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शनिवार, ११ अप्रैल २००९

विष्णु प्रभाकर को विनम्र श्रद्धांजलि [आलेख] - दिव्यांशु शर्मा

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आठ दशकों तक हिंदी साहित्य के आकाश में चमकने वाले श्री विष्णु प्रभाकर हमारे बीच नहीं रहे| आज उनके देहान्त के बाद उनकी इच्छानुसार उनका शरीर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को दान कर दिया गया। "आवारा मसीहा" में शरत चन्द्र जैसे जटिल-चरित्र कहानीकार की जीवनी को सब के सामने लाने वाले प्रभाकर स्वयं हिंदी साहित्य जगत के मसीहा साबित हुए|

प्रभाकर का जन्म १९१२ में मीरापुर जिला मुज़फ़्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश में हुआ और आप अल्पायु में हिसार (हरियाणा) आ गए थे| पश्चिम उत्तर प्रदेश को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाने वाले प्रभाकर की प्रथम कहानी "दीवाली के दिन " १९३१ में प्रकाशित हुई और पहली लघुकथा "सार्थकता" जनवरी १९३९ के प्रेमचंद संपादित हंस में| उस के बाद से आप के तीन लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। "अर्धनारीश्वर" के लिए भारतीय ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी सम्मान से भी नवाजे गए|

प्रभाकर मूलतः गांधीवादी थे और उनकी लेखनी स्वाधीनता संग्राम में मुखर हो कर सामने आयी| कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य एवं लघुकथा उनके लेखन की मूल विधाएं रहीं| प्रभाकर उन साहित्यकारों में से हैं जिन्होंने लघुकथा लेखन को बहुत संजीदगी से लिया और उसे एक नयी परिभाषा दी| उन्ही के शब्दों में (गद्य कोष से साभार): "आदर्श लघुकथा वह होती है, जो किसी कहानी का कथानक न बन सके"|

प्रभाकर एक स्वतंत्र प्रव्रत्ति के लेखक थे और उन्होंने राजनैतिक बेडियों को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया|यही कारण था कि लम्‍बे समय तक आकाशवाणी से जुड़े रहने के पश्चात् भी साहित्य पर राजनीति की जकडन को उन्होंने नहीं स्वीकारा और त्याग पत्र दे दिया|

रचनाकार परिचय:-

दिव्यांशु शर्मा का जन्म सितम्बर 1984 को छत्तीसगढ मे हुआ था। उपकरण नियंत्रण प्रौद्योगिकी मे बी.ई. की उपाधिधारक दिव्यांशु की साहित्य मे बचपन से ही रूचि रही है। उनका विश्वास है कि समाज को एक सोच और दिशा देने में साहित्य की बडी भूमिका है।

कई दशकों तक सतत और प्रभावी लेखन करने और चालीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित होने के बावजूद भी प्रभाकर अपने जीवन के अंतिम दिनों में सतत लेखन में व्यस्त रहे| उनका मानना था कि साहित्यकार का समाज के प्रति एक उत्तरदायित्व है| यशवंत कोठारी जी को दिए एक साक्षात्कार में प्रभाकर जी ने कहा कि "मैं साहित्‍यकार को तीसरी आंख मानता हूं। व्‍यवस्‍था को ठीक ढंग से चलने को बाध्‍य करने का दायित्‍व साहित्‍यकार पर है। उसे इस बहुत बड़े दायित्‍व का भार वहन करना चाहिए।"...

प्रभाकर जी के इस दर्शन से रचनाकार और साहित्य कार आने वाले लम्बे समय तक प्रेरणा लेते रहेंगे और उनकी रचनाएँ समस्त साहित्य स्रजकों और पाठकों को सोच की दिशा देती रहेंगी|

कृतित्व : 
उपन्यास- ढलती रात, स्वप्नमयी।
नाटक- हत्या के बाद, नव प्रभात, डॉक्टर, प्रकाश और परछाइयाँ, बारह एकांकी, अशोक
कहानी संग्रह- संघर्ष के बाद
उपन्यास- आवारा मसीहा , अर्धनारीश्वर , धरती अब भी घूम रही है , क्षमादान, दो मित्र, पाप का घड़ा, होरी, पंखहीन नाम से उनकी आत्मकथा तीन भागों में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।

उपलब्धियाँ-
पद्म विभूषण, अर्धनारीश्वर उपन्यास के लिये भारतीय ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी सम्मान, देश विदेश में अनेकों सम्मान। 
हिंदी साहित्य के महत्त्वपूर्ण एवं सशक्त हस्ताक्षर प्रभाकर को साहित्य शिल्पी समूह की और से भाव भीनी श्रद्धांजलि| साहित्य जगत में आप का योगदान अमर है|

10 comments:

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ।

सुभाष नीरव २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

नि:संदेह यह एक दु:खद ख़बर है। स्वभाव से बेहद सरल और विनम्र विष्णु प्रभाकर जी एक महान लेखक थे। कर्म करने में ही विश्वास रखने वाले इस लेखक ने आडम्बर न जीवन में पसंद किए, न साहित्य में। "आवारा मसीहा" उनकी हिंदी में ही नहीं, वरन विश्व साहित्य में एक क्लासिक कृति है। इस महान दिवगंत आत्मा को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि !

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

विष्णु प्रभाकर की क्षति अपूरणीय है। श्रद्धांजलि।

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

विष्णु प्रभाकर की क्षति अपूरणीय है। श्रद्धांजलि।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

विनम्र श्रद्धांजलि..

नंदन २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

विष्णु प्रभाकर के बिना हिन्दी साहित्य की चर्चा हमेशा अधूरी रहेगी। आज साहित्याकाश सूना हो गया। उन्हे भावभीनी श्रद्धांजलि।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

महान साहित्यकार की पुण्य आत्मा को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि .

अविनाश वाचस्पति २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

देह तो अपनी थी ही नहीं
विचार मौजूद रहेंगे सदा।

अतुल्य २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

हिन्दी साहित्य के इस महान व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि! उनके जाने से हिन्दी साहित्य-जगत ने अपना एक बेहद प्रकाशवान रत्न खो दिया है।
पर अपनी रचनाओं के माध्यम से यह ज्योति लंबे समय तक प्रकाश फैलाती रहेगी।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

एक अपूरणीय क्षति... श्रद्धांजली..

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