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गुरुवार, ४ फरवरी २०१०

भाषा की खुशबू [ग़ज़ल] - देवी नागरानी


लोरी सुना रही है हिंदी जुबां की खुशबू
रग-रग से आ रही है हिन्दोस्तां की खुशबू

रचनाकार परिचय:-
11 मई 1949 को कराची (पाकिस्तान) में जन्मीं देवी नागरानी हिन्दी साहित्य जगत में एक सुपरिचित नाम हैं। आप की अब तक प्रकाशित पुस्तकों में "ग़म में भीगी खुशी" (सिंधी गज़ल संग्रह 2004), "उड़ जा पँछी" (सिंधी भजन संग्रह 2007) और "चराग़े-दिल" (हिंदी गज़ल संग्रह 2007) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त कई कहानियाँ, गज़लें, गीत आदि राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आप वर्तमान में न्यू जर्सी (यू.एस.ए.) में एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं।.....

भाषा अलग अलग सी हर प्रांत की है बेशक
पर दास्ताँ से आये उनकी जुबां की खुशबू

भारत हमारी माँ है, भाषा है उसकी ममता
हिन्दोस्तां से आये सारे जहाँ की खुशबू

दुश्मन का भी भरोसा, जिसने कभी न तोड़ा
ख़ामोश उस ज़बाँ से आये बयाँ की खुशबू

भाषाई शाखों पर थे हर प्राँत के परिंदे
उड़कर जहाँ भी पहुंचे, पहुंची वहां की खुशबू

दीपक जले है हरसूं भाषा के आज देवी
लोबान सी है आती कुछ कुछ वहां की खुशबू



तस्वीर में - श्री रामबाबू गौतम, सुश्री देवी नागरानी जी, डा. श्री उमेश शुक्ला और शिव अग्रवाल जी

8 comments:

Udan Tashtari ४ फरवरी २०१० ६:३६ AM  

दुश्मन का भी भरोसा, जिसने कभी न तोड़ा
ख़ामोश उस ज़बाँ से आये बयाँ की खुशबू

बहुत सुन्दर..देवी जी की रचनाएँ हमेशा ही लाजबाब होती हैं.

बेनामी ४ फरवरी २०१० ८:२२ AM  

Nice Gazal

Alok Kataria

निर्मला कपिला ४ फरवरी २०१० ११:२३ AM  

भाषाई शाखों पर थे हर प्राँत के परिंदे
उड़कर जहाँ भी पहुंचे, पहुंची वहां की खुशबू

दीपक जले है हरसूं भाषा के आज देवी
लोबान सी है आती कुछ कुछ वहां की खुशबू
लाजवाब गज़ल देवी नागरानी जी कल की जदूगर हैं धन्यवाद उन्हें पढवाने के लिये धन्यवाद्

नीरज गोस्वामी ४ फरवरी २०१० १:२५ PM  

आज ही ब्लॉग पर एक लेख पढ़ रहा था जिसमें किसी अखबार के हवाले से कहा गया था की हिंदी एक मरती हुई भाषा है मैं चाहता हूँ की ये ग़ज़ल उसे पढवा दूं ताकि उसकी सोच बदले...जिस भाषा में इतनी सुन्दर रचनाये रचित होतीं हों वो कभी नहीं मर सकती...दीदी आपने एक बार फिर कमाल किया है.नमन है आप और आपकी लेखनी को.
नीरज

अवनीश एस तिवारी ४ फरवरी २०१० ५:४६ PM  

बहुत खूब |

अवनीश तिवारी

अवनीश एस तिवारी ४ फरवरी २०१० ५:५० PM  

नीरज जी,

मेरे जानकारी के हिसाब से हिन्दी ३ रे स्थान पर है , सर्वाधिक उपयोग में लाई जाने वाली भाषा के रूप में |
मेरे ख्याल से हिन्दी एक flexible language है , जो गंगा माता की तरह अन्य भाषायों के सौन्दर्य को अपने भीतर समा कर और निखरती रही है |
इसके रूप बदलते रहेंगे , लेकिन यह मरेगी नहीं |

जय हिंद , जय हिन्दी


अवनीश तिवारी

Devi Nangrani ४ फरवरी २०१० १०:०१ PM  

मैं साहित्य शिल्पी का आभार प्रकट करती हूँ इन रचनाओं के माध्यम से प्रवासी भावनात्मक करवटें लेता हुआ हमारा दर्द, हमारी सर ज़मीन दूरियां जिन्हें हम यादों की वादियों में सजाये रहते hain. मुम्बई के रचनाकार मेरे दिल के बहुत करीब है. अनुज नीरज और अविनाश इस रचनात्मक क्षितिज के नए चमकते सितारे हैं. निर्मला जी की आभारी हूँ प्रोत्सहन की राह में हमेशा मुझे सबसे आगे मिली. समीर हर जगह हाज़िर होता है, आलोक जी आपका धन्यवाद.
हिंदी भाषा के इस सैलाब को रोकना मुमकिन ही नहीं नामुमकिन है. नेट मगज़िनेस और ब्लोग्स से इसका जो इजाफा हुआ है वह उलेखनीय है.

वो गुलफ़िशाँ है देवी, वही बाग़बाँ हमारा
आती रहे वतन से परवरदिगाँ की खुशबू

देवी नागरानी

सुलभ § सतरंगी ५ फरवरी २०१० ११:२१ AM  

भाषाई शाखों पर थे हर प्राँत के परिंदे
उड़कर जहाँ भी पहुंचे, पहुंची वहां की खुशबू


अति सुन्दर..

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:-
श्रद्धांजलि:-
साक्षात्कार:-
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-
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