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रविवार, १ मार्च २००९

तितली रानी, तितली रानी [बाल-कविता] - आकांक्षा यादव

तितली रानी, तितली रानी
पंख उड़ाती कहाँ चली
घूम रही हो गली-गली
अभी यहाँ थी, वहाँ चली


काश हमारे भी पंख होते
संग तुम्हारे हम उड़ लेते
रंग-बिरंगे पंख तुम्हारे
मन को भाते हैं ये सारे

जब भी तुमको चाहें छूना
पास नहीं आती हो
फूलों का रस लेकर
झट से उड़ जाती हो।




रचनाकार परिचय:-


आकांक्षा यादव अनेक पुरस्कारों से सम्मानित और एक सुपरिचित रचनाकार हैं।

राजकीय बालिका इंटर कालेज, कानपुर में प्रवक्ता के रूप में कार्यरत आकांक्षा जी की कवितायें कई प्रतिष्ठित काव्य-संकलनों में सम्मिलित हैं।

आपने "क्रांति यज्ञ: 1857 - 1947 की गाथा" पुस्तक में संपादन सहयोग भी किया है।

23 comments:

अविनाश वाचस्पति २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

बच्‍चों के याद करने योग्‍य
बेहतर तितली कविता
बच्‍चों की यही रहती
है आकांक्षा लिखे ऐसा
कोई
याद रहे सोई।

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

मन को छू जाने वाली बाल कविता है, मैने भी आनंद लिया।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

अच्छी बाल कविता है। तितली वैसे भी बच्चों के लिये प्रिय कौतूहल है।

सुभाष नीरव २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

तितली पर एक अच्छी बाल कविता !

gita pandit २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

एक अच्छी बाल कविता तितली पर ...

महावीर २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

प्रवाहमयी सुंदर कविता जिसने केवल बच्चों का ही नहीं, हमारे जैसे वृद्धों का भी दिल लुभा लिया। बहुत पसंद आई।
महावीर शर्मा

sanju २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

अच्छी लयबद्ध बाल कविता के लिए आकांक्षा जी को बहुत-बहुत बधाई

sanju २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

कविता पढने के बाद अपना खोया बचपन याद आ गया

अच्छी बाल कविता....

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

बहुत अच्छी बाल कविता। बधाई।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

एक बार फ़िर बचपन में पहुंच गये इस कविता के माध्यम से.. बचपन में खूब तितलियों के पीछे भागते थे उन्हे पकडने के लिये... भंबरों को माचिस की डिविया में कैद कर उनकी गुनगुनाहट सुनने में बडा मजा आता था..

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

बाल कविता लिखना कठिन कार्य है। आप इस प्रयास में पूर्ण सफल हुई हैं।

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

बाल कविता तो अच्छी है ही, मैने तितली पर जितनी भी बाल कवितायें पढी हैं उनमें यह श्रेष्ठ में स्थान रखती है।

Ratnesh २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

जब भी तुमको चाहें छूना
पास नहीं आती हो

फूलों का रस लेकर
झट से उड़ जाती हो।
.....................
आकांक्षा जी की बाल कविता 'तितली रानी' बहुत खूब है.बड़ी खूबसूरती से आप विषय और शब्दों का चयन करती हैं.बधाई स्वीकारें.

Dr. Brajesh Swaroop २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

आकांक्षा जी! आपने तो तितली रानी के बहाने इक बार फिर से बचपन की दहलीज पर लाकर खडा कर दिया..बधाई.

Rashmi Singh २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

आकांक्षा जी की कविताओं की मैं कायल हूँ. सहज-सारगर्भित शब्दों में इतना अनुपम चित्रण विरले ही देखने को मिलता है. इसे आकांक्षा जी की खूबी कहें या फिर उनकी कविताओं की ! बहुत ही खूबसूरत बाल कविता के लिए बारम्‍बार बधाई धन्‍यवाद और शुभकामनाएं.

Ram Shiv Murti Yadav २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

आकांक्षा जी की बाल कविता पढ़कर आनंद आ गया. ढेरों बधाई !!

KK Yadav २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

तितली रानी, तितली रानी
पंख उड़ाती कहाँ चली ?
...एक सार्थक,सुन्दर और असरदार बाल कविता.गहन अनुभूति है.आकांक्षा जी, बधाई !!!!!

बाजीगर २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

चलिए तितली रानी के साथ फिर से बच्चे बन जाएँ...मैं राजीव रंजन जी के साथ हूँ कि-" बाल कविता तो अच्छी है ही, मैने तितली पर जितनी भी बाल कवितायें पढी हैं उनमें यह श्रेष्ठ में स्थान रखती है।"

Yuva २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

यह तो नहीं पता कि तितली पर कविगण इतना मोहित क्यों होते हैं, पर आकांक्षा जी की यह सुन्दर कविता पढ़कर बचपन की वादियों में तितली के पीछे दौड़ने में कोई हर्ज़ नहीं....तो आप भी आयें मेरे साथ !!!

डाकिया बाबू २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

अहा! तितली रानी को पढ़कर मन प्रफुल्लित हो गया. आकांक्षा जी कि अन्य बाल-कविताओं का बेसब्री से इंतजार रहेगा.

Ratnesh २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

@ Yuva
...लो जी हम आ गए आपके पीछे.जल्दी से घुमाइए हमें भी तितली रानी के साथ.

Bhanwar Singh २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

मनमोहक रचना.बार-बार मन इस बाल गीत को गुनगुना उठता है- तितली रानी-तितली रानी.

Bhanwar Singh २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

इक बार फिर से गुनगुना दूँ- तितली रानी-तितली रानी......

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