........साहित्य शिल्पी एक पूर्ण वेबसाईट में परिवर्तित हो चूका है। अब हमारी रचनाये यहाँ पढ़े... - www.sahityashilpi.in तथा कृपया हमें अपनी प्रतिक्रिया एवं सुझावों से अवश्य अवगत करायें जिससे हम आवश्यक सुधार कर सकें.....

सोमवार, १४ दिसम्बर २००९

"मैं ज़िन्दा था ही नहीं" राजीव रंजन प्रसाद की पहली कहानी [आओ धूप स्तंभ, सम्पादन सूरजप्रकाश]

इस बार आओ धूप में प्रस्तुत है राजीव रंजन प्रसाद की पहली कहानी "मैं ज़िन्दा था ही नहीं"। राजीव की यह कहानी हमारे सामने एक साथ कई सवाल खड़े करती है। जब भी हम अपने आसपास पास बचपन विहीन बचपन देखते हैं, कचरा बीनते हुए, ढाबे पर, चाय की दुकान पर, स्‍कूटर मैकेनिक की दुकान पर या इतर मेहनत मजूरी करते हुए तो कई सवाल हमें डिस्‍टर्ब करते हैं। क्‍यों सब बच्‍चों के हिस्‍से में बचपन नहीं आता और अगर आता भी है तो इस तरह से या उस तरह से क्‍यों आता है। हम चाह कर भी क्‍यों नहीं उनके लिए कुछ ठोस काम कर पाते और एक कटिंग चाय पिला कर ही हाथ झाड़ लेते हैं। लेकिन जब वही बचपन विहीन बचपन दुघर्टना का शिकार हो जाता है तो हम देखते हैं कि सिलसिला खत्‍म नहीं होता। उसकी जगह लेने के लिए आगे और बच्‍चे तैयार हैं। सामाजिक सरोकारों पर राजीव की पैनी निगाह है। हम विश्‍वास करते हैं कि राजीव भविष्‍य में भी इस तरह की डिस्‍टर्ब करने वाली कहानियां ले कर आते रहेंगे

आओ धूप में आपकी इसी तरह की पहली कहानी का हम इंतज़ार करेंगे।

सूरज प्रकाश
[email protected]

-----------

"मैं ज़िन्दा था ही नहीं" राजीव रंजन प्रसाद की पहली कहानी

------------
रोज देखता था उस लड़की को। सुबह हुई नहीं कि हॉस्टल की पिछली दीवार से लगे कूड़े के ढेर में जाने क्या खोजती, ढूँढती, बीनती मिलती। उसके घुटनों से लम्बा उसका बोरा पीठ पर लदा होता। अभी उम्र ही क्या होगी? ज्यादा से ज्यादा आठ वर्ष, किंतु जिन्दगी पीठ पर लदे पहाड़ से कम नहीं। उसका चेहरा उसके कपडो की तरह मटमैला नहीं था। हल्का गेहुँआपन लिये गोल, आँखें अंदर को धँसी, छोटी-छोटी। मैने अनुभव किया कि वह लड़की जानती ही नहीं हँसी किसे कहते हैं। टीन के डब्बे, प्लास्टिक, पोलीथीन, कागज, अखबार, यहाँ तक कि सिगरेट की डिबियों को वह उठा, झाड़ कर अपने बोरे में भर लेती।

हॉस्टल का ये कोना कभी साफ रहा हो मैने नही देखा। चपरासी हर कमरे का कचरा झाड़ कर यहीं पटक जाता है। उस लड़की के लिये कुबेर का खजाना था ये कोना।....।बचपन यानी कि तितली हो जाना, खिलखिलाना, कूदना, सपने बुनना और जगमग आँखों से आकाश के सारे तारे लूट लेना ...पर ऐसा बचपन! सच, पहली बार देखा। नहीं, उसमें बचपन था ही कहाँ? वह लड़की आठ वर्ष की अधेड़ थी। कुछ दिनों से उसके साथ एक और बच्ची आने लगी थी, हाथ थामे। उसकी छोटी बहन होगी, शायद। पाँच साल की भी न थी। यहाँ पहुँचते ही वह एक कोने में खडी हो जाती और अपनी दीदी को कबाड़ बीनते देखा करती । नि:शब्द। बचपना उसके बचपन में भी नहीं दीखा।

सुबह जल्दी उठ जाने के बावजूद स्ट्डी टेबल पर कभी नहीं बैठा। छ्त पर हवा सुहानी लगती थी और मैं टूथब्रश मुँह में दबाये घंटे भर दाँतो में इधर उधर करता रहता। सुबह सुबह और सोचता भी क्या? पर दिमाग खाली भी नहीं रहता शायद! इसीलिये कई बार मैने उस लड़की को अपनी सोच में कुलबुलाते पाया था। मुझे बेचैन कर देती थीं उसकी बेहद खामोश आँखें।....और अब यह छोटी...मैं उनकी आँखों में बचपन तलाशता और पाता आँखों के कोरों पर कीचड़ और भीतर मुर्दनी। बचपन को यह कैसा लकवा? अब कल ही तो वह मशहूर ग़ज़ल सुन रहा था - “ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती,वो बारिश का पानी”। मेरे तो सारे रोयें जैसे रो उठे थे। दिल कोई कस कर दबा रहा हो, जैसी स्थिति हो गई थी। सोचता हूँ, क्या कभी ये लड़कियाँ समझ सकेंगी इस गजल का अर्थ?....।

बोरा खचाखच भर चुका था। लड़की ने दोंनो हाथों से उठा कर वजन सा लिया, फिर एक झटका दोनो हाथों से बोरे को दिया और उसे कंधे से धकेल कर पीठ पर लाद लिया। छोटी ने बहन की फ्राक का एक सिरा थामा और दोनों चल पडीं। सूरज से चिंगारिया निकलनी शुरू हो चुकी थीं और बीच में कुछ नीला सा गोल गोल घूमने लगा था।
मैंने दादू की चाय की दुकान पर नजर डाली, दादू व्यस्त था। सुबह पाँच बजे ही वह दूकान खोल लेता है और फिर रात्रि नौ बजे तक....पूरा कोल्हू का बैल है वह। मैं भी कुल्ला कर, पानी मुँह और आँखों में डाल, नीचे उतर आया। बाथरूम में अभी पानी नहीं आ रहा था, सोचा तब तक एक कप चाय ही सही।
“गोपाल चाय पिला यार!” मैने दादू के लड़के से कहा। गोपाल यंत्रवत ले आया। इस बीच मैंने दादू को इशारा कर दिया था - “एक फुल, कड़ी, स्पेशल”। गोपाल के हाथ से मैंने पानी लिया और देखा वह फिर मशीन हो गया है। सामने की बैंच पर जूठन पड़ी थी। कहीं से कर्कश आवाज आयी - “कपड़ा मार’’ और गोपाल बैंच साफ करने लगा। दादू चिल्लाया- ‘’गोपाल! पीछे ‘मन’ को दो हाफ चाय दे के आ।’’ गोपाल ने दादू के हाथ से दो ग्लास ले लिये। मेरी चाय बनने में देर थी।
दादू मुझसे बेहद परेशान रहता है। सुबह मै कड़ी चाय पीना पसंद करता हूँ, वह भी खालिस दूध की। दादू कई बार टिप्पणी कर चुका है ‘’इतना पत्ती में मैं चार जन को चाय पिलाता..’’ और कई बार दबा प्रतिरोध भी “इतना कड़ा चाय पीने से काला हो जायेगा..’’। मैं दादू की झल्लाहट पर मजाक जड़ देता हूँ, ‘’कौन सा लड़की हूँ दादू, कि काला हो जाने से फर्क पड़ेगा?’’ दादू को भी क्या फर्क पड़ता है, मेरी चाय का वैसे भी वह तीन रूपया चार्ज करता है। “गोपाल!’’ दादू ने फिर आवाज दी, “राजू को चाय दे के आओ।’’ गोपाल ने चाय मुझको थमा दी।
आज सुबह से ही दिमाग जाने क्या क्या सोच रहा था और अब.....मैं सर झटक कर अपनी चेतना बटोरने लगा कि अभी आखिर सोच क्या रहा था मैं...शायद गोपाल के बारे में.. वही आठ वर्ष की उम्र, दादू का अपना बेटा....एक बाल मजदूर।
“दादू! तुम गोपाल को पढ़ने क्यों नहीं भेजते?’’ मैंने पूछा।
“जायेगा, अभी टेम नही हुआ..” दादू ने अपनी उफनती चाय को स्टोव से उतारते हुए कहा। हाँ! ग्यारह बजे से गोपाल दुकान में नहीं रहता, मुझे याद आया।
तब चटर्जी काम करता है। दादू ने काम पर रखा है इसे। तपन नाम है, पर चटर्जी ही सभी पुकारते हैं.....ये नहीं पढ़ता। पढ़ेगा तो पैसे नहीं मिलेगे, पैसे नहीं मिलेंगे तो खायेगा क्या? इस तरह के उत्तर उसने मुझे कई बार दिये थे किंतु अपने घर के विषय में कभी नहीं बताया। चंचल है यह लड़का। दादू के तो नाकों चने चबवाता रहता है। जब चटर्जी की जरूरत हो चटर्जी गायब। पता चला मैदान में पतंग उडा रहा है। दादू दुकान से चिल्लाता है, और भागता हुआ आता है चटर्जी- क्या काम है? सपाट सा उसका प्रश्न और दादू गालियों का भंडार उस पर खोल देता। मैंने चटर्जी को अपने बचपन के लिये लड़ते पाया है। उसे दादू की गालियों की परवाह नहीं, वेतन कट जाने की परवाह नहीं। परवाह है तो पतंग की, जिसकी डोर में धार नहीं है। इसी कारण तो झबलू की पतंग को बार-बार उलझा कर भी काट नहीं पा रहा। उसे परवाह है तो उन सारे कंचों की जिन्हें कल हार गया था। उसे परवाह है तो गुल्ली और डंडे की क्योंकि गिल्ली में पर्याप्त उछाल नहीं है। उसने दादू की मिल्कियत को खुली चुनौती दे रखी है, पीटना है तो पीट लो...। मेरी चाय खत्म हो चुकी थी। गोपाल के हाथों में ग्लास थमा, मैं अपने कक्ष की ओर लौटा। डर था कि पानी आ गया होगा, कहीं बाथरूम में भीड़ न हो गई हो।

****
लड़की ने शराब की खाली बोतल उठाई और बोरे में डालने से पूर्व ऐसी निगाहों से देखा जैसे अभी पटक कर फोड़ डालेगी। किंतु...शराब भले ही जहर हो, ये बोतल तो उसकी रोटी है। लड़की ने बोतल को बोरे में डाल लिया। उसकी इस गतिविधि ने मेरी कल्पना पैनी कर दी थी...शायद बाप शराबी हो, बच्चियों को मारता पीटता हो, कमाई पी कर उड़ा देता हो...और..और...मैं अपनी कल्पना में स्वत: संवेदित होने लगा। छ्त से थोड़ा झुक कर देखा। छोटी चुपचाप खड़ी थी। “ए लड़की!! तुम्हारा नाम क्या है?” मैंने पुकारा।
बड़ी के हाथ कुछ उठाते-उठाते रुक गये, उसने झुके हुए ही ऊपर देखा। मुझे छोटी से मुखातिब देख, वह पुन: कार्य में लग गई। “ए लड़की!” मैने छोटी को पुन: पुकारा। छोटी ने ऊपर तो देखा लेकिन सहमी आँखों से। मुझे लगा जैसे मेरे शब्दों में मिठास नहीं और इसीलिये बच्ची सहम गई।
“तुम्हारा नाम क्या है?” पूरी मृदुता मैंने आवाज में भरी। छोटी नि:शब्द रही। मैं.....मैं उसके सहम जाने का उत्तर स्वयं से पूछ रहा था। मुझे छोटी पर गुस्सा नहीं आया।......। अभी कुछ दिनों पूर्व ही किसी दोस्त से बहस में मैंने दलीलों पर दलीलें दी थीं कि बचपन चाहे निम्न वर्ग का हो, मध्यम या उच्च वर्ग का, बचपन तो बचपन ही होता है। एक तर्क मुझे मिला “कभी अनाथालय गये हो?” इस दलील पर यद्यपि मुझे निरुत्तर हो जाना चाहिये था, तथापि मैंने जाने किन-किन तर्कों से यह वाद-विवाद जीता था।....शायद अपने इसी खोखलेपन से डरा था मैं? दाँतों में घूमता ब्रश अनायास रुक गया। अनाथालय तो बहुत दूर है, मेरे सामने, मेरे रोज की अनुभव - ये दो लड़कियाँ। किस बचपन से तुलना करूँ और कैसे बचपन से? इनको तो किसी कुत्ते के पिल्ले के बचपन सा सुख भी प्राप्त नहीं...बेचारीं....ब्रश दाँतों के इर्द-गिर्द फिर घूमने लगा। बोरा भर चुका था और लड़कियाँ जाने लगीं। मैं उन्हें जाते देखता रहा। बोझ कंधे पर लादे बड़ी और उसकी फ्राक का एक सिरा पकड़े छोटी।
मन-मस्तिष्क इतना बोझिल हो गया था कि चाय पीना आवश्यक हो गया। दादू को मैंने हाथ से इशारा किया, “एक फुल कड़ी स्पेशल”। लड़कियाँ दादू की दूकान के सामने ही बोझा कंधे से उतार सुस्ता रही थीं।
“गोपाल!” मैंने आवाज दी। “जा दोनों को हाफ चाय दे कर आना।” मैंने इशारा किया। गोपाल मेरे चेहरे पर दृष्टि टिका कर खड़ा रहा।
“जा, दे के आ!” मैने आदेश के स्वर में कहा।
गोपाल ने अब दादू की ओर देखा। दादू ने दो हाफ गोपाल को थमा दिये। गोपाल फिर भी झिझका, पर हार कर गया ही। “ले!” गोपाल ने मोटे स्वर में बड़ी को कहा। बड़ी ने दादू की ओर देखा। दादू व्यस्त था। मैंने देखा, एक आश्चर्य की रेखा उसके चेहरे पर उभरी, उसकी नज़र मुझ पर पड़ी।
“ले लो - ले लो!” मैंने आग्रह सूचक शब्दों में कहा। बड़ी ने दोनों हाथों में ग्लास थामे फिर छोटी को एक थमा दिया। उसने अजीब सी निगाहों से मुझे देखा, शायद कृतज्ञता थी।
*****

जगदलपुर को पूरी तरह शहर तो नहीं कहा जा सकता। किंतु बस्तर जैसे क्षेत्र के लिये यह जिले का मुख्यालय, शहर से कम भी नहीं। अमरसिंह के साथ मैटिनी शो जा रहा था। अनुपमा चौक पर बहुत भीड़ थी। “क्या हुआ भाई साहब?” मैंने वहीं खड़े एक व्यक्ति से पूछा। “एक्सीडेंट!” एक शब्द में उसने स्थिति स्पष्ट कर दी। जिज्ञासावश मैं भीड़ में अपने लिये जगह बनाने लगा। अचानक चौंक उठा...” अरे यह तो वही...वो....वही लड़की है”। “कौन?” अमर सिंह नें प्रश्नवाचक निगाहों से घूरा। “अपने हॉस्टल के पास कबाड़ बीनने आती है रोज..” मेरे स्वर में घबराहट थी और अमरसिंह की आँखों में अचरज।
बड़ी, सड़क पर पड़ी थी। सर फट गया था और खून बिखरा हुआ था। एक सफेद कार जिसके अगले हिस्से पर खून लगा था, वहाँ खड़ी थी। ड्राईवर कोई धन्नासेठ था जो रूमाल से अपना पसीना पोंछ रहा था।....। मैंने हमेशा देखा है दुर्घटनाओं में ड्राईवर भीड़ के हाथ लगा तो भीड़ उसे अधमरा कर ही मानती है पर....धन्नासेठ के कपडे मँहगी सफारी के थे। टाईपिन भी सोने की नज़र आ रही थी, भला भीड़ उसे हाँथ कैसे लगा सकती थी? मेरे मन में गुस्से का गुबार सा उठा कि उसका मुँह ही नोंच डालूँ या...या...या....मैंने आश्चर्य से देखा, उसने एक निगाह लाश पर डाली फिर वापस अपनी कार में बैठा और चलता बना। मैंने कार का नम्बर नोट किया।
“चल न यार! पिक्चर छूट जायेगी।” अमर सिंह नें मेरा हाथ पकड़ कर खींचा। “छोड़, मैं नहीं देखूँगा।” मैंने जवाब दिया। मैं उस छोटी लड़की को देख रहा था जो रोये जा रही थी। मेरी पलकों के कोरों पर नमीं बैठने लगी। “तू भी यार.. छोटी-छोटी बातों पर रो डालता है।” अमर ने टिप्पणी की। मुझे महसूस हुआ .. शायद…सचमुच.....। वर्ना क्या भीड़ इसी तरह खामोश रहती? हमें क्या लेना देना की मनोवृत्ति। किसी को भी क्या लेना देना? सड़क दुर्घटना में एक मौत हुई, बस! फिर ये कुत्ते से बदतर मौत! लाश लावारिस पड़ी रही। छोटी के रोने की आवाज मेरे कानों में सूईयाँ चुभाने लगी। मैं क्या करता? मैं क्या कर सकता था?...मुझे क्या करना चाहिये था?....?....? ये प्रश्न आज तक अपने आप से दोहराता रहा हूँ। उस क्षण, मैं स्वयं को बिखरा-बिखरा महसूस कर रहा था, सड़क पर बिखरे कबाड़ की तरह।
****

मैं मुँह धोता टहल रहा था। जानता था, अब कबाड़ बीनने कोई नहीं आयेगा। फिर भी अनायास छत से झाँक लेता...। रात भर ठीक से सो नहीं सका था।....और सचमुच सप्ताह भर कोई नहीं आया। कबाड़ जमा होता रहा, होता रहा और आज......आज, छोटी कबाड़ बीन रही थी। मैंने देखा, फिर देखा, फिर देखा...उसके घुटनों से बडा उसका बोरा। पीठ पर वही सब कुछ - डब्बे, बोतल, सिगरेट के पैकेट, पोलीथीन...। शराब की बोतल उसके हाथों में थी। छोटी ने बहुत शांत आँखों से देखा, फिर उसे बोरे में डाल लिया। मैं उसके चेहरे में आया हर भाव पढ़ जाना चाहता था, निराशा हुई मुझे।
बोरा भर गया था। छोटी ने वजन लेने के लिये हाथों से बोरे को खींचा...नहीं बहुत भारी था। उसने पुन: यत्न किया। उससे नहीं उठा। मैंने देखा, छोटी ने बोरा खोल भीतर से शराब की बोतल निकाल निकाल फेंक दीं। बोरा कंधे पर उठाया और चल पड़ी, बिलकुल भावशून्य!....। तभी मैंने देखा, वही सफेद कार सामने फर्राटे से निकली और आज खून का एक भी छींटा उस पर न था। एक भी नहीं....। मैं देख रहा था, एक लाश आहिस्ता आहिस्ता, कंधे पर पहाड़ ढोए जा रही है। फिर मैंने महसूस लिया कि मैं कभी ज़िन्दा था ही नहीं।

14 comments:

Devi Nangrani १४ दिसम्बर २००९ ६:४१ AM  

Bahut Hi Marmic kahani.

Devi nangrani

nitesh १४ दिसम्बर २००९ ७:४६ AM  

बालश्रम पर बहुत मार्मिक कहानी। लगता नहीं है कि यह पहली कहानी है।

बेनामी १४ दिसम्बर २००९ ७:५३ AM  

Nice Story.

Alok Kataria

अनिल कुमार १४ दिसम्बर २००९ ८:१२ AM  

शराब की बोतले बाला बिम्ब बडा संवेदनशील है। बाल श्रम पर अपनी व्यथा उडेल दी है कथाकार नें। प्रस्तुति का आभार।

Udan Tashtari १४ दिसम्बर २००९ ९:४३ AM  

्शानदार गठन...भावुक कर गई कथा.

मोहिन्दर कुमार १४ दिसम्बर २००९ ९:५० AM  

मार्मिक कथानक लिये भावुक कर देने वाली रचना.

निधि अग्रवाल १४ दिसम्बर २००९ ११:२८ AM  

सवाल छोड जाती हुई कहानी है। आँख नम कर देती है।

अभिषेक सागर १४ दिसम्बर २००९ ११:५६ AM  

बहुत अच्छी कहानी, बधाई।

अनन्या १४ दिसम्बर २००९ १:२८ PM  

सूरज जी का कथन ही दोहराती हूँ कि

"सामाजिक सरोकारों पर राजीव की पैनी निगाह है। हम विश्‍वास करते हैं कि राजीव भविष्‍य में भी इस तरह की डिस्‍टर्ब करने वाली कहानियां ले कर आते रहेंगे"

aniruddh १४ दिसम्बर २००९ १:५० PM  

रुला दिया राजीव जी आपने।

rashmi ravija १४ दिसम्बर २००९ २:३१ PM  

सच एक कुत्ते के पिल्ले का जीवन भी इनसे बेहतर है...वे अपनी मर्जी के मालिक तो हैं..विषाद से भर गयी , ये कहानी..

दिव्यांशु शर्मा १४ दिसम्बर २००९ ५:१९ PM  

बाल श्रम पर लिखी गयी कहानियों में एक फायदा ये होता है कि आरम्भ से ही पाठक के जज़्बात की नब्ज़ लेखक के हाथ में होती है | पर साथ ही इसमें एक ज़िम्मेदारी भी आ जाती है लेखक पर , कहानीकार पर कि वो पाठक की उमीदों पर खरा उतरे ... उसे ऐसा कुछ बताये , सुनाये जो उस ने पहले सोचा नहीं हो इस परिप्रेक्ष्य में | कोई ऐसा दृश्य बनाए जो इन जज्बातों के साथ इनसाफ करता हो | और यहीं राजीव जी की ये कहानी मुझे बहुत जमी | बच्चियों की बेचारगी का वर्णन मात्र दया नहीं लगा ... अपितु अपने आप से एक सवाल भी लगा , जो हम करने से डरते हैं .. पर हम उत्तर ना मिलने के दर से सवाल करना नहीं छोड़ सकते | क्यूंकि इन प्रश्नों के अभाव में कई उत्तर भटकती रूहों के मानिंद डोलते फिरते हैं | चटर्जी का नैसर्गिक विद्रोह , छोटी का झोली से बोतल का निकालना ... ये भी कुछ जवाब हैं छोटे छोटे लेकिन एक दम साबित और मज़बूत....
राजीव भाई को बधाई ..

rachana १४ दिसम्बर २००९ ९:०८ PM  

rajeev ji
aap ki pahli kahani hi aap ko ek achchha kahani kar sabit karti hai kitna marmik varnan haia,sajiv aur sahi
bahut sunder
saader
rachana

Dr. Sudha Om Dhingra १६ दिसम्बर २००९ २:०० AM  

भावुक कथावस्तु और संवेदनशील अभिव्यक्ति,
पहली ही कहानी इतनी मार्मिक और ज़ोरदार, आँखें नम कर गई.
बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ.

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:-
श्रद्धांजलि:-
साक्षात्कार:-
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-
संस्मरण:-
वीडियो:-
बाल साहित्य:-
पुस्तक चर्चा:-
अनुवाद:-

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP