लोरी सुना रही है हिंदी जुबां की खुशबू
रग-रग से आ रही है हिन्दोस्तां की खुशबू
रचनाकार परिचय:-
11 मई 1949 को कराची (पाकिस्तान) में जन्मीं देवी नागरानी हिन्दी साहित्य जगत में एक सुपरिचित नाम हैं। आप की अब तक प्रकाशित पुस्तकों में "ग़म में भीगी खुशी" (सिंधी गज़ल संग्रह 2004), "उड़ जा पँछी" (सिंधी भजन संग्रह 2007) और "चराग़े-दिल" (हिंदी गज़ल संग्रह 2007) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त कई कहानियाँ, गज़लें, गीत आदि राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आप वर्तमान में न्यू जर्सी (यू.एस.ए.) में एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं।.....

भाषा अलग अलग सी हर प्रांत की है बेशक
पर दास्ताँ से आये उनकी जुबां की खुशबू

भारत हमारी माँ है, भाषा है उसकी ममता
हिन्दोस्तां से आये सारे जहाँ की खुशबू

दुश्मन का भी भरोसा, जिसने कभी न तोड़ा
ख़ामोश उस ज़बाँ से आये बयाँ की खुशबू

भाषाई शाखों पर थे हर प्राँत के परिंदे
उड़कर जहाँ भी पहुंचे, पहुंची वहां की खुशबू

दीपक जले है हरसूं भाषा के आज देवी
लोबान सी है आती कुछ कुछ वहां की खुशबू



तस्वीर में - श्री रामबाबू गौतम, सुश्री देवी नागरानी जी, डा. श्री उमेश शुक्ला और शिव अग्रवाल जी

8 comments:

  1. दुश्मन का भी भरोसा, जिसने कभी न तोड़ा
    ख़ामोश उस ज़बाँ से आये बयाँ की खुशबू

    बहुत सुन्दर..देवी जी की रचनाएँ हमेशा ही लाजबाब होती हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  2. भाषाई शाखों पर थे हर प्राँत के परिंदे
    उड़कर जहाँ भी पहुंचे, पहुंची वहां की खुशबू

    दीपक जले है हरसूं भाषा के आज देवी
    लोबान सी है आती कुछ कुछ वहां की खुशबू
    लाजवाब गज़ल देवी नागरानी जी कल की जदूगर हैं धन्यवाद उन्हें पढवाने के लिये धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज ही ब्लॉग पर एक लेख पढ़ रहा था जिसमें किसी अखबार के हवाले से कहा गया था की हिंदी एक मरती हुई भाषा है मैं चाहता हूँ की ये ग़ज़ल उसे पढवा दूं ताकि उसकी सोच बदले...जिस भाषा में इतनी सुन्दर रचनाये रचित होतीं हों वो कभी नहीं मर सकती...दीदी आपने एक बार फिर कमाल किया है.नमन है आप और आपकी लेखनी को.
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  4. नीरज जी,

    मेरे जानकारी के हिसाब से हिन्दी ३ रे स्थान पर है , सर्वाधिक उपयोग में लाई जाने वाली भाषा के रूप में |
    मेरे ख्याल से हिन्दी एक flexible language है , जो गंगा माता की तरह अन्य भाषायों के सौन्दर्य को अपने भीतर समा कर और निखरती रही है |
    इसके रूप बदलते रहेंगे , लेकिन यह मरेगी नहीं |

    जय हिंद , जय हिन्दी


    अवनीश तिवारी

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  5. मैं साहित्य शिल्पी का आभार प्रकट करती हूँ इन रचनाओं के माध्यम से प्रवासी भावनात्मक करवटें लेता हुआ हमारा दर्द, हमारी सर ज़मीन दूरियां जिन्हें हम यादों की वादियों में सजाये रहते hain. मुम्बई के रचनाकार मेरे दिल के बहुत करीब है. अनुज नीरज और अविनाश इस रचनात्मक क्षितिज के नए चमकते सितारे हैं. निर्मला जी की आभारी हूँ प्रोत्सहन की राह में हमेशा मुझे सबसे आगे मिली. समीर हर जगह हाज़िर होता है, आलोक जी आपका धन्यवाद.
    हिंदी भाषा के इस सैलाब को रोकना मुमकिन ही नहीं नामुमकिन है. नेट मगज़िनेस और ब्लोग्स से इसका जो इजाफा हुआ है वह उलेखनीय है.

    वो गुलफ़िशाँ है देवी, वही बाग़बाँ हमारा
    आती रहे वतन से परवरदिगाँ की खुशबू

    देवी नागरानी

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  6. भाषाई शाखों पर थे हर प्राँत के परिंदे
    उड़कर जहाँ भी पहुंचे, पहुंची वहां की खुशबू


    अति सुन्दर..

    उत्तर देंहटाएं

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