पासपोर्ट का रंग [कहानी/ स्वर प्रस्तुति] - तेजेन्द्र शर्मा

"मैं भगवान को हाज़िर नाज़िर जान कर कसम खाता हूँ कि ब्रिटेन की महारानी के प्रति निष्ठा रखूँगा।" अंग्रेज़ी में बोले गए ये शब्द एवं इनके बाद के सभी वाक्य पंडित गोपाल दास त्रिखा को जैसे किसी गहरे कुएँ में से आते प्रतीत हो रहे थे। वे हैरो के सिविक सेंटर में बीस पच्चीस गोरे, काले, भूरे रंग के अलग-अलग देश के और पीले रंग के चीनी लोगों के साथ ब्रिटेन की महारानी के प्रति वफ़ादारी की कसमें खा कर ब्रिटेन की नागरिकता ग्रहण कर रहे थे। अपने आपको धिक्कार भी रहे थे।

"पापा, आप भी कमाल करते हैं। अब भला इस वक्त आप पार्टीशन की बात ले कर बैठ जाएँगे तो लाइफ़ आगे कैसे बढ़ेगी? किया होगा अंग्रेज़ों ने जुल्म कभी हमारे देशवासियों पर। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हम जीवन को रोक कर बस, उसी पल को बार-बार जिए जाएँ।"

"बेटा तू नहीं समझ सकता। मेरे लिए ब्रिटेन की नागरिकता लेने से मर जाना कहीं बेहतर है। मैंने अपनी सारी जवानी इन गोरे साहबों से लड़ने में बिता दी। जेलों में रहा। मुझे तो फाँसी की सज़ा तक हो गई थी। लेकिन. . ."
"अब आप दोबारा अपनी रामायण लेकर शुरू मत हो जाइएगा।"

"बेटा तू मुझे वापस भारत भेज दे। मैं किसी तरह अपनी जिंद़गी बिता लूँगा वहाँ।

"बाउजी, किस दुनिया की बात कर रहे हैं। आपको यहाँ, इस देश में हमारे साथ रहना है। देखिए बाउजी, ब्रिटिश पासपोर्ट के लिए लोग दो-दो लाख रुपए देते हैं रिश्वत में, तब कहीं जाकर हासिल कर पाते हैं। आपको मुफ़्त में मिल रहा है तो आप इसकी कदर ही नहीं करते। ब्रिटिश पासपोर्ट हो तो आपको किसी भी देश का वीज़ा लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जब दिल किया, जहाँ जाना हो, बस, हवाई जहाज़ की टिकट लीजिए और घूम आइए वहाँ।"

"लेकिन बेटा जी, मुझे हिंदुस्तान के लिए, अपनी जन्मभूमि के लिए तो वीज़ा लेना पड़ेगा न। क्या इससे बड़ी कोई लानत हो सकती है मेरे लिए? बेटा, एक बात बताओ, क्या कोई ऐसा तरीक़ा नहीं हो सकता कि मैं हिंदुस्तान का नागरिक भी बना रहूँ और मुझे तुम अपनी खुशी के लिए ब्रिटेन की नागरिकता भी ले दो?"

सरोज ने भी इंद्रेश को बहुत समझाने का प्रयास किया था कि जब बाउजी को पसंद नहीं तो क्यों उनकी नागरिकता बदलवाई जाए। लेकिन इंद्रेश ने किसी की नहीं सुनी। ब्रिटेन की रानी के प्रति वफ़ादारी की कसम खाने के बाद गोपाल दास जी ने तीन दिन तक कुछ नहीं खाया, पेट में जैसे कसम का अफ़ारा उठ रहा था।

गोपालदास जी कभी अपने नए पासपोर्ट को देखते, तो कभी अपनी बाईं बाजू को। उनकी बाईं बाजू में एक गोली लग गई थी, उनकी हड्डी के साथ स्टील की रॉड लगा दी गई थी। इसलिए उनकी बाईं भुजा दाईं भुजा से कुछ इंच छोटी थी। और यह गोली उन्हें एक अंग्रेज़ सिपाही ने मारी थी, लाहौर में।

लाहौर से दिल्ली आना उनकी मजबूरी थी। अपनी जन्मभूमि को उस समय छोड़ना उन्हें बहुत परेशान कर रहा था। किंतु कोई चारा नहीं था। वहाँ किसी पर विश्वास नहीं बचा था। दोस्त दोस्त को मार रहे थे। हर आदमी या तो हिंदू बन गया था या फिर मुसलमान। रिश्ते जैसे ख़त्म ही हो गए थे। सभी इंसान धार्मिक हो गए थे और जानवर की तरह बरताव कर रहे थे।

मजबूरी तो इंग्लैंड आना भी थी। लेकिन यह मजबूरी बिछड़ने की नहीं, मिलने की थी, साथ रहने की थी। पत्नी की मृत्यु के बाद का अकेलापन, किसी अपने के साथ रहने की चाह और इकलौता पुत्र। यही सब गोपालदास जी को लंदन ले आया था। बेटी विवाह के बाद अमरीका में है और बेटा इंग्लैंड - बेचारे गोपालदास जी अकेले फरीदाबाद में अपनी बड़ी-सी कोठी में कमरे गिनते रहते। अधिकतर रिश्तेदार दिल्ली में। अब तो फरीदाबाद से दिल्ली जाने में भी शरीर नाराज़गी ज़ाहिर करने लगता था। ऐसे में ज़ाहिर-सी बात है कि इंद्रेश ने अपने पिता की एक नहीं सुनी और उन्हें लंदन ले आया था।

आज यही लंदन गोपालदास जी को जैसे और अधिक पराया लगने लगा था। आजकल वो विधि और अगस्त्य से भी कम बात करते थे। अगस्त्य छोटा है, बार-बार अपने दादा जी से चिपटता रहता है। विधि महसूस करती थी कि दादा जी परेशान हैं। अपनी मीठी-सी अंग्रेज़ी में पूछ लेती थी, "दादा जी, आप हर वक्त क्या सोचते रहते हैं?" दादा जी क्या जवाब दें। अपनी छोटी-सी नन्हीं परी को क्या और कैसे बताएँ अपने दिल का दर्द। बस स्टार न्यूज़ और ज़ी टीवी उनके साथी बन गए थे। बार-बार वही ख़बरें सुनते रहते। भारत के बारे में भारतवासियों से अधिक गोपाल दास जी को ख़बर रहती थी।

"मुझे सच बाउजी पर बहुत तरस आता है। सेम-सेम ख़बरें सुन कर बोर भी नहीं होते।" सरोज इंद्रेश को बता देती थी। बस यही बार-बार सुनने वाली उबाऊ ख़बरों में से ही एक दिन गोपालदास जी को एक ख़ास ख़बर सुनाई दे गई थी जिसने उनके जीवन को पूरी तरह से बदल कर रख दिया था। स्टार न्यूज़ ने समाचार दिया कि प्रवासी दिवस के दौरान प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया है कि पाँच देशों के भारतीय मूल के लोगों को दोहरी नागरिकता दी जाएगी।

"सरोज बेटा, तुमने सुना। आज तो प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया है कि हम दोहरी नागरिकता रख सकते हैं। उन्होंने साफ़-साफ़ कहा ही कि पाँच देशों के एन.आर.आई. बकायदा डयूल नेशनेलिटी रख सकते हैं। और उन पाँच देशों में इंग्लैंड भी शामिल है। बेटा तू जल्दी से इंद्रेश को फ़ोन मिला। उसको कह कि आफ़िस से निकलते हुए हाइ कमीशन से एक एप्लीकेशन फॉर्म लेता आवे। हम कल ही अप्लाई कर देंगे। अब मैं वापस इंडियन हो सकता हूँ।" बाउजी बस बोले जा रहे थे। सरोज एकटक उन्हें देखे जा रही थी। विधि और अगस्त्य भी मोटी-मोटी आँखों में अपने दादा जी को देखे जा रहे थे।

सरोज बाउजी के साथ लिविंग रूम तक चली गई। बाउजी के शरीर का रक्त प्रवाह तेज़ होता जा रहा था, "तू खुद ही सुन लै पुत्तर। अभी मेन न्यूज़ दोबारा आएगी।" जब तक मुख्य समाचार में सरोज ने सुन नहीं लिया कि बाउजी ने ठीक सुना है, तब तक वह बाउजी के चेहरे पर बदलते भाव पढ़ती रही। उसे इंद्रेश पर गुस्सा भी आ रहा था कि उसने बाउजी को फ़िज़ूल की मुसीबत में डाल दिया है। अगर बाउजी को वीज़ा लेने जाना होता था तो अपने आप ही जा कर ले आते थे। इसी बहाने अपने आप को बिज़ी भी रखते थे।

इंद्रेश शाम को घर आया। "पुत्तर तू फ़ारम लै आया?" बाउजी की आँखों में उम्मीद की नदी-सी बह रही थी।
"बाउजी, जब तक मेरा आफ़िस बंद होता है तब तक हाइ कमीशन के काउंटर बंद हो जाते हैं। मैं आज ही त्रिलोक शर्मा को फ़ोन करता हूँ। वो वहाँ के वीज़ा सेक्शन में है। उसे सही सिचुएशन मालूम होगी।"

बातचीत, टी.वी., टेलिफ़ोन या भोजन गोपालदास जी का मन किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था। बस एक ही इच्छा हो रही थी कि इंद्रेश किसी भी तरह त्रिलोक शर्मा से बात कर ले। उनकी आँखों में बस एक ही चाह थी - दोहरी नागरिकता। बैठे-बैठे सपना देख रहे थे।

इंद्रेश टेलिफ़ोन पर बात कर रहा था और भावों का सूचकांक बाउजी के चेहरे पर दिखाई दे रहा था।
"बाउजी, त्रिलोक कह रहा है कि अभी तो सिर्फ़ प्रधानमंत्री ने घोषणा की है, बस। अभी यह बिल बना कर पार्लियामेंट में पेश होगा, पास होगा, फिर उस पर राष्ट्रपति के दस्तख़त होंगे, फिर एक्ट बनेगा तब जा के लागू होगा फिर उसके फ़ार्म वगैरह बनेंगे तब कहीं जा कर आम आदमी तक पहुँचेगी दोहरी नागरिकता। फिलहाल तो यह बस प्रवासियों को खुश करने भर का ड्रामा लगता है।"

"यार ये कोई कांग्रेसी प्रधानमंत्री नहीं है। यह करेक्टर वाला बंदा है। आर.एस.एस. का आदमी है। झूठ नहीं बोल सकदा। त्रिलोके को कह किसी तरह दिल्ली से पता लगवाए।"

"बाउजी, पॉलीटीशन सभी एक से होते हैं। आज़ादी के बाद सभी का एक ही उद्देश्य बचा है। बस लूट लो जितना लूट सको। किसी को भी जनता की परवाह नहीं।"

गोपालदास जी को इस समय राजनीतिज्ञों के चरित्र पर बहस करने में कोई रुचि नहीं थी। रात भर परेशान रहे। बस बिस्तर पर करवटें बदलते रहे। सुबह उठे, दिनचर्या से निवृत्त हुए, नाश्ता किया, तैयार हुए और निकल पड़े। बेकरलू लाइन ले कर सीधे ऑक्सफर्ड सर्कस, वहीं से सेंट्रल लाइन ले कर होबर्न अंडरग्राउंड स्टेशन पहुँचे। होबर्न को वे हमेशा होलबोर्न ही कहते हैं। उसके स्पैलिंग ही ऐसे हैं। अंग्रेज़ी के साइलेंट लेटर हमेशा ही उनको परेशान करते हैं। होबर्न से बाहर निकल कर बाएँ को मुड़े और आहिस्ता-आहिस्ता चल दिए भारतीय उच्चायोग भवन की ओर। उनके लिए घर बैठे रह पाना संभव नहीं था। वे स्वयं पता करना चाहते थे कि प्रधानमंत्री ने क्या कहा है।

सामने बी.बी.सी. का बुश हाउस दिखाई दिया। आल्डविच इलाके में बस यही दो भवन हैं जिनसे गोपालदास जी को दिली लगाव है। एक तो बी.बी.सी. का बुश हाउस और दूसरा भारत भवन। बी.बी.सी. देख कर गोपालदास जी को वो सभी महान समाचार वाचक याद आ जाते थे जिनकी आवाज़ सुनने के लिए वे अपने रेडियो पर शार्ट वेव पर बी.बी.सी. सेट करते परेशान होते रहते थे। कभी भी बहुत साफ़ नहीं आता था लेकिन बात साफ़ करता था। ठीक उसी ही तरह गोपालदास जी भी बात साफ़ और खरी करते हैं चाहे सामने वाले को पसंद आए या न आए।

भारत भवन के बाहर हमेशा की तरह भीड़ लगी हुई थी। बाहर की खिड़की वाले से नमस्कार करते हुए एक टोकन ले कर हाल के अंदर जा पहुँचे। पहले दिल किया कि त्रिलोक शर्मा को फ़ोन कर लेते। फिर ख़याल आया कि इंद्रेश नाराज़ हो जाएगा। बस सीधे पूछताछ वाले काउंटर पर जा पहुँचे। और उससे सीधे-सीधे दोहरी नागरिकता का फ़ार्म माँग लिया। सामने एक युवा-सी लड़की बैठी थी। बात अंग्रेज़ी में करती थी या फिर अंग्रेज़ीनुमा हिंदी में। "सॉरी, हमारे पास ऐसा कोई फ़ार्म नहीं है। कहीं आप पी.आई.ओ. फ़ार्म की बात तो नहीं कर रहे?"

"जी नहीं, कल ही प्रधानमंत्री ने प्रवासी दिवस समारोह में ऐलान कीता है कि अब इंग्लैंड के हिंदुस्तानी दोनों देशों की नागरिकता रख सकते हैं। मैं उसकी बात कर रहा हूँ।

वह लड़की गड़बड़ा गई, 'एक्सक्यूज़ मी' कह कर अपने अफ़सर को बुलाने चली गई। उसका अफ़सर भारतीय था। सरदार दिलीप सिंह, "देखिए त्रिखा साहब, पालिटिकल स्टेटमेंट और सरकारी कार्यवाही में बहुत फ़र्क होता है। दिल्ली में प्रधानमंत्री ने एक पॉलिसी स्टेटमेंट दी है, बस। अब उस पर काम शुरू होते-होते कोई छ: सात महीने तो लग ही जाएँगे। हमारे स्टाफ़ तक तो अभी यह ख़बर भी नहीं पहुँची कि प्रधानमंत्री ने ऐसी कोई स्टेटमेंट भी दी है।" दिलीप सिंह ने भी वही बात दोहरा दी जो त्रिलोक शर्मा ने कही थी।

निराश से गोपालदास जी भारी कदमों से बाहर आ गए। भारत भवन से होबर्न तक का जो रास्ता आते समय पाँच-सात मिनट में तय हो गया था वही अब बीस मिनट से अधिक ले चुका था। होबर्न स्टेशन अचानक इतनी दूर कहाँ चला गया?

गोपालदास जी वापस हैरो एँड वील्डस्टोन स्टेशन से सीधे घर न जा कर लायब्रेरी की तरफ़ चल दिए। वहाँ मधोक साहब और बधवार जी मिल गए। "भाई लोगों, आपने डयूएल नेशनेलिटी वाली ख़बर पढ़ी है क्या?"

ख़बर दोनों ने पढ़ ली थी। मधोक साहब का अपना ही अंदाज़ था, "त्रिखा जी, मैंने तो अभी तीन महीने पहले ही पाँच साल के वीज़े पर सौ पाउंड खरचे हैं। मुझे तो कोई जल्दी पड़ी नहीं है दोहरी नागरिकता की। जब लागू होगी तब देखा जाएगा। अभी से क्यों दिमाग़ ख़राब करूँ। फिर अपना अभी वहाँ कोई प्रापर्टी वगैरह ख़रीदने का भी कोई प्रोग्राम है नहीं।"

बधवार साहब त्रिखा जी की मानसिकता से परिचित थे, "मैं समझता हूँ त्रिखा जी कि आपके लिए दोहरी नागरिकता के अर्थ कुछ और ही हैं। लेकिन आप तो जानते ही हैं कि अपनी भारतीय सरकार हर काम में कितना टाइम लेती है। पचास साल में हिंदी को भारत की राजभाषा नहीं बना पाईं। कहीं यह दोहरी नागरिकता वाला मामला भी पचास साला योजना न हो।"
"मेरे हिसाब से तो यह बस प्रवासियों को खुश करने की एक भोंडी कोशिश से ज़्यादा कुछ भी नहीं है।" यह दवे साहब थे। जो पास ही बैठे तीनों की बातें सुन रहे थे।

दुखी मन लिए गोपालदास जी घर वापस आ गए। सोच थी कि पीछा नहीं छोड़ रही थी। एक, दो, तीन, चार, आठ महीने बीत चुके थे लेकिन दोहरी नागरिकता अभी तक देहरी लाँघ कर त्रिखा जी के घर नहीं पहुँच पाई थी। बीतते-बीतते क़रीब एक वर्ष ही बीत गया। दूसरा प्रवासी दिवस भी आ पहुँचा। पुत्र से बात करके भारत जाने का कार्यक्रम जनवरी महीने का ही बनवा लिया। सोचते थे कि जब प्रवासी दिवस मनाया जा रहा होगा उसी समय शायद कुछ नई बात निकल आए और उनकी बात बन जाए।

गोपालदास जी पहली बार भारत के लिए वीज़ा लेने जा रहे थे। बहुत शर्म आ रही थी। सुबह नाश्ते के समय इंद्रेश की ओर देखा, "पुत्तर जी, क्या तुम त्रिलोक को कह कर मेरे लिए वीज़ा नहीं लगवा सकते। भारत के लिए विज़ा अप्लाई करने में बहुत अजीब-सा लग रहा है।"

इंद्रेश ने सरोज को कह दिया कि इंटरनेट से आज फार्म डाउनलोड करके बाउजी से भरवा ले।
" पुत्तर वीज़ा सिर्फ़ सिंगल ऐंट्री ही अप्लाई करना है। दूसरे ट्रिप तक तो दोहरी नागरिकता लागू हो ही जाएगी।"
इंद्रेश मुस्करा भर दिया, "बाउजी आप भी बस।"

भारत में बाउजी ने सोचा कि प्रवासी दिवस में शामिल हो आएँ। लेकिन उनका मन नहीं मान रहा था कि दो सौ डॉलर की फ़ीस दे कर अपने देश में प्रवासी दिवस में शामिल हों। फिर वे रिपोर्ट पढ़ते रहे कि सारा का सारा प्रवासी दिवस अंग्रेज़ी में मनाया जा रहा है। हिंदी बेचारी वहीं खड़ी है जहाँ बधवार जी बता रहे थे।

प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन पर एलान किया कि दोहरी नागरिकता अब सोलह देशों के भारतीयों को दी जा सकेगी। बाउजी सोच रहे थे कि जब सोलह देशों की बात की जा रही है तो जिनके लिए पहले वर्ष में घोषणा की जा चुकी है, उनको तो अवश्य ही इस वर्ष मिल जाएगी। उन्होंने प्रधानमंत्री से मिलने के बहुत प्रयास किए। लेकिन जनता के प्रतिनिधियों को रू-ब-रू मिल पाना क्या इतना आसान होता है।

गोपालदास जी विदेश मंत्रालय के दफ़्तर के भी चक्कर लगाते रहे। श्रीवास्तव जी और स्वरूप सिंह से मुलाक़ात की। मुस्कुराहटें तो मिलीं, दोहरी नागरिकता बस दूर खड़ी थी दूर ही रही। और गोपालदास जी वापस अपने देश आ गए। अपने देश यानी लंदन। अब वो इसी देश के नागरिक थे।

वे वापस आए और भारत में सरकार बदल गई। वही कांग्रेस वापस जिससे गोपालदास जी को शिकायत रहती थी। एक तो यह मीडिया भी गोपालदास जी को आराम से नहीं जीने देता। कभी भी कुछ भी छापता रहता है। इंटरनेट से सरोज ही एक ख़बर निकाल कर लाई थी कि कांग्रेस सरकार ने एक प्रवासी मंत्रालय बना दिया है। गोपालदास जी को विश्वास हो चला था कि जब सरकार ने मंत्रालय तक बना डाला है तो दोहरी नागरिकता ज़्यादा दूर नहीं हो सकती। उनका उत्साह दोगुना बढ़ गया था। लेकिन उनके मित्र अब उनसे दूर ही भागते थे।

"लो वो बोर फिर आ गया। अब सारा टाइम दोहरी नागरिकता की भेंट चढ़ जाएगा।"
"यार इस आदमी को और कोई काम है या नहीं, बस सारा वक्त यही सोचता रहता है। पागल हो जाएगा कुछ दिनों में।"
"ये हो जाएगा क्या होता है जी। हो चुका है। इस तरह की बातें पागल ही कर सकते हैं।"

बस एक बधवार जी थे जो गोपालदास जी की मनोदशा को समझ पा रहे थे। वही उनसे बात भी करते थे और अपनी राय भी देते रहते थे, "गोपालदास जी, आज अख़बार में ख़बर आई है कि प्रवासी मंत्री ने आस्ट्रेलिया में दोहरी नागरिकता देने के फ़ार्म अपने हाथों से बाँट कर दोहरी नागरिकता की शुरुआत कर दी है। यह देखिए, अख़बार आपके सामने हैं।"

गोपालदास जी ने अख़बार देखा, समाचार देखा और अख़बार वहीं रख दिया। और घर की ओर चल पड़े। उनके साथी हैरान कि इतनी बड़ी ख़बर और गोपालदास जी बिना कोई टिप्पणी किए चल दिए।

गोपालदास जी पहले सीधे भारतीय कार्नर शॉप की तरफ़ गए। वहाँ जा कर अख़बार ख़रीदा और उछलते मन को उस अख़बार का सहारा देते हुए घर की ओर चल दिए। अपने कमरे में जा कर पूरा समाचार ठीक से पढ़ा। उम्मीद जागी कि अब अशोक के शेर वाला मेरा नीला पासपोर्ट एक बार फिर से जीवित हो उठेगा। केवल पासपोर्ट का रंग नीले से लाल होने पर इंसान के भीतर कितनी जद्दोजहद शुरू हो जाती है। आज उन्होंने घर में किसी से बात नहीं की। रात भर करवटें बदलते रहे। सुबह होने का इंतज़ार, बस यही कर सकते थे, करते रहे। सुबह का नाश्ता करने के बाद एक बार फिर भारतीय उच्चायोग के दरवाज़े पर खड़े थे।

अंदर का दृश्य ठीक वैसा ही था जैसा कि पिछली बार। अबकी बार उन्होंने फ़ार्म माँगने की जगह अपना अख़बार काउंटर क्लर्क के सामने रख दिया। काउंटर पर बैठी महिला परेशान-सी हो उठी। पिछली मुलाक़ात उसे याद आ गई। लेकिन आज गोपालदास जी का गुस्सा बहुत उग्र होता जा रहा था, "आप समझती क्या हैं अपने आपको। यहाँ आपका ही मंत्री आस्ट्रेलिया में जा कर फ़ार्म बाँट रहा है, उसकी फ़ोटो तक छपी है और आप कहती हैं कि आपके पास अबतक फ़ार्म नहीं आए हैं। बुलाइए अपने अफ़सर को, कराइए मेरी बात। यह भला कोई तरीक़ा हुआ कि दो साल तक प्रधानमंत्री कहते रहे कि दोहरी नागरिकता दी जाएगी। अब प्रवासी मंत्री फ़ार्म बाँटता साफ़ दिखाई दे रहा है और आप कहती हैं कि आपने दिल्ली से क्लैरिफ़िकेशन माँगा है। आप लोग काम करना ही नहीं चाहते। ज़रूर आप लोग कोई नया अलाउंस माँग रहे होंगे। यह ब्यूरोक्रेसी की वजह से कभी कोई काम हो ही नहीं सकता। हमारी दोहरी नागरिकता के रास्ते के सबसे बड़े रोड़े आप लोग ही हैं।"

झगड़े की आवाज़ सुन कर त्रिलोक शर्मा भी बाहर आ गए। गोपालदास जी को देख कर वे हैरान भी हुए। काउंटरों के ज़रिए ही बाहर चले आए और गोपालदास जी को सुरक्षा कर्मियों के धकियाने से बचा लिया। समझाते हुए घर जाने को कहा, "आप चिंता न करें बाउजी, मैं खुद ही इंद्रेश से बात कर लूँगा।"

गोपालदास जी हाइ कमीशन की इमारत से बाहर आ गए। अपने आप को बहुत पराया-सा महसूस कर रहे थे। उनके कदम उन्हें बिना बताए ही वाटरलू पुल की तरफ़ ले गए। नीचे टेम्स का पानी अपनी रफ़्तार से बहता जा रहा था। हाइ टाइड थी इसलिए पानी भी काफ़ी था। सूर्य सिर पर चमक रहा था और हवा तेज़ चल रही थी। गोपालदास जी की आँखों में से पानी बहने लगा। वे तय नहीं कर पा रहे थे कि यह पानी नमकीन है बस पानी है। मन में एक पल के लिए आया कि इस पुल से नीचे छलांग लगा कर इस टंटे को ख़तम ही कर दें।

वाटरलू स्टेशन से ही बेकरलू ट्यूब ले ली। घर पहुँचे। सरोज को देख कर सकपका गए। कहीं त्रिलोक ने फ़ोन न कर दिया हो। सरोज ने बिना कुछ पूछे चाय बना कर आगे रख दी। बिस्किट के साथ चाय पी। अपने कमरे में चले गए। इंद्रेश शाम को घर लौटा, "सरोज, बाउजी की तबीयत शायद ज़्यादा बिगड़ती जा रही है। आज हाइ कमीशन में जा कर नाटक कर आए हैं। त्रिलोक का फ़ोन आया था मुझे।"

"क्यों, ऐसा क्या कर आए?" सरोज परेशान हो उठी, "देखिए आज कुछ कहिएगा मत। हाइ कमीशन से बहुत परेशान लौटे हैं। मुझे तो पता नहीं था कि वहाँ गए थे। लेकिन चेहरा देख कर मुझे लगा कि बहुत निराश दिखाई दे रहे हैं। आप कल समझा दीजिएगा। डिनर टेबल पर कुछ मत कहिएगा।"

विधि बाउजी को बुलाने गई तो कमरे में अँधेरा था। टेलिविजन पर स्टार न्यूज़ चल रही थी। उसने आवाज़ दी लेकिन उसकी पतली-सी आवाज़ टी.वी. की आवाज़ में दब गई। उसने बत्ती जलाई। देखा कि बाउजी एकटक छत को देखे जा रहे थे।

वह घबरा कर बाहर आ गई और ममी पापा को बताया। इंद्रेश और सरोज दोनों एक साथ कमरे में आए। बाउजी को आवाज़ दी। गोपालदास जी एकटक छत को देखे जा रहे थे। उनके दाएँ हाथ में लाल रंग की ब्रिटिश पासपोर्ट था और बाएँ हाथ में नीले रंग का भारतीय पासपोर्ट। उन्होंने ऐसे देश की नागरिकता ले ली थी जहाँ के लिए इन पासपोर्टों की ज़रूरत नहीं थी।

स्टार न्यूज पर नए प्रधानमंत्री घोषणा कर रहे थे कि अब विदेश में बसे सभी भारतीयों को दोहरी नागरिकता प्रदान की जाएगी।


इस कहानी को आप सस्वर सुनने के लिये नीचे प्लेयर पर चटखा लगायें




Tags: , , ,

12 Responses to “पासपोर्ट का रंग [कहानी/ स्वर प्रस्तुति] - तेजेन्द्र शर्मा”

निधि अग्रवाल ने कहा…
9 अप्रैल 2009 को 7:22 am

तेजेन्द्र शर्मा आज के समय के प्रमुख कहानीकार क्यों है यह इस कहानी को पढ कर जाहिर हो जाता है।


अनिल कुमार ने कहा…
9 अप्रैल 2009 को 9:08 am

गोपाल जी की मनोदशा को सफलता से उकेरा गया है। आजादी आन्दोलन से जुडे बुजुर्ग बदलती पीढी के संस्कारों के साथ अपनी मनोदशा को जुडा नहीं पाते इसी से सारी दिक्कते हैं।


अनन्या ने कहा…
9 अप्रैल 2009 को 9:58 am

मर्मस्पर्शी।


दिव्यांशु शर्मा ने कहा…
9 अप्रैल 2009 को 11:31 am इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

दिव्यांशु शर्मा ने कहा…
9 अप्रैल 2009 को 11:49 am

एक उम्दा कहानी .. कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है वैसे वैसे पाठक के मन में दो भाव, समानान्तर रेखाओं की तरह चलने लगते हैं | ये दो भाव हैं गोपाल दास का दोहरी नागरिकता के लिए उत्सुकता के प्रति सहानुभूति और उस के कुछ बहुत सहज सी बातों (जो कि एक पीढी के लिए बिलकुल सहज नहीं हैं ) को ना समझ पाने के प्रति एक झुंझलाहट | और यही , इन दोनों भावों का उत्पन्न हो जाना , इस कहानी की शक्ति है |
"होबर्न को वे हमेशा होलबोर्न ही कहते हैं। उसके स्पैलिंग ही ऐसे हैं। अंग्रेज़ी के साइलेंट लेटर हमेशा ही उनको परेशान करते हैं।" काफी प्रभावी लाइन है | गोपाल दास के नए परिवेश को ना समझ पाना और उस के आगे घुटने भी ना टेकने की जिद दोनों साथ दृष्टिगोचर होती हैं जो कि कहानी की आत्मा भी है | गोपाल दास अंत तक घुटने नहीं टेकता है |
कहानी का अंत थोडा predictable था पर उस के सिवाय कुछ हो भी नहीं सकता था | बेहतरीन रचना के लिए शुक्रिया |


दृष्टिकोण ने कहा…
9 अप्रैल 2009 को 12:24 pm

दिव्यांशु की कहानी के अंत को ले कर कही गयी बात सही है और यही बेहतरीन अंत भी है। कहानी रोचक है और झकझोरने वाली भी।


राजीव तनेजा ने कहा…
9 अप्रैल 2009 को 2:26 pm

पहली बार हिन्द युग्म के कहानी पाठ कार्यक्रम में तेजेन्द्र जी की ज़बानी इस कहानी को सुना..आज फिर इसी कहानी को फिर से सुना....इसमें ऐसा कुछ है कि इसे बार-बार सुना और पढा जा सकता है।


विश्व दीपक ’तन्हा’ ने कहा…
9 अप्रैल 2009 को 5:47 pm

हर आदमी या तो हिंदू बन गया था या फिर मुसलमान। रिश्ते जैसे ख़त्म ही हो गए थे। सभी इंसान धार्मिक हो गए थे और जानवर की तरह बरताव कर रहे थे।

पचास साल में हिंदी को भारत की राजभाषा नहीं बना पाईं। कहीं यह दोहरी नागरिकता वाला मामला भी पचास साला योजना न हो।

केवल पासपोर्ट का रंग नीले से लाल होने पर इंसान के भीतर कितनी जद्दोजहद शुरू हो जाती है।

उन्होंने ऐसे देश की नागरिकता ले ली थी जहाँ के लिए इन पासपोर्टों की ज़रूरत नहीं थी।

उपरोक्त पंक्तियों से कहानीकार के सामर्थ्य का पता लगता है। निस्संदे हीं तेजेन्द्र शर्मा जी की लेखनी में वह बात है, जो औरों से उन्हें अलग करती है।
कहानी एक साँस में पढ गया और कहीं भी उबाऊपन या दोहराव महसूस नहीं हुआ। इस विषय पर पहले कुछ पढा नहीं था, इसलिए अनुभव नया था। सच कहूँ तो,ऎसी कहानियों को पढकर हीं कुछ लिखने का उत्साह होता है।

-विश्व दीपक


rachana ने कहा…
9 अप्रैल 2009 को 6:48 pm

aap ne kahani ko jis tarah se padha hai sach maniye aankho me aansu aagaye .jitna sundar likha hai utna hi achchha padha bhi hai

saader
rachana


नंदन ने कहा…
10 अप्रैल 2009 को 8:01 am

यह कहानी मन पर प्रभाव छोडने में सक्षम है।


श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ ने कहा…
10 अप्रैल 2009 को 12:59 pm

तेजेन्द्र शर्मा जी की कहानी पा्सपोर्ट का रंग मात्र प्रवासी भारतीयों के अंतर्द्वंद का सजीव द्स्तावेज नहीं है अपितु सुदूर विदेश में बसे अपने लोगों के प्रति स्वदेश की राजनीतिक उपेक्षा और शोषण का चित्रण भी है. मर्मस्पर्शी कहानी - प्रस्तुति के लिये आभार


मोहिन्दर कुमार ने कहा…
10 अप्रैल 2009 को 8:27 pm

विदेशी धरती पर अपने देश के लिये तडफ़ते मन की दास्तां को सुन्दर शब्दों में ढाल कर बनाई गई मर्म स्पर्शी कहानी..


एक टिप्पणी भेजें

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~~~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...
Blogger द्वारा संचालित!
Designed by SpicyTricks and Modified for SahityaShilpi.com by Ajay Yadav