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सोमवार, २० अक्तूबर २००८

प्रख्यात कथाकार/उपन्यासकार नासिरा शर्मा से बातचीत [साक्षात्कार] - डॉ. फीरोज़ अहमद

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आपकी साहित्य साधना कब और कैसे आरम्भ हुई और उसके लिए प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

घर में लिखने पढ़ने का माहौल था। उससे कहाँ बचा जा सकता था। स्कूल में भी कहानी प्रतियोगिता आयोजित होती। दोनों जगह रचनात्मक माहौल सृजन की दुनिया को लगातार अंकुर फोड़ने की प्रक्रिया में रखते जिसके कारण लेखन एक सहज प्रक्रिया के रूप में जीवन का हिस्सा बनता चला गया।

सृजन से पूर्व, सृजन के समय और सृजन के पश्चात् आपकी मन:स्थिति क्या होती है?


लिखते समय जज्बात और ख्यालात का हुजूम उत्तेजना भरता है। तब कोई शोर या आवाज किसी तरह का खलल कभी मूड खराब करता है तो कभी तेज गुस्सा दिलाता है। उसका कारण भी है कि आपके हाथ से दरअसल भाषा का तारतम्य फिसल जाता है। जो बहाव सहज रूप से निकलता है वह फिर बनावट से पूरा होता है जो मुझे ठीक नहीं लगता। मगर हमेशा ऐसा नहीं होता। जब कहानी गिरफ्त में हो तो बाकी चीजें बेकार सी लगती हैं। कयामत भी आकर गुजर जाये तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

लिखने से पहले एक बेचैनी, कभी-कभी उदासी, अक्सर खामोशी की कैफियत बनती है। लिखते समय जज्बात और ख्यालात का हुजूम उत्तेजना भरता है। तब कोई शोर या आवाज किसी तरह का खलल कभी मूड खराब करता है तो कभी तेज गुस्सा दिलाता है। उसका कारण भी है कि आपके हाथ से दरअसल भाषा का तारतम्य फिसल जाता है। जो बहाव सहज रूप से निकलता है वह फिर बनावट से पूरा होता है जो मुझे ठीक नहीं लगता। मगर हमेशा ऐसा नहीं होता। जब कहानी गिरफ्त में हो तो बाकी चीजें बेकार सी लगती हैं। कयामत भी आकर गुजर जाये तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। लिखने के बाद एक अजीब-सी खुशी, इत्मीनान-सा महसूस होता है मगर इस अहसास से मैं कोसों दूर रहती हूँ कि मैंने कोई शहकार रचा है क्योंकि कहानी मुकम्मल हो जाने के बाद भी, अभिव्यक्ति और किरदार की सहजता को लेकर मैं काफी सोचती और शब्दों को अक्सर बदलती रहती हूँ। जब हर तरफ से मुतमईन हो जाती हूँ तभी छपने भेजती हूँ।

साहित्य को आप किन शब्दों में परिभाषित करेंगी?

इन्सान बने रहने की कोशिश और इन्सान बने रहने के लिए दूसरों को उस कोशिश में शामिल करना।

इतनी लम्बी साहित्य साधना में क्या कभी आपका जी ऊबा है? यदि हाँ, तो क्या कारण रहे हैं?

बीच-बीच में काफी फुजूल के काम करती हूँ। इसलिए हमेशा ताजगी का अहसास बना रहता है। लेखन और लेखक का भारी लबादा पहनना और उसे तकलीफ के साथ घसीटते जाना मेरी फितरत नहीं है।

अवाम के सन्दर्भ में साहित्य की भूमिका को आप किस प्रकार देखती हैं?

कहानियों में अवाम का दखल दरअसल एक महत्त्वपूर्ण 'गारा' है जिससे आप कहानी बनाते हैं। मगर अफसोस जिस अवाम के लिए हम लिखते हैं ज्यादातर वे लोग साहित्य नहीं पढ़ पाते हैं। पहला कारण शिक्षित न होना और दूसरा मेहनत मजदूरी और सर छिपाने की जद्दोजहद के बाद उनके पास थककर सोने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। हम खुद ही लिखते हैं और खुद ही पढ़ते हैं। जो शिक्षित है, जिन्हें साहित्य से लगाव है; उन तक पुस्तकें उस तरह सुलभ नहीं है जैसी होनी चाहिए। साहित्य की कोई कृति न सामूहिक रूप से समाज की धारा बदल पाई, न समाज की कुरीतियों की जड़ से उखाड़ पाई और न पुराने कानूनों में संशोधन करा पाई। मगर हाँ, व्यक्तिगत रूप से कुछ व्यक्तियों को, बिखरे रूप से, जरूर बदल पाई। मगर वास्तविकता तो यह है कि क्या अकेला चना भाड़ भूंज सकता है? कहने का अर्थ साफ है कि सामाजिक जकड़न और जड़ सोच वाले कुनबे में जो व्यक्ति बदला, वह पूरे परिवार को नहीं बदल पाया; मगर उसे घर निकाला जरूर मिला। तो भी अपवाद की कमी नहीं है। यह अपवाद कब सामूहिक फोर्स में बदलेंगे और अवाम और साहित्यकार में कब संवाद स्थापित होगा; कहा नहीं जा सकता है। अभी तो हम सब कोशाँ हैं।

क्या साहित्योपजीवी होकर जिया जा सकता है?

नहीं।

बाल-साहित्य के रूप में आपने साहित्य का विपुल मात्रा में सृजन किया है। हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य में उसकी स्थिति और भूमिका पर आपका दृष्टिकोण क्या है?

बच्चों के लिए मैंने बचपन से लिखा। लगातार लिखा। मगर उस लेखन का उस तरह नोटिस नहीं लिया गया जिसको राष्ट्र के स्तर पर पहचान का नाम दिया जा सकता है; क्योंकि हिन्दी की दुनिया में बाल-साहित्य का कोई अहम रोल नजर नहीं आता है जबकि उसके लिखने वालों की संख्या काफी है और वे जो केवल बाल-रचनाओं के साहित्यकार हैं; उनको भी वह सम्मान और पहचान किसी मंच पर जैसी विदेशों के रचनाकारों को मिली हुई है, नहीं प्राप्त है। जबकि बहुत कुछ बाल-भवन, नेशनल बुक ट्रस्ट के द्वारा होता रहता है, मगर वह सब कुछ मुख्यधारा जैसा नजर नहीं आता है, न इनकी चर्चा खास व आम में बराबर से होती है। बाल पत्रिकाएँ भी हैं। बाल-साहित्य पुरस्कार भी हैं। मगर जिस तरह उर्दू में अब्बू खाँ की बकरी को साहित्यिक कृति होने का तमगा मिला हुआ है या हर बड़े लिखने वाले ने बच्चों के लिए भी लिखा है वैसा रिवाज हिन्दी में देखने को नहीं मिलता है; भले ही अन्य भारतीय भाषाओं में हो। हम भूल जाते हैं कि लेखक इन्सानी अहसास को अपने कलम से कागज पर उतारता है न कि खानाबन्दी किये इन्सानों में से किसी को उठाता है। गरीब-अमीर, अफसर-नौकर, मर्द-औरत, बूढ़े-बच्चे सब मिल कर परिवार में रहते हैं और समाज की संरचना करते हैं, मगर जब साहित्यकार कलम उठाता है तो उसकी रचना से अक्सर बाल पात्रा गायब रहते हैं। आखिर क्यों? क्या स्वयं उसका बचपन उसका पीछा कभी छोड़ता है? (कृष्ण बलदेव वैद का उपन्यास 'उसका बचपन' याद आ गया) कहने का मतलब सिर्फ इतना 

इसमें कोई शक नहीं है कि आज पाठकों के वैसे खत नहीं मिलते हैं जैसे कि बीस वर्ष पहले मिलते थे। जिसमें कहानी पर जमकर बात होती थी। कहीं पर कुछ घटा तो है जो संवाद की स्थिति नहीं बन पाती है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमने कुछ जगहों पर बेजा हस्तक्षेप कर उनको पीछे धकेल दिया है जिनकी राय और प्यार की हमें जरूरत होनी चाहिए।
कि हम अपने तक सीमित न रहें। वैसे भी बच्चों के लिए लिखना आसान काम नहीं है। जबरदस्ती लिखवाना भी नहीं चाहिए मगर जो लिखते हैं उनको आदर व सम्मान मिलना चाहिए और हमारी मानसिकता में यह बात दाखिल हो जानी चाहिए कि बच्चों का एक बड़ा संसार है; जिसमें जिज्ञासा, मासूमियत, भय, खुशी, चीजों को देखने और महसूस करने का बिल्कुल अलग अनुभव है। जिसको समेटने का अर्थ है कि हम अपनी रचनाओं में केवल नई पीढ़ी को जगह नहीं दे रहे है बल्कि अपने कलम और अपनी सोच को निरन्तर शादाबी बख्श रहे हैं।

साधारणतया कहानी की एक परिभाषा दी जाती है कि कहानी घटना या घटनाओं का सुसंयोजित रूप है। आज की कहानी इस दृष्टि से काफी भिन्न नजर आती है। तो क्या इसको कहानी नहीं मानना चाहिए? आप अपनी राय बताइये।

घटनाएँ यदि कहानियाँ हैं तो फिर रिपोर्टिंग क्या है? पत्रकारिता और साहित्यिक लेखन का बुनियादी फर्क यह है कि एक में सूचना होती है और दूसरे में अहसास। रपट की सीमा जहाँ समाप्त होती है, कहानी वहाँ से शुरू होती है। कहानी इन्सान के अन्दर की दुनिया को खोलती है। बाहर के ब्यौरे गैरज़रूरी तौर से नहीं देती है। कहानी मेरी नजर में वह है जो घटनाओं का उल्लेख न करके उस घटना के प्रभाव का वर्णन करे जो इन्सान पर बीती है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह लेखन रिपोर्ताज भी हो सकता है और लेख भी कहला सकता है।

साहित्य लेखन में महिलाओं की क्या स्थिति है और उसका मूल्यांकन किस प्रकार किया जाता है?

हिन्दी साहित्य में महिलाओं का हमेशा से योगदान रहा है मगर हाँ, अब संख्या काफी बढ़ गई है। विभिन्न तरह के मुद्दों को लेकर उनकी कलम मुखर हुई है। यदि आप सवाल सम्पूर्ण औरत की स्थिति पर करते तो अच्छा होता। अभी तक सही तरीके से हिन्दी साहित्य का मूल्यांकन नहीं हो पाया तब उस लेखन के लिए क्या कहूँ जो गैरजरूरी तरीके से मुख्य धारा से अलग हो अपनी पहचान बनाने के संघर्ष में रत है।

विभिन्न साहित्यिक विमर्शों के सन्दर्भ में आपकी क्या मान्यता है? इसकी प्रासंगिकता के सन्दर्भ में आप क्या लिखती हैं?

बुनियादी तौर पर मैं साहित्य में खानाबन्दी की कायल नहीं हूँ। हम एक समाज में रहते हैं। समाज के बाँटे जाने पर एतराज करते हैं। मगर वही काम हम अपने-अपने कार्य क्षेत्रों में करने से बाज नहीं आते हैं। कुछ जुल्म हमारे यहाँ हुए हैं। उनका सिलसिला आज भी अफसोसनाक तरीके से जारी है मगर उसको इस तरह से खत्म करने की दलीलें कि विमर्श व आरक्षण देकर खत्म किया जाय, न न्यायसंगत लगती है, न तर्कसंगत लगती है। यही कारण है कि हम बहुत सारे मुद्दों से जूझने के बावजूद कहीं पहुँचे नहीं हैं।

कुछ लोगों का मत है कि आज की कहानी पाठकों से कट गई है। लेखक लेखकों से प्रशंसा प्राप्त करने के लिए लिखता है। क्या यह सही है?

इसमें कोई शक नहीं है कि आज पाठकों के वैसे खत नहीं मिलते हैं जैसे कि बीस वर्ष पहले मिलते थे। जिसमें कहानी पर जमकर बात होती थी। कहीं पर कुछ घटा तो है जो संवाद की स्थिति नहीं बन पाती है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमने कुछ जगहों पर बेजा हस्तक्षेप कर उनको पीछे धकेल दिया है जिनकी राय और प्यार की हमें जरूरत होनी चाहिए। शायद इसी के चलते पाठकों में पुस्तक खरीदने की संख्या भी घटी है। पहले दाम ज्यादा; फिर उपलब्ध नहीं। खरीददारी लाइब्रेरी या अन्य संस्थाओं में बल्क के रूप में होती है तो वहाँ पाठक नहीं। बात केवल लेखक, प्रकाशक, पाठक के बीच तक सीमित नहीं है बल्कि राजनीति का तंग दायरा और गैर जरूरी मुद्दों पर फोकस भी इस दुर्दशा में शामिल हैं।

हिन्दी कहानी साहित्य का भविष्य कैसा है?


हिन्दी में कहानियाँ लिखी जा रही हैं। बेहतर भी और खूबसूरत भी। मगर परेशानी यह है कि हमारे कलम पर कुछ नाम चढ़ गये हैं। हम लगातार उसे दोहराते रहते हैं। कहानियों के नए नामों के लिए जगहें तंग हैं या फिर हम पढ़ते ही नहीं हैं क्योंकि भीड़ बहुत है। मगर यह समय निकल जायेगा। भुला दिए जाने के बाद भी बेहतर चीजें सामने आयेंगी। ऐसा हो रहा है। धूल, धुआँ, शोर, परिदृश्य को वक़्ती तौर से धुँधला बना सकते हैं; मगर कब तक?

हिन्दी में कहानियाँ लिखी जा रही हैं। बेहतर भी और खूबसूरत भी। जैसे-मधुसूदन आनन्द की 'ज़र्राह', मेराज अहमद की 'अमरूद और हरी पत्तियाँ', हसन जमाल की 'जमील मुहम्मद की बीवी', अब्दुल बिस्मिल्लाह की 'कागज के कारतूस', चित्रा मुद्गल की 'मिट्टी', रवीन्द्र कालिया की 'सुन्दरी बहुत देर तक' याद रह जाने वाली कहानियाँ हैं। मगर परेशानी यह है कि हमारे कलम पर कुछ नाम चढ़ गये हैं। हम लगातार उसे दोहराते रहते हैं। कहानियों के नए नामों के लिए जगहें तंग हैं या फिर हम पढ़ते ही नहीं हैं क्योंकि भीड़ बहुत है। पत्रिकाएँ फिलहाल बहुत हैं। खेमे असंख्य है। पैमाना तय नहीं, कसौटी का कोई प्रामाणिक मंच नहीं। अपनी डफली अपना राग है। मगर यह समय निकल जायेगा। भुला दिए जाने के बाद भी बेहतर चीजें सामने आयेंगी। ऐसा हो रहा है। धूल, धुआँ, शोर, परिदृश्य को वक़्ती तौर से धुँधला बना सकते हैं; मगर कब तक?

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20 comments:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

नासिरा जी ने बहुत गहराई से और साफ दिल से सारे उत्तर दिये हैँ
पढकर खुशी हुई..
- लावण्या

DR.Shagufta Niyaz २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

बहुत अच्छा साक्षात्कार है.बधाई.

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

बहुत अच्छा लगा इस मंच पर नासिरा शर्मा जी को पढना, डो. फीरोज अहमद बधाई के पात्र हैं प्रस्तुत साक्षात्कार के लिये।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

नासिरा जी से किये गये प्रश्न उच्च कोटि के हैं यही कारण है कि नासिरा जी नें अपने उत्तरों में बहुत कुछ समेटा है। बहुत अच्छा लगा पढ कर।

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

लेखन की बारीकियों को नासिरा जी नें न केवल बताया बल्कि बहुत साफगोई से कहानी की हालिया स्थिति पर भी टिप्पणी की है। अच्छा लगा यह साक्षात्कार।

seema gupta २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

"it is really my pleasure to read this inteview.."

Regards

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

बहुत अच्छी तरह से लिया गया, बहुत अच्छी तरह से प्रस्तुत किया गया साक्षात्कार। साहित्य शिल्पी को बधाई।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

नसीरा जी के बारे मे साहित्य शिल्पी पर पढ कर अच्छा लगा... बहुत अच्छा साक्षात्कार ....बधाई...

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

Appreciable. Thanks.

Alok Kataria

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

डॉ. फीरोज अहमद द्वारा प्रस्तुत यह साक्षात्कार अंतर्जाल पर एक उपलब्धि की तरह है, अंतर्जाल पर साहित्य को गंभीरता से प्रस्तुत करने के प्रयास में यह एक कडी सिद्ध होगा।

नासिरा जी तो स्वयं एक संस्था की तरह हैं। बहुत सी गहरी बाते कहीं उन्होनें "जो बहाव सहज रूप से निकलता है वह फिर बनावट से पूरा होता है जो मुझे ठीक नहीं लगता। मगर हमेशा ऐसा नहीं होता। जब कहानी गिरफ्त में हो तो बाकी चीजें बेकार सी लगती हैं।"


"अफसोस जिस अवाम के लिए हम लिखते हैं ज्यादातर वे लोग साहित्य नहीं पढ़ पाते हैं। पहला कारण शिक्षित न होना और दूसरा मेहनत मजदूरी और सर छिपाने की जद्दोजहद के बाद उनके पास थककर सोने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। हम खुद ही लिखते हैं और खुद ही पढ़ते हैं।"

"कहीं पर कुछ घटा तो है जो संवाद की स्थिति नहीं बन पाती है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमने कुछ जगहों पर बेजा हस्तक्षेप कर उनको पीछे धकेल दिया है"

"हिन्दी में कहानियाँ लिखी जा रही हैं। बेहतर भी और खूबसूरत भी। मगर परेशानी यह है कि हमारे कलम पर कुछ नाम चढ़ गये हैं। हम लगातार उसे दोहराते रहते हैं। कहानियों के नए नामों के लिए जगहें तंग हैं या फिर हम पढ़ते ही नहीं हैं क्योंकि भीड़ बहुत है। मगर यह समय निकल जायेगा। भुला दिए जाने के बाद भी बेहतर चीजें सामने आयेंगी। ऐसा हो रहा है। धूल, धुआँ, शोर, परिदृश्य को वक़्ती तौर से धुँधला बना सकते हैं; मगर कब तक?"


बधाई डॉ. फीरोज, इस प्रस्तुति के लिये।


***राजीव रंजन प्रसाद

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

अच्छा लगा ...
यह साक्षात्कार पढकर ।

बधाई डॉ. फीरोज अहमद ,

pran sharma २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

ye sach hai ki hum khud hee likhte
hain aur khud hee padhte hain.
pathak kahani se door ho gayaa hai.
Mukhya karan hai ,n to us mein
kathaanak raha hai aur n hee
kissagoee.Pathneeyata,gathan,
samprashneeyata aur maarmiktaa jo
kahani ke mukhya ang yaa gun hain
kahani ke ek sire se gaayab ho gaye
hain.Pathak dilubaaoo kahanion se
kategaa hee.Kya karan hai ki "usne
kaha tha","kafan","Poos kee Raat",
"Toba Tek Singh"jaesee kahanian
aaj bhee bade shauq se padhee jaatee hain?

pran sharma २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

Dr.Firoz Ahmad ko badiya interview
ke liye badhaaee.

Dr. Sujit Kumar Bajpayee २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

बहुत अच्छा साक्षात्कार है। डो. फीरोज को बधाई।

विश्व दीपक ’तन्हा’ २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

सर्वप्रथम तो फीरोज़ जी का आभार , जो उन्होंने इतनी महान हस्ती का साक्षात्कार लिया।

नासिरा जी ने जिस विधि सभी प्रश्नों का जवाब दिया है, उससे उनकी प्रतिभा और अनुभव का उम्दा प्रमाण मिलता है। उनके बारे में बहुत कुछ जानने को मिला।

बधाईयाँ!!!!!!

अजय यादव २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

आदरणीय नासिरा जी के विचार जानकर बहुत अच्छा लगा. उच्चकोटि के प्रश्न थे और नासिरा जी ने भी अपने जवाब में वर्तमान हालात को बहुत कुछ समेटा है.
आभार!

आलोक शंकर २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

achcha sakshatkar hai.
aise hi aur ki ummeed hai.

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

डा. फ़िरोज अहमद जी का आभार कि आपने इस साक्षात्कार के माध्यम से नासिरा जी के बारे में इतनी जानकारी उपलब्ध करवाई. निश्चय ही हम पुस्तकों और कहानियों के बारे में अधिक जानते हैं परन्तु सर्जनकर्ता से अन्जान रहते हैं... साक्षात्कात एक सशक्त माध्यम है जिससे बहुत से अनछुये पहलू सामने आते हैं.

सुशील कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

प्रेरणादायक साक्षात्कार। ज्वलंत प्रश्न और विवेकयुक्त संतुलित उत्तर।संवादहीनता की स्थिति पर साफ़-सुथरा विचार।बहुत धन्यवाद ऐसी प्रस्तुति के लिये।-सुशील कुमार

मोहन वशिष्‍ठ २३ नवम्बर २००९ ६:४७ PM  

डा: फिरोज जी आपने नासिरा शर्मा जी का साक्षात्‍कार पेश किया एक बहुत ही बडी उपलब्धि है बहुत अच्‍छा साक्षात्‍कार बधाई

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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