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सोमवार, २१ दिसम्बर २००९

वह गरीब है ना...[लघुकथा] - अवनीश तिवारी

आज फ़िर दफ्तर के कामों में उलझे होने और बचे कामों को पूरा करने की तंग अवधि के कारण, दोपहर के खाने से दूर रहना पड़ा। सुबह का वह बैग शाम जाते समय भी उतना ही वजनदार था। काम पूरा हो जाने की खुशी पेट के भूख को भुला कर रह रह संतोष का पुट मष्तिष्क में छोड़ जा रही थी। यह संतोष मेरी चाल की तेजी में बदल मुझे अपने घर की ओर ले जा रही थी। एकाएक पास के चाट की दूकान पर नज़र पड़ी और भूख ने अपना मुंह उढा लिया। मन चाट का स्वाद लेने ललच पड़ा और मैं चाट की दूकान पर आ जमा। मै चाट के लिए कह कर खडा रहा। ४-६ जनों की मांग पहले से होने के कारण मेरा नंबर अभी नहीं आया था।

इस बीच एक फटे हाल, कुछ अधिक उम्र का दुबला सा आदमी, पैरों के टूटते हुए चप्पलो को खींचते धीरे - धीरे बढ़ा आ रहा था। उसकी दीनता दूर से ही अपना परिचय दे रही थी। गहरे रंग के इस आदमी ने भी चाट के लिए कहा और मेरे समीप रूक मुंह लटका कर खड़ा हुआ।

पास फेंकें गए चाट के जुठे पत्तलों को चाटने कई कुत्ते जमें थे। उनमें एक पिल्ला किसी ज्यादा भरे जुठे पत्तल को पा उसे तूफानी गति से चाटे जा रहा था । कोई दूसरा तंदुरुस्त कुत्ता उस पिल्लै को पत्तल चाटते देख उसकी तरफ़ झपटा और उसे काट भगाया। पिल्ले को पत्तल चाटने के लिए मिली इस सजा से हुए हल्ले से चौक और यह सब देख उस गरीब के ह्रदय की पीड़ा उसके मुंह तक आ गयी। वह कुत्ते की ओर अपने दाहिने हाथ की तर्जनी से निशाना लगा झुंझलाहट में बोल पड़ा - " ये उसे क्यों मारता है, वह गरीब है ना "। गरीबी की व्यथा से निकला यह दर्द सुन मैं सन्न सा रह गया।

..........और लोग यह सब देख सुन उसे अनदेखा कर अपने अपने चाट में मस्त हो गए। दीनता की पुकार हर कोई नहीं समझ सकता । मै भी अपना चाट खा वहां से निकल पडा। वह क्षणिक घटना बार बार दिमाग में चोट करे जा रही थी, जिससे आहत मैं अब मंद गति से, किसी सोच में खो चला जा रहा था।

5 comments:

नंदन २१ दिसम्बर २००९ ८:१० AM  

संवेदना से भरी लघुकथा.

बेनामी २१ दिसम्बर २००९ ८:२३ AM  

Nice Short Story.

Alok Kataria

दृष्टिकोण २१ दिसम्बर २००९ ११:३२ AM  

अवनीश जी इस कहानी में अभी और लिखे जाने की संभावना अंतर्निहित है। कहानी में दृश्टिकोण बहुत प्रसंशनीय है।

अनन्या २१ दिसम्बर २००९ १२:२४ PM  

बात सही है बेचारा गरीब ही पिसता है।

सुषमा गर्ग २१ दिसम्बर २००९ २:२३ PM  

अच्छी और संवेदनशील लघुकथा है।

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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