कमलेश्वर शहरयार को एक खामोश शायर मानते थे। एक ऐसा खामोश शायर जब इस कठिन दौर व खामोशी से जुड़्ता है, तो एक समवेत चीखती आवाज मे बदल जाता है। बडे अनकहे तरीके से अपनी खामोशी भरी शाइस्ता आवाज को रचनात्मक चीख में बदल देने का यह फन शहरयार की महत्वपूर्ण कलात्मक उपलब्धि है। वे मानते है कि शहरयार की शायरी चौकाने वाली आतिशबाजी और शिकायती तेवर से अलग बड़ी गहरी सांस्कृतिक सोच की शायरी है और वह दिलो दिमाग को बंजर बना दी गयी जमीन को सीचती है। 

अकादमी पुरस्कार के अतिरिक्त विभिन्न स्तरों पर देश विदेश में सम्मान और ख्याती प्राप्त शहरयार के उर्दू में ‘इस्में आज़्म’, ‘सातवाँ दर’, ‘हिज्र की जमीन’ शीर्षकों से आए काव्य संग्रह काफी चर्चित और प्रशंशित हुए हैं। ‘ख्वाब का दर बंद है’ हिन्दी और अंग्रेजी मे भी प्रकाशित हो चुका है तथा ‘काफिले यादों के’, ‘धूप की दीवारे’, ‘मेरे हिस्से की ज़मीन’ और ‘कही कुछ कम है’ शीर्षकों से उनके काव्य संग्रह हिन्दी मे प्रकाशित हो चुके है। ‘सैरे जहाँ’ हिन्दी मे शीघ्र प्रकाश्य है। 

‘उमराव जान’ की गजलों से शहरयार को जो ख्याति, जो सम्मान मिला उसे वे अपनी उपलब्धि और खुशकिस्मती मानते हैं। फिल्म को आज के संदर्भ में वे काफी ‘इफेक्टिव मीडिया’ मानते हैं। वे कहते है कि उन्होने अपनी आइडियोलाजी के लिये इस मीडिया का बेहतर इस्तेमाल किया। एक श्रेष्ठ और समर्पित कवि के अतिरिक्त वे एक संवेदनशील, विनम्र, आत्मीय और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने वाले व्यक्ति हैं। प्रस्तुत है डॉ. प्रेम कुमार से उनकी बातचीत 

[ नोट - डॉ. प्रेम कुमार ने बेहद विस्तार से शहरयार को जानने व इस मंच पर प्रस्तुत करने का उल्लेखनीय कार्य किया है इसके लिये साहित्य शिल्पी समूह उनका आभार व्यक्त करता है। अंतरजाल की सीमाओं के मद्देनजर दो खंडो और चालीस पृष्ठों में प्रेषित इस साक्षात्कार के महत्वपूर्ण अंश मुख्य पृष्ठ पर प्रस्तुत किये जा रहे हैं। शेष बातचीत पढने के लिये प्रस्तुत साक्षात्कार के नीचे दिये गये लिंक पर चटखा लगायें]

लेखन के शुरुआती दौर के विषय में कुछ बतायें 

ये मुझे याद नहीं आता. बार-बार सोचा है - कोई ऐसा सिरा नहीं मिला कि पकड़ कर कह सकूँ कि मैं शायरी की तरफ जाने वाला था। बेसिकली यह याद आता है कि खलीलुर्रहमान साहब, जो बड़े कवि और आलोचक थे, ए.एम.यू. में रीडर थे; से मिलना-जुलना होता था। जब मैंने तय किया कि मुझे थानेदार नहीं बनना है तो घर से अलग होना पड़ा। तब मैं खलीलुर्रहमान के साथ रहने लगा।...। तो शुरू में मेरी जो चीजें छपीं, ऐक्चुअली वो मेरी नहीं हैं। बाद में अचानक कोई मेरी ज़िंदगी में आया.... नहीं, यह कांफीडेंशियल है... मैं कितना ही रुसवा हो जाऊँ इस उम्र में, किसी और को रुसवा क्यों करूँ?.... तब दुनिया मुझे अज़ीब लगने लगी और फिर मैं शायरी करने लगा। बी.ए. की आखिरी साल में शेर लिखने की रफ़्तार तेज हो गई। एम.ए. में साइकोलोजी में दाखिला लिया और जल्दी ही अहसास हुआ कि फैसला गलत लिया है। दिसम्बर में नाम कटा लिया। फिर चार छ: महीने केवल शायरी की - खूब छपवाई। ऊपर वाले की मुझ पर.... हाँ, यूँ मैं मार्क्सिस्ट हूँ फिर भी मानता हूँ कि कोई शक्ति है; कोई बड़ी ताक़त है जो मेरी चीजों को तय करती रही है। उर्दू की बहुत अच्छी मैगजींस में मेरी चीजें छपने लगीं। तेज़ रफ़्तारी से सामने आया। फिर एम.ए. उर्दू में ज्वाइन किया। उस दौर में मेरा और मासूम रज़ा राही का कम्पिटीशन चलता था। जी, हमने बी.ए. साथ-साथ किया, फिर मैं एक साल पीछे हो गया।

इस पर खुश नहीं होना चाहिये कि यह फिक्शन का दौर है। इस पर अफसोस होना चाहिये है, यह अदब का दौर नहीं है। महसूस करने को आला जुबान है- हर शख्स की मादरी जुबान और उसकी सबसे अच्छी चाहते है, तो महसूस करने का यह माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए। जो शख्स महसूस नहीं कर सकता, वह खासा खतरनाक होता है। वह न तो अच्छा शायर हो सकता है, न अच्छा बाप, न शौहर, न पड़ोसी। इसलिये वे आर्गनाइज्ड लोग, जो समाज मे उथल-पुथल करना चाहते हैं, वे इंसानो से उनके महसूस करने का हक छीन लेना चाहते हैं। शायरी, पेंटिग, म्यूजिक सब इमेजिनेशन की पैदावार है। सोसायटी में इनका न होना खतरनाक है। वैल्यूज को जितनी फोर्सफुली और पर्फेक्टली पोयट्री रेप्रेजेंट कर सकती है, उतना और कोई फैकल्टी आँफ आर्ट नहीं कर सकती।


पिछले दिनों हिन्दी में “ कविता की मौत “ और गद्य के भविष्य पर काफी कुछ कहा गया है। पिछले दिनों काजी अब्दुल सत्तार ने पोयट्री पर कई कोणों से प्रहार करते हुए इक्कीसवीं सदी को फिक्शन की सदी कहा है। एक शायर होने के नाते आप इन बिन्दुओं पर किस प्रकार सोचते है? 

देखिये इस पर खुश नहीं होना चाहिये कि यह फिक्शन का दौर है। इस पर अफसोस होना चाहिये है, यह अदब का दौर नहीं है। महसूस करने को आला जुबान है- हर शख्स की मादरी जुबान और उसकी सबसे अच्छी चाहते है, तो महसूस करने का यह माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए। जो शख्स महसूस नहीं कर सकता, वह खासा खतरनाक होता है। वह न तो अच्छा शायर हो सकता है, न अच्छा बाप, न शौहर, न पड़ोसी। इसलिये वे आर्गनाइज्ड लोग, जो समाज मे उथल-पुथल करना चाहते हैं, वे इंसानो से उनके महसूस करने का हक छीन लेना चाहते हैं। शायरी, पेंटिग, म्यूजिक सब इमेजिनेशन की पैदावार है। सोसायटी में इनका न होना खतरनाक है। वैल्यूज को जितनी फोर्सफुली और पर्फेक्टली पोयट्री रेप्रेजेंट कर सकती है, उतना और कोई फैकल्टी आँफ आर्ट नहीं कर सकती। पोयट्री से लुत्फ उठाने के लिये, उसे एप्रीशिएट करने के लिए कई चीज जरूरी हैं-म्यूजिक, पेंटिग, फिलासफी, मीटर्स बगैरह। उन्हें जानना जरूरी है। यदि आपको आईरकी सोसायटी चाहिये और उसमें वैल्यूज की बुनियाद चाहिये, तो पोयट्री जरूरी है। सारी दुनिया की जुबानों में पहले पोयट्री पैदा हुई फिर फिक्शन। फिक्शन को लोमैन भी पढ़ सकता है, पर पोयट्री का लुत्फ बहुत कुछ जानने पर ही लिया जा सकता है। बड़ा फिक्शन भी पोयट्री के बिना नहीं लिखा जा सकता। 

हिंदी में तो मंच के स्तर के गिरते जाने की........?

वो तो उर्दू में भी है। अच्छे बुरे हर तरह के लोग जाते भी हैं। नहीं किसी के साथ पढने-न-पढ़ने की शर्त नहीं रखी। यह सही है कि खाली लिटरेरी हैसियत के प्रोग्राम अच्छे लगते हैं यह दुनिया कुछ खास लोगों के लिए नहीं बनी है, हर तरह के लोग उस में मौज़ूद हैं। और उन्हें मौजूद और जिंदा रहने का हक है। खुद हम जिन लोगों को कंटेम्प्ट के साथ देखते हैं, उनका एक रोल है वो जिस सतह पर लोगों को एंटरटेन करते हैं, उसकी भी एक जरुरत है। हम-आप भी अगर अपने आपको अपने बनाए हुए जाल से थोडा सा निकाल सकें तो हमको भी वो चीजें अच्छी लगती हैं। 

मंच में और सीरियस लिटरेचर में जो फ़ासला पैदा हो गया है, उसकी थोडी बहुत जिम्मेदारी सीरियस राइटर्स पर भी है। वो उस इडियस में बात करने लगे है कि जो बहुत खास लोगों के लिए रह गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें अपने से नीचे उतरना चाहिए, पर अर्थ यह है कि हमें अपनी गंभीर बात को सहज अंदाज में कहने का आर्ट हासिल करना चाहिए।


मंच में और सीरियस लिटरेचर में जो फ़ासला पैदा हो गया है, उसकी थोडी बहुत जिम्मेदारी सीरियस राइटर्स पर भी है। वो उस इडियस में बात करने लगे है कि जो बहुत खास लोगों के लिए रह गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें अपने से नीचे उतरना चाहिए, पर अर्थ यह है कि हमें अपनी गंभीर बात को सहज अंदाज में कहने का आर्ट हासिल करना चाहिए। 

अदब में फ़ार्म और कटेंट की बहस में हमेशा उलझावा रहा है, इसीलिये कि अदब में इन दोनो को अलग-अलग देखना नामुमकिन है। ये तो हम उसका असेस्मेंट करने में, उसको एप्रीशिएट करने में अपनी सहूलियत के लिये अलग-अलग कर के देखते हैं और कभी एक चीज पर और कभी दूसरी चीज पर ज्यादा एम्फ़ैसिस देने लगते हैं। मैं उन लोगों में हुँ जिनका ख्याल है कि अगर कोई मजबूरी आन पड़े और हमें फ़ार्म और कटेंट में से किसी एक को तस्लीम करना पडे तो मैं कंटेट को अहमियत दूंगा

उर्दू में शायरी की ताकत के नाम पर प्राय: गज़ल का जिक्र किया जाने लगता है। आप भी पहले नज़्म की तुलना मे गज़ल के रूप को बेहतर मानते रहे हैं। गज़ल और नज़्म के स्तर पर आज आप शायरी या शायर को किस तरह अलग अथवा बेहतर-कमतर मानते हैं। 

गज़ल मे जो भी ट्रुथ होता है वह जनरल बन जाता है। उसकी डिटेल्स मौजूद नहीं होती इसलिये शेर कई जगह कई बातों को निकालते हुए आता है। यह उसकी ताकत भी है कमजोरी भी। आप चाहते है कि किसी पर्टिकुलर चीज पर निगाह डालें लोग, पर जनरल होने की वजह से सुनने-पढ़्ने वाला अपनी तरह से अर्थ ले लेता है। नज़्म में जिस तरह आप अपनी बात कहते है, उसमे पढने-सुनने वाला पूरी तरह नहीं तो काफी बड़ी हद तक आपकी सोच के आस-पास रहता है। गज़ल कहते समय उस फार्म की कुछ बंदिशे है, जिनकी वजह से कभी-कभी कुछ ज्यादा कह जाते हैं या कुछ कम रह जाता है। जरूरी नहीं कि हर नज़्म मे सौ फीसदी कामयाब हों, लेकिन गज़ल के मुकाबले मे लिखने वाले को यह अहसास होता है कि वह अपनी बात दूसरों तक पहुँचा सका है।


पहले मेरा इस पर रूख दूसरा था। अब चेंज किया है, मैने अपनी राय को। अब दोनों में ही में सभी तरह की प्राब्लम्स फेस करता हूँ। गज़ल मे जो भी ट्रुथ होता है वह जनरल बन जाता है। उसकी डिटेल्स मौजूद नहीं होती इसलिये शेर कई जगह कई बातों को निकालते हुए आता है। यह उसकी ताकत भी है कमजोरी भी। आप चाहते है कि किसी पर्टिकुलर चीज पर निगाह डालें लोग, पर जनरल होने की वजह से सुनने-पढ़्ने वाला अपनी तरह से अर्थ ले लेता है। नज़्म में जिस तरह आप अपनी बात कहते है, उसमे पढने-सुनने वाला पूरी तरह नहीं तो काफी बड़ी हद तक आपकी सोच के आस-पास रहता है। गज़ल कहते समय उस फार्म की कुछ बंदिशे है, जिनकी वजह से कभी-कभी कुछ ज्यादा कह जाते हैं या कुछ कम रह जाता है। जरूरी नहीं कि हर नज़्म मे सौ फीसदी कामयाब हों, लेकिन गज़ल के मुकाबले मे लिखने वाले को यह अहसास होता है कि वह अपनी बात दूसरों तक पहुँचा सका है। 

गज़ल की ताकत या कमजोरी की बात नहीं है। उसके फार्म ने न खुशी है, न खामी है। इस्तेमाल करने वाले पर है। हमारे यहाँ इसका बहुत चलन रहा है। उसके जरिये जो भी कहा जाता है वो बहुत ही जल्द और बहुत से लोगों तक पहुचता है। ग़ज़ल के बारे मे हर बार कहा गया है कि अपने जमाने का साथ नहीं दे सकरी पर इकबाल, फैज सबने साबित किया कि दे सकती है। मुशायरे की शायरी से हिन्दी या उर्दू मे अंदाज नहीं लगाना चाहिए। 

हमारे यहाँ बहुत से शायर है-अच्छे शायर, जिन्होने गजल बिल्कुल नहीं लिखी पर उनकी शायरी कुछ खास लोगों की शायरी है। शायरी मे शायर की अपनी सोच होनी चाहिए, पहचान होनी चाहिए। कुछ खास बातें उसकी होनी चाहिए, लेकिन उसकी पहुँच खास के साथ आम लोगों तक भी हो। तब वह एक सच्ची और अच्छी शायरी होती है। उर्दू मे इसकी सब से बड़ी मिसाल गालिब है, बहुत गहरी, बहुत फिलासफी कल बातें करते है और जिन्दगी की ऐसी सच्चाइयाँ सामने लाते है, जो हमें हैरान कर देती हैं। उनकी जुबान भी , ईडियम कहिए, वो आसान नहीं है, लेकिन इसके बावजूद एक सतह पर आम आदमी भी उससे लुत्फंगूज होता है, मजा लेता है। 

गज़ल और नज़्म की जहाँ तक बार है, हम उर्दू वालों का मिजाज गज़ल मे इतना रच-बस गया है कि वो नज़्म को उतना पसंद नही करता। यही वजह है कि उर्दू में वो शायर नुक्सान में रहे, जिन्होने सिर्फ नज़्में लिखी। आम मकबूलियत में अनकी गजलों का बड़ा हाथ है। अगरचे अदब को सतह पर देखा जाए तो उनका असली कंट्रीब्यूशन उनकी नज़्मो मे है। 

आपने गजल की जिस खूबी-खामी और उर्दू शायरों की पसंद व मिजाज की बात की है वह तो अपनी जगह है पर आपको भी ऐसा लगता है कि गजलों में अपने पूर्वर्तियो की छाया अथवा नकल या दोहराव अधिक बहुत अधिक दिखाई देता है। मौलिकता के संदर्भ में आप उर्दू गजल को कहा देखते है? 

ऐसा नही है। ये दौर बड़ी शायरी का दौर नहीं है। दूसरे दर्जे के शायर है और वे सब मिलकर बड़ी शायरी बनते है। फैज, मकदूम, मज़ाज़, जज़्बी, सरदार बगैरह मिलकर एक शक्ल बनाते है। अच्छे शायर है ये सब और अच्छी बात यह है अलग-अलग अच्छे शायर होना। हर शायर का जहाँ प्वांइट आफ व्यू होगा वह उससे देखेगा चीजों को। सिलेक्ट करने न करने का आला प्वाइंट आफ व्यू है। ऐसा मालूम होता है कि कुछ सिमलीज व मेहाफर्स बार बार आ रहे है। उससे लगता है कि रिपिट कर रहा है शायर अपने को। अच्छा सच्चा शायर कोशिश करता है कि अपने को रिपीट न करे। अब जैसे रात आया या सहर आया कहीं। पालिटिकल सोशियो प्राबलम्स है, अपनी बात है, कहने मे कुछ सिम्बल हैल्प करते है। इसलिये रात और दिन सिम्बल बन गए। सिचुएशन की मुख्तलिफी से फैज की, मेरी, पाकिस्तान का रात या दिन अलग होंगे। बहुत से दौर अदब मे ऐसे आते है और आए है जहाँ शायरो की बात ओवर लैप करती है। वह पूरे दौर की बात बन जाती है। एक्सटर्नल फोर्सेज, बहुत से लोगों को एक तरह से सोचने को मजबूर कर देती है। जब सब लोग एक तरह से सोचने को मजबूर हो जाए तो जाहिर है कि उनकी जुबान मे भी समानताएँ नजर आती है। पर ये उपरी समानताएँ होती है। सरसरी नजर से, कैजुअली जो पढ़्ता है, उसे यह धोखा है कि सब एक तरह की बातें कर रहे हैं। शायरी मे हर शायर की इडिवीजुअलिटी जरूर मौजूद रहती है। इसलिए क्रिएट करने वाले की अपनी जो आइडैंटिटी है, वह गुम नही होती। शायरी या कोई भी सीरियस आर्ट-फार्म पढ़्ने सुनने देखने वाले से थोडी सावधानी और थोडा वक्त मांगता है। जाकिर साहब का यह कथन कि “अगर कोई काम इस काबिल है कि किया जाए तो फिर उसे दिल लगाकर किया जाए अदब पर भी पूरी तरह लागू होता है। 

आपको मुशायरो मे भी बुलाया जाता रहा है। आप शिरकत भी करते रहे है। ऐसा क्यों है कि आपकी मुशायरो के बारे मे अच्छी राय नही है? अपनी कुछ खामियो के बावजूद मुशायरो या कवि सम्मेलन अपनी अपनी भाषाओं को लोकप्रिय तो बना ही रहे है? 

इंडिया मे मुशायरों और कवि सम्मेलनों मे सिर्फ चार बाते देखी जाती है- पहली, मुशायरा कंडक्ट कौन करेगा? दूसरी- उसमे गाकर पढ़्ने वाले कितने लोग होगे? तीसरी- हंसाने वाले शायर कितने होंगे और चौथी यह कि औरतें कितनी होगीं? मुशायरा आर्गेनाइज –पेट्रोनाइज करने वाले इन्ही चीजों को देखते है। इसमे शायरी का कोई जिक्र नहीं। हर जगह वे ही आजमाई हुई चीजें सुनाते है। भूले बिसरे कोई सीरियस शायर फँस जाता है, तो सब मिलकर उसे डाउन करने की कोशीश करते है। इसे आप पॉपुलर करना कह लीजिए। फिल्म ग़ज़ल भी बहुत पॉपुलर कर रहे है। पर बहुत पापुलर करना वल्गराइज करना भी हो जाता है बहुत बार। इंस्टीट्यूशन मे खराबी नहीं, पर जो पैसा देते है, वे अपनी पसंद से शायर बुलाते है। उनके बीच मे सीरियस शायर होगे तो मुशकिल से तीन चार और उन्हे भी लगेगा जैसे वे उन सबके बीच आ फँसे है। जिस तरह की फिलिंग मुशायरो के शायर पेश करते है, गुमराह करने वाली, तास्तुन, कमजरी वाली चीजें वे देते है, सीरियस शायर उस हालात मे अपने को मुश्किल मे पाता है। 

आप हिन्दी के साहित्य और साहित्यकारों से भी आत्मीय व करीबी स्तर पर जुडे रहे है। हिन्दी –उर्दू साहित्य को अगर आज तुलनात्मक दृष्टि से हम देखना चाहें, तो क्या मुख्य समानताए या असमानताए उनके बीच दिखती है? हिन्दी गजल के बारे मे विशेष रूप से अपनी राय जाहिर करते हुए आप अन्य विधाओ मे लिखे गए साहित्य की वर्तमान स्थिति के बारे मे अपने अनुभव, अपने विचार प्रकट करना अवश्य चाहेगे?

हिन्दुस्तानी वाला इलाका बैक्क बर्ड है। यहाँ अदब के बूते जिन्दा नहीं रहा जा सकता। रीजनल जुबानों में रिकॉगनीशन मिलने पर जिन्दगी गुजारी जा सकती है। मराठी, उडिया, बंगाली, तमिल वगैरह मे पढ़ा-लिखा कोई आदमी ऐसा नहीं होगा जो अपनी भाषा के लेखको को न जानता होगा। हिन्दी-उर्दू वाले आसानी से नये लोगों को रिकगनाइज नहीं करते। हम ही रहें नये न आए। एस्टेबलिशमेंट बन गया है। एकेडमिक इंस्टीयूशंन और हिन्दी-उर्दू डिपार्ट्मेंट्स की स्थिति यह है कि वहा लिटरेचर से लेना देना नहीं। साहित्य पढ़ाने मे लगे है, किंतु एकेडिमिक काम के अलावा दुनिया भर के काम उन्हे है। प्रोग्रेसिव आइडियाज से हिन्दी उर्दू दोनो मे लोग बिदकते है।


मैने हिन्दी साहित्य को हिस्टोरिक प्रोस्पेक्टिव मे सिस्टेमेटिक और आर्गेनाइज्ड ढंग से नही पढ़ा। पर हाँ जिन लोगो से सम्बन्ध रहे है उन्हे पढा है। भले ही सिस्टेमेटिक ढंग से नहीं पर मैने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, गिरिधर राठी, अशोक वाजपेयी, भारती, शमशेर, दुष्यंत, केदारनाथ, त्रिलोचन, नागार्जुन, श्रीकांत वर्मा वगैरह को पढ़ा है। वह अलग शायरी है। इसमे कम्पेयर नहीं। हिन्दी मे लोग गजल लिखते है, यह अच्छी बात है। पर दुष्य़ंत ने जो छाप लगा दी, वह बिलकुल अलग है। किसी भी तरह देखे वह गजल है। हम जिस तरह के मीटर के आदी है, हिन्दी शायरी हमें थोडी प्रोजेक लगती है। हम जिस तरह के मीटर और रिदम के कायल है, उसकी वजह से यह अहसास होता है कि जैसे वह प्रोज के करीब है। महादेवी, निराला मे ऐसी बात नहीं। पर जहा तक थाट-कंटेट को बात है, बहुत सीरियस शायरी है। वहाँ क्रिटीहिज्म मैने सुनी ज्यादा है, पढ़ी कम है। अपनी तकरीर मे नामवर सिंह बहुत इम्प्रेस करते है। उनका रिकार्ड काफी दिनों से एक जगह ठहरा हुआ है। मुझे कमलेश्वर और नामवर की तकरीर में अंतर नहीं लगता। दोनो इम्प्रेस करते है और दोनो के कुछ पहलू ऐसे है तो ज्यादा देर मुतस्सिर करते है। हिन्दी मे फिक्शन अच्छा है। कमलेश्वर, मोहन राकेश यादव, मुन्नू, शानी, श्रीलाल शुक्ल को पढ़ा है। एक खास पीरियड में राकेश , कमलेश्वर, यादव, शानी ने अच्छा लिखा है। 

खराबियाँ-अच्छाइयाँ दोनो मे कॉमन है। हिन्दुस्तानी वाला इलाका बैक्क बर्ड है। यहाँ अदब के बूते जिन्दा नहीं रहा जा सकता। रीजनल जुबानों में रिकॉगनीशन मिलने पर जिन्दगी गुजारी जा सकती है। मराठी, उडिया, बंगाली, तमिल वगैरह मे पढ़ा-लिखा कोई आदमी ऐसा नहीं होगा जो अपनी भाषा के लेखको को न जानता होगा। हिन्दी-उर्दू वाले आसानी से नये लोगों को रिकगनाइज नहीं करते। हम ही रहें नये न आए। एस्टेबलिशमेंट बन गया है। एकेडमिक इंस्टीयूशंन और हिन्दी-उर्दू डिपार्ट्मेंट्स की स्थिति यह है कि वहा लिटरेचर से लेना देना नहीं। साहित्य पढ़ाने मे लगे है, किंतु एकेडिमिक काम के अलावा दुनिया भर के काम उन्हे है। प्रोग्रेसिव आइडियाज से हिन्दी उर्दू दोनो मे लोग बिदकते है। 

आपके बारे में कहा जाता है कि आपने अपने लेखन से हिन्दी उर्दू के बीच एक पुल बनाया है। आप हिन्दी में भी काफी लोकप्रिय हैं। आपकी लोकप्रियता में फिल्म के गीतों की क्या भूमिका है? आप अपनी उपलब्धियों और देश की वर्तमान हालत पर क्या कुछ कहना चाहते हैं? 

मैं हिन्दी या उर्दू को नहीं लिख रहा, बल्कि उन लोगों के लिये लिख रहा हूँ जो खास तौर पर उर्दू भाषा भाषी हैं पर स्क्रिप्ट नहीं जानते, उन लोगों के लिये इनकी मातृभाषा उर्दू नहीं है पर मेरी शायरी पसंद करते हैं। मेरे शेर सुन कर, मुझसे मिल कर खुश होते हैं, मुझे प्यार देते हैं। हिन्दी में ज्यादा पॉपुलर होने की वजह यह है कि वे छापते हैं, पैसे देते हैं, इज्जत देते हैं, मानते हैं। उर्दू में खुद छपवानी पडती हैं किताबें। 

मेरी ज़िन्दगी में फिल्म के मेरे गीतों नें बहुत अहं रोल अदा किया है। मैं अपनी लिटररी अहमियत की वजह से फिल्म में गया फिर आम स्तर पर फिल्म की वजह से लिटरेचर में मेरी अहमियत बढी। मोहब्बत, शौहरत, दौलत, इज्जत, बच्चे...आदमी जो ख्वाहिश कर सकता है मुझे खूब मिला। वैसे आप जानते हैं पूरी तरह कोई मुतमइन नहीं होता। शायद आदमी के ज़िन्दा रहने को जरूरी है कि वह किसी चीज की ख्वाहिश करता रहे।किसी चीज की कमी महसूस करता रहे। 

जहाँ तक देश के सूरत-ए-हाल का सवाल है, तो जैसे मुल्क का फ्यूचर तय हो रहा है, रिफॉर्म्स के नाम पर जैसे जो हो रहा है और आम आदमी को कुछ नहीं मिल रहा है, हम खुली आँखों से देख रहे हैं और अपने को बेबस महसूस करते हैं। ईस्ट ईंडिया कम्पनी दूसरी तरह से आ रही है। आम आदमी को सच्चाईयों से दिन प्रतिदिन दूर किया जा रहा है। लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में मेरा जो अनुभव है वह यह कि वह पाखंड को बहुत समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता। यहाँ लोग शोर नहीं मचाते लेकिन जब फैसले का वक्त आता है तो सच्चे और अच्छे फैसले करते हैं। मेरा यह ईमान मुझे फ्यूचर से मायूस नहीं होने देता। मुझे यकीन है कि आने वाली जनरेशन को वह सब कुछ नहीं देखना पडेगा जो हम देख सह रहे हैं।


न जिसकी शक्ल है कोई, न जिसका नाम है 
कोई इक एसी शै का क्युँ हमेँ अज़ल से इंतज़ार है 

जहाँ तक देश के सूरत-ए-हाल का सवाल है, तो जैसे मुल्क का फ्यूचर तय हो रहा है, रिफॉर्म्स के नाम पर जैसे जो हो रहा है और आम आदमी को कुछ नहीं मिल रहा है, हम खुली आँखों से देख रहे हैं और अपने को बेबस महसूस करते हैं। ईस्ट ईंडिया कम्पनी दूसरी तरह से आ रही है। आम आदमी को सच्चाईयों से दिन प्रतिदिन दूर किया जा रहा है। लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में मेरा जो अनुभव है वह यह कि वह पाखंड को बहुत समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता। यहाँ लोग शोर नहीं मचाते लेकिन जब फैसले का वक्त आता है तो सच्चे और अच्छे फैसले करते हैं। मेरा यह ईमान मुझे फ्यूचर से मायूस नहीं होने देता। मुझे यकीन है कि आने वाली जनरेशन को वह सब कुछ नहीं देखना पडेगा जो हम देख सह रहे हैं:-
 
आज का दिन बहुत अच्छा नहीं तस्लीम है 
आने वाला दिन बहुत बहतर है, मेरी राय है। 

आपको उमरावजान के गीतों के कारण बेहद ख्याति मिली। फिल्म जगत के आपके अनुभव कैसे रहे हैं? फिल्मों के लिये गीत लिखते हुए स्वयं को कितना समर्थ और अनुकूल मानते हैं?

मुझे ज़िन्दगी में बहुत सी चीजें फिल्म के गानों की मकबूलियत से मिलीं। दूर दराज मुल्कों में जो मुशायरों में बुलाया जाता है तो उसमें यही इंट्रोडेक्शन काफी होता है कि ये उमरावजान के गीतों के लेखक हैं। मेरे बच्चों से अक्सर यह सवाल किया जाता है कि आप उन्ही शहरयार के बच्चे हैं, जिन्होने उमरावजान के गाने लिखे हैं? मैं आवाम की पसंद की अहमियत का हमेशा कायल रहा हूँ। अगर कोई किसी को पसंद करता है तो उसमें कुछ न कुछ अच्छा जरूर है। नासिर काज़मी का एक मिसरा है – “कुछ होता है जब पलके खुदा कुछ कहती है” मकबूलियत की अपनी जगह है। 

वहाँ निन्यानबे प्रतिशत गाने धुनों पर लिखे जाते हैं, फौरन वहीं पर। हम नहीं लिख सकते। बहुत दिनों से यह काम हो रहा है। साहिर वगैरह बहुत लोगों नें लिखे। लगता है जैसे कफन तैयार है अब मुर्दा तैयार कीजिये। जब तक हम कहानी कैरेक्टर का हिस्सा न बना लें गीत को कैसे लिखें? क्रियेटिव प्रोसेस इंटरकोर्स से मिलता जुलता है। उसको प्राईवेसी जरूरी है। हम दनादन धुन पर तुरंत नहीं लिख सकते। 

पिक्चर को मन इस लिये होता है कि उस मीडियम का इफैक्ट है। हमारी बहुत सी बातें जो वैसे नहीं पहुँच रहीं वहाँ से पहुँचें। हमने उस मीडिया को अपनी आईडियोलॉजी के लिये इस्तेमाल किया है। हमें खडे होने के लिये सही जगह मिलनी चाहिये, हम उसके सारे रिग्वायरमेंट पूरे कर सकते हैं। मेरे अनुभव बहुत अच्छे रहे हैं वहाँ के। हमें हमेशा यह अहसास रहा कि हम युनिवर्सिटी के नौकर हैं। हमने मुशायरों फिल्मों के लिये छुट्टियाँ जाया करना ज़रूरी नहीं समझा। बाहर के ऑफर्स उन दिनो एवायड करते रहे। अब रिटायरमेंट के बाद हम वक्त देना अफोर्ड कर सकते हैं। 
***** 



अंत में शहरयार साहब की लिखी एक बेहद खूबसूरत गज़ल! तलत अज़ीज साहब की गाई इस गज़ल को फिल्म ’गमन’ के लिये संगीतबद्ध किया था सुप्रसिद्ध संगीतकार जयदेव ने। तो आइये सुनते हैं ये गज़ल:

29 comments:

  1. बहुत अच्छा साक्षात्कार है, शहरयार साहब नें भी स्वयं को खुली किताब बना दिया है। डॉ. प्रेम कुमार बधाई।

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  2. पंकज सक्सेना13 जनवरी 2009 को 8:20 am

    उमराव जान उसके गीत/ग़ज़लों के लिये अमर फिल्म है। शहरयार साहब अध्भुत शायर है। उन्हे इस तरह प्रस्तुत करने के लिये धन्यवाद।

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  3. शहरयार साहब को जानने और समझने में यह साक्षात्कार अपने संपूर्ण रूप में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन सकता है. यद्यपि संक्षिप्त रूप में भी यह अपने आप में संग्रहणीय है परन्तु मेरी सभी से अपील है कि इसके संपूर्ण रूप को भी अवश्य पढ़ें.
    इस सुंदर प्रस्तुतिकरण के लिये साहित्य शिल्पी और प्रेमकुमार जी को आभार!

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  4. I liked the interview :) and just now also listning the songs of Umrao jaan.

    Alok Kataria

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  5. बहुत अच्छा साक्षात्कार है.शहरयार साहब ने बेबाक तरीके से जवाब दिया है. सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रेमकुमार जी ने बहुत अच्छे सवालात किये है उनहोंने साक्षात्कार को एक नई दिशा प्रदान की है,और उन्होंने बड़े बड़े साहित्कारों का साक्षात्कार लिया.साहित्य शिल्पी को बधाई इस प्रस्तुति के लिए.

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  6. शहरयार साहब को जानने और समझने में यह साक्षात्कार अपने संपूर्ण रूप में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है.उन्होंने स्वयं को खुली किताब बना दिया है। साहित्य शिल्पी को बधाई इस प्रस्तुति के लिए.

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  7. पूरा साक्षत्कार और उसके एक एक पहलू को बारीकी से पढा। शहरयार मेरे पसंदीदा शायरों में से एक हैं। साक्षात्कार यह बताता है कि एक शायर कैसे पनपता है कैसे अपनी जमीन तल्काशता है, कैसे उसके भीतर कविता उतरती है। शायरी के मौजूदा हालात पर उनकी चिंताओं से हमं सहमत हूँ।

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  8. शहरयार संजीदा शायर है। साफगोई से बात करते हैं। अपने मार्क्सवादी दृष्टिकोण को जस्टीफाई करते हैं तो ईश्वर की सत्ता को भी विनम्रता से स्वीकार करते हैं। कविता को फिक्शन के उपर रखते हैं और देश के मौजूदा हालात पर लिखने वालों को कुरेदते भी हैं। डॉ. प्रेम, बडा काम किया है आपने।

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  9. शहरयार से परिचित होना अच्छा लगा।

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  10. शहरयार जी का साक्षात्कार बेहद महत्वपूर्ण लगा। उनके जवाब बहुत साफगोई लिए हुए हैं। साहित्य शिल्पी में यह श्रृंखला जारी रहनी चाहिए,

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  11. शहरयार हिन्दुस्तान के उन शायरों में से हैं जिनकी वजह से उर्दू शायरी की रूह बरकरार है | उन के लिखे सारे शेर दिल से निकले हुए लगते हैं जिस में कोई लाग लपट नही है | कम्युनिस्ट और मार्क्सिस्ट विचारधारा के शायरों में एक अलग संजीदगी और आत्मविश्वास देखा गया है ...चाहे वो कैफी हों , शहरयार हों या रज़ा.
    जिस संजीदगी से वो लिखे हैं उसी सच्चाई से साक्षात्कार भी दिया.. डॉ. प्रेम कुमार को बधाई .. शहरयार की कुछ ग़ज़लों की एक लिंक यहाँ चस्पा कर रहा हूँ .. शायद काम आए.
    http://www.urdupoetry.com/shahryar.html

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  12. साफगोयी है यह जब इतना बडा शायर विनम्रता से कहता है कि यह बडी शायरी का दौर नहीं है। साहित्य शिल्पी को मेरी हार्दिक शुभकामनायें।

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  13. प्रेम जी ने जितने सलीके से सवाल किये हैं उतने ही शानदार तरीके से और पूरी जिम्‍मेवारी और बेबाकी के साथ शहरयार जी ने जवाब दिये हैं। और इस पूरे प्रकरण में फायदा हम पाठकों का हुआ है।
    शहरयार पढ़े लिखे पाठकों के शायर तो हैं हीृ आम आदमी के लिए भी उतने ही प्रिय हैं। एक और शानदार साक्षात्‍कार के लिए पूरी टीम को बधाई
    सूरज

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  14. डॉ. प्रेम का आभारी हूँ कि हर दिल अजीज शहरयार से रू-ब-रू कराया आपने। इस व्यक्ति में कितनी गहरायी है, पता चलता है।

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  15. बहुत अच्छा साक्षात्कार है। बधाई।

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  16. बहुत अच्छा साक्षातकार है.. खास कर शहरयार साहब के विचारों से अभिभूत हो गया... खासकर उनकी इस बात की सराहना करना चाहूंगा...
    क्रियेटिव प्रोसेस इंटरकोर्स से मिलता जुलता है। उसको प्राईवेसी जरूरी है। हम दनादन धुन पर तुरंत नहीं लिख सकते।

    डॉ. प्रेम कुमार को बहुत बधाई...

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  17. डॉ. प्रेमकुमार जी का प्रश्न चयन और खुल कर दिये गये शहरयार साहब के उत्तर न केवल पठनीय हैं अपितु कहीं गहरे उनके अनुभव रचनात्मकता को भी दिशा देने वाले हैं। कई बाते जिसने प्रभावित किया जैसे:-

    "इस पर खुश नहीं होना चाहिये कि यह फिक्शन का दौर है। इस पर अफसोस होना चाहिये है, यह अदब का दौर नहीं है।"

    "जो शख्स महसूस नहीं कर सकता, वह खासा खतरनाक होता है। वह न तो अच्छा शायर हो सकता है, न अच्छा बाप, न शौहर, न पड़ोसी। इसलिये वे आर्गनाइज्ड लोग, जो समाज मे उथल-पुथल करना चाहते हैं, वे इंसानो से उनके महसूस करने का हक छीन लेना चाहते हैं।"

    " मंच में और सीरियस लिटरेचर में जो फ़ासला पैदा हो गया है, उसकी थोडी बहुत जिम्मेदारी सीरियस राइटर्स पर भी है। वो उस इडियस में बात करने लगे है कि जो बहुत खास लोगों के लिए रह गया है।"

    " ये दौर बड़ी शायरी का दौर नहीं है। दूसरे दर्जे के शायर है और वे सब मिलकर बड़ी शायरी बनते है। फैज, मकदूम, मज़ाज़, जज़्बी, सरदार बगैरह मिलकर एक शक्ल बनाते है। अच्छे शायर है ये सब और अच्छी बात यह है अलग-अलग अच्छे शायर होना। हर शायर का जहाँ प्वांइट आफ व्यू होगा वह उससे देखेगा चीजों को। सिलेक्ट करने न करने का आला प्वाइंट आफ व्यू है। ऐसा मालूम होता है कि कुछ सिमलीज व मेहाफर्स बार बार आ रहे है। उससे लगता है कि रिपिट कर रहा है शायर अपने को। "

    "हिन्दुस्तानी वाला इलाका बैक्क बर्ड है। यहाँ अदब के बूते जिन्दा नहीं रहा जा सकता।"

    गज़ल और नज़म पर भी उनके विचार प्रभावित करने वाले हैं। बहुत अच्छा साक्षात्कार।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  18. shaharyaar ji se unki baaton ke madhyam se milna rochak laga aur yah sandarbh
    इंडिया मे मुशायरों और कवि सम्मेलनों मे सिर्फ चार बाते देखी जाती है- पहली, मुशायरा कंडक्ट कौन करेगा? दूसरी- उसमे गाकर पढ़्ने वाले कितने लोग होगे? तीसरी- हंसाने वाले शायर कितने होंगे और चौथी यह कि औरतें कितनी होगीं?
    kitni bebaki se kaha,achha laga.......is baatchit ko hum anubhawon ke dastawej kah sakte hain

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  19. शहरयार साहब को करीब से समझने का मौका दिया है इस साक्षात्कार ने. आभार.

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  20. SAKSHATKAR MAN MEIN UTAR GAYAA HAI.
    AESE MAHATVAPOORN SAKSHAATKAR KE
    LIYE DR.PREM KUMAR AUR SAHITYA
    SHILPI KO HAARDIK BADHAAEE.

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  21. शुक्रिया इस जहीन शायर से मुलाकात कराने के लिए.....उनका व्यक्तित्व भी वैसा ही है जैसा वे लिखते है.

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  22. शहरयार जी का यह शानदार साक्षात्कार बहुत ही महत्वपूर्ण है। डॉ. प्रेम के सवाल और शहरयार के माकूल और बेबाकी के तरीके से दिये हुए जवाब पढ़ कर बहुत कुछ
    बातें पता लगीं। साहित्य शिल्पी को इस साक्षात्कार के लिए बधाई।

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  23. हर दिल अज़ीज़ और एक बेहद उम्दा शायर से मुलाक़ात कर जी भीतर तक हरा हो गया।
    क्या कहने?


    प्रवीण पंडित

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  24. बहुत अच्छा साक्षात्कार ....


    इस सुंदर प्रस्तुति के लिये.... साहित्य शिल्पी और ......
    प्रेमकुमार जी को
    बधाई.....


    आभार!

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  25. BEHATRIN SAKKHYATKAR KE LIYE BAHUT BAHUT BADHAI.NAYE LEKAKHO KO ISASE NISCHIT HI NAYI URJA MILEGI.
    (RAHUL GUPTA LOHAVAN MATHUIRA UP)

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  26. gazal or najmo ke bare me sahryar sahab ki bate man or mastisk dono ko zakzor deti hai

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  27. हम भी शहरयार के मुरीद हैं पर उनके विषय में जानने का अवसर आज मिला । धन्यवाद ।

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  28. बहुत कुछ जानने को मिला शहरयार जी ने व्यक्तित्व को सहजता से साक्षात्कार में व्यक्त कर दिया ..उनकी बेबाक़ी को सलाम .....मुशायरों के बारे में आपकी राय एकदम दोटूक है .....वाचिक परम्परा से जुड़े होने के कारण अक्सर ऐसा ही एहसास होता है .....डॉ.प्रेमकुमार जी और साहित्य शिल्पी परिवार को धन्यवाद ..!!

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