मोहे पागल कर दे!! [कविता] - विश्वदीपक तनहा
इश्क़ की बूटी
डाल के लूटी,
ओ री झूठी,
सच कह -
तूने पाई कहाँ से
प्यार-मोहब्बत की यह घुट्टी,
खुद तो हुई बावरी फिरती,
मेरी भी कर दी है छुट्टी।
अब जो तेरे जाल में हूँ तो
नैनन से हीं घायल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।
रचनाकार परिचय:-थोड़े ढीले,
बह कर-
मेरी ओर जुबाँ से
बने बनाए बाँध को छीले,
खुद तो मुझमें प्यास जगाए,
फिर मेरी चुप्पी को पी ले।
अब जो तेरी झील में हूँ तो
सावन का हीं बादल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।
रूप की गठरी,
रंग की मिसरी,
लेके ठहरी,
मुझ तक-
तेरी आन पड़ी है
जान-जिया की माँग ये दुहरी,
खुद तो चाल चले है सारी,
फिर मुझसे पूछे क्या बहरी।
अब जो तेरे साथ में हूँ तो
जोबन का हीं कायल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।






12 comments:
एक सुन्दर, मीठा गीत |
बधाई |
अवनीश तिवारी
मनमोहक कविता के लिये बधाई।
जान-जिया की माँग ये दुहरी,
खुद तो चाल चले है सारी,
फिर मुझसे पूछे क्या बहरी।
अब जो तेरे साथ में हूँ तो
जोबन का हीं कायल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।
कमाल का प्रवाह
सरोबार कर देने वाला नवगीत है।
खुद तो मुझमें प्यास जगाए,
फिर मेरी चुप्पी को पी ले।
अब जो तेरी झील में हूँ तो
सावन का हीं बादल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।
तनहा जी की बिम्ब निर्माण क्षमता का मैं हमेशा से कायल रहा हूँ।
Nice Poem.
Alok Kataria
सुन री...मोहे पागल कर दे।
घायल हो गये हैं विश्वदीपक जी
बहुत लयभरी और बेहतरीन कविता।
Prem me dube ek premi ki aawaj ..bahut sundar..laybaddh aur bhav se saji badhiya geet..badhai vishv deepak ji
बहुत प्यारा मीठा गीत .मोहे पागल कर दे
बोल रसीले,
छैल-छबीले,
थोड़े ढीले,
वाह! कवि का एक और रुप...बहुत ही सुंदर दीपक जी बधाई!
सूफियाना रंग की सरस रचना. साधुवाद.
रचना पसंद करने के लिए सारे मित्रों का धन्यवाद!!
-विश्व दीपक
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