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मंगलवार, १० मार्च २००९

ध्वनि कविता की जान है...[काव्य का रचना शास्त्र : १] - आचार्य संजीव सलिल

ध्वनि कविता की जान है, भाव श्वास-प्रश्वास.
अक्षर तन, अभिव्यक्ति मन, छंद वेश-विन्यास.

अपने उद्भव के साथ ही मनुष्य को प्रकृति और पशुओं से निरंतर संघर्ष करना पड़ा. सुन्दर, मोहक, रमणीय प्राकृतिक दृश्य उसे रोमांचित, मुग्ध और उल्लसित करते थे. प्रकृति की रहस्यमय-भयानक घटनाएँ उसे डराती थीं. बलवान हिंस्र पशुओं से भयभीत होकर वह व्याकुल हो उठता था. विडम्बना यह कि उसका शारीरिक बल और शक्तियाँ बहुत कम थीं. अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए उसके पास देखे-सुने को समझने और समझाने की बेहतर बुद्धि थी. बाह्य तथा आतंरिक संघर्षों में अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने और अन्यों की अभिव्यक्ति को ग्रहण करने की शक्ति का उत्तरोत्तर विकास कर मनुष्य सर्वजयी बन सका. 

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है। आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है। आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। वर्तमान में आप म.प्र. सड़क विकास निगम में उप महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं।

अनुभूतियों को अभिव्यक्त और संप्रेषित करने के लिए मनुष्य ने सहारा लिया ध्वनि का. वह आँधियों, तूफानों, मूसलाधार बरसात, भूकंप, समुद्र की लहरों, शेर की दहाड़, हाथी की चिंघाड़ आदि से सहमकर छिपता फिरता. प्रकृति का रौद्र रूप उसे डराता. मंद समीरण, शीतल फुहार, कोयल की कूक, गगन और सागर का विस्तार उसमें दिगंत तक जाने की अभिलाषा पैदा करते. उल्लसित-उत्साहित मनुष्य कलकल निनाद की तरह किलकते हुए अन्य मनुष्यों को उत्साहित करता. अनुभूति को अभिव्यक्त कर अपने मन के भावों को विचार का रूप देने में ध्वनि की तीक्ष्णता, मधुरता, लय, गति की तीव्रता-मंदता, आवृत्ति, लालित्य-रुक्षता आदि उसकी सहायक हुईं. अपनी अभिव्यक्ति को शुद्ध, समर्थ तथा सबको समझ आने योग्य बनाना उसकी प्राथमिक आवश्यकता थी.

सकल सृष्टि का हित करे, कालजयी आदित्य.
जो सबके हित हेतु हो, अमर वही साहित्य.

भावनाओं के आवेग को अभिव्यक्त करने का यह प्रयास ही कला के रूप में विकसित होता हुआ 'साहित्य' के रूप में प्रस्फुटित हुआ. सबके हित की यह मूल भावना 'हितेन सहितं' ही साहित्य और असाहित्य के बीच की सीमा रेखा है जिसके निकष पर किसी रचना को परखा जाना चाहिए. सनातन भारतीय चिंतन में 'सत्य-शिव-सुन्दर' की कसौटी पर खरी कला को ही मान्यता देने के पीछे भी यही भावना है. 'शिव' अर्थात 'सर्व कल्याणकारी, 'कला कला के लिए' का पाश्चात्य सिद्धांत पूर्व को स्वीकार नहीं हुआ. साहित्य नर्मदा का कालजयी प्रवाह 'नर्मं ददाति इति नर्मदा' अर्थात 'जो सबको आनंद दे, वही नर्मदा' को ही आदर्श मानकर सतत सृजन पथ पर बढ़ता रहा.

मानवीय अभिव्यक्ति के शास्त्र 'साहित्य' को पश्चिम में 'पुस्तकों का समुच्चय', 'संचित ज्ञान का भंडार', जीवन की व्याख्या', आदि कहा गया है. भारत में स्थूल इन्द्रियजन्य अनुभव के स्थान पर अन्तरंग आत्मिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को अधिक महत्व दिया गया. यह अंतर साहित्य को मस्तिष्क और ह्रदय से उद्भूत मानने का है. आप स्वयं भी अनुभव करेंगे के बौद्धिक-तार्किक कथ्य की तुलना में सरस-मर्मस्पर्शी बात अधिक प्रभाव छोड़ती है. विशेषकर काव्य (गीति या पद्य) में तो भावनाओं का ही साम्राज्य होता है. 

होता नहीं दिमाग से, जो संचालित मीत. 
दिल की सुन दिल से जुड़े, पा दिलवर की प्रीत.

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साध्य आत्म-आनंद है :

काव्य का उद्देश्य सर्व कल्याण के साथ ही निजानंद भी मान्य है. भावानुभूति या रसानुभूति काव्य की आत्मा है किन्तु मनोरंजन मात्र ही साहित्य या काव्य का लक्ष्य या ध्येय नहीं है. आजकल दूरदर्शन पर आ रहे कार्यक्रम सिर्फ मनोरंजन पर केन्द्रित होने के कारण समाज को कुछ दे नहीं पा रहे जबकि साहित्य का सृजन ही समाज को कुछ देने के लिये किया जाता है. 

जन-जन का आनंद जब, बने आत्म-आनंद.
कल-कल सलिल-निनाद सम, तभी गूँजते छंद.

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काव्य के तत्व 

बुद्धि भाव कल्पना कला, शब्द काव्य के तत्व.
तत्व न हों तो काव्य का, खो जाता है स्वत्व. 

बुद्धि या ज्ञान तत्व काव्य को ग्रहणीय बनाता है. सत-असत, ग्राह्य-अग्राह्य, शिव-अशिव, सुन्दर-असुंदर, उपयोगी-अनुपयोगी में भेद तथा उपयुक्त का चयन बुद्धि तत्व के बिना संभव नहीं. कृति को विकृति न होने देकर सुकृति बनाने में यही तत्व प्रभावी होता है. 

भाव तत्व को राग तत्व या रस तत्व भी कहा जाता है. भाव की तीव्रता ही काव्य को हृद्स्पर्शी बनाती है. संवेदनशीलता तथा सहृदयता ही रचनाकार के ह्रदय से पाठक तक रस-गंगा बहाती है. 

कल्पना लौकिक को अलौकिक और अलौकिक को लौकिक बनाती है. चनाकार के ह्रदय-पटल पर बाह्य जगत तथा अंतर्जगत में हुए अनुभव अपनी छाप छोड़ते हैं. साहित्य सृजन के समय अवचेतन में संग्रहित पूर्वानुभूत संस्कारों का चित्रण कल्पना शक्ति से ही संभव होता है. रचनाकार अपने अनुभूत तथ्य को यथावत कथ्य नहीं बनता. वह जाने-अनजाने सच=झूट का ऐसा मिश्रण करता है जो सत्यता का आभास कराता है. 

कला तत्त्व को शैली भी कह सकते हैं. किसी एक अनुभव को अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से व्यक्त करते हैं. हर रचनाकार का किसी बात को कहने का खास तरीके को उसकी शैली कहा जाता है. कला तत्व ही 'शिवता' का वाहक होता है. कला असुंदर को भी सुन्दर बना देती है.

शब्द को कला तत्व में समाविष्ट किया जा सकता है किन्तु यह अपने आपमें एक अलग तत्व है. भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम शब्द ही होता है. रचनाकार समुचित शब्द का चयन कर पाठक को कथ्य से तादात्म्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है.

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साहित्य के रूप :

दिल-दिमाग की कशमकश, भावों का व्यापार.
बनता है साहित्य की, रचना का आधार. 

बुद्धि तत्त्व की प्रधानतावाला बोधात्मक साहित्य ज्ञान-वृद्धि में सहायक होता है. हृदय तत्त्व को प्रमुखता देनेवाला रागात्मक साहित्य पशुत्व से देवत्व की ओर जाना की प्रेरणा देता है. अमर साहित्यकार डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ऐसे साहित्य को 'रचनात्मक साहित्य' कहा है. 

साहित्य शिल्पीसादर समर्पित

साहित्य शिल्पी पर आरंभ यह श्रंखला संजीव सलिल जी नें अपनी पूजनीय माता जी व प्रख्यात कवयित्री स्व. श्रीमति शांति देवी वर्मा को समर्पित की है। हम सलिल जी की भावनाओं को नमन करते हैं।
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लक्ष्य और लक्षण ग्रन्थ 

रचनात्मक या रागात्मक साहित्य के दो भेद लक्ष्य ग्रन्थ और लक्षण ग्रन्थ हैं साहित्यकार का उद्देश्य अलौकिक आनंद की सृष्टि करना होता है जिसमें रसमग्न होकर पाठक रचना के कथ्य, घटनाक्रम, पात्रों और सन्देश के साथ अभिन्न हो सके. 

लक्ष्य ग्रन्थ में रचनाकार नूतन भावः लोक की सृष्टि करता है जिसके गुण-दोष विवेचन के लिए व्यापक अध्ययन-मनन पश्चात् कुछ लक्षण और नियम निर्धारित किये गए हैं लक्ष्य ग्रंथों के आकलन अथवा मूल्यांकन (गुण-दोष विवेचन) संबन्धी साहित्य लक्षण ग्रन्थ होंगे. लक्ष्य ग्रन्थ साहित्य का भावः पक्ष हैं तो लक्षण ग्रन्थ विचार पक्ष.
काव्य के लक्षणों, नियमों, रस, भाव, अलंकार, गुण-दोष आदि का विवेचन 'साहित्य शास्त्र' के अंतर्गत आता है 'काव्य का रचना शास्त्र' विषय भी 'साहित्य शास्त्र' का अंग है. 

साहित्य के रूप -- 
१. लक्ष्य ग्रन्थ : (क) दृश्य काव्य, (ख) श्रव्य काव्य. 
२. लक्षण ग्रन्थ : (क) समीक्षा, (ख) साहित्य शास्त्र.

21 comments:

नंदन २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

आचार्य संजीव जी आपका हार्दिक स्वागत। कविता में ध्वनि शब्दों से माधुर्य व सौन्दर्य दोनों ही बढ जाता है। ट्ब टब, कल कल, छल छल, पट पट जैसे शब्द किसी दृश्य को बिना किसी कठिन शब्द प्रयोग के भी स्पष्ट कर देते हैं। एसे में कविता भाषा क्या हो?

शैली पर कृपया विस्तार से समझायें।

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

आचार्य जी यह आलेख भूमिका की तरह हो गया। इसमें कई विषयों पर यदि आप विस्तार से बात करें तो हम छात्रों का भला होगा।

सकल सृष्टि का हित करे, कालजयी आदित्य.
जो सबके हित हेतु हो, अमर वही साहित्य.

साहित्य पर आपने इस दोहे में बहुत कुछ कहा लेकिन यदि साहित्य क्या है किन तत्वों का साहित्य में होना आवश्यक है। कविता क्या है? इसका स्वरूप क्या है गद्य के स्वरूप आदि पर भी कृपया आरंभ मे ही चर्चा हो। गद्य मैंने इस लिये लिखा कि छंद और अकविता के बीच की दूरी व उपयोगिता समझने में मदद मिले।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

स्व. श्रीमति शांति देवी वर्मा जी को मेरा भी नमन। इस श्रंखला से बहुत सीखना है। एक रूपरेखा पहले दी गयी होती तो सुविधा होती। धन्यवाद सालिल जी।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

Comprehensive Article.

Alok Kataria

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

आदरणीय संजीव सलिल जी का साहित्य शिल्पी के मंच पर हार्दिक स्वागत है। संजीव जी की विद्वत्ता उस फलदार वृक्ष के सदृश्य है जो अपनी मिठास बाँटने को भी तत्पर है। प्रस्तुत आलेख श्रंखला हम जैसे नव-लेखकों के लिये वरदान है।

आदरणीय सलिल जी आपने लिखा है कि "सबके हित की यह मूल भावना 'हितेन सहितं' ही साहित्य और असाहित्य के बीच की सीमा रेखा है" एसे में वे रचनायें जो किसी दृश्य का चित्रण या आत्मानुभूति का प्रस्तुतिकरण है क्या साहित्य की परिभाषा में आयेंगी?

साहित्य के रूप पर आपसे विवेचनात्मक आलेख की प्रतीक्षा रहेगी।

Kewal Krishna २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

उम्मीद है इस आलेख श्रंखला से।

अनुज २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

आचार्य संजीव सलिल जी को होली की हार्दिक शुभकामनायें। आलेख बहुत अच्छा है। संक्षिप्त है। संपूर्ण है। संग्रहणीय है।

अनुज कुमार सिन्हा
भागलपुर

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

सलिल जी होली की मुबारक। आपके आलेख से प्रसन्नता हुई है कि बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। उदाहरण यदि और सम्मिलित करें तो समझने में सहायक होगा।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

बहुत अच्छा आलेख है। बधाई एवं होली की सार्दिक शुभकामना।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

सलिल जी,

साहित्य शिल्पी पर आपका हार्दिक स्वागत है. आप जैसे गुणीजन का आशीर्वाद पाना हमारे लिये सौभाग्य की बात है. ऐसे सार्थक लेखों से नव उदित लेखकों का मार्गदर्शन होगा एंव वह अपनी लेखनी को एक नया आयाम दे पायेंगे.

आपको परिवार सहित होली के पर्व की शुभकामनायें. ईश्वर आपके जीवन में उल्लास और मनचाहे रंग भरें.

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

"बुद्धि तत्त्व की प्रधानतावाला बोधात्मक साहित्य ज्ञान-वृद्धि में सहायक होता है. हृदय तत्त्व को प्रमुखता देनेवाला रागात्मक साहित्य पशुत्व से देवत्व की ओर जाना की प्रेरणा देता है"

bahut hi sundar lekh.
saadar
khyaal

दिव्यांशु शर्मा २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

"काव्य का उद्देश्य सर्व कल्याण के साथ ही निजानंद भी मान्य है. भावानुभूति या रसानुभूति काव्य की आत्मा है किन्तु मनोरंजन मात्र ही साहित्य या काव्य का लक्ष्य या ध्येय नहीं है."
एक बहुत आवश्यक आलेख | आज जब साहित्य शब्द का वज़न कम होता जा रहा है तो आवश्यक है की वर्तमान सृजक इस की बारीकियों को समझें | रचना शास्त्र का ज्ञान होने से आने वाली कविताओं को बेहतर बनाने में सहायता होगी | आचार्य का स्वागत | साहित्य शिल्पी टीम को बधाई |

अनिल कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

होली मुबारक।
आचार्य कृपया साहित्य की परिभाषा से आरंभ करें। समकालीनता और कविता की वर्तमान दशा दिशा पर भी आपकी टिप्पणी चाहूंगा।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी को होली की शुभकामनायें। काव्य के रचना शास्त्र के हर अंक की प्रतीक्षा रहेगी। प्रथमांक अच्छा बन पडा है।

रंजना २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

जो बातें मेरे मानस में सदैव घुमडा करती हैं,उन्हें इतने सुन्दर ढंग से विवेचित देख ,जो परमानन्द मिला कि क्या कहूँ......आपने इतने सुन्दर ढंग से साहित्य के सत्-चित-आनंद स्वरुप की व्याख्या की है कि इसमें परिशिष्टि(टिप्पणी)रूप में कुछ भी जोडूँ तो मखमल में टाट का पैबंद सा लगेगा.....
साधुवाद आपका और माताजी को सादर नमन...

शोभा २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

बहुत ही सारगर्भित आलेख। आभार।

अवनीश एस तिवारी २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

आचार्यजी ,
यह लेख ज्ञान और प्रस्तुति दोनों में उत्तम है |
इसे हमरा सौभाग्य ही कहा जाए कि हमें यह सीखने को मिल पा रहा है |

धन्यवाद |

अवनीश तिवारी

योगेश समदर्शी २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

जानकारी पूर्ण आलेख के लिये आपका आभार...

महावीर २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

बहुत ही सारगर्भित आलेख है। आचार्य जी की इस श्रंखला से बहुत सीखने को मिलेगा। स्व: श्रीमति देवी वर्मा जी को नमन।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` २३ नवम्बर २००९ ७:०० PM  

होली की सपरिवार शुभकामनाएँ सभीको साहित्य शिल्पी परिवार के सदस्योँ व पाठकोँ को सारगर्भित आलेख पढकर बहुत खुशी हुई
- लावण्या

Sanjiv Kavi १८ मई २०१० ७:२१ PM  

बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर

सनसनाते पेड़
झुरझुराती टहनियां
सरसराते पत्ते
घने, कुंआरे जंगल,
पेड़, वृक्ष, पत्तियां
टहनियां सब जड़ हैं,
सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
तड़तड़ाहट से बंदूकों की
चिड़ियों की चहचहाट
कौओं की कांव कांव,
मुर्गों की बांग,
शेर की पदचाप,
बंदरों की उछलकूद
हिरणों की कुलांचे,
कोयल की कूह-कूह
मौन-मौन और सब मौन है
निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
और अनचाहे सन्नाटे से !

आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
महुए से पकती, मस्त जिंदगी
लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
जंगल का भोलापन
मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
कहां है सब

केवल बारूद की गंध,
पेड़ पत्ती टहनियाँ
सब बारूद के,
बारूद से, बारूद के लिए
भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

बस एक बेहद खामोश धमाका,
पेड़ों पर फलो की तरह
लटके मानव मांस के लोथड़े
पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
दर्द से लिपटी मौत,
ना दोस्त ना दुश्मन
बस देश-सेवा की लगन।

विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
अपने कोयल होने पर,
अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

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