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गुरुवार, १३ नवम्बर २००८

राम जी का खेत [गुरु नानक जयंति पर विशेष] - शोभा महेन्द्रू


गुरू पर्व की आप सभी को बहुत-बहुत बधाई।

गुरू नानक देव जी का अवतरण तलवंडी नामक स्थान में, कल्यानचंद नाम के एक किसान के घर 15 अप्रैल, 1469 को हुआ था। ऐसी पवित्र आत्माएँ जब भी अवतरित होती हैं, सारे संसार को अपने प्रकाश से आलोकित कर देती हैं। यही कारण है कि 1539 में इनके ब्रह्म लीन हो जाने के बाद भी लोग उनको श्रद्धा से स्मरण करते हैं। उनके आदर्श, मानव मात्र की प्रेरणा हैं और सर्वदा रहेंगे। इस महान आत्मा को संसार में नानक,गुरु नानक, बाबा नानक और नानकशाह नाम से जाना गया। नानक वह जिन्होने संसार की पीड़ा को समझा और उससे मुक्ति का उपाय खोजा।

एक साधारण से परिवार में जन्म लेकर एक असाधारण व्यक्तित्व जगत में आलोकित हुआ। पूत के पाँव पालने में ही पहचाने जाने लगे। करूणा, त्याग और प्रेम की मूर्ति रूप बालक को देख माता-पिता हैरान थे। कभी खुश, कभी उदास हो गए। पता नहीं भविष्य में क्या बनेगा- यह प्रश्न अक्सर पिता को सालता था। विद्यालय में बालक का मन नहीं लगता था। अध्यापक से कहता- ऐसा ग्यान दीजिए जिससेअपने को जान सकूँ, ईश्वर को जान सकूँ। ऐसे प्रश्नों से सब लोग हैरान हो जाते। पिता ने सोचा -बालक पढ़ता नहीं है तो काम में लगा दो। खेतों में अनाज की रक्षा का काम सौंपा गया। वे पक्षियों को दाना खाता देख प्रसन्न होते। उन्हें उड़ाने के बदले वे गाया करते-

राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत।
खा ले चिड़िया भर-भर पेट।।

पिता की नाराज़गी और डाँट का उनपर कोई असर ना पड़ा। फिर किसी और दुकान पर काम सिखने को बैठाया गया। वहाँ भी उनका वही हाल था। ग्राहक को समान अधिक ही तोलते। किसी गरीब को देखते तो मुफ्त में भी दे देते। अत: वहाँ भी अधिक दिन ना टिक सके। पिता ने सोचा विवाह कर दो शायद संसार में रम जाए। विवाह हुआ। दो पुत्र भी हुए किन्तु उनका मन संसार में ना रमा। और एक दिन घर छोड़ निकल पड़े।

नानक जी के दो शिष्य सदा उनके साथ रहा करते थे। उनमें मरदाना अच्छा गायक था। नानक भक्ति में डूब कर लिखा करते थे और मरदाना उसी तरह भक्ति में डूबकर गाया करता था। तीनों जगह-जगह गीत गाते और उपदेश करते चलते थे। अपने भ्रमण के दौरान एक बार उन्होने एक संभ्रांत व्यक्ति के हाथ से भोजन लेने से इंकार कर दिया। कारण पूछने पर बोले- हथेली में मेहनत के निशान नहीं हैं। वे परिश्रम बिना खाने को पाप मानते थे।

नानक जी एक उच्च कोटि के संत थे । एक गाँव में उनका बहुत स्वागत हुआ । उन्होने गाँव के लोगों को आशीर्वाद दिया- तुम सारे संसार में फैल जाओ। कुछ दूर जाने पर उनको बहुत बेरूखे लोग मिले। एकदम असभ्य और जंगली। नानक जी ने उनको आशीर्वाद देते हुए कहा- जहाँ हो, वहीं रहो। यह बात मरदाना को नागवार गुजरी। उसने पूछा- गुरूदेव जिसने आपकी इतनी सेवा की उसे आप दूर तक बिखर जाने का आशीर्वाद देते हैं और इन गँवारों को चैन से एक स्थान पर रहने का ? समझ नहीं आया। नानक जी ने समझाया- मैं चाहता हूँ कि नेक दिल इन्सान सारी दुनिया में फैले और सबको सुखी बनाए। किन्तु बुराई को एक ही स्थान पर रहना चाहिए। वरना सब लोग दुःखी ही होंगें। ऐसे होते हैं संत। जो मानव मात्र के हित की बात करते और सोचते हैं। ऐसे युग पुरूष किसी एक धर्म या जाति के नहीं होते। वे मानव मात्र के होते हैं। इसी लिए युगों-युगों तक मानव मात्र की श्रद्धा के पात्र रहते हैं।

आज धर्म के नाम पर विष बीज बोया जा रहा है, मानव-मानव का शत्रु बन गया है। ऐसे में इन महापुरूषों को याद करना ही पर्याप्त नहीं है। इनके प्रति यदि मन में श्रद्धा है तो इनके बताए मार्ग पर चलना आवश्यक है। प्रेम का प्रसार किया जाना चाहिये। यदि ऐसा कर पाए तभी हमारी श्रद्धा स्वीकारी जाएगी । आइए आज नानक जयंति के दिन हम सब यही संकल्प दोहरायें और इनके सच्चे अनुयायी बनें।

नानक जी के संदेश और रचनाओं की बात किये बिना उनकी चर्चा अधूरी रह जारी है। मानवता का गुरु नानक रचित यह संदेश देखें:

जो नर दुख में दुख नहिं मानै।
सुख सनेह अरु भय नहिं जाके, कंचन माटी जानै।।
नहिं निंदा नहिं अस्तुति जाके, लोभ-मोह अभिमाना।
हरष शोक तें रहै नियारो, नाहिं मान-अपमाना।।
आसा मनसा सकल त्यागि के, जग तें रहै निरासा।
काम, क्रोध जेहि परसे नाहीं, तेहि घट ब्रह्म निवासा।।
गुरु किरपा जेहि नर पै कीन्हीं, तिन्ह यह जुगुति पिछानी।
नानक लीन भयो गोबिंद सों, ज्यों पानी सों पानी।।

*****

17 comments:

Udan Tashtari २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

बहुत बढि़या ..आन्नद आया!!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

बेहद अलौकिक प्रतिभा थे सँत नान्नक उनपर लिखा आपका ये आलेख बहोत अच्छा लगा -

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

Nive article on guruparb. Thanks.

Alok Kataria

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

नानक जी के संदेश और रचना को प्रस्तुत करता आपका आलेख बहुत प्रशंसनीय है। बहुत बहुत बधाई व शुभकामनायें गुरुपर्व की।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

शोभा जी आपका आलेख आज के पावन दिवस के अनुरूप है। बहुत अच्चे व प्रेरक प्रसंग आपने प्रस्तुत किये हैं।

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

गुरू पर्व की आप को बधाई। नानक पर लिखना कठिन है उनका जीवन व कथन गहरा है, अनंत है। आपका सारांश प्रशंसनीय है।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

बहुत अच्छा आलेख। बधाई। गुरुपर्व की शुभकामनायें।

अजय यादव २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

गुरु नानक की अभ्यर्थना करता आपका आलेख बहुत अच्छा लगा.
गुरुपर्व की हार्दिक शुभकामनायें!

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

गुरु नानक देव जी पर सामायिक लेख के लिए आभार

अनुज २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

बहुत अच्छा लेख। काव्य-उद्धरण बहुत अच्छा लिया है आपने।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

गुरुनानक जयंति की शुभकामनायें। लेख बहुत अच्छा बन पडा है। बधाई।

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

बहुत अच्छा आलेख।

गुरुनानक जयंति की शुभकामनायें।

बधाई।

Pran Sharma २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

Prernaon se bharaa ek uttam lekh.

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

शोभा जी,

आज के दिवस पर इससे बेहतर प्रस्तुति नहीं हो सकती थी। गुरुनानक की के जीवन पर चुनिन्दा बातों के उद्धरण से लेख को आपने प्रेरक भी बना दिया है।

***राजीव रंजन प्रसाद

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

बहुत अच्छा आलेख।

गुरुनानक जयंति की शुभकामनायें।

बधाई।

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

बहुत अच्छा आलेख।

गुरुनानक जयंति की शुभकामनायें।

बधाई।

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:४२ PM  

गुर-परब की लाखों बधाइयां ।
आपके आलेख के माध्यम से ही परम गुरु , अलौकिक संत के दीदार हो गये।
रब राख्खा।

प्रवीण पंडित

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