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शुक्रवार, ११ दिसम्बर २००९

ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं [ग़ज़ल] - नीरज गोस्वामी

Ghazal by Neeraj Goswami


रचनाकार परिचय:
नीरज गोस्वामी का जन्म 14 अगस्त 1950 को जम्मू में हुआ। इंजिनियरिंग स्नातक नीरज जी लगभग 30 वर्षों के कार्यानुभव के साथ वर्तमान में भूषण स्टील मुम्बई में असिसटैंट वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत हैं।

बचपन से ही साहित्य पठन में इनकी रुचि रही है। अनेक जालघरों में इनकी रचनायें प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने अनेक नाटकों में काम किया और पुरुस्कार जीते हैं।
मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं
वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं

इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही
जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं

तल्ख़ बातों को जुबाँ से दूर रखना सीखिए
घाव कर जाती हैं गहरे जो कभी भरते नहीं

अब्र लेकर घूमता है ढेर-सा पानी मगर
फ़ायदा कोई कहाँ गर प्यास पे बरसे नहीं

छोड़ देते मुस्कुरा कर भीड़ के संग दौड़ना
लोग ऐसे ज़िंदगी में हाथ फिर मलते नहीं

खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी
घर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं

8 comments:

वन्दना ११ दिसम्बर २००९ ३:४८ PM  

मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं
वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं

waah...........jadoo bhar diya hai.
इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही
जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं
ishq ka ye andaz to kabil-e-tarif hai

योगेन्द्र मौदगिल ११ दिसम्बर २००९ ४:२१ PM  

wahwa ..kya baat hai...badhai neeraj ji..badiya gazal..

AlbelaKhatri.com ११ दिसम्बर २००९ ६:२६ PM  

wah !
aanand aaya.......

Tarkeshwar Giri १२ दिसम्बर २००९ ७:२६ AM  

Its very Good

rashmi ravija १२ दिसम्बर २००९ १:०२ PM  

तल्ख़ बातों को जुबाँ से दूर रखना सीखिए
घाव कर जाती हैं गहरे जो कभी भरते नहीं
बहुत सुन्दर ग़ज़ल है....अहसासों से लबरेज़

सुलभ सतरंगी १२ दिसम्बर २००९ १:३८ PM  

मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं
वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं
-- बहुत खूब.

इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही
जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं
-- बहुत खूब आगे बयाँ करने की जरुरत नहीं.

तल्ख़ बातों को जुबाँ से दूर रखना सीखिए
घाव कर जाती हैं गहरे जो कभी भरते नहीं
-- बिलकुल सच.

अब्र लेकर घूमता है ढेर-सा पानी मगर
फ़ायदा कोई कहाँ गर प्यास पे बरसे नहीं
-- वाह क्या तस्वीर है.

छोड़ देते मुस्कुरा कर भीड़ के संग दौड़ना
लोग ऐसे ज़िंदगी में हाथ फिर मलते नहीं
-- क्या फरमाया है सर जी.

खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी
घर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं
-- लाजवाब ग़ज़ल

अर्कजेश १२ दिसम्बर २००९ २:२७ PM  

हर शेर पेर वाह वाह वाह ....

इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही
जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं

simply genius.

मोहिन्दर कुमार १४ दिसम्बर २००९ ९:५९ AM  

खूबसूरत ख्यालात का मुजाहरा करती एक दिलकश गजल

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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