बार- बार बिछुड़ने पर
समझाता हूं स्वयं को एक वाक्य से.....
रुदन बनने का श्रेय, मिला तेरे विश्वास से
माना कि, पीड़ा का परिचायक हूँ
पर साथी भी तो हूँ तेरा
कारण अकारण आ जाना
क्या सम्बन्ध साक्ष्य नहीं मेरा
निनाद हूँ टूटे भावों का
क्षोभ नहीं मैं साक्ष्य हूँ
अतीत की अकुलाहट
बीता ! वर्तमान हूँ
विडम्बना है जीवन की
मेरी मृत्यु ही मेरा जीवन है
कि चक्षु पे गिरते ही
हस्तों से तू उठाता है
यें असीम प्रेम ही तो है मेरा
तेरी हर पीड़ा अपनाता हूँ
जब भी रहोगे शोक में
सर्वप्रथम मैं आता हूँ
बार-बार बिछुड़ने पर
स्वयं को मैं समझाता हूँ ........

----------
रचनाकार - जूबी मंसूर



12 comments:

  1. अरे ये तो बहुत सुन्दर कविता है !

    उत्तर देंहटाएं
  2. जब भी रहोगे शोक में
    सर्वप्रथम मैं आता हूँ
    बार-बार बिछुड़ने पर
    स्वयं को मैं समझाता हूँ ........

    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर रचना | बधाई |
    लेकिन १ शब्द नहीं जमा - जैसे - कि चक्षु पे गिरते ही (पे)

    अवनीश तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्षोभ नहीं मैं साक्ष्य हूँ
    अतीत की अकुलाहट
    बीता ! वर्तमान हूँ
    विडम्बना है जीवन की
    मेरी मृत्यु ही मेरा जीवन है
    कि चक्षु पे गिरते ही
    हस्तों से तू उठाता है
    यें असीम प्रेम ही तो है मेरा
    तेरी हर पीड़ा अपनाता हूँ
    जब भी रहोगे शोक में
    सर्वप्रथम मैं आता हूँ
    बार-बार बिछुड़ने पर
    स्वयं को मैं समझाता हूँ ........



    bahut gahri abhivayakti

    उत्तर देंहटाएं
  5. jo gir gye
    vo kho gye
    girte hee
    jmi doj ho gye
    jo girne se rh gye
    ve moti ho gye
    moti ko sheje rkhna
    use kleje me
    chhipaye rkhna
    kyon ki
    haathon me
    ve kb aate hain
    najok hain bhut hi
    hath ke
    chhute hee tut jate hain

    उत्तर देंहटाएं
  6. jo gir gye
    vo kho gye
    girte hee
    jmi doj ho gye
    jo girne se rh gye
    ve moti ho gye
    moti ko sheje rkhna
    use kleje me
    chhipaye rkhna
    kyon ki
    haathon me
    ve kb aate hain
    najok hain bhut hi
    hath ke
    chhute hee tut jate hain
    dr.vedvyathit@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह...अद्वितीय...अप्रतिम ....
    मर्म को छू गयी आपकी यह रचना...अनुपम बिम्ब प्रयोग और उसका अद्भुत विस्तार किया आपने...

    उत्तर देंहटाएं
  8. क्षोभ नहीं मैं साक्ष्य हूँ
    अतीत की अकुलाहट
    बीता ! वर्तमान हूँ

    apoorv abhivyakti

    neelesh Jain
    www.yoursaarathi.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget