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गुरुवार, २३ अप्रैल २००९

परिंदे [सुभाष नीरव का कविता-पाठ] - स्वर शिल्पी

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पिछले सप्ताह स्वर शिल्पी पर हमने साहित्य शिल्पी द्वारा गाज़ियाबाद में आयोजित करवाये गये कवि-सम्मेलन में सम्मिलित मशहूर शायर ज़नाब मासूम ग़ाज़ियाबादी साहब की एक गज़ल आपको सुनवाई थी। इसी क्रम को ज़ारी रखते हुये आइये आज सुनते हैं कवि सुभाष नीरव को।

सुभाष जी की इस खूबसूरत रचना "परिंदा" के बोल हैं:

परिंदे मनुष्य नहीं होते
धरती और आकाश
दोनों से रिश्ता रखते हैं परिंदे
उनकी उड़ान में है अनन्त व्योम
धरती का कोई टुकड़ा
वर्जित नहीं होता
परिंदों के लिये।
SubhashNeerav1.mp3

घर-आँगन, गाँव-बस्ती, शहर
किसी में भी भेद नहीं करते परिंदे
जाति, धर्म, नस्ल, संप्रदाय से
बहुत ऊपर होते हैं ये परिंदे।
मस्ज़िद में, मंदिर में
चर्च में और गुरुद्वारों में
वे कोई फर्क नहीं करते
जब चाहे बैठ जाते हैं उड़ कर
उनकी ऊँची बुर्जियों पर
बेख़ौफ़।

रचनाकार परिचय:-

 का जन्म 27-12-1953 को मुरादनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। मेरठ विश्वविद्यालय से स्नातक तथा भारत सरकार के पोत परिवहन मंत्रालय में अनुभाग अधिकारी(प्रशासन) के तौर पर कार्यरत सुभाष नीरव की कई कृतियाँ यथा ‘यत्कचित’, ‘रोशनी की लकीर’ (कविता संग्रह); ‘दैत्य तथा अन्य कहानियाँ’, ‘औरत होने का गुनाह’, ‘आखिरी पड़ाव का दु:ख’(कहानी-संग्रह); ‘कथाबिंदु’(लघुकथा-संग्रह), ‘मेहनत की रोटी’(बाल कहानी-संग्रह) आदि प्रकाशित हैं। लगभग 12 पुस्तकों का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद भी वे कर चुके हैं और अनियतकालीन पत्रिका ‘प्रयास’ और मासिक ‘मचान’ का सम्पादन भी कर रहे हैं।

हिन्दी में लघुकथा लेखन के साथ-साथ पंजाबी-हिन्दी लघुकथाओं के श्रेष्ठ अनुवाद के लिए उन्हें ‘माता शरबती देवी स्मृति पुरस्कार, 1992’ तथा "मंच पुरस्कार, 2000" से सम्मानित किया गया जा चुका है।

"साहित्य सृजन" तथा अन्य कई ब्लाग्स के माध्यम से अंतर्जाल पर भी वे सक्रिय हैं।



कर्फ़्यूग्रस्त शहर की
खौफ़ज़दा, वीरान और सुनसान
सड़कों, गलियों में विचरने से भी
नहीं घबराते परिंदे।
प्रांत, देश की हदों,
सरहदों से भी परे होते हैं
आकाश में उड़ते परिंदे।
इन्हें पार करते हुये
नहीं चाहिये होती उन्हें कोई अनुमति
नहीं चा्हिये होता कोई पासपोर्ट, वीजा
शुक्र है!
परिंदों ने नहीं सीखा
मनुष्य की तरह रहना
ज़मीन पर।



इस समारोह में पढ़ी गई कुछ अन्य रचनायें भी हम आगे इसी स्तंभ में प्रस्तुत करेंगे।

21 comments:

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

Nice Poem. Thanks.

Alok Kataria

अविनाश वाचस्पति २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

अच्‍छा लगा आवाज में

दोबारा सुनना

सुना पहले भी है

पर इससे बार बार
सुन सकते हैं

चाहे जितनी बार

और सुनवा भी सकते हैं सबको

अच्‍छा लगा यह कर्म

कविता पढ़ना ही है
कवि का धर्म।

नंदन २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

शुक्र है!
परिंदों ने नहीं सीखा
मनुष्य की तरह रहना
ज़मीन पर।

नीरव जी की यह प्रभावी कविता है। स्वर शिल्पी के माध्यम से इसका प्रस्तुतिकरण अच्छा लगा।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति है, बधाई।

seema gupta २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

शुक्र है!
परिंदों ने नहीं सीखा
मनुष्य की तरह रहना
ज़मीन पर।
" इंसानियत के मर्म को मुखर करती भावनात्मक कविता"

regards

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

नीरव जी की यह कविता पहले भी पढी है लेकिन सुनने का अलग आनंद है।

nitesh २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

कर्फ़्यूग्रस्त शहर की
खौफ़ज़दा, वीरान और सुनसान
सड़कों, गलियों में विचरने से भी
नहीं घबराते परिंदे।
प्रांत, देश की हदों,
सरहदों से भी परे होते हैं
आकाश में उड़ते परिंदे।

काश आदमी ही परिंदा हो जाता।

तेजेन्द्र शर्मा २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

Subhash bhai

For technical reasons I could not listen to your voice, but I have already read this poem. Jis tarha kuchh behtareen filmi geet insaan kabhi bhee gunguna sakta hai, theek usee tarha aap kee ye kavita har bar sunney par ek naya arth deti hai. Badhai.

Tejendra Sharma
Katha UK (London)

दिगम्बर नासवा २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

परिंदों के माध्यम से कितनी सहज बात...........लाजवाब बात कह दी है नीरव जी ने.......

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

सार्थक-सशक्त रचना।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

परिन्दों को उपमान बना कर लिखी गई सुन्दर कविता

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

आदरणीय सुभाष जी, आपकी रचना और आपका प्रस्तुतिकरण प्रभावी होता है। आपकी साहित्य साधना स्तुत्य है।

राजीव तनेजा २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

गाज़ियाबाद के बाद अब यहाँ पर फिर से सुनना अच्छा लगा

Dr. Sudha Om Dhingra २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

सुभाष जी की कविता परिंदा सुनी भी और पढ़ी भी- लाजवाब .अद्भुत, सशक्त अभिव्यक्ति- परिंदों के माध्यम से गहरा सन्देश देती भावनात्मक कविता. अभिनन्दन!
सुधा

रूपसिंह चन्देल २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

सुभाष नीरव की ’परिन्दे’ एक अद्भुत कविता है. परिन्दे के माध्यम में कवि ने जो भाव प्रस्तुत किए हैं और जिस खूबसूरती से उसे कहा वह मौलिक और श्लाघनीय है. हिन्दी के समकालीन कविता में ’परिन्दे’ का स्थान सुरक्षित रहेगा ऎसा मेरा मानना है. कवि और साहित्य शिल्पी को इसके लिए बधाई.

रूपसिंह चन्देल

rachana २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

bahut hi sunder likha hai .sach hai kash hum ne kuchh sikha hota
saader
rachana

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

दोनों से रिश्ता रखते हैं परिंदे
उनकी उड़न में है अनंत व्योम. - छेकानुप्रास
धरती का कोई टुकडा
वर्जित नहीं होता - छेकानुप्रास

मन्दिर में, मस्जिद में
चर्च में और गुरुद्वारों में -व्रंत्यानुप्रास

मुकेश पोपली २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

कविता जितनी पढ़ने में सुंदर है, उतनी ही सुनने में भी अच्‍छी लगी । बहुत बहुत बधाई ।

Vijay Kumar Sappatti २३ नवम्बर २००९ ७:०५ PM  

kya baat hai subhash ji , waah waah sun kar maza aa gaya ..ji dil khush ho gaya ...


aapko aur sahitya shilpi ko badhai ..

विजय
http://poemsofvijay.blogspot.com

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ २३ नवम्बर २००९ ७:०६ PM  

सुभाष जी को प्रत्यक्ष सुनने के बाद इस रचना का दूसरी बार सुनना अच्छा लगा.

सुभाष नीरव २३ नवम्बर २००९ ७:०६ PM  

Meri kavita "Parinde" par tippni karne ya apni bahumulya rai dene wale sabhi mitroN ka main shukrguzar hun. Isse zahir hota hain ki kavita meiN main jo kahna chahta tha, vo bhali bhanti sampreshit ho gaya hai. Shahitya Shilpi ka bhi aabhari hun ki unhone "swar shilpi" ke antargat meri kavita prakashan kiya aur audio bhi sunne ki liye prastut kiya.

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