अनुदर्शन [काव्य-पाठ] - स्वर व रचना महेन्द्र भटनागर
स्वर शिल्पी पर हम अपने पाठकों को विभिन्न साहित्यिक रचनाओं की स्वर-प्रस्तुति सुनवाते रहे हैं। इस प्रक्रिया में वरिष्ठ कवि श्री महेन्द्र भटनागर के गीत व कवितायें पहले भी कई बार इस मंच पर आप सुन चुके हैं। आज एक बार फिर प्रस्तुत है इन्हीं का एक गीत; बोल हैं:
उड़ गये
ज़िन्दगी के बरस रे कई,
राग सूनी
अभावों भरी
ज़िन्दगी के बरस
हाँ, कई उड़ गये!
लौट कर आयगा अब नहीं
वक़्त जो —
धूल में, धूप में
खो गया,
स्याह में सो गया!
शोर में
चीखती ही रही ज़िन्दगी,
हर क़दम पर विवश,
कोशिशों में अधिक विवश!
गा न पाया कभी
एक भी गीत मैं हर्ष का,
एक भी गीत मैं दर्द का!
गूँजता रव रहा
मात्र :
संघर्ष....संघर्ष... संघर्ष!
विश्रान्ति के
पथ सभी मुड़ गये!
ज़िन्दगी के बरस,
रे कई
देखते...देखते उड़ गये!
तो आइये सुनते स्वयं महेन्द्र भटनागर जी का गाया हुआ यह गीत जिसका शीर्षक है "अनुदर्शन": (गीत सुनने के लिये नीचे दिये गये प्लेयर में चटखा लगायें):
रचनाकार परिचय:-




12 comments:
कविता पाठ ने आनंदित किया
अच्छा रहा ...
महेन्द्र भटनागर जी की कविता में उनके अनुभव प्रकट होते हैं।
संघर्ष....संघर्ष... संघर्ष!
विश्रान्ति के
पथ सभी मुड़ गये!
ज़िन्दगी के बरस,
रे कई
देखते...देखते उड़ गये!
महेन्द्र जी को पढना और सुनना अच्छा लगता है।
Nice Poem, presented well.
Alok Kataria
गा न पाया कभी
एक भी गीत मैं हर्ष का,
एक भी गीत मैं दर्द का!
गूँजता रव रहा
मात्र :
संघर्ष....संघर्ष... संघर्ष!
अच्छी कविता।
काव्य पाठ नें आनंदित किया।
बेहतरीन प्रस्तुति।
संघर्ष....संघर्ष... संघर्ष!
Mahendra ji ko sunna aur unka likha padhna bahut achha laga
सुन्दर प्रस्तुति!
इस सुंदर गीत को सुनना बेहद आनंददायक अनुभव रहा। बधाई स्वीकारें।
जी सच कहा है आपने... देखते देखते ही जिन्दगी यूं गुजर जाती है जैसे मुट्ठी से रेत फ़िसल कर जमीन पर गिर जाये..
भावभीनि रचना.. आभार
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