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सोमवार, २८ दिसम्बर २००९

मोहे पागल कर दे!! [कविता] - विश्वदीपक तनहा

इश्क़ की बूटी
डाल के लूटी,
ओ री झूठी,
सच कह -
तूने पाई कहाँ से
प्यार-मोहब्बत की यह घुट्टी,
खुद तो हुई बावरी फिरती,
मेरी भी कर दी है छुट्टी।
अब जो तेरे जाल में हूँ तो
नैनन से हीं घायल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।

रचनाकार परिचय:-

विश्वदीपक ’तन्हा’ का जन्म बिहार के सोनपुर में २२ फरवरी १९८६ को हुआ था। आप कक्षा आठवीं से कविता लिख रहे हैं।

बारहवीं के बाद आपका नामांकन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर के संगणक विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग में हो गया। अंतरजाल पर कुछ सुधि पाठकगण और कुछ प्रेरणास्रोत मित्रों को पाकर आपकी लेखनी क्रियाशील है।
बोल रसीले,
छैल-छबीले,
थोड़े ढीले,
बह कर-
मेरी ओर जुबाँ से
बने बनाए बाँध को छीले,
खुद तो मुझमें प्यास जगाए,
फिर मेरी चुप्पी को पी ले।
अब जो तेरी झील में हूँ तो
सावन का हीं बादल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।

रूप की गठरी,
रंग की मिसरी,
लेके ठहरी,
मुझ तक-
तेरी आन पड़ी है
जान-जिया की माँग ये दुहरी,
खुद तो चाल चले है सारी,
फिर मुझसे पूछे क्या बहरी।
अब जो तेरे साथ में हूँ तो
जोबन का हीं कायल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।

12 comments:

अवनीश एस तिवारी २८ दिसम्बर २००९ १:१४ PM  

एक सुन्दर, मीठा गीत |
बधाई |

अवनीश तिवारी

अभिषेक सागर २८ दिसम्बर २००९ २:१२ PM  

मनमोहक कविता के लिये बधाई।

निधि अग्रवाल २८ दिसम्बर २००९ २:१९ PM  

जान-जिया की माँग ये दुहरी,
खुद तो चाल चले है सारी,
फिर मुझसे पूछे क्या बहरी।
अब जो तेरे साथ में हूँ तो
जोबन का हीं कायल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।

कमाल का प्रवाह

राजीव रंजन प्रसाद २८ दिसम्बर २००९ २:३६ PM  

सरोबार कर देने वाला नवगीत है।

खुद तो मुझमें प्यास जगाए,
फिर मेरी चुप्पी को पी ले।
अब जो तेरी झील में हूँ तो
सावन का हीं बादल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।

तनहा जी की बिम्ब निर्माण क्षमता का मैं हमेशा से कायल रहा हूँ।

बेनामी २८ दिसम्बर २००९ ३:१८ PM  

Nice Poem.

Alok Kataria

nitesh २८ दिसम्बर २००९ ३:२६ PM  

सुन री...मोहे पागल कर दे।

घायल हो गये हैं विश्वदीपक जी

अनन्या २८ दिसम्बर २००९ ४:४० PM  

बहुत लयभरी और बेहतरीन कविता।

विनोद कुमार पांडेय २८ दिसम्बर २००९ ५:३३ PM  

Prem me dube ek premi ki aawaj ..bahut sundar..laybaddh aur bhav se saji badhiya geet..badhai vishv deepak ji

रंजना [रंजू भाटिया] २८ दिसम्बर २००९ ७:५६ PM  

बहुत प्यारा मीठा गीत .मोहे पागल कर दे

sumita २८ दिसम्बर २००९ ११:३३ PM  

बोल रसीले,
छैल-छबीले,
थोड़े ढीले,
वाह! कवि का एक और रुप...बहुत ही सुंदर दीपक जी बधाई!

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २९ दिसम्बर २००९ ९:०७ AM  

सूफियाना रंग की सरस रचना. साधुवाद.

विश्व दीपक ३० दिसम्बर २००९ ३:१६ PM  

रचना पसंद करने के लिए सारे मित्रों का धन्यवाद!!

-विश्व दीपक

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