, कि इतना बढ़िया गीत सुनाने के लिये राधा जी को तो ईनाम मिलना चाहिये।"

" ईनाम ! " वरुन ने तुमसे पूछा था।

" हाँ।... और ईनाम में है आज का डिनर। तीन लोगों के लिये, आपके मनपसंद होटल में, मेरी ओर से। " तुम एक कुशल ऐंकर की तरह धाराप्रवाह बोले जा रहे थे।

" पर रो....." मैंने टोकना चाहा।

"अ......‚...... क्या कह रही हैं आप। इस वक्त कुछ नहीं। अभी तो बस, चलें। " फिर बाकी की शाम तो जैसे एक ख़्वाब थी।

फिर तो जैसे मेरी जिंदगी ही बदल गई थी। अपने घर, पति, बेटे के प्रति मेरा समर्पण पहले की ही तरह था, बस अपने प्रति मेरा नज़रिया बदल गया था। मैं अब अपने आप को देखती थी तुम्हारे नज़रिये से। तुम्हारी पसन्द नापसन्द का असर अब मेरे रोज़मर्रा के कामों पर भी पड़ने लगा था।

तुम भी अब अक्सर आने लगे थे। तुम्हीं ने बताया था कि तुमने कुछ ही दिन पहले तबला बजाना सीखा था। चाहते तो थे तुम इसमें डिग्री हासिल करना पर पढ़ाई और फिर नौकरी वगैरह के चक्कर में वह विचार कहीं पीछे छूट गया था। जब भी तुम आते हम लोग न जाने कितनी बातें करते, मैं जी भर कर गाती और तुम टेबल को ही तबला बनाकर संगत देते। समय कब पंख लगाकर उड़ जाता, पता ही न चलता।

वरुण इस बारे में सब जानते थे, पर न तो वो कभी हमारे साथ शामिल होते और न ही इस बारे में कोई बात करते थे। एक तरह से तटस्थ से ही रहते। कभी कभी थोड़ा जल्दी आ जाने पर वो हमारे साथ थोड़ी देर बैठ जाते थे पर जल्दी ही उन्हें कोई काम याद आ जाता या फिर आराम करने चले जाते।

विशाल दो दिन के लिये घर आया था। तुम्हारी उससे भी खूब दोस्ती हो गई थी। हम तीनों, बस तीनों ही क्योंकि वरुण ऑफ़िस छोड़कर आना नहीं चाहते थे, खूब घूम़ते फिरते। इस बार विशाल बहुत खुश था। उसी ने मुझसे कहा था, " मम्मी इस बार तो दो दिन की छुट्टी में ही मज़ा आ गया। हर बार के दस पन्द्रह दिन इन छुट्टियों के सामने बेकार हैं। इस बार तुम भी कितना खुश रहती हो, बस पापा ही हमारे साथ नहीं आते।"

उसने तो ये भी कहा था, " मम्मी, पापा भी अगर रोहन अँकल की तरह होते तो कितना मज़ा आता न ? " मेरा दिल धक से रह गया, अनजाने में उसने मेरे मन की बात कह दी थी। मैंने तुरंत बात बदली, " पापा भला रोहन अँकल जैसे कैसे हो सकते हैं ? उनकी अपनी अलग पर्सनालिटी है।"

" नहीं, मैं कह रहा हूँ 'अगर', अगर होते तो।"

" हाँ, हाँ ठीक है। चल अब सो जा, कल तुझे वापस जाना है। "

" पर मम्मी पापा तो आये ही नहीं अभी तक। दस बज गये हैं न ?"

" आ जायेंगे थोड़ी देर में।"

और मैं विशाल को कमरे में ही छोड़कर रसोईघर में चली गई थी। अगले दिन विशाल को ट्रेन पर बैठाने मेरे साथ तुम गये थे, क्योंकि वरुण के पास फिर समय नहीं था।

फिर एक दिन तुमने मुझे ख़बर दी थी कि तुम्हें किसी बैंक में नौकरी मिल गई थी, बस ज्वाइनिंग लैटर मिलने में अभी थोड़ा वक्त था।

तुमने कोचिंग अब छोड़ दी थी। मेरे घर तुम पूर्ववत ही आते थे। जितनी बार आते थे मैं अपने को तुम्हारे और भी क़रीब महसूस करती थी। तुम्हारे मेरे बीच औपचारिकतायें समाप्त हो चुकी थीं, परन्तु अपनी अपनी मर्यादा की सीमायें अभी भी बरकरार थीं।

तुम्हारी सरस सरल मनोहारी बातें, तुम्हारा हँसमुख स्वभाव सब मुझ पर जैसे एक जादू सा कर चुके थे। मैं भी निश्चिन्त और खुश रहने लगी थी, क्योंकि मेरे सहारे के लिये तुम हर वक्त मौजूद थे। विशाल भी यदा कदा तुम्हारे बारे में पूछ ही लेता। वैसे तुम भी तो अक्सर उससे फ़ोन पर बात कर लेते थे।

वरुण के तटस्थ, स्वकेन्द्रित और शान्त स्वभाव ने जीवन में जो रिक्तता उत्पनन्नअ की थी, वह शायद अब भर गई थी। मेरे नीरस जीवन को जीने की उमंग मिल गई थी और मुझे अपने वजूद की सार्थकता का एहसास होने लगा था। मेरे सूने जीवन को तुमने रंगों से भर दिया था।

जीवन से मुझे वह सब मिल रहा था जिसकी मैंने कभी चाहत भी न की थी। पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। तुम्हारी ज्वाइनिंग आ गई, तुम्हें कानपुर छोड़कर बनारस वापस जाना था। अपने घर अपने शहर और अपनों के बीच।

जाना तो तुम भी नहीं चाहते थे पर तुम्हें जाना पड़ा। बनारस जाकर भी तुम मुझे नहीं भूले थे। क़रीब क़रीब रोज़ ही तुम्हारा फ़ोन आता था और आठ दस दिन में किसी न किसी बहाने तुम आ जाते थे। धीरे धीरे ये आठ दस दिन बढ़कर पन्द्रह दिन,पच्चीस दिन फिर महीनों में परिवर्तित हो गये थे। अपने घर के कारणों से तुम नहीं आ पाते थे। तुम्हारे घरवाले तुम पर शादी के लिये दबाव डाल रहे थे जिसके लिये तुम मना कर देते थे। तुम उनसे कहते कि तुम अभी शादी करने की स्थिती में नहीं हो, पर वे इसका कारण हमारी दोस्ती को मानते थे, क्योंकि उन्हें इसकी गहराई का अनुमान हो गया था। एक दिन तुम्हीं ने बताया था मुझे ये सब।

पर तुम्हारा फोन बराबर आता था बातों में वही अपनापन और मिलने की व्यग्रता होती थी। इधर मैं नितान्त अकेली हो गई थी। किसी काम में मन नहीं लगता था। हर वक्त बस तुम्हारा ख़याल आता रहता था। हर चीज़ तुम्हारी याद दिलाती थी। मेरा दोपहर का खाना लगभग बन्द हो गया था, और सुर एक बार फिर मौन हो गये थे। वरुण सदैव की तरह अपने में मस्त रहते। इन सब बातों से एकदम अनभिज्ञ। उनका तो हर काम पूर्ववत सुचारु ढँग से ही चल रहा था, वो भला अन्तर कैसे समझते।

समय बीतने के साथ तुम्हारा फ़ोन आना कम हो गया था। कई बार तो मैं ही तुम्हारा नम्बर मिलाती थी। पर तुम्हारी बातों में कोई परिवर्तन नहीं आया था। वही अपनापन वही मिठास। तुम्हारी आवाज़ सुनते ही सारी शिकायतें अपने आप दूर हो जाती थीं।

इधर कई दिनों से तुम्हारा फ़ोन नहीं आया था। पल पल प्रतीक्षा करते पूरे अड़तालीस दिन बीत गये थे। जबकि मैं तुमसे कह चुकी थी कि अब तभी बात होगी जब तुम फ़ोन करोगे आज तो मेरे सब्र की सीमा समाप्त हो गई। मन एकदम व्याकुल बेचैन था। अपनी प्रतिज्ञा भूलकर तुम्हारा नम्बर मिलाने के लिये मैंने रिसीवर उठाया ही था कि जीवन को एक बार फिर तुम्हारे नज़रिये से देखा। मैं एक विवाहिता स्त्री। एक इतने बड़े बेटे की माँ जो कुछ ही दिनों में अपने पैरों खड़े होने की तैयारी में लग जायेगा। सब कुछ तो है मेरे पास - घर, पति, परिवार, बच्चा। क्यों मैं तुमसे जुड़ती जा रही हूँ ? क्या दे सकती हूँ मैं तुम्हें ?

तुम्हारे घर के लोग भी तुम्हें शायद यही समझाते थे। क्या मैं अपना घर छोड़कर तुम्हारा घर बसा सकती हूँ ? तुम्हारा परिवार बसा सकती हूँ, शायद नहीं। तो फिर क्यों !! क्यों मैं धोखा दे रही हूँ अपने आपको, और विशेषकर तुमको। तुमको, जिसे अनजाने में बेहद चाहने लगी थी। तुम्हारे सामने तो अभी पूरा जीवन पड़ा था।

उम्र में तो मैं ही तुमसे बड़ी हूँ। मेरा ही फ़र्ज़ है अपने आप को सम्हालना और तुम्हें समझाना। एक दिन तुमने मुझे सहारा दिया था। उसी सहारे के बल पर आज मुझे मज़बूत बनना है और तुम्हारे रास्ते से स्वयं को एकदम हटा लेना है, वो भी इस तरह से कि तुम्हें इसका पता भी न चले और थोड़ी सी भी तकलीफ़ न हो। मैंने रिसीवर वापस रख दिया। रखते ही फ़ोन की घण्टी बज उठी।

" हैलो। राधा ! " वही व्यग्रता, वही अपनापन, तुम्हारा ही फ़ोन था। " कितनी बातें करती हो भई ! कब से कोशिश कर रहा हूँ, पर तुम्हारा नम्बर मिल ही नहीं रहा था, बराबर इन्गेज्ड टोन आ रही थी।"

" हाँ वो.... असल में वरुण मुझसे बात कर रहे थे।"

" अब तो फ्री हो गई न ! मुझे तुमसे ढेर सारी बातें करनी हैं।"

" नहीं रोहन, मैं फ्री नहीं हूँ। अभी मुझे तैयार होना है, क्योंकि वरुण मुझे लेने आ रहे हैं। हमें ज़रा ज़रूरी काम से बाहर जाना है। " मेरे हाथ काँप रहे थे। एक बार फिर अन्दर से अपने को कमज़ोर होता हुआ महसूस कर रही थी।

" हाँ हाँ, मुझे मालूम हैं तुम्हारे ज़रूरी काम। थोड़ी देर बाद चली जाना।"

" नहीं रोहन, मुझे जल्दी है। मैं फिर बात करूँगी। अभी मैं फ़ोन रखती हूँ नहीं तो शायद बहुत देर हो जायेगी।"

"राधा......... "

और मैंने फ़ोन रख दिया। घण्टी फिर बज उठी। साथ ही मेरा दिल भी तड़प उठा। मैंने फ़ोन उठाना चाहा पर बीच में ही हाथ रोक लिया। अपने को रोक पाना मेरे लिये मुश्किल हो रहा था, मैं मुड़ी और जाकर बाहर बरामदे मे बैठ गई। घण्टी बजती जा रही थी। उसकी धीमी धीमी आवाज़ बराबर बाहर आ रही थी। थोड़ी देर में वह भी बन्द हो गई या मुझे ही सुनाई देना बन्द हो गई, पता नहीं।
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9 comments:

  1. यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    शुभकामनाएँ!
    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रभावित करती है आपकी कहानी।

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  3. मैं कहानी के अंत से सहमत हूँ यह कहानी पाठक को दिशा देती है।

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  4. कहानी की नायिका के मनोमंथन को बखूबी प्रस्तुत करती है आपकी कहानी। बहुत बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
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    उत्तर देंहटाएं
  7. सुषमा जी प्रभावशाली कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई...अंत तो प्रेरणादायक है ही आपके शब्द संयोजन भी बेहतरीन हैं।

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