आदि मानव ने अनुभूतियों को ध्वनि के माध्यम से अभिव्यक्त करने की प्रेरणा प्रकृति से पाई तो उन्हीं का अनुसरण भी किया. इन ध्वनियों का आरोह-अवरोह तथा उनमें निहित भावों को संप्रेषित करने की शक्ति ही क्रमशः कविता का उत्स बनी, हम काव्य शास्त्र के विकास तथा विविध भाषाओं / बोलियों के साहित्य का अवलोकन उसी तरह करने का प्रयास करेंगे जैसे नौका विहार करते हुए दोनों तटों को देखा जा सकता है.

विश्व पटल पर प्राचीनतम भारतीय साहित्याचार्यों ने प्रारंभ से ही काव्य के सूक्ष्म विवेचन को महत्त्व दिया. लगभग ३००० वर्ष प्राचीन भारतीय काव्य शास्त्र का ज्ञान श्रीकृष्ण द्वारा ब्रम्हा-विष्णु आदि ६४ शिष्यों, ब्रम्हा द्वारा सरस्वतिसुत सारस्वतेय तथा अन्य मानस पुत्रों को, सारस्वतेय द्वारा ६०० ई.पू के लगभग भरत मुनि, नंदिकेश्वर (नर्मदा तट पर उनके आश्रम के समीप नंदिकेश्वर ग्राम, उनका शिवालय आदि बरगी ग्राम के समीप बने बाँध में डूब गए. श्री नंदिकेश्वर शिवलिंग की प्राणप्रतिष्ठा समीपस्थ पहाडी पर मध्य प्रदेश शासन द्वारा कराई गयी. राजनैतिक कारणों से इस बाँध का नाम नंदिकेश्वर के नाम पर न होकर रानी अवन्ती बाई के नाम पर है ) आदि १८ शिष्यों को १८ विविध विद्याओं का ज्ञान प्राप्त हुआ. ४६

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है। आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है। आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। वर्तमान में आप म.प्र. सड़क विकास निगम में उप महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं।

प्रारंभ में 'काव्य' का समावेश 'नाट्य' के अंतर्गत था. कालांतर में दोनों विधाओं का दो अलग-अलग आयामों में विकास होने पर उन्हें स्वतंत्र तथा कुछ मीमांसकों द्वारा 'काव्य' के अंतर्गत 'नाट्य' को माना गया है. भारतीय काव्य शास्त्र का प्रथम संपूर्ण उपलब्ध ग्रन्थ भरत मुनि रचित 'नाट्य-शास्त्र" होने की पुष्टि उसकी सूत्र शैली से होती है. ४७ भरत ने अलंकारों (उपमा, रूपक, दीपक, यमक आदि) को रसाश्रित माना है.

साहित्य को स्वतंत्र विधा के रूप में सर्वप्रथम लगभग २००० वर्ष पूर्व महाकवि राजशेखर ने अपनी काल जयी कृति 'काव्य-मीमांसा' में 'पंचमी साहित्य विद्या आईटीआई यायावरीय.' कहकर मान्यता दी.४१ इसके बाद ६०० ई. पू.में महाकवि भामह ने 'काव्यालंकार' में ' सहितयोः शब्दार्थो: भावः साहित्यम' कहकर साहित्य में शब्द, अर्थ तथा भाव की त्रयी का होना अनिवार्य माना.४२

पौर्वात्य रचनाकारों ने मानव मन में तरंगित होनेवाली ललित भावनाओं तथा अनुभूतियों की वाणी या लिपि द्वारा कलात्मक अभिव्यक्ति को ही साहित्य कहा. 'सहितस्य भावः' में सहित के दोनों अर्थ १. 'समुदाय' तथा २. 'हित के साथ' ग्राह्य हैं.४३ साहित्य का मस्तिष्क की तुलना में ह्रदय से तथा तर्क की तुलना में भावना से अधिक नैकट्य है.

साहित्य का उद्देश्य भावनाप्रधान मनुष्य को परिष्कृत, उन्नत, उदार, सहिष्णु, समझदार, सहयोगी, समन्वयी, सहकारी, सजग, सहज तथा सरल बनाकर स्वार्थ से सर्वार्थ की ओर अग्रसर करना है. साहित्य में अन्तर्निहित सत्य, स्नेह, सौंदर्य, सदाचार, करुना, औद्दार्य, श्रृंगार, राग-विराग, योग-भोग, त्याग-अनुराग, ममता-समता, आदर्श' व्यव्हार आदि पाठक को हर देश-काल-परिस्थिति तथा परिवर्तनों में जीना सिखाता है. सच्चा साहित्य समयजयी होता है. साहित्य मनुष्य के अंतर्मन में जीवनानुभवों से व्युत्पन्न प्रतिक्रियाओं की ललित, रमणीय, सुनियोजित, हृद्स्पर्शी,स्पष्ट तथा सत्यान्वेषित अभिव्यक्ति है.मानव आदिकाल से 'सत्य-शिव-सुन्दर'के अन्वेषण तथा सत-चित-आनंद' के साक्षात् के प्रति आकर्षित-समर्पित रहा है. क्षुद्र-लौकिक कामनाओं को जयकर निष्काम अलौकिक आनद में निमग्न कर सकने में समर्थ-सर्व हितकारी, सोद्देश्य, चिन्तनपरक विचारों की सुव्यवस्थित अभ्व्यक्ति साहित्य में तथा साहित्य से ही संभव है.

साहित्य की कसौटी मानवीय उदात्त भावनाओं को उत्प्रेरित-संवर्द्धित-परिष्कृत करना, वैयक्तिक कामनाओं को सर्वहितार्थ नियंत्रित-समर्पित करना, वासनाओं को उच्छ्रंखल व् पाशविक न होने देकर शुभदा, सुखदा, सरला, सुफाका व् सफल बनाने एवं बनने की सत्प्रेरणा देना है. हर कल्प में अनुभूति का अमरकंटक से निःसृत बुद्धि, भाव, रस, कल्पना, यथार्थ, आदर्श तथा व्यव्हार की सलिल-धर कल-कल निनाद कर साहित्य नर्मदा के रूप में प्रवाहित होती है. साहित्य नर्मदा के तट का हर कंकर शंकर होता है.

सनातन-शाश्वत विचारों तथा दैनंदिन आचारों के समंतारी तटों के मध्य आध्यात्म, दर्शन, धर्म, कला एवं विज्ञानं के पञ्च पंकजों से सुशोभित साहित्य नर्मदा में कर्म प्रधान बिस्व करि राखा, जो जस करहि सो तस् फल चाखा' तथा 'हुइहै वहि जो राम रूचि राखा, को करि तरक बढावै साखा' अर्थात कर्मवाद और भाग्यवाद की परस्पर विरोधी प्रतीत होती किन्तु वास्तव में एक-दूसरे की पूरक, ऊपरी दृष्टि से भिन्न दिखतीं किन्तु वस्तुतः अभिन्न विचारधाराएँ नीर-क्षीरवत प्रवाहित होती रही हैं, हो रही हैं तथा होती रहेंगीं. संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, डिंगल, अरबी तथा फारसी के भाषिक शिखरों के मध्य टकसाली-खडी हिंदी की कल-कल निनादिनी उतारों-चढावों, घुमावों-भटकावों के मध्य सतत प्रवाहित साहित्य को क्षिप्रता, निर्मलता, चारुता, सरलता, तथा सारगर्भितता के पञ्चतत्वों परिपुष्ट कर जनगन-मन का साध्य एवं आराध्य बनाया है.

साहित्य नर्मदा की दो धाराओं भावप्रधान लक्ष्य ग्रंथों और विचारप्रधान लक्षण ग्रंथों में क्रमशः समालोचना एवं साहित्यशास्त्र समाहित है. दृश्य काव्यान्तर्गत रूपक व् उपरूपक, श्रव्य काव्यान्तर्गत शैली व अर्थ तथा शैली के अंतर्गत गद्य, पद्य और चम्पू काव्य ( गद्य-पद्य मिश्रित) हैं.पुनः गद्य के अंतर्गत उपन्यास, कहानी, लघुकथा, निबंध, जीवनी, संस्मरण,रिपोर्ताज, पर्यटन वृत्तान्त, पत्र-लक्खन आदि तथा पद्यान्तार्गत प्रबंध काव्य (महाकाव्य, खंडकाव्य, एकार्थ काव्य तथा मुक्तक काव्य (पाठ्य-गीति)आदि समाविष्ट हैं.४४ यह वर्गीकरण रचनाओं के शैल्पिक वैविध्य पर आधृत है.

उक्त के सर्वथा विपरीत आंग्ल साहित्य में वर्ण्य विषय के आधार पर काव्य को स्वानुभूति निरूपक (आत्माभिव्यन्जक, विषयीप्रधान, व्यक्तित्व प्रधान, सबजेकटिव) तथा तथा बाह्यार्थ निरूपक ( जगताभि व्यंजक, विषयप्रधान, कृतित्वप्रधान, ऑब्जेक्टिव) वर्गों में विभाजित किया गया है.आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन्हें परस्परपूरक व अभिन्न तथा वर्गीकरण को
स्थूल माना है. ४५

मथ साहित्य समुद्र को, मिले काव्य के रत्न.
सत-चित-आनंद हेतु हैं, सत-शिव-सुन्दर यत्न.

काव्य सृष्टि निर्दोष हो काव्य प्रकाशकर मम्मट के मतानुसार -  'तद्दोशौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृति पुनः क्वाप'४८
अर्थात- 
दोषरहित शब्दार्थयुत, वह हर रचना काव्य.
अलंकार हों या न हों, हो हर गुण संभाव्य.

मम्मट ने अन्यत्र 'रस' को प्रधान माना है.

पंडित जगन्नाथ के अनुसार- 'रमणीयार्थ प्रतिपदाकः शब्दः काव्यम' ४९
अर्थात - 
प्रतिपादित होता जहाँ, अर्थ रुचिर-रमणीक.
वहीं शब्द में काव्य है, यही सही है लीक.

अम्बिका दत्त व्यास कहते हैं - 'लोकोत्तरानन्ददाता प्रबंधः काव्यनाम्भाक'५०
अर्थात- 
जिस रचना का पाठ कर, हो चित में आनंद.
वही पंक्तियाँ काव्य हैं, कविवर आनंदकंद.

महापात्र विश्वनाथ ह्रदय को अपूर्व आनंद देने वाले वाक्य ही काव्य हैं...- रसात्मकं वाक्यम काव्यम' ५१
अर्थात - 
जिन वाक्यों में रस भरा, जो हैं रस की खान.
काव्य वही जो फूँकते, मानव मन में जान.

काव्यादर्श में डंडी कहते हैं- 'काव्य शोभाकरान धर्मान अलंकारान प्रचक्षते. ५२
अर्थात- 
सुन्दरता औ' धर्म है, अलंकार सच मान.
कविता में फूँके वही, सत्य मानिये जान.

वामन (९०० ई.) काव्यालंकार सूत्र में उक्त सभी से भिन्न मत व्यक्त करते हुए कहते हैं- 'रीतिरात्मा काव्यस्य' ५३
अर्थात - 
शब्द-भाव की योजना, या पद रचना रीति.
काव्य-आत्मा है यही, रखें स्मरण नीति.

कुंतक (१०००ई.) ने वक्रोक्ति जीवित में 'वक्रोक्तिः काव्यजीवितम' कहकर उक्ति वैचित्र्य, कथन का अनूठापन आदि को काव्य माना है. ५४

हो विचित्रता उक्ति में, कथन अनूठा देख.
समझ कीजिये पंक्ति का, कविता कह उल्लेख.

आनंदवर्धन ने 'ध्वन्यालोक' में 'काव्यस्यात्मा ध्वनिरितिः' कहते हुए एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया. ५५

ध्वनि में बसती काव्य की, आत्मा सच ले जान.
तदनुसार रसपान कर, मान काव्य वरदान

क्षेमेन्द्र (११०० ई.) ने औचित्य विचार चर्चा में ''औचित्यम रस सिद्धस्य स्थिरं काव्यमजीवितं' कहते हुए नयी मान्यता स्थापित की.५६

अलंकार रस वस्तु का, है औचित्य प्रमाण.
कविता में कवि फूँकता, है इनसे ही प्राण.

प्रारंभ में 'काव्य' का समावेश 'नाट्य' के अंतर्गत था. कालांतर में दोनों विधाओं का दो अलग-अलग आयामों में विकास होने पर उन्हें स्वतंत्र तथा कुछ मीमांसकों द्वारा 'काव्य' के अंतर्गत 'नाट्य' को माना गया है. भारतीय काव्य शास्त्र का प्रथम संपूर्ण उपलब्ध ग्रन्थ भरत मुनि रचित 'नाट्य-शास्त्र" होने की पुष्टि उसकी सूत्र शैली से होती है. ४७ भरत ने अलंकारों (उपमा, रूपक, दीपक, यमक आदि) को रसाश्रित माना है.

सारतः काव्य वह भावमय, रसपूर्ण रचना है जो अलौकिक आनंद का संचार करे. जिस को पढ़कर ह्रदय में भाव उत्पन्न न हो, वह काव्य नहीं है. इस दृष्टिकोण से काव्य मानव-जीवन की अनुभूतियों, सित्त्वृतियों तथा सृष्टि-सौंदर्य की व्याख्या है.

काव्य सुप्त भावनाओं को जाग्रत के अदेखे से सामीप्य तथा देखे से अभिन्नता की प्रतीति कराता है. काव्यानंदी एक अपूर्व भाव लोक में विचरण करता है. वह बिना किसी सम्बन्ध के अन्यों के दुःख से दुखी तथा सुख से सुखी होते हुए 'आत्म' से 'विश्वात्म' बनाने की और अग्रसर होता है. इस काव्यानन्द के अन्वेषण की ६ पढ़तियाँ हैं.१. रस पद्धति, २. अलंकार पद्धति, ३. रीति पद्धति, ४. वक्रोक्ति पद्धति, ५. ध्वनि पद्धति, ६. औचित्य पद्धति.

नाट्य शास्त्र में रूपक के तत्वों की विवेचना करते हुए भरत मुनि ने 'रस' को प्रधान तत्व मानते हुए अध्याय ६-७ में विस्तृत चर्चा की है. आचार्य विश्वनाथ ने भी रस को ही 'काव्य कि आत्मा' माना है. 'रसात्मकं वाक्यम काव्यम' अर्थात 'रसमय रचना काव्य है' की अवधारणा दशकों तक मान्य रही. रस ही आनंददाता है अतः 'लोकोत्तरानन्ददाता प्रबंधः काव्यनामभाक' अर्थात अलौकिक आनंद देनेवाली रचना ही काव्य कहे जाने की अधिकारी है. काव्यालोचन की अन्य पद्धतियों के प्रतिपादकों को भी रस की महत्ता माननी ही पडी.

अगले आलेख में हम उक्त ६ सिद्धांतों पर कुछ और चर्चा इसलिए करेंगे कि काव्य शास्त्र के विकास और काव्य के गुण-दोष समझने के लिए इन्हें समझना अपरिहार्य है.

गत सन्दर्भ: ३६ रघुवंश ६/३५, ३७. कुमारसंभव १/४७, किरातार्जुनीयम ८/४७, ३९. शिशुपाल वध ४/२०, ४०.कम्प्रिहेंसिव हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया, नीलकंठ शास्त्री भाग २, पृष्ठ ५५२, ४१. पंचमी साहित्य विद्या इति यायावरीय, ४२. भामह - काव्यालंकार , ४३ मोहनवल्लभ पन्त, आलोच्नाशास्त्र, पृष्ठ १-६, ४४ उक्त ४३, १६-३३, ४५. उक्त ४३- ३४-३५, ४६. राजशेखर काव्य मीमांसा, ४७. डॉ.कृष्ण देव शर्मा, भारतीय काव्य शास्त्र पृष्ठ ६-७, ४८. मम्मट,काव्यप्रकाश, ४९. जगन्नाथ, ५०. अम्बिकादत्त व्यास, ५१. महापात्र विश्वनाथ, ५२. डंडी काव्यादर्श, ५३. वामन काव्यालंकार सूत्र, ५४. कुंतक -वक्रोती जीवत,५५. आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक, ५६. क्षेमेन्द्र औचित्य विचार चर्चा. 

16 comments:

  1. पंकज सक्सेना1 अप्रैल 2009 को 8:03 am

    सलिल जी का लेख इतनी जानकारियों से भरा है कि प्रसन्नता होती हैं इंटरनेट हिन्दी सामग्री के लिये भी अच्छी जगह बन गया।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सलिल जी मुझे आपके आलेख की प्रतीक्षा आपके द्वारा दिये जा रहे उद्धरणों एवं काव्यानुवादों के कारण रहती है। इस श्रंखला का धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सलिल जी रस और अलंकार पर प्राचीन विद्वानों नें बहुत कुछ कहा है जो आपके उदाहरणों में भी प्रकट होता है। लेकिन आज के काव्य में इन दोनों तत्वों का अभाव है इस पर आपकी टिप्पणी?

    उत्तर देंहटाएं
  4. साहित्य का उद्देश्य भावनाप्रधान मनुष्य को परिष्कृत, उन्नत, उदार, सहिष्णु, समझदार, सहयोगी, समन्वयी, सहकारी, सजग, सहज तथा सरल बनाकर स्वार्थ से सर्वार्थ की ओर अग्रसर करना है. साहित्य में अन्तर्निहित सत्य, स्नेह, सौंदर्य, सदाचार, करुना, औद्दार्य, श्रृंगार, राग-विराग, योग-भोग, त्याग-अनुराग, ममता-समता, आदर्श' व्यव्हार आदि पाठक को हर देश-काल-परिस्थिति तथा परिवर्तनों में जीना सिखाता है. सच्चा साहित्य समयजयी होता है. साहित्य मनुष्य के अंतर्मन में जीवनानुभवों से व्युत्पन्न प्रतिक्रियाओं की ललित, रमणीय, सुनियोजित, हृद्स्पर्शी,स्पष्ट तथा सत्यान्वेषित अभिव्यक्ति है.मानव आदिकाल से 'सत्य-शिव-सुन्दर'के अन्वेषण तथा सत-चित-आनंद' के साक्षात् के प्रति आकर्षित-समर्पित रहा है. क्षुद्र-लौकिक कामनाओं को जयकर निष्काम अलौकिक आनद में निमग्न कर सकने में समर्थ-सर्व हितकारी, सोद्देश्य, चिन्तनपरक विचारों की सुव्यवस्थित अभ्व्यक्ति साहित्य में तथा साहित्य से ही संभव है.

    धन्यवाद आचार्य जी एसे उच्च कोटि के आलेख के लिये।

    उत्तर देंहटाएं
  5. त्वरित टिप्पणी:

    नंदन .
    रस और अलंकार पर प्राचीन विद्वानों नें बहुत कुछ कहा है जो आपके उदाहरणों में भी प्रकट होता है। लेकिन आज के काव्य में इन दोनों तत्वों का अभाव है

    नंदन जी!
    वन्दे मातरम काव्य तो काव्य है...वह समयजयी तभी होगा जब उसमें रस होगा. अलंकार भी रस वर्षंण का माध्यम मात्र है. आज के काव्य में भी वही तत्व हैं जो कल के काव्य में थे या कल के काव्य में रहेंगे. कल का सब आज नहीं है, वही है जिसमें रस है...आज का वही कल तक रहेगा जिसमें रस होगा.. आज सिर्फ नीरस लिखा जा रहा है ऐसा मुझे नहीं लगता. आज जो भी सरस लिखा जा रहा है वह बचेगा..रहेगा... साहित्य सिर्फ पुस्तकालयों या विद्वानों के सहारे नहीं बचता...साहित्य बचता है लोक द्वारा...बच्चन ने लिखा है की मेरी कोई पंक्ति कहीं कोई बावला गता मिल जाये तो लिखना सार्थक हो जाये...रैदास, घाघ, भड्डरी, भिखारी, गिरधर, ईसुरी, जगनिक आदि लोक कवी लोक्कंठो में ही अमर हो गए...क्या लोक के कंठ में कोई नीरस रचना प्रतिष्ठित होती है?
    साहित्य या काव्य बुद्धिजीवियों से नहीं भाव्जीवियों से चिरजीवी होता है..ऐसा मेरा सोचना है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सलिल जी,

    काव्य रचना पर जानकारियों से भरपूर इस आलेख श्रंखला का इन्तजार रहता है..

    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. साहित्य का उद्देश्य भावनाप्रधान मनुष्य को परिष्कृत, उन्नत, उदार, सहिष्णु, समझदार, सहयोगी, समन्वयी, सहकारी, सजग, सहज तथा सरल बनाकर स्वार्थ से सर्वार्थ की ओर अग्रसर करना है. साहित्य में अन्तर्निहित सत्य, स्नेह, सौंदर्य, सदाचार, करुना, औद्दार्य, श्रृंगार, राग-विराग, योग-भोग, त्याग-अनुराग, ममता-समता, आदर्श' व्यव्हार आदि पाठक को हर देश-काल-परिस्थिति तथा परिवर्तनों में जीना सिखाता है.

    इन शब्दों के आलोक में साहित्य पर आज के युग में किसी भी और कुछ भी को साहित्य बताने वाले लोगों को सद् बुद्धि प्रप्त हो सके सम्भवत: प्रचीनतम गूढ़ बातों पर शिल्पी के सुधी पाठकों का ग्यान दैनिन्दिन संपुष्ट हो रहा है. आपके सत्प्रयास के लिये साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  8. संजीव सलिक जी यह ज्ञान यज्ञ है। आपकी आहूतियों के लिये साधुवाद।

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  9. सलिल जी आपने अपनी टिप्पणी में जो लिखा है व्यावहारिक रूप से तो सही जान पडता है लेकिन ढूंढ्ने पर भी काल जयी रचनाओं का अभाव ही दिखायी देता है। नयी कविता में बात कहने का अपना मजा है लेकिन वहा भी बोझिलता है इससे आप इनकार नहीं करेंगे। छंद को लोग बीते जमाने की बात मानने लगें हैं एसे में कविता के भविष्य को ले कर निराशा दिखायी देती है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. काव्य सृष्टि निर्दोष हो काव्य प्रकाशकर मम्मट के मतानुसार - 'तद्दोशौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृति पुनः क्वाप'४८
    अर्थात-
    दोषरहित शब्दार्थयुत, वह हर रचना काव्य.
    अलंकार हों या न हों, हो हर गुण संभाव्य.

    क्या अनिल जी की बात का आपके द्वारा उद्धरित यह श्लोक उत्तर है।

    उत्तर देंहटाएं
  11. आचार्य जी!
    साहित्य के प्रति आपकी अनुरक्तता देख कर मुझे यह आभास होने लगा हैं कि अन्तर्-जाल पर विद्वान व्यक्तियों की कोई कमी नही है।
    आपने समय लगा कर यह लेख परिश्रम
    के साथ लिखा है। आपकी साहित्य के प्रति
    निष्ठा को मैं प्रणाम करता हूँ।
    आशा है कि भविष्य में भी आपके इसी प्रकार के लेख अन्तर्-जाल पर प्रकाशित होंगे।
    बधाई स्वीकार करें।
    अन्तर्राष्ट्रीय मूर्ख दिवस पर
    आपको शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपका यह आलेख ज्ञान से भरपूर है |
    मुर्ख दिवस पर मेरे जैसे मुर्ख के लिए जरुरी भी :)

    धन्यवाद
    अवनीश

    उत्तर देंहटाएं
  13. आपका यह आलेख ज्ञान से भरपूर है |
    मूर्ख दिवस पर मेरे जैसे मूर्ख के लिए जरुरी भी :)

    धन्यवाद
    अवनीश

    उत्तर देंहटाएं
  14. द्रष्टिकोण की भिन्नता साहित्य को समृद्ध करती है. कुछ लोग एकत्र होकर असाहित्य को साहित्य कहें या सत्साहित्य की अनदेखी करें भी तो इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं. समयजयी साहित्य का मूल्याकन सम सामयिक समय नहीं कर पाता, जो समय के अवरोधों का जीवट से सामना कर जी जाए वही तो समयजयी होगा. आज जिन्हें हम समयजयी कहते हैं अपने समय में उन्हें भी उपेक्षा, अवमानना, अनादर, अभाव और अनदेखी का सामना करना पड़ा. सामयिक साहित्य में से क्या बचेगा? गत तीन दशकों में रचित साहित्य को लें... हम-आप उस में से क्या और कितना याद रख सकें है? अंतर्जाल ने साहित्य सृजन का परिमाण बढाया है तो गुणवत्ता कम होगी ही. साहित्यिक मठाधीशों को फतवे जारी करने की आदत सदा से है. गीत के मरने की घोषणा कर ताली पिट्वानेवाले मर गए पर गीत न केवल जिंदा है अपितु पूर्वापेक्षा अधिक समृद्ध हुआ है. हम 'पर' के सुधर से दृष्टि हटा कर 'स्व' के सुधार पर केन्द्रित करें यही अभीष्ट है. 'बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजों आपना मुझ सा बुरा न होय' को जीनेवाला ही तिमिर में दिया बनकर जल सकता है.

    उत्तर देंहटाएं

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