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शनिवार, ११ अक्तूबर २००८

गिटलीघुम [बाल गीत] - उपासना अरोरा



गिटलीघुम गिटलीघुम गिटलीघुम
आओ सारे साथ मिलके बादलों पे चलते हैं
वो बड़ा सा छेद मिलके फूलों से ही भरते हैं
प्यारा सा मौसम रहेगा हर दम
चिलचिलाती गर्मी में क्यूँ मरें हम तुम
गिटलीघुम गिटलीघुम गिटलीघुम

आओ चलें हम वो वाले किले में
काला से धुंए में पानी भरेंगे
चलके बुझाते हैं आग जो लगी है
खांसता खांसते क्यूँ निकले दम
गिटलीघुम गिटलीघुम गिटलीघुम

आओ चलो हम बाँटें खुशी
सबके चेहरों पे नाचे हँसी
अच्छे बच्चे बनके रहे हम
क्यूँ रहे यहाँ कोई गुम सुम
गिटलीघुम गिटलीघुम गिटलीघुम

13 comments:

बगीची २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

गिटलीघुम की उपासना
एक नये शब्‍द की प्रस्‍तावना
बच्‍चों के लिए अच्‍छी रहती है
सदा ऐसी मनभावना।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

आओ चलो हम बाँटें खुशी
सबके चेहरों पे नाचे हँसी
अच्छे बच्चे बनके रहे हम
क्यूँ रहे यहाँ कोई गुम सुम
गिटलीघुम गिटलीघुम गिटलीघुम

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

वाह वाह!!! बहुत सुन्दर। बहुत अच्छी बाल रचना।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत अच्छी बाल कविता। बधाई।

अनुज २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

अच्छी कविता।

शोभा २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

सुंदर लिखा है.

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

उपासना जी आप में अपार रचनात्मक क्षमता है। बाल साहित्य लिखना असाधारण कार्य है। यह एसा ही है जैसे नयी पौध को खाद पानी से सींचना। अगर बच्चों में एसे संदेश जग गये तो समझिये क्रांति हो गयी। बधाई स्वीकारें।

***राजीव रंजन प्रसाद

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत सुन्दर बाल रचना। निश्चित ही बच्चे इसे गुनगुनाना और याद रखना पसंद करेंगे। गिटलीगुम सुन्दर बन पडा है।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

गिटलीघुम गिटलीघुम गिटलीघुम
आओ सारे साथ मिलके बादलों पे चलते हैं
वो बड़ा सा छेद मिलके फूलों से ही भरते हैं

सुन्दर कल्पनाओं से सजी बहुत अच्छी कविता है।

लोकेश २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

बहुत अच्छी कविता है।

विपुल २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

सुंदर कल्पना , सरल शब्द और बेहतर शैली.. अच्छी रचना के लिए बधाई उपासना जी..

Zakir Ali 'Rajneesh' २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

रोचक और लयबद्ध गीत है। पढकर अच्छा लगा। सम्पादक मण्डल को एक सुझाव देना चाहूंगा कि रचना के साथ यदि चित्र हो, तो उसका इम्पैक्ट ज्यादा प्रभावी होता है। और मेरी समझ से बाल रचना के साथ वह जरूरी भी है।

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:३८ PM  

गिटलीघुम गुनगुनाकर बच्चे बन जाने का सुख मिला।
अच्छी बाल कविता।

प्रवीण पंडित

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