वतन की याद आती है [ग़ज़ल] - देवी नागरानी
रचनाकार परिचय:-बहे काजल न क्यों हरदम, वतन की याद आती है
समय बीता बहुत लंबा हमें परदेस में रहते
न उसको भूल पाए हम, वतन की याद आती है
तड़पते हैं, सिसकते हैं, जिगर के ज़ख़्म सीते हैं
ज़ियादा तो कभी कुछ कम, वतन की याद आती है
चढ़ा है इतना गहरा रंग कुछ उसकी मुहब्बत का
हुए गुलज़ार जैसे हम, वतन की याद आती है
यहाँ परदेस में भी फ़िक्र रहती है हमें उसकी
हुए हैं गम से हम बेदम, वतन की याद आती है
हमारा दिल तो होता है बहुत मिलने मिलाने का
रुलाते फ़ासले हमदम, वतन की याद आती है
वही है देश इक ‘देवी’ अहिंसा धर्म है जिसका
लुटाता प्यार की शबनम, वतन की याद आती है







14 comments:
वही है देश इक ‘देवी’ अहिंसा धर्म है जिसका
लुटाता प्यार की शबनम, वतन की याद आती है
बहुत खूब देवी जी। हर एक पंक्ति अपने आप में कीमती है। लीजिए मैं भी कोशिश करूँ-
बसे परदेश में फिर भी दिलों में शेष है जज्बा
यही भारत का है दम खम वतन की याद आती है
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
हमारा दिल तो होता है बहुत मिलने मिलाने का
रुलाते फ़ासले हमदम, वतन की याद आती है
बहुत प्रभावी और संवेदनशील ग़ज़ल है।
Nice Gazal.
Alok Kataria
देवी नागरानी जी गज़ल विधा में जाना माना नाम हैं। परदेस की व्यथा गज़ल बखूबी कहती है।
तड़पते हैं, सिसकते हैं, जिगर के ज़ख़्म सीते हैं
ज़ियादा तो कभी कुछ कम, वतन की याद आती है
अहसास से भरी ग़ज़ल है। आँख भर आती है।
Wahwa...Behtreen GAZAL
बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल है |
देश प्रेम से ओत - प्रोत |
बधाई |
अवनीश तिवारी
मुम्बई
बहुत अच्छी ग़ज़ल, बधाई।
हमारा दिल तो होता है बहुत मिलने मिलाने का
रुलाते फ़ासले हमदम, वतन की याद आती है
दीदी की ग़ज़ल पर क्या कहूँ...बहुत दिल से लिखती हैं...और जब सुनातीं है तो बस फिर पूछिए मत...सुरों की गंगा बहती है...इश्वर उन्हें हमेशा खुश रखे....
नीरज
dhnya hain aap
aap ke jazbaat
aap ki lekhni
aur aapka ishq-e-vatan
___vandan is vatan ka
__vandan aap jaise hamvatan ka !!
देवी जी,
मिट्टी की सोंधी सोंधी सुगन्ध सी अपने देश की याद हर पल तन और मन में बसती है और फ़ासले रुलाते हैं। इस अह्सास को संवेदनशील शब्दों में पिरो कर आपने मन और आँख दोनों ही भिगो दी। धन्यवाद इतनी सुन्दर गज़ल के लिये तथा साहित्यशिल्पी का आभार।
शशि पाधा
अत्यंत संवेदनशील ग़ज़ल।
वतन की याद आती है...
संवेदनाओं को छुआ है आपने. दर्द बहुत है इस ग़ज़ल में...
- सुलभ
वतन से दूर, रहकर भी मन की इस साहित्य शिल्प के माध्यम से कुछ कसक कम हो जाती है. आप सभी का प्रोत्साहन मेरी लिए बहुत ही अनमोल मार्गदर्शक है.
कभी रोता है दिल मेरा, कभी आंखें हैं होती नम
क्या मिट पायेगी ये दूरी, क्या होंगे फासले ये कम
आप सभी का हार्दिक आभार और साहित्य शिल्प के इस मंच को भी मेरा अभिनन्दन
देवी नागरानी
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