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मंगलवार, ७ अक्तूबर २००८

अब अगले जन्म में लिखूंगा - नीरज [पद्मश्री गोपालदास नीरज का साक्षात्कार] – देवेश वशिष्ठ ‘खबरी’

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नीरज जी, कुछ लोगों ने आपको हिंदी का अश्वघोष कहा,दिनकर ने हिंदी की वीणा कहा। भाषाभाषियों ने संत कवि माना तो कुछ ने आपको मृत्युवादी-निराशावादी माना। स्वयं को कैसे परिभाषित करते हैं आप? 

देखिए, मैं तो शुद्ध कविता लिखता हूं। शुद्ध कविता में जीवन के बहुत से आयाम आते हैं। कहीं आशा है तो वहीं निराशा भी है, जीवन है तो मृत्यु भी है, कहीं जय है तो कहीं पराजय भी है, कहीं सुख है तो कहीं दुख भी है, संसार का रूप ही द्वंद्वात्मक है। अंधकार के बाद प्रकाश है और प्रकाश के बाद अंधकार।

क्या है- आध्यात्मिकता?  भौतिकता, समन्वय- असमन्वय कहीं! लेकिन मैंने जीवन के सभी पक्षों को उजागर किया है। इसमें निराशा भी आती है, आशा भी आती है, संलिप्तता भी आती है, भोगवाद भी आता है, योगवाद भी आता है। मैंने जीवन को उसकी संपूर्णता में जीया है, इसलिए बहुत सी मेरी कविता में आपको विरोध भी मिलेगा लेकिन साथ-साथ समन्वय है उनमें। 

शेक्सपियर से एक बार किसी ने पूछा कि आप ट्रेजडी के साथ कॉमेडी क्यों लिखते हैं? तो उन्होंने कहा- आई वांट टू होल्ड मिरर अप टू दी नेचर। मैं प्रकृति के सामने दर्पण लेकर खड़ा हूं, उसमें ट्रेजडी भी है और कॉमेडी भी.

नीरज में छिपे गीतकार को थोड़ी देर भुला दिया जाय तो नीरज क्या हैं?


मेरा तो अस्तित्व ही कवितामय है। बचपन से ही इसको मैंने अपनी साधना माना है, तप माना है, तपस्या माना है। इसी को मैंने अपना संपूर्ण जीवन दे दिया है, इसलिए कवि के अतिरिक्त मेरा और कोई स्वरूप याद नहीं किया जाएगा।
मेरा तो अस्तित्व ही कवितामय है। बचपन से ही इसको मैंने अपनी साधना माना है, तप माना है, तपस्या माना है। इसी को मैंने अपना संपूर्ण जीवन दे दिया है, इसलिए कवि के अतिरिक्त मेरा और कोई स्वरूप याद नहीं किया जाएगा। हालांकि मैंने ज्योतिष में भी बहुत अध्ययन किया है, लेकिन ज्योतिषी के रूप में मुझे याद नहीं किया जाएगा। मुझे सिर्फ और सिर्फ एक कवि के रूप में याद किया जाएगा।

युवा नीरज और अनुभवी नीरज में क्या फर्क महसूस करते हैं?

यौवन में जो ऊर्जा होती है, जो भावनाएं होती हैं वही सृजन में प्रयुक्त होती हैं। जैसे जैसे आदमी बूढ़ा होता है वैसे वैसे सृजन की शक्ति भी कम होती चली जाती है। कविताएं बहुत कम लिख पाता हूं अब, पहले एक महीने में 60-70 कविताएं लिखता था। 70 के दशक के बाद कविता लिखना कम हो गया, फिर दोहे लिखने लगा, मुक्तक लिखना शुरू कर दिये, हाईकू लिखना शुरू कर दिये, छोटी कविताएं लिखने लगा। जैसे जैसे वृद्धावस्था आती है ऊर्जा कम हो जाती है, और याद रखियेगा- ऊर्जा ही सृजन की शक्ति होती है। 

तब तो मैं था ही युवाओं के लिए लेकिन आज भी मेरे चाहने वाले लाखों करोड़ों में हैं। जितना मैं छपता हूं अपनी पीढ़ी में उतना कोई नहीं छपता। पांच-छ: प्रकाशक लगातार मेरी रचनाएं छाप रहे हैं, लोग कहते हैं कि कविताओं की पुस्तकें छपती नहीं हैं आजकल, लेकिन मेरी कविताओं के 25-25 संस्करण छप चुके हैं. हर साल एक नया संस्करण आ जाता है। मैं आज भी पढ़ा जा रहा हूं और सुना भी जा रहा हूं। 67 साल हो गये मंच पर, आज भी लोकप्रियता कायम है।

आपकी कौन सी पुस्तक सबसे ज्यादा अपील करती है?

हाल में ही मेरी सभी रचनाओं का तीन खंडो में संग्रह निकला है- नीरज रचनावली, लेकिन हृदय के सबसे करीब दो पुस्तकें हैं- प्राणगीत और दर्द दिया है। इसमें मेरे यौवनकाल की कविता हैं।

कोई दूसरा कवि जिसकी रचनाओं ने प्रभावित किया?

मुझे सबसे ज्यादा टैगोर पसंद हैं। टैगोर में उदात्तीकरण तत्व है जो बहुत कम कवियों में मिल पाता है। जीवन भर वो कवि बने रहे और इसलिए बने रहे कि वो विषय बदलते रहे। अगर आप एक ही बात को पकड़ कर बैठ जाएंगे तो उस बात के लिए निष्ठुर हो जाएंगे। टैगोर के अलावा खलील जिब्रान, जिन्होंने धार्मिक आडम्बर के खिलाफ बहुत कुछ लिखा और इसी वजह से उन्हें लेबनान से निकाला गया. हालांकि बाद में उन्हें पैगम्बर समझा गया। 

मुझे भी हमेशा विवादास्पद माना गया, कोई मुझे निराशावादी समझता है, कोई भोगवादी को कोई सुरावादी. मैंने लिखा-

हम तो इतने बदनाम हुए इस जमाने में
यारो सदियां लग जाएंगी हमें भुलाने में..

जो विवादास्पद होता है वही लोकप्रिय होता है.

कोई कवि या किताब जिसे आप नापसंद करेंगे, जो उतनी शोहरत के काबिल नहीं हैं जितनी उन्हें मिली? 


साहित्य के पतनशील युग में हम जी रहे हैं. आज हर आदमी अर्थ के पीछे भाग रहा है। पेट की भूख के बाद हृदय की भूख लगती है। जिसे घृणास्पद शब्द के तौर पर सैक्स कहा जाता है, हमारे यहां इसे काम कहा गया है। काम एक सृजन शक्ति है।...। ये कविताएं मेरा सृजन हैं- मेरे बच्चे हैं सब.
आजकल तो अधिकांश कवि ऐसे ही हैं। मंच पर बहुत से गीतकार ऐसे ही हैं. अध्ययन नहीं है इनके पास। जीवन के बारे में अध्ययन नहीं है, साहित्य का कोई गहन अध्ययन नहीं है इनके पास, न देशज साहित्य का और न ही विदेशी साहित्य का। न भारतीय मूल्यों का और न ही भारतीय संस्कृति का अध्ययन है। बस बाजार है जो चला जा रहा है। साहित्य के पतनशील युग में हम जी रहे हैं. आज हर आदमी अर्थ के पीछे भाग रहा है। पेट की भूख के बाद हृदय की भूख लगती है। जिसे घृणास्पद शब्द के तौर पर सैक्स कहा जाता है, हमारे यहां इसे काम कहा गया है। काम एक सृजन शक्ति है।...। ये कविताएं मेरा सृजन हैं- मेरे बच्चे हैं सब। (हंसते हुए) मैंने बच्चे इतने पैदा कर लिए हैं कि अब शक्ति नहीं बची पैदा करने की। 

आजकल के कवियों ने सृजन को धन से जोड़ लिया है. वो पैसे के पीछे भाग रहे हैं. सस्ती लोकप्रियता के पीछे भाग रहे हैं। 

गीतों की किस्मत में एक दिन ऐसा भी दिन आना था.
उतना ही वो महंगा था, जो जितना ज्यादा सस्ता था.

हिंदी कविता और गीतों के मंच पर कितना बदलाव आया है? हास्य व्यंग्य के बारे में क्या कहेंगे?

हास्य व्यंग्य बहुत बड़ी चीज है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता हास्य व्यंग्य है। जैसे-जैसे समाज में विद्रूपताएं आती हैं, भ्रष्टाचार आता है. खाईयां बड़ी-बड़ी होने लगती हैं, तब हास्य व्यंग्य लिखा जाता है। हास्य व्यंग्य का मतलब-हम कुरेद रहे हैं आपको, लेकिन आपको ठीक करने के लिए कुरेद रहे हैं, लेकिन आज हास्य व्यंग्य के नाम पर चुटकुले मिमिक्री या अभिनय ही देखने को मिलता है।

आप जिस हास्य व्यंग्य की बात कर रहे हैं, वो किस पीढ़ी के कवियों तक बचा हुआ था ?

हास्य व्यंग्य के बहुत से कवि हैं - सुरेन्द्र शर्मा हैं, माणिक वर्मा हैं, सुरेश उपाध्याय हैं। ये सब अच्छे हास्य कवि हैं। हास्य के साथ आध्यात्मिक हैं। होशंगाबाद के सुरेश उपाध्याय को अब लोग नहीं जानते, नगण्य से हो गये हैं लेकिन मंच से आरंभ उन्हीं ने किया था। ओम प्रकाश आदित्य और अशोक चक्रधर भी अच्छा हास्य लिखते हैं।

कोई किताब जिसे पढ़ने की ख्वाहिश हमेशा रही पर अभी तक नहीं पढ़ पाए? 

पढ़ा तो बहुत कुछ; जीजस को पढ़ा, कुरान पढ़ी, गीता पढ़ी...पर पूरी कोई नहीं पढ़ पाया. लेकिन अगर आपने गीता का दूसरा अध्याय पढ़ लिया, और समझ लिया तो समझो सब पढ़ लिया।

कोई लक्ष्य जो अभी बचा है? 

कविताई।...। इस जन्म में जो लिख सका लिख ली, अब अगले जन्म में लिखूंगा।

यानि अगले जन्म में भी कवि बनना चाहते हैं? 

बेशक! मैं तो चाहता हूं, मृत्यु अंत नहीं है जीवन का। इट इज अनअदर गेट ऑफ अनअदर लाइफ। इस दरवाजे में आप जो इच्छा लेकर जाओगे वैसा ही निकलोगे, ऐसा मेरा मानना है। लाओत्से था, दार्शनिक था- बूढ़ा ही पैदा हुआ वो। जुरथ्रुस्ट था ईरान का, हंसता हुआ पैदा हुआ वो। दिनकर जी की बड़ी सुंदर पंक्तियां हैं-

बड़ा वो आदमी जो जिंदगी भर काम करता है।
बड़ी वो रूह जो तन से बिना रोए निकलती है।

मैं यही चाहता हूं कि कविता करते करते इस तन से प्राण निकल जाएं।

आपने भावप्रधान प्रेमगीत लिखे. प्रेम को कैसे परिभाषित करेंगे?

प्रेम के कई पायदान हैं, पहले तो शारीरिक आकर्षण भाव पैदा करते हैं। शरीर से ऊपर उठकर जब वो मन तक पहुंचता है तो वो प्रेम बनता है। प्रेम से ऊपरी दशा भक्ति की होती है, लेकिन भक्ति में भी आदान-प्रदान रहता है. उसके ऊपर सिर्फ आनंद रह जाता है। काम ऊर्ध्वगामी होता है तो आनंद में परिवर्तित हो जाता है, और आखिरकार व्यक्ति प्रेम विश्वप्रेम में परिवर्तित हो जाता है। अपने बारे में कहूं तो-

किन्तु पूछा गया नाम जब प्रेम से
खोजता ही फिरा किन्तु 
मिल सका न तेरा ठिकाना कहीं.
ध्यान से बात की तो कहा बुद्धि ने
सत्य तो है मगर आजमाना नहीं.

आपकी सबसे पसंदीदा रचना-

एक दोहा मुझे बहुत पसंद है:

आत्मा के सौन्दर्य का शब्द रूप है काव्य।
मानव होना भाग्य है कवि होना सौभाग्य।


पिछले जन्म का कोई पुण्य था जिसने मुझे कवि बना दिया। इन द बिगनिंग वाज वर्ड एंड वर्ड वाज थॉट. सृष्टि विचारों से बनती है...और कवि विचार सृजन करता है। जब किसी विचार में स्वयं को डुबो दिया जाता है, खो जाया जाता है, तब कविता का जन्म होता है।
पिछले जन्म का कोई पुण्य था जिसने मुझे कवि बना दिया। इन द बिगनिंग वाज वर्ड एंड वर्ड वाज थॉट। सृष्टि विचारों से बनती है...और कवि विचार सृजन करता है। जब किसी विचार में स्वयं को डुबो दिया जाता है, खो जाया जाता है, तब कविता का जन्म होता है। जब मैं कविता लिखता हूं, तब न हिंदू होता हूं, न मुसलमान होता हूं. सिर्फ शुद्ध-बुद्ध चैतन्य होता हूं। कविता ऐसे ही लिखी जा सकती है।

आपने कई युग देखे हैं, साहित्य के भी और वक्त के भी, लेकिन अभी जो अलगाववाद फैल रहा है उसके बारे में क्या कहेंगे?

राजनीति देश पर शासन करती है, ढ़ांचा तैयार कर सकती है, वो शरीर बनाती है देश का।  लेकिन कोई भी शरीर बिना आत्मा के जड़ और निष्ठुर ही होता है। आत्मा का निर्माण तब होगा जब साहित्य का ज्ञान और राजनीति का समन्वय होगा। 

साहित्य शिल्पी के लिये दो शब्द? 

साहित्य शिल्पी का प्रयास सराहनीय है... मेरी शुभकामनाएं। 

36 comments:

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

आज शाम, नीरज जी को ही सुन रहा था, उन्हीं को पढ़ रहा था... कि तब ही राजीव जी ने इस साक्षातकार के बारे में अवगत कराया।

देवेश वशिश्ठ, ने अच्छे पश्न किए और फिर नीरज जी से तो ऐसे ही तो उत्तर की अपेक्षा की जा सकती है। पढ़ कर अच्छा लगा।

नीरज जी के बारे में काफ़ी कुछ पढ़ा है। सो शायद इस ही कारण, यह बात-चीत बहुत संक्षित लगी। यूं लगा कि बात तो जैसे शुरु हुई और खतम भी हो गई। मन नहीं भरा। आशा है, नीरज जी से फिर बात करने का आपको मौका मिलेगा।

आपका यह प्रयास सराहना योग्य अवश्य है।

मेरी मंगलकामना सदैव आपके साथ हैं।

~ रिपुदमन पचौरी

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज को इसी जन्म में अभी बहुत लिखना है और हमें उन्हें बहुत पढना है। नीरज जी के साक्षात्कार का आभार। साहित्य शिल्पी को बधाई।

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज का साक्षात्कार इंटर्नेट पर प्रस्तुक कर आपने इस माध्यम के प्रति यह विश्वास दिलाया है कि यहाँ भी गंभीर काम होते हैं। नीरज को बहुत करीब से जानने का आपने अवसर दिया। मैं रिपुदमन सी से सहमत हूँ कि बात तो जैसे शुरु ही हुई थी और खतम हो गयी। नीरज महासागर है।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज जी जनता मेँ अत्यँत लोकप्रिय रहे हैँ ..उनका यह साक्षात्कार उनके सँघर्षमय जीवन काल की एक झलक मात्र दीखला रहा है -
देवेश वशिश्ठ जी, अच्छा प्रयास रहा -
कविवर नीरज जी के व्यक्तिगत पहलू पर भी आगे अवश्य बातेँ होँ और युवा पीढी के लिये मार्गदर्शन भी ..और नीरज जी को सादर नमस्कार एवँ स्वस्थ व दीर्घ जीवन के लिये शुभकामनाएँ -
- लावण्या

Udan Tashtari २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज जी के साक्षात्कार का आभार - ऐतिहासिक पोस्ट हो गई. बहुत आनन्द आ गया.

गुरतुर गोठ २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

इस ऐतिहासिक साक्षातकार के लिए भाई 'खबरी' को बहुत बहुत धन्‍यवाद ।


संजीव तिवारी

डा. फीरोज़ अहमद २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

देवेश वशिष्ट जी ने अच्छे पश्न किए और फिर नीरज जी से तो ऐसे ही तो उत्तर की अपेक्षा की जा सकती है। पढ़ कर अच्छा लगा।
पिछले दिनों नीरज जी पर एक पुस्तक प्रकाशित हुई है - एक मस्त फकीर नीरज प्रेमकुमार काफी अच्छी पुस्तक है .

मीडिया मंत्र २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज जी को जानने के लिए
एक नहीं अनेक साक्षात्‍कार चाहिये
उनकी उम्‍दा रचनायें भी
लगाते रहियेगा।

नीरज को जानना
इंसानियत को पहचानना
मेरा ऐसा है मानना।

- अविनाश वाचस्‍पति

seema gupta २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

आत्मा के सौन्दर्य का शब्द रूप है काव्य।
मानव होना भाग्य है कवि होना सौभाग्य।

' thanks for this wonderful interview of neeraj jee, great efforts to make us know more about him'

regards

swati prakash garg २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत अच्छा लगा नीरज जी को पढ़कर और उनके विचार जानकर. साहित्य शिल्पी इस प्रयास के लिये बधाई की पात्र है.

एक सुझाव है कि जिस तरह साहित्यकारों के बारे में जानकारी का स्तंभ है उसी तरह उनकी पूरी रचनाओं को भी प्रकाशित करने का स्तंभ हो. बेहतरीन रचनाओं के पद पढ़ पढ़ कर पूरी रचनाएँ पढ़ने की प्यास और बढ़ जाती है.

स्वाति

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत ही सराहनीय प्रयास जिससे हम रचनाकारो के बारे मे जान सके... धन्यवाद देवेश जी...

कथाकार २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज जी मेरे प्रिय कवि हैं. वे कभी भी हल्‍केपन से पेश नहीं अाये और हमेशा मंच को गरिमा प्रदान की. इस साक्षात्‍कार की खासियत ये है कि सवाल बहुत सलीके से पूछे गये हैं और अच्‍छे सवाल हीइस तरह के खूबसूरत जवाब दिलवा सकते हैं. आपकी टीम को बधाई. और अच्‍छा लगता अगर इसके साथ नीरज जी की आवाज में गाये किसी गीत का लिंक दे दिया जाता. भविष्‍य में इस पर सोचा जा सकता है कि रचनाकार के साक्षात्‍कार के साथ रचनाकार साक्षात्त भी हमें मिले

सूरज प्रकाश

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

आदरणीय नीरज से कौन परिचित नहीं, देवेश नें बहुत जिम्मेदारी से यह साक्षात्कार लिया है। प्रश्नों का चयन बहुत अच्छा है तथा उन पहलुओ को सामने लाने की कोशिश की गयी है जो आम तौर पर प्रश्न नहीं बनते।

नीरज जी के विषय में जानने की जिज्ञासा कम नहीं हो सकती, उनकी रचनायें ही उनका परिचय हैं। आज तो कविताओं का परिचय नीरज से आरंभ और नीरज पर समाप्त होने लगा है..खास कर उनके अविस्मरणीय गीत....वे ज्योतिषी भी हैं जान कर सुखद आश्चर्य हुआ। हाँ यह सत्य है कि वे कवि जी जाने जायेंगे।

साहित्य शिल्पी को उनका आशीर्वाद इस अभियान की उर्जा होगा। नीरज को प्रणाम।


***राजीव रंजन प्रसाद

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज जी जैसी बहूआयामी हस्ती को जानने के लिए पूरी उमर भी कम है... देवेश जी ने बहुत ही करीने से नीरज जी के जीवन के महत्वपूर्ण पहलूओं पर प्रश्न किए हैं और नीरज जी ने भी उतनी ही खूबसूरती से सभी प्रश्नों के कवितामयी उत्तर दिए हैं .. सचमुच यह एक ऐतहासिक पोस्ट है .. आभार

Dr. Sujit Kumar Bajpayee २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत ही बढिया साक्षात्कार...

ऐसी महान हस्तियों के विचारों को जानने का कम ही मौका मिलता है।

साहित्य शिल्पी और खासकर देवेश जी को बहुत बहुत धन्यवाद।

आलोक शंकर २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बड़ा वो आदमी जो जिंदगी भर काम करता है।
बड़ी वो रूह जो तन से बिना रोए निकलती है।

bahut bahut aabhar is sakshatkar ke liye. is se hamara hausla do guna ho jaega.

विश्व दीपक ’तन्हा’ २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज जी के बारे में इतना कुछ जानने को मिला, इसके लिए खबरी जी का तहे-दिल से शुक्रिया।

बधाई स्वीकारें।

दिव्यांशु शर्मा २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बढिया साक्षात्कार रहा देवेश भाई | नीरज जी की कवितायेँ और उन का दर्शन स्तुत्य हैं | उन्हें कई बार मुशायरों में सुना | भीड़ में खड़े रह कर औटोग्राफ लिया | पर इस साक्षात्कार केसे उन से और करीब आने का मौका मिला | शुक्रिया |

Zakir Ali 'Rajneesh' २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

किसी व्यक्ति को जानने, समझने के लिए साक्षात्कार सबसे उम्दा माध्यम है। नीरज एक महान रचनाकार हैं, उनको पढना, उनको सुनना, उनको जानना गर्व का विषय है। साक्षात्कार को उपलबध कराने का शुक्रिया।

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत ही अच्छा लगा कुछ छुए कुछ अनछुए पहलुओं
जानकर... मेरे हिसाब से यह साक्षात्कार मात्र अंजलिभर ही होगा क्यूकि आदरणीय नीरज जी के तटबन्ध शायद ही हों...


काव्य सरोवर कांतिमान
खिला आज 'नीरज' जो
मैं पुष्पित हो जाउंगा
पा ली पग की रज जो

इसी अभिलाषा में ..
-राघव

prakash chandalia २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

Neeraj ko sunna Ek Sadi (Century) ko sunne jaisa hai. Hindi Kavya jagat ki is Labdhpratristhit Shakhsiyat ka interview kabhi pura ho hi nahi sakta. Neeraj ji ke baare me jitna jaan pate hain, utna aur janne ki pyas bhi badh jaati hai. Sahityashilpi ne Hindi jagat me dhamakedaar shuruwat ki hai. Neeraj jaise murdhanya vidwanon ka interview iski shaan badhayega. Neeraj ji ko hamne Kolkata me Kai baar bulakar kavi sammelan kiye hain. November me ve phir aa rahe hain, unke swagat mke liye vyakul hain hum sabhi
prakash chandalia
mahanagarindia.blogspot.com

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज जी का यह साक्षात्कार इंटरनेट पर साहित्य को गंभीरता से प्रस्तुत किये जाने का आरंभ कहा जा सकता है। बहुत अच्छा साक्षात्कार। नीरज जी की महानता को प्रणाम।

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज तो बस नाम ही बहुत है। आज की कविता नीरज से आरंभ और नी
रज पर खतम।

pran sharma २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

Kavivar Gopal das Neeraj aur Devesh
Vashishth ke beech baatcheet bahut
hee achchhee lagee.Kavivar Neeraj
kavita agle janam mein hee nahin,
janm-janmaantar tak likhenge.kavita
un mein rachee-basee hai

yogesh samdarshi २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज जी का यह साक्षातकार भी नीरज जी की अनेक रचनओ जैसा अनुपम ही है. एक एक प्रशन का बहुत सुंदर और आत्मग्राहय उत्तार ... सच मु्च मजा आ गया... बधाई

शोभा २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

नीरज जी के विचार जान कर बहुत प्रेरणा मिली. इतने बड़े साहित्यकार से साक्षात्कार साहित्य शिल्पी की बड़ी उपलब्धि है. देवेश जी को साधुवाद.

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

VERY NICE AND HISTORIC POST

ALOK KATARIA

Atulya २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

Niraj ji se mulaqaat bahut achchhi lagi. unko padhate toh bahut samay se rahe hain par unke baare mein unke hi shabdon mein jaankar maza aa gaya.
Sahityashilpi kaa bahut bahut aabhar iss mulaqaat ke liye!

Tarun २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

Neeraj ji ke sakshatkar ke liye shukriya, inki kavitayen hi nahi balki geet bhi bahut sunder likhen hain.

श्रद्धा जैन २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

aaj neeraj ji ka satkshtaakar sahityashilpi manch ki bhaut badi uplabdhi hai
un jaise badhe kavi se milna unhe jaanna koun nahi chahta

aapke zariye ye sambhav ho sakta iske liye aapki bhaut aabhari hoon

ye silsila zari rakhe ki abhi sagar mein moti bhaut hai

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

श्रीयुत गोपालदास 'नीरज'

हिन्दी साहित्य का एक युग .... एक अनूठा इतिहास ...

युगकवि 'नीरज' जी को बचपन से ही पढ़ता, सुनता और देखता आया. आज बन्धु देवेश जी के माध्यम से इस कालजयी रचनाकार का साक्षात्कार के रूप में साहित्यशिल्पी के पृष्ठ पर पदार्पण .... निसंदेह हमारे लिए एक गौरवशाली क्षण है. अभिभूत हूँ अपने आदरणीय कवि के कई अनछुए पहलुओं को जानकर. आने वाले समय में हमसब रचनाकारों को उनका आशीर्वाद समय समय पर इसी तरह मिलता रहे ऐसी सदैव कामना है. आनंद के इस पल को प्रस्तुत कराने के लिए देवेश जी और साहित्यशिल्पी का विशेष आभार

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

unhe sun kar aacha laga.karib se jaane ka aacha mauka hai sahitya Shilpi ke shrotaaon ke liye..

Neeraj ji aur sahitya Shilpi ko dhanyawaad

--------- Anupama

OMVEER CHAUHAN २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

niraj ji ke baare me jankar kafi acha laga.aise prayas sarahniy hai.
mujhe niraj ji ki kavitao ka sngrah ka pata batane ki krapa kare.
main unki kavitaye parna chahta hu
niraj ji ka satchatkar kafi acha laga
dhanyavad sahitya shilpi

Harash Mahajan २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

Neeraj ji ko padne ka bahoot baar soubhagya mila ..aaj hamara soubhagya hi samjheiN k shayarfamily ke madhyam se Neeraj ji ke mukh se nikle shabd phir se padne ko mile...Prashn bhi ati sunder our Neeraj ji ke uttar bhi. PaRh ker bahoot achha laga

Harash Mahajan

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:३८ PM  

डूबा हुआ हूं मैं ।साक्षात्कार संपन्न हो गया ।क्या वाक़ई?किस का मन करता है ऐसी श्रवण -सुधा से बाहर आने के लिये?
कौन नहीं जानता इस नाम को , किंतु चर्चा ने जानने की चाह द्विगुणित कर दी --शारीरिक आकर्षण -प्रेम -भक्ति --आनंद, क्या कहिये.
इस सत्संग -सुख को पुनः दिलाइए देवेश जी!

प्रवीण पंडित

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

नीरज जी के साक्षात्कार का आभार।

साहित्य शिल्पी !
बधाई।

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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