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गुरुवार, ६ नवम्बर २००८

कश्मीरियत की राह में राही को ज्ञानपीठ [विशेष आलेख] - कृष्ण कुमार यादव



कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। पर वक्त ने कश्मीर के साथ ऐसा खेल खेला कि आतंकवाद की आग में मासूम कश्मीरियत जलने लगी। खैर वक्त ने फिर से करवट बदली और एक बार पुन: कश्मीरियत अपने उसी अन्दाज में जी उठी। कश्मीर सदैव से विद्वानों और कवियों की भूमि रही है। इनमें अभिनव गुप्त, कल्हण, लल्लेश्वरी, शेख नुरूद्दीन, गणी कश्मीरी, ललितादित्य, मुंशी भवानीदास काचरू, ब्रजनारायण ‘चकबस्त’, रतननाथ दर ‘सरशार’, डा0 इकबाल, चन्द्रकान्ता, गुलाब अहमद महजूर, मास्टर जी, आजाद, दीनानाथ नादिम इत्यादि का नाम लिया जा सकता है। ऐसे में यदि कश्मीरी धरा के किसी पुत्र को भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार न मिला हो तो आश्चर्य भी होता है और क्षोभ भी। पर हाल ही में भारतीय भाषा में महत्वपूर्ण योगदान के लिये कश्मीरी कवि अब्दुल रहमान राही को वर्ष 2004-05 के लिये 40वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा करके सचमुच एक सराहनीय कार्य किया गया है, जिसके कि समृद्ध साहित्य के नजरिये से दूरगामी परिणाम होंगे। स्वयं राही इसे भारतीय संस्कृति में कश्मीरी भाषा व साहित्य के बढ़ते महत्व के रूप में देखते हैं। उनके मत में सदियों की गुलामी के कारण कश्मीरी भाषा को अपनी पूरी क्षमता सामने लाने का मौका नहीं मिला, फिर भी एक लम्बे ऐतिहासिक दबाव के बावजूद इसने अपने आप को जिस तरह बचाये रखा वह प्रशंसनीय है। ज्ञानपीठ पुरस्कार द्वारा कश्मीरी भाषा की सृजनात्मक शक्ति और भाषा वैज्ञानिक गरिमा को सराहा गया और इसके सांस्कृतिक महत्व को भी पहचाना गया है।

आधुनिक कश्मीर के सबसे चर्चित व प्रतिष्ठित कवि, पत्रकार और आलोचक अब्दुल रहमान राही राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार तब चर्चा में आए जब 1961 में उन्हें ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके बाद राही को 1980 में जम्मू कश्मीर सांस्कृतिक अकादमी अवार्ड, 1989 में भारत सरकार की फेलोशिप और फिर 2000 में पद्मश्री से नवाजा गया। इसके अलावा राही को ‘राष्ट्रीय कबीर सम्मान‘ भी प्राप्त हुआ। 6 मई 1925 को कश्मीर के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे राही को माता-पिता का सान्निध्य लम्बे समय तक प्राप्त नहीं हुआ, सो बचपन ननिहाल में गुजरा। राही ने जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय से फारसी और अंग्रेजी साहित्य में एम0ए0 की उपाधि प्राप्त की। उम्र के एक मुकाम पर पहुँचकर आजीविका हेतु राही ने लोक निर्माण विभाग में सरकारी मुलाजिम की नौकरी ज्वाइन कर ली पर इसी बीच जनवादी धारणा भी उन पर हावी होती गयी। यह वह दौर था जब कश्मीर ने जंग के बीच आजादी की सुबह देखी थी और सोवियत संघ के कम्युनिज्म की लहर विश्व के कई देशों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। कश्मीर भी इस धारा से विमुख नहीं रह पाया और इसी के साथ साहित्य में प्रगतिशील लेखन का दौर भी आरम्भ हो गया। कश्मीर के चर्चित कवि गुलाम अहमद महजूर और दीनानाथ नादिम ने इस दौर में कश्मीरी काव्य-धारा को प्रभावित करना आरम्भ कर दिया था। चूंकि साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब होता है और उस दौर में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में कश्मीर में राजशाही के खिलाफ आँधी जोरों पर थी और एक नए कश्मीर का निर्माण हो रहा था सो दीनानाथ नादिम के नेतृत्व में इस दौर में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में जनांदोलन के लिए सांस्कृतिक फ्रंट की स्थापना हुयी जिसे राही ने कालान्तर में तीव्रता दी। अपने जुदा अंदाज के चलते शीघ्र ही राही ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के महामंत्री बन गए और प्रगतिशील धारा को एक नई ऊँचाई प्रदान की। राही पर शेख नुरूद्दीन और लल्लेश्वरी का भी प्रभाव पड़ा। कश्मीर में लल्ला दादी के नाम से मशहूर लल्लेश्वरी अपने विद्रोह को अध्यात्म और दर्शन के मुहावरे में लपेटकर पेश करने वाली क्रांतिकारी महिला के रूप में जानी जाती हैं। लल्लेश्वरी ने प्रचलित परम्पराओं व अंधविश्वास एवं कुरीतियों पर जमकर चोट की एवं समाज के बीच रहकर अपनी मान्यताओं को स्थापित किया। राही ने इस दौरान लिखा- अपने भाग्य पर सवाल न करो, न अमृत की आस. जितने भी लम्हे मिले हैं, खुशी से जियो। इस बीच सरकारी नौकरी त्यागकर राही पूर्णतया साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधयों की ओर प्रवृत्त हुए एवं नेशनल कांफ्रेंस के उर्दू दैनिक पत्र ‘खिदमत’ के सम्पादकीय विभाग से जुड़ गए। कालान्तर में राही ने प्रगतिशील लेखक संघ की साहित्यिक पत्रिका ‘क्वांगपोश’ का भी सम्पादन किया और कुछ समय तक दिल्ली से प्रकाशित उर्दू पत्र ‘आजकल’ के सम्पादक मण्डल में भी रहे। राही ने एक पत्रकार व अध्यापक के रूप में भी काम किया एवं कालान्तर में कश्मीर विश्वविद्यालय में कश्मीरी भाषा व साहित्य विभाग के संस्थापक अध्यक्ष बने। जब राज्य के स्कूलों में कश्मीरी की पढ़ाई बंद करा दी गयी तो राही ने कश्मीरी को पुन: पाठ्यक्रम में शामिल कराने को अपना ध्येय बना लिया और कामयाबी भी हासिल की। बहुत कम लोगों को पता होगा कि कश्मीरी की प्रमाणिक लिपि नहीं थी और राही ने पहली बार कश्मीरी स्क्रिप्ट को कम्पोज किया जो कि आज भी सबसे प्रमाणिक रूप में प्रचलित है। पर तूफां को कौन बांध पाया है, सो राही अंतत: पूर्णतया कविताओं की ओर मुड़ गए ... आखिर कश्मीर की फिजा है ही ऐसी।

राही कश्मीर की सूफी परम्परा से काफी प्रभावित हैं। उनकी दिली इच्छा है कि इस परम्परा को आगामी पीढ़ियों में भी जिन्दा रखा जाय। वह कहते हैं अब भी जब कश्मीर में नमाज पढ़ी जाती है, तब वे पूरे आलम के लिए दुआयें माँगते हैं। तमाम झंझावतों के बावजूद कश्मीरी संस्कृति पर नाज करने वाले राही कश्मीरी विस्थापितों को लेकर चिन्तित हैं। इस दौर में वे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को याद करना नहीं भूलते, "आज यदि गाँधी जी होते, तो कश्मीर में जो हो रहा है, उन्हें बताते। कश्मीरी बोली के बेटे बिछुड़ गये हैं। लौट आइये! मेरे भाइयों, कश्मीर तुम्हारे बिना अधूरा है।" कवि के पास शब्दों की बहुत बड़ी सम्पदा होती है। कहते हैं व्यवस्था बदलने के लिए किसी नारे की जरूरत नहीं बल्कि सोच बदलने की जरूरत है और साहित्य के पास इसकी काबिलियत है। तभी तो रहमान राही कहते हैं कि "यदि मैं साहित्यकार न होता तो कोई साज बजाकर अपनी रूह को शान्त करता, सियासत के क्षेत्र में तो नहीं जाता।"

मार्क्स से प्रेरित प्रगतिवादी विचारधारा की कविताएं राही ने खूब रची। पूरी कायनात के साथ मनुष्य के संवाद के कवि राही की कविताओं में नाइंसाफी और असमानता के बीच पल रही निरीह जनता के लिए सन्देश हैं। आखिर एक व्यक्ति जिसका बचपन ब्रिटिश साम्राज्य की क्रूरता देखते हुये बीता था और जब युवावस्था में कदम रखा तो आजादी तो मिली पर बेगानों की तरह। एक तरफ कश्मीर पर कबाइली हमला और दूसरी तरफ विवादों के बीच हिन्दू-मुस्लिम दंगे। देर से ही सही लोकतंत्र का उदय तो कश्मीर में हुआ पर राजनीति के बदलते तेवरों के बीच आतंकवाद और अस्थिरता का साया सदैव कश्मीरी मासूमियत को कचोटता रहा। निश्चितत: इन सबका असर राही की रचनावृत्ति पर भी पड़ा। एक दौर वो भी आया, जब उनकी लेखनी से स्वत: फूट पड़ा-
नगर का वह राजपथ
जिस पर हजारों लोग चलते हैं
मेरे जंगल के अंदर तक चला आया है
जैसे मेरी आस्थाओं के परिधान में
चुपचाप कीड़े रेंगने लगते हों।

राही पहले उर्दू में लिखते थे पर 1953 के बाद कश्मीरियत का नजदीक से अहसास होने पर मातृभाषा कश्मीरी में लिखना आरम्भ कर दिया। चूंकि वह फारसी के भी अच्छे विद्वान हैं, इसलिए फारसी की तमाम अच्छी प्रवृत्तियों को भी कश्मीरी में साथ लाए। फारसी, उर्दू और कश्मीरी भाषाओं एवं परम्पराओं के बेजोड़ विद्वान राही ने करीब 22 कृतियाँ रचीं। उनकी प्रारम्भिक कविताओं का संग्रह ‘सनुवैन्य साज’ नाम से आया। इस बीच राही ने अपनी कविता को प्रगतिशील आन्दोलन के दायरे से बाहर निकाल आधुनिक काव्य-धारा की ओर उन्मुख किया। नतीजन, जिन्दगी को नए रंगों में देखने की चाहत एवं यथार्थ व कल्पना के द्वंद को कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करती उनकी 32 प्रतिनिधि कविताओं का संकलन ‘नौवरोज-ए-सबा’ नाम से आया। इस संग्रह ने राही को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्रदान की। राही का निबंध संग्रह ‘कहवात’ साहित्यिक आलोचना की प्रमुख कृति मानी जाती है। राही की अन्य प्रमुख रचनाएं हैं- सुभुक सोदा, स्याह रूदा जरेमंज, कलमी राही, कहवट, शारिशनासी, फैसला। राही की कविताओं पर अल्लामा इकबाल, फैज अहमद फैज और अली सरदार जाफरी का असर भी देखा जा सकता है।

अब्दुल रहमान राही ने जीवन के 82 वर्षों में बहुत कुछ देखा और महसूस किया है। वे वातावरण में सिर्फ़ एक मूकदर्शक की भांति नहीं खड़े रहे वरन् उसकी क्रिया-प्रतिक्रियाओं में भी शामिल हुए। उन्होंने अंग्रेजों के दौर का कश्मीर देखा तो आजादी के बाद खून-खराबे का मंजर भी। धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर को दिल की गहराइयों से महसूस किया तो आतंकवाद का साया भी मँडराते देखा। तभी तो उनके अंदर से हूक सी निकली-
सब विश्वास उजड़े
चरागाहों की झुलसी घास है
सारी चेतना फुफकारती क्रुद्ध सांप जैसी
सब देव मेरे ही मन की परछाइयाँ हैं
सब दैत्य मेरा ही कोई विकृत रूप।

उम्र के एक दौर में वे अविश्वास और कटुता से भरे कश्मीर के बीच खोखले नारों और वायदों से आजिज भी आ गए और लिखा-
कभी मैं भी तारों को जन्म देना चाहता था
अब तो सोचने पर अपना नाम भी याद नहीं आता।

वक्त के साथ कश्मीर पर मंडराती धुंध छँटती गयी और बर्फ में कैद रिश्तों की परतें शीतल धाराओं के साथ फिर से कश्मीरियत का सुहाना गीत गुनगुनाने लगीं। फिजां में एक बार फिर से वही रूमानियत आने लगी और इसी के साथ राही के शब्दों की गूंज भी दूर तलक जाने लगी। साम्प्रदायिकता और इंसानियत के वजूद को नेस्तनाबूद करती हुई संकीर्ण बदहवास कट्टरता के खिलाफ राही की कविताओं में पुरानी परम्परायें एवं कश्मीर की साहित्यिक व रूहानी वसीयत प्रतिबिम्बित होने लगी। ऐसे में देर से ही सही पर पहली बार किसी कश्मीरी कवि को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने की घोषणा न केवल कश्मीर व कश्मीरी भाषा के लिए वरन समूचे राष्ट्र के लिए गौरव का विषय है। आशा की जानी चाहिए कि कश्मीर की धरती एक बार फिर से साहित्य और संस्कृति की सर्वोच्चता को प्राप्त करेगी, तभी राही के ये शब्द भी सार्थक होंगे-
मेरे शब्दों का कल कोई अर्थ हो न हो
कल ही तय करेगा
तुम्हारे जलते घावों को ठंडक पहुँचाए
वे शीतल जलधाराएं मैं लाता ही रहूँगा।

10 comments:

rsmyadav २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

अद्भुत और बेहतरीन प्रस्तुति. राही जी के साथ-साथ कृष्ण कुमार जी ने पूरे कश्मीर के साहित्यिक परिवेश का जीवंत खाका खींच दिया है. ढेरों बधाई.

hindi.literature २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

....राही जी के जीवन और उनकी उपलब्धियों की समीक्षात्मक पड़ताल करता यह आलेख समकालीन साहित्य को नई दिशा देता है. आपकी ये पंक्तियां सकारात्मक सोच और आपके प्रभावी चिंतन की परिचायक हैं- साम्प्रदायिकता और इंसानियत के वजूद को नेस्तनाबूद करती हुई संकीर्ण बदहवास कट्टरता के खिलाफ राही की कविताओं में पुरानी परम्परायें एवं कश्मीर की साहित्यिक व रूहानी वसीयत प्रतिबिम्बित होने लगी। ऐसे में देर से ही सही पर पहली बार किसी कश्मीरी कवि को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने की घोषणा न केवल कश्मीर व कश्मीरी भाषा के लिए वरन समूचे राष्ट्र के लिए गौरव का विषय है। आशा की जानी चाहिए कि कश्मीर की धरती एक बार फिर से साहित्य और संस्कृति की सर्वोच्चता को प्राप्त करेगी........तथास्तु !!

dr.wzx2928 २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

Really very inspiring Article on Rahi ji. Congts Krishna ji.

युग-विमर्श २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

अब्दुल-रहमान राही की कुछ छुट-पुट रचनाएँ पढ़ी अवश्य थीं किंतु श्री यादव के आलेख से कवि के समूचे व्यक्तित्व को समझने का अवसर प्राप्त हुआ. लेख अच्छा ही नहीं उच्च-स्तरीय भी है और यादव जी की सीधी-सादी विवेचनात्मक शैली से भी परिचित करता है.

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

नगर का वह राजपथ
जिस पर हजारों लोग चलते हैं
मेरे जंगल के अंदर तक चला आया है
जैसे मेरी आस्थाओं के परिधान में
चुपचाप कीड़े रेंगने लगते हों।

राही को जानना बहुत अच्छा लगा, उन्हे ज्ञानपीठ की हार्दिक बधाई। साहित्य शिल्पी को इस लेख के प्रस्तुतिकरण का धन्यवाद

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

कवि अब्दुल रहमान राही को बधाई के साथ साथ कृष्ण कुमार यादव जी को इस उत्कृष्ट आलेख की बधाई।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

प्रभावी व्यक्तित्व पर प्रभावी लेख... समाचार तो टीवी पर भी देखा परन्तु विस्तार से पढने का मजा ही कुछ अलग है... आभार

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

राही जी को ज्ञानपीठ की ....

हार्दिक ..



उत्कृष्ट प्रस्तुति....


यादव जी,

बधाई।.......

mauryark २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

Rahi ji par itne sundar aur gyanvardhak alekh ke liye KK Yadav ji ko badhai.

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

राही जी को ग्यानपीठ पुरस्कार आह्लाद और गौरव का विषय है। यादव जी द्वारा दी गयी जानकारी अमूल्य एवं रोचक है ।
राही जी का काश्मीरी साहित्य पढ़ने की इच्छा बलवती हुई है।

प्रवीण पंडित

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