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सोमवार, २३ मार्च २००९

काफ़िया पर विमर्श-2 [ग़ज़ल : शिल्प और संरचना] - सतपाल 'ख्याल',

काफ़िया पर ही अपनी आगे बढ़ाते हैं. इता दोष से तो मै ये कहता हूँ कि इस नियम का पालन सख्ती से नही होता लेकिन ये नियम है. अब हर नियम बनाने के पीछे कुछ लाज़िक तो होता है और वो सुधार के लिए ही होता है लेकिन बज़ुर्गों ने फिर उनमें छूट भी दी ताकि शायर को आसानी हो.

चलिए इस शे’र से समझते हैं

मैने चाहा जो तुम्हें उसका गुनहगार हूँ मैं
मगर इतना भी समझ लो कि वफ़ादार हूँ मैं.

(गुनह+गा़र और वफ़ा+दार) यहाँ बढ़ा हुआ अंश एक जैसा नहीं है. अगर गुनहगार के साथ यादगार आ जाता तो ग़ल्त हो जाता. बाकी ये तो दा़ग हैं जिन्होंने इकबाल जैसे शायर पैदा किए. इता तब होगा अगर बढ़ा हुआ अंश एक जैसा होता और उस मे भी अगर बढ़ा हुआ अंश निकाल देने से दोनो शब्दों मे अगर व्याकरण भेद है तो वो सही माना जायेगा. एक योजित है एक शुद्ध तो भी सही है और अगर बढ़ा हुआ अंश निकाल देने से दोनो शब्दों मे एक निर्रथक हो तो भी सही है.

भूल शायद हमने बड़ी कर ली
दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली
(बशीर बद्र)

यहाँ बड़+ई और दोस्त +ई तो ई निकाल देने से बड़ और दोस्त हमकाफ़िया नही हैं लेकिन बड़ एक निर्रथक शब्द है इसलिए ये ईता से मुक्त है.

एक और शे’र देखें:

लाई हयात आये कज़ा ले चली चले
अपनी खुशी से आये न अपनी खुशी चले.

यहाँ चल और खुश "ई" निकाल देने से हमकाफ़िया नही है लेकिन चल और खुश मे व्याकरण भेद है .

तंग आ चुके हैं कशमकशे-ज़िंदगी से हम
ठुकरा न दे जहाँ को कहीं बेदिली से हम
(साहिर)

यहाँ "ई" निकालने से ज़िंदग और बेदिल बचता है और क्योंकि ज़िंदग निर्रथक इसलिए सही है.

अलम मे कोई दिल का तलबगार न पाया
इस जिंस का जहाँ मे खरीददार न पाया.
(मीर)

अब यहाँ एक सवाल खड़ा होता है कि है तो दोनो योजित लेकिन सही कैसे "तलब" और "खरीद" मे कुछ भी तुकाँत नही पर यहाँ जो काफ़िया है वो गार और दार है जो सही है अगर तलबगार और यादगार होता तो हम आगे बढ़ते ये देखने के लिये के बढ्चे हुए अंश निकालने से क्या दोनो मे व्याकरण भेद है, क्या दोनो हमकाफ़िया हैं, क्या दोनो मे कोई निर्रथक शब्द है. फिर हम फ़ैसला करते.

जैसे चलता-फिरता दोसती-दुशमनी गिरता-चलता.

चलता-फिरता मे "ता" दोनो मे है तो आगे बढ़कर देखते हैं कि चल और फिर क्या भेद है. ये दोनों क्रियाएँ हैं तो ग़ल्त हैं इसलिए इता दोष पैदा हो गया.

ऐसे ही दोस्ती और दुशमनी मे हुआ दोनो भाववाचक हैं तो इता हो गया.

अगर "चलता" के साथ "सबका" आ जाता तो सही होता

दोसती के साथ पालकी आ जाता तो सही होता. थोड़ा पेचीदा तो है लेकिन धीरे-धीरे समझ मे आ जायेगा. अरूज़िओं के भी दो खेमे हैं, एक इता मानता है एक नहीं. आप अब कहेंगे कि भ्रम मे डाल रहा हूँ लेकिन ये वास्तविकता है. एक खास बात ये कि ये सारे नियम मतले पर लागू होते हैं, सिर्फ़ मतले पर बाकी अशआर पर नहीं.

इसके बाद बात करते हैं इस शे’र की :

बदन मे आग सी चेहरा गुलाब जैसा है
कि ज़हरे-ग़म का नशा भी शराब जैसा है.

ये सब श्री आर.पी शर्मा जी ने बताया है जिसे मै विस्तार दे रहा हूँ.

१. इता के आगे दो भाग हैं एक है ख़फ़ी और दूसरा ज़ली

तो खफ़ी माअने जो छुपा हो जैसे उपर फ़राज़ साहब के शे’र मे ख़फ़ी इता है गुलाब जिसमे गुल और आब समाये हुए हैं ऐसे योजित शब्द ख़फ़ी होंगे.

बाकी जिनका ऊपर ज़िक्र किया वो ज़ली यानि जो ज़ाहिर हों वो है.

---------------------

अब आपके लिये अलग-अलग शायरों के मतले बतौर उदाहरण. आप इन्हें पढ़ें और विचार-विमर्श करें.

बशीर बद्र

आस होगी न आसरा होगा
आने वाले दिनों में क्या होगा

किस ने मुझको सदा दी बता कौन है
ऐ हवा तेरे घर में छुपा कौन है

मोम की ज़िन्दगी घुला करना
कुछ किसी से न तज़करा करना

दूसरों को हमारी सज़ायें न दे
चांदनी रात को बद-दुआयें न दे

**
मुनव्वर राना

रचनाकार परिचय:-

सतपाल ख्याल ग़ज़ल विधा को समर्पित हैं। आप निरंतर पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होते रहते हैं। आप सहित्य शिल्पी पर ग़ज़ल शिल्प और संरचना स्तंभ से भी जुडे हुए हैं तथा ग़ज़ल पर केन्द्रित एक ब्लाग आज की गज़ल का संचालन भी कर रहे हैं। आपका एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन है। अंतर्जाल पर भी आप सक्रिय हैं।

सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है
मगर जब गुफ्तगू करता है चिंगारी निकलती है

इश्क़ में राय बुज़ुर्गों से नहीं ली जाती
आग बुझते हुए चूल्हों से नहीं ली जाती

जो उसने लिक्खे थे ख़त कापियों में छोड़ आए
हम आज उसको बड़ी उलझनों में छोड़ आए

ख़ुदा-न-ख़्वास्ता दोज़ख मकानी हो गये होते
ज़रा-सा चूकते तो क़ादियनी हो गये होते
**

साहिर

तंग आ गये हैं कशमकशे-ज़िंदगी से हम
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बेदिली से हम

**
द्विज

अश्क बन कर जो छलकती रही मिट्टी मेरी
शोले कुछ यूँ भी उगलती रही मिट्टी मेरी

**
एक और शे’र

हमें कोई ग़म नही था ग़मे आशिकी से पहले
न थी दुशमनी किसी से तेरी दोसती से पहले

**
प्राण शर्मा

जीता हूँ, मेरे दोस्त! अब किस बेदिली से मैं।
करता हूँ इसका ज़िक्र नहीं हर किसी से मैं।

प्राण शर्मा

ज़रा ये सोच मेरे दोस्त दुश्मनी क्या है
दिलों में फूट जो डाले वो दोस्ती क्या है

*****
मै भी अपना एक मतला रख रहा हूँ हालांकि मै शागिर्द हूँ कोई उस्ताद नहीं.

हुक्म चलता है तेरा तेरी ही सरदारी है
तू है पैसा तू खुदा तेरी वफ़ादारी है.

मै फिर अपनी बात दुहराता हूँ कि कोशिश करो कि आप की ग़ज़ल का मतला दोषपूर्ण न हो, लेकिन अगर कहीं कथ्य मर जाये तो आप छूट ले सकते हैं. वही छूट जो दी गई हो, ये नहीं कि बे-वज़्न ही चल पड़ो. ये सब नियम मतले पर लागू होते हैं पूरी ग़ज़ल पर नहीं. मै फिर दुहराता हूँ कि मै नियम तोड़ने की बात नही कर रहा. इन सब नियमों से ही ग़ज़ल के हुस्न मे चार चाँद लग जाते हैं. पहले पहल ये सब उबाऊ लगता है लेकिन अभ्यास से सध जाता है और मश्क ग़ज़ल के लिये लाज़िमी है. जब नासिख की ग़ज़लों को सुधारने के लिए मीर ने मना कर दिया तो नासिख ने एक तरीका अपनाया वो ग़ज़ल लिख लेता फिर कुछ दिनों बाद फिर उसमे सुधार कर लेता और फिर कुछ दिन बाद इसे दोहराता ऐसा करने से खुद-ब-खुद निखार आने लगता है लेकिन सब्र बहुत ज़रूरी है.

इस खूबसूरत मतले के साथ खत्म करता हूँ

मौसम है निकले शाख से पत्ते हरे-हरे
पौधे चमन मे फूलों से देखे भरे-भरे

18 comments:

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

सतपाल जी आपने अच्छे उदाहरण लिये हैं। आपका लेख बहस के लिये खुला है। मैं विद्वानों के विचार पढने के लिये उत्सुक हूँ और उनकी टिप्पणियों की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

अनिल कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

सतपाल जी पहली बात यह कि पिछले आलेख के क्रम में यह अच्छा आलेख है। दूसरा मैं साहित्य शिल्पी के संचालकों से कहूंगा कि वे अनोनिमस टिप्पणी बंद करवायें साथ ही मनु से व्यक्तिगत रूप से बात करें।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

पहले तो 'आयी हयात' नहीं बल्कि 'लायी हयात' है, आपका व्याकरण ज्ञान महज़ 'आवरद' तक सीमित है, जो 'आमद' की नहीं सोचता! अगर आप सही विवेचना पर विश्वास रखते हैं तो इस टिप्पणी को हटाये नहीं, यह आपकी बुराई नहीं आपकी शिक्षा है!

-- अदना

नंदन २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

विशेष परिस्थितियों की बात अलग है अन्यथा नीयम काव्य को सुन्दरता देते हैं। हिन्दी कविता को ही देखिये छंद मुक्त हो कर बहुत सी धार्क़ाओं में बही लेकिन कथ्य अच्छाहोने के बावजूद जनप्रियता के पैमाने पर खरी नहीं उतरी। ग़ज़ल अभी पटरी पर है इसे बचाना भी चाहिये।

"अर्श" २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

youpogi rachna... bahot badhiya.. ham navsikhiye shayaro ko bahot kuchh sikhne ko milta hai...


arsh

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

सतपाल जी आपका यह संक्षिप्त आलेख अच्छा है और उदाहरण सटीक हैं। आपका काम अपनी बात रखना है और आपको आलोचना से घबराना नहीं चाहिये। आलोचना सीखने के नये रास्ते बना देती है। आपके आलेख में जो बाते चूट जाती हैं उस पर वरिष्ठ शायरों के विचार टिप्पणी के रूप में आ ही जाते हैं जिससे कमी भी समाप्त हो जाती है। जहाँ तक अनोनिमस टिप्पणी का प्रश्न है मुझे भी लगता है कि साहित्य शिल्पी में खुल कर वाद-विवाद हो ही जाता है तो नाम छिपाना ठीक नहीं लगता। व्यक्तिगत टिप्पणी को मिटाया ही जाना चाहिये जिससे साहित्य शिल्पी के भीतर के सौहार्द्य के माहौल को नुकसान न हो।

mehek २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

bahut achhe sher lekar nayi baat batayi,shukran,hum jaise to kuch na kuch sikh hi lete hai.hame gazal ka koi jyada gyan nahi.aapke lekh bahut chhe lage hai padhna gyanvardhak.

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

@ अनिल तुमको 'निंदक नियरे राखिए' शायद याद नहीं!

-- अदना

अतुल्य २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

अच्छा आलेख है। कुछ नई बातें भी पता चलीं इसे पढ़कर।
बाकी ये जो मित्र अनोनिमस रूप से टिप्पणी कर रहे हैं और जिस पर एक साथी ने अनोनिमस टिप्पणी ही बंद कर देने का सुझाव संचालकों को दिया है, उनसे एक अनुरोध है कि वे अपने नाम से टिप्पणी करें और बिना किसी पर व्यंग्य किये अपनी बात रखें तो हम जैसे लोगों को कुछ और भी सीखने को मिलेगा। और रही बात टिप्पणी हटाने की तो मैं नहीं समझता कि यदि आपकी बात गज़ल और अरूज़ से संबंधित होगी तो उसे संचालक हटायेंगे।

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

pehli tippni hatayen nahi ranjan ji , inhone sahi kaha hai pahle to
she'r kaa misra sudhar len aap..layI kar leN.
doosra 'आवरद'yani mihnat se kaha gya she'r ya ghazal paR ke kaha gya, zabardastee kaha gya, likhne ke liye kaha gya jisme aatma naam ki koii cheez na ho aur yahi baat to mai yahan convey karna chahta hoon, ki shyiree sirf mathematic nahi hai. lekin ye us ka roop sanvaar dete hai.

aur 'आमद' jo apne aap dil ke bheetar se nikle jise ooper se utree huee ghazal kahte hain vahi to shayiree hai.vahi jo dil se nikle dil tak pahunche. is Anonymous ka thanks yahi baat mai kahna chahta hoon lekin ek baat aur hai ki..
ek shyar 100 me se 15 ghazalen hii ooper se utree ya AAMAD hotee hain baaki vo apne mashak se likhta hai aur ye 15 % hi har shayar ka dil tak pahunchta hai.
ek apna she'r jo tippni parke ooper se utra hai
ताअने देकर जो थक गये हो तो
कोई पत्थर उछाल कर मारो.

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

आलेख के लिये बधाई स्वीकारें। गुरुजनों व बडे शायरों के उदाहरणों का आपने अच्छा प्रयोग किया है।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

अनोनिमस जी,

आपको पूरे आलेख में सिर्फ़ आयी और्र लायी ही नजर आया जो कि एक टाईपोग्रफ़ीकल मिस्टेक हो सकती है..
आलोचना से किसी को भी इन्कार नहीं है मगर वो सार्थक होनी चाहिये न कि ह्तोसाहित करने वाली...
आप पहले भी ऐसी टिप्पणिया कर चुके हैं और यह आपकी मानसिक कुंठता का ही प्रतीक हैं.

सतपाल जी निश्चय ही आपके लेखों से सीखने वालों को बहुत कुछ मिला है. आप निरर्थक टिप्पणियों को अनदेखा कर लिखते रहिये.. हमें यह मान कर चलना चाहिये कि सभी.. इंजन या ड्व्वे नहीं होते जो लोगों को गन्त्वय यक पहुंचाते हैं.. कुछ लोग सिर्फ़ ब्रेक का काम जानते हैं
राजीव जी से अनुरोध है कि वह मेल से टिप्प्णी के नोटिफ़िकेशन को ओन करें ताकि अनोनिमस टिप्पणी करने वालों तक पहूंचा जा सके.

दृष्टिकोण २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

सतपाल जी क़ाफिया पर हिन्दी और उर्दू की दिक्कतों पर पिछले लेख में कुछ सवाल थे। आपसे इस लेख में उनके उत्तर की उम्मीद थी। रंजन जी द्विज जी से भी अगर आप बात करें कि वे इस संबंध में एक लेख द्वारा शंका समाधान करें।

अवनीश एस तिवारी २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

सतपाल जी,
अनेक धन्यवाद लेख के लिए | बहुत सही तरीके से आगे बढ़ रहें है | ऐसा ही जरी रखिये |
आप ने जिन गुरुओं का सहयोग लिया है, उन्हें भी शुक्रिया |

कुछ सुझाव -
१. जो भी नियम हो, उसे मोटे अक्षरों में रख दीजिये | इससे लेख को दोहराने में आसानी होती है |

२. प्रश्नोत्तर का हिस्सा भी जोड़ दीजिये | बहुत सारे मसलें उसी में सुलझ जाते है |

अवनीश तिवारी

dhirendra chandel २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

ग़ज़ल के विषयों में कही गयी आपकी हर बात सही है यह भी सही है की हर रचनाकार को अपनी-अपनी भाषा की विधाओं का ज्ञान होना चाहिए ,किन्तु नियमों की वजह से ग़ज़ल का वज़्न संभल पाना बहुत ही मिस्किल काम है ,कहीं शेरीयत गडबडा जाती है तो कहीं कहीं कहने की बात ही अधूरी रह जाती है ,बड़े बड़े रचनाकारों ने भी पूरी तरह से हर नियम का पालन नहीं किया है आप का मार्गदर्शन उचित है सभी को सतत ऐसे ही प्रयास करना चाहिए पर अगर बे-बहरा होकर या चाँद कमियों के होते अच्छी बात जो सीधे रूह तक जाए ,कहती है तो यह उचित है |

गौतम राजरिशी २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

सतपाल जी की सशक्त लेखनी से उपजा एक और ग्यानवर्धक आलेख....कहीं-कहीं उलझनें शेष हैं अभी भी, शायद नया हूँ इसलिये।

शुक्रिया सतपाल जी। प्राण साब और महावीर जी की टिप्पणियों की प्रतिक्षा कर रहा हूँ।

गौतम राजरिशी २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

हाँ....एक बात जो अखरती है पूरे आलेख में वो शिर्षक के ठीक नीचे बने पोस्टर पे इतने अच्छे शेर के नीचे भगत सिंह लिखा होना मेरे ख्याल से शेर के बेमिसाल शायर के साथ नाइंसाफी होगी...
संयोजक साब से आग्रह है कि कृपया इसे सुधार दें

manu २३ नवम्बर २००९ ७:०२ PM  

फिर आना पडा,
,,,फोन आया के किसी अनाम टिपण्णी को आपकी समझा जा रहा है,, क्या वाकई आपने की है,,,??,सुना तो यकीन ही नहीं हुआ,,,,,जो जगह हम कब के छोड़ चुके हैं,,,,वहा पर यदि कोई अनाम कमेंट करे तो हमारे ही खाते में क्यों,,,,??
फिर याद आया के लिखा तो हमीने था के यदि कोई बात नागवार लगी तो फिर टिप्पणी करूंगा,,,
पहले भी अनाम टिप्पणी की वजह बता चुका हूँ,,,और हटाई गई टिपण्णी को भी कबूल चुका हूँ,,,,जो के आपके लिहाज से अभद्र थी,,,,,उन्ही के बारे में जब और भी गुनिजनो से पूछा तो यही कहा गया के ,,,खैर छोडिये,,,,, सारी बात कह दी तो ये भी हटा दी जायेगी,,,,, हालांकि अभद्र उसमे भी कुछ नहीं है,,,,,पर हां ,,,चुभने वाला है,,,सो बात यही ख़त्म,,,

शायद अगले लेख पर भी एक बार आऊँ,,,,यही कमेंट दोहराने,,,,,,क्यूकी यहाँ तो लेट हो गया हूँ ना,,,?? और हमारी जो छवि बनाई गई है,,,उसको तो साफ़ करने की कोशिश करना हमारा हक़ है,,,,,,अतः ये कमेंट भी ना हटाया जाए,,,,,,और इसके बाद जो अगले लेख पर दूंगा वो भी,,,
उसके बाद यहाँ कोई कमेंट नहीं,,,,,,यदि किसी को कोई बात कहनी सुन्नी होगी तो व्यक्तिगत रूप से,,,,,फिर भी यदि बेहद ही जरूरी हुआ तो अपने नाम से,,,,,अपनी शक्ल दिखा केर कमेंट करंगे,,,,,,,,,,

भविष्य में kisi भी अनाम कमेंट को हमसे ना जोड़ा जाए,,,,,हमने कभी भी कोई ऐसी बात नहीं लिखी के मुंह छुपा के कहनी पड़े,,,,,एक बार लिखी तो,,,बिना kisi के कहे खुद ही स्वीकार की,,,

आशा है आइन्दा ध्यान रखा जौएगा,,,
यदि फोन नहीं आता तो आज भी हम नहीं आने वाले थे देखने,,,,

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