परिंदे [सुभाष नीरव का कविता-पाठ] - स्वर शिल्पी

सुभाष जी की इस खूबसूरत रचना "परिंदा" के बोल हैं:
परिंदे मनुष्य नहीं होते
धरती और आकाश
दोनों से रिश्ता रखते हैं परिंदे
उनकी उड़ान में है अनन्त व्योम
धरती का कोई टुकड़ा
वर्जित नहीं होता
परिंदों के लिये।
| SubhashNeerav1.mp3 |
घर-आँगन, गाँव-बस्ती, शहर
किसी में भी भेद नहीं करते परिंदे
जाति, धर्म, नस्ल, संप्रदाय से
बहुत ऊपर होते हैं ये परिंदे।
मस्ज़िद में, मंदिर में
चर्च में और गुरुद्वारों में
वे कोई फर्क नहीं करते
जब चाहे बैठ जाते हैं उड़ कर
उनकी ऊँची बुर्जियों पर
बेख़ौफ़।
रचनाकार परिचय:-"साहित्य सृजन" तथा अन्य कई ब्लाग्स के माध्यम से अंतर्जाल पर भी वे सक्रिय हैं।
कर्फ़्यूग्रस्त शहर की
खौफ़ज़दा, वीरान और सुनसान
सड़कों, गलियों में विचरने से भी
नहीं घबराते परिंदे।
प्रांत, देश की हदों,
सरहदों से भी परे होते हैं
आकाश में उड़ते परिंदे।
इन्हें पार करते हुये
नहीं चाहिये होती उन्हें कोई अनुमति
नहीं चा्हिये होता कोई पासपोर्ट, वीजा
शुक्र है!
परिंदों ने नहीं सीखा
मनुष्य की तरह रहना
ज़मीन पर।
इस समारोह में पढ़ी गई कुछ अन्य रचनायें भी हम आगे इसी स्तंभ में प्रस्तुत करेंगे।




21 comments:
Nice Poem. Thanks.
Alok Kataria
अच्छा लगा आवाज में
दोबारा सुनना
सुना पहले भी है
पर इससे बार बार
सुन सकते हैं
चाहे जितनी बार
और सुनवा भी सकते हैं सबको
अच्छा लगा यह कर्म
कविता पढ़ना ही है
कवि का धर्म।
शुक्र है!
परिंदों ने नहीं सीखा
मनुष्य की तरह रहना
ज़मीन पर।
नीरव जी की यह प्रभावी कविता है। स्वर शिल्पी के माध्यम से इसका प्रस्तुतिकरण अच्छा लगा।
बहुत अच्छी प्रस्तुति है, बधाई।
शुक्र है!
परिंदों ने नहीं सीखा
मनुष्य की तरह रहना
ज़मीन पर।
" इंसानियत के मर्म को मुखर करती भावनात्मक कविता"
regards
नीरव जी की यह कविता पहले भी पढी है लेकिन सुनने का अलग आनंद है।
कर्फ़्यूग्रस्त शहर की
खौफ़ज़दा, वीरान और सुनसान
सड़कों, गलियों में विचरने से भी
नहीं घबराते परिंदे।
प्रांत, देश की हदों,
सरहदों से भी परे होते हैं
आकाश में उड़ते परिंदे।
काश आदमी ही परिंदा हो जाता।
Subhash bhai
For technical reasons I could not listen to your voice, but I have already read this poem. Jis tarha kuchh behtareen filmi geet insaan kabhi bhee gunguna sakta hai, theek usee tarha aap kee ye kavita har bar sunney par ek naya arth deti hai. Badhai.
Tejendra Sharma
Katha UK (London)
परिंदों के माध्यम से कितनी सहज बात...........लाजवाब बात कह दी है नीरव जी ने.......
सार्थक-सशक्त रचना।
परिन्दों को उपमान बना कर लिखी गई सुन्दर कविता
आदरणीय सुभाष जी, आपकी रचना और आपका प्रस्तुतिकरण प्रभावी होता है। आपकी साहित्य साधना स्तुत्य है।
गाज़ियाबाद के बाद अब यहाँ पर फिर से सुनना अच्छा लगा
सुभाष जी की कविता परिंदा सुनी भी और पढ़ी भी- लाजवाब .अद्भुत, सशक्त अभिव्यक्ति- परिंदों के माध्यम से गहरा सन्देश देती भावनात्मक कविता. अभिनन्दन!
सुधा
सुभाष नीरव की ’परिन्दे’ एक अद्भुत कविता है. परिन्दे के माध्यम में कवि ने जो भाव प्रस्तुत किए हैं और जिस खूबसूरती से उसे कहा वह मौलिक और श्लाघनीय है. हिन्दी के समकालीन कविता में ’परिन्दे’ का स्थान सुरक्षित रहेगा ऎसा मेरा मानना है. कवि और साहित्य शिल्पी को इसके लिए बधाई.
रूपसिंह चन्देल
bahut hi sunder likha hai .sach hai kash hum ne kuchh sikha hota
saader
rachana
दोनों से रिश्ता रखते हैं परिंदे
उनकी उड़न में है अनंत व्योम. - छेकानुप्रास
धरती का कोई टुकडा
वर्जित नहीं होता - छेकानुप्रास
मन्दिर में, मस्जिद में
चर्च में और गुरुद्वारों में -व्रंत्यानुप्रास
कविता जितनी पढ़ने में सुंदर है, उतनी ही सुनने में भी अच्छी लगी । बहुत बहुत बधाई ।
kya baat hai subhash ji , waah waah sun kar maza aa gaya ..ji dil khush ho gaya ...
aapko aur sahitya shilpi ko badhai ..
विजय
http://poemsofvijay.blogspot.com
सुभाष जी को प्रत्यक्ष सुनने के बाद इस रचना का दूसरी बार सुनना अच्छा लगा.
Meri kavita "Parinde" par tippni karne ya apni bahumulya rai dene wale sabhi mitroN ka main shukrguzar hun. Isse zahir hota hain ki kavita meiN main jo kahna chahta tha, vo bhali bhanti sampreshit ho gaya hai. Shahitya Shilpi ka bhi aabhari hun ki unhone "swar shilpi" ke antargat meri kavita prakashan kiya aur audio bhi sunne ki liye prastut kiya.
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