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गुरुवार, २५ दिसम्बर २००८

ईंटों का जंगल [कहानी-पाठ] - तेजेन्द्र शर्मा


कहानियाँ किसे पसंद नहीं! हम में से अधिकांश अपने बचपन में दादी-नानी से कहानियाँ सुनकर ही इस रंग-बिरंगी दुनिया से परिचित हुये हैं। यद्यपि बाल-कहानियों की यह दुनिया सच से प्राय: बहुत दूर होती है पर हम शायद बचपन के संस्कार के कारण ही जीवनपर्यंत कहानियों का मोह नहीं छोड़ पाते। यह एक अलग बात है कि अब इन कहानियों में कल्पना के साथ-साथ वास्तविक जीवन की कटु सच्चाइयाँ भी शामिल होने लगतीं हैं।

कड़वी सच्चाई पर आधारित ऐसी ही एक कहानी हम साहित्यशिल्पी पर आज आपको सुनाने जा रहे हैं। सुप्रसिद्ध कथाकार तेजेन्द्र शर्मा की इस कहानी का नाम है - "ईंटों का जंगल"। महानगरों में एक अदद मकान की तलाश अपने आप में किसी ज़ंग से कम नहीं है। "दो दीवाने शहर में, रात में य़ा दोपहर में; आबदाना ढूँढते हैं, इक आशियाना ढूँढते हैं" गाने की सफलता के पीछे शायद आम-जन से जुड़ी इस पीड़ा का भी बहुत अड़ा हाथ है। तो आइये सुनते हैं, इसी पर आधारित ये कहानी:





कहानी को पढ़ने के लिये यहाँ चटका लगायें: ईंटों का जंगल

14 comments:

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

कहानी की रिकॉर्डिंग बहुत अच्छी हुई है, स्वर स्पष्ट हैं। नेट पर इस तरह से कहानी कम ही सुनने को मिलती हैं। कहानी का शिल्प व भाव सौष्ठव प्रशंसनीय है। तेजिन्दर शर्मा जी बहुत बधाई।

अतुल्य २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

बहुत अच्छी कहानी है. तेजेन्द्र शर्मा जी को साहित्यशिल्पी पर देखकर अच्छा लगा.
कहानी के लिये आभार!

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

घर के सपने और उस सपने के साथ की हकीकते और दर्द को बहुत अच्छी तरह बयाँ करती है आपकी कहानी। कहानी सुनना एक अलग ही अनुभव है।

दृष्टिकोण २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

आप आदमी और उसके संघर्ष की कहानी है। काणे जैसे लोग आम संवेदनाओं का किस तरह व्यापार करते हैं आपकी कहानी बताती है। मन भारी हो गया सुन कर।

gita pandit २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

तेजेन्द्र शर्मा जी !

आपको साहित्य-शिल्पी पर
देखकर अच्छा लगा....


कहानी बहुत अच्छी है....

संवेदन-शील मन की ....
संवेदन-शील रचना...


बहुत-बहुत बधाई....

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

घर हर आम आदमी का मँहगा सपना है। आपकी कहानी इस सत्य को उजागर करती है कि यह सपना आखित मँहगा क्यों है।

ANJANI २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

har aam admi ki ek hi chah ek mahal ho sapno ka kaie ek aam aadmi ek aam aadmi ke sapno par kutharaghat kar deta hai aur ek sundar sapna toot jata hai isi kodarsati hai yah kahani.

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

बहुत अच्छी कहानी है। बधाई।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

Nice story, Thanks

Alok Kataria

अजय यादव २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

कहानी सुनना अपने आप में एक सुखद अनुभूति है बनिस्बत उसे पढ़ने के. पर आपकी कहानी सुनते-सुनते मन उदास हो गया और शायद यही किसी भी रचना की सफलता है कि वह पाठक को खुद से जोड़ सके.
एक अच्छी कहानी के साथ साहित्य शिल्पी पर आने के लिये तेजेन्द्र जी को बहुत बहुत धन्यवाद! आशा है कि आगे भी आपकी ऐसी ही सुंदर कहानियाँ इस मंच से पढ़ने को मिलेंगी!

महावीर २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

भाई तेजेन्द्र जी
आपका कहानी 'कहने' का मनोरंजक एवं विशिष्ट ढंग है जो इस गहन विषय को समझने में बहुत उपयुक्त है। कथा-वस्तु, चरित्र-चित्रण, वातावरण, उद्देश्य और शैली के सभी अंगों की दृष्टि से एक प्रभावशाली कहानी है।
साहित्य-शिल्पी की टीम को तेजेन्द्र जी की कहानी पढ़वाने और उनकी आवाज़ में सुनवाने के लिए धन्यवाद।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

जो रचना किसी के दिल को छु ले वही एक सार्थक रकाना है और आपकी कहानी ने सुचमुच दिल को छु लिया

madhu २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

tejendra sharma ki etoN ka jungle kahani meri manpasand kahani hai. isko kai baar padha hai aur jitnee baar padha hai ek naya aayam khulta hai. mumbai mayaaviaur sapnoN ka shahar hai. jab sapne tootate hain aur woh bhee ghar ke tow dil per kya guajartee hai, ye kahani bakhoobee bayaan kartee hai. tejendraji ko badhai.

Vijay Kumar Sappatti २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

aapki kahani padhi , maine wahan par bhi comments diye hai , yaha bhi doonga , aapki ye katha , ghar ke sapne dekhate hue insaan ki takleefe bayan karti hai , aur aap ne itni acchi tarah se ise likha , iske liye aap badhai ke paatr hai .

bahut bahut badhai ..

vijay

http://poemsofvijay.blogspot.com/

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