........साहित्य शिल्पी एक पूर्ण वेबसाईट में परिवर्तित हो चूका है। अब हमारी रचनाये यहाँ पढ़े... - www.sahityashilpi.in तथा कृपया हमें अपनी प्रतिक्रिया एवं सुझावों से अवश्य अवगत करायें जिससे हम आवश्यक सुधार कर सकें.....

साहित्यशिल्पी पर नवीनतम प्रस्तुतियाँ

लोड हो रहा है. . .

रविवार, २१ जून २००९

साधु की पुत्री [हितोपदेश का काव्यानुवाद - 3, स्थायी स्तंभ] - सीमा सचदेव

इक जंगल मे साधु एक
किए थे उसने पुण्य अनेक
करता रहता प्रभु की भक्ति
अद्भुत थी उस साधु की शक्ति


साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

2 अक्टूबर, 1974 को पंजाब के अबोहर मे जन्मी सीमा सचदेव पेशे से हिन्दी-अध्यापिका हैं। इनकी कई रचनाये जैसे- विभिन्न अंतर्जाल पत्रिकाओ मे प्रकाशित हैं। "मेरी आवाज़ भाग-१,२", "मानस की पीड़ा",,"सन्जीवनी", "आओ सुनाऊं एक कहानी", "नन्ही कलियाँ", "आओ गाएं" नामक रचना-संकलन ई-पुस्तक के रूप में प्रकाशित हैं।


पर न थी उसकी सन्तान
साधवी समझे यह अपमान
एक बार इक नदी के तीर
साधु बैठा था गम्भीर

कौआ इक उड़ता हुआ आया
मुँह में चुहिया को दबाया
चुहिया उसके मुँह से छूटी
आ के गिरी साधु की गोदि
साधु का हृदय गया भर
ले आया उसे अपने घर

लड़की उसे जादू से बनाया
और पत्नी के सामने लाया
बेटी मान के उसको पाला
हो गया जीवन मे उजाला

इक दिन बेटी हुई स्यानी
अब साधु ने मन मे ठानी
क्यों न उसका ब्याह रचाए
कन्यादान से पुण्य कमाए
वही बनेगा इसका वर
होगा जो सबसे ताकतवर

सोच के गया सूर्य के पास
बोला मेरी बेटी खास
तुम दुनिया में सबसे महान
और मेरा यह है अरमान
मेरी सुता से ब्याह रचाओ
उत्तम वर उसके बन जाओ
लिया सूर्य ने सबकुछ जान
बोला मैं नही हूँ महान
चाँद ज्यो ही नभ में आए
तो वो मुझको दूर भगाए
चाँद ही है वो उत्तम वर
बोलो तुम उससे जाकर

आया साधु चाँद के पास
बोला मेरा करो विश्वास
तुम ही हो वह उत्तम वर
बसाओ मेरी सुता संग घर
सुनकर चाँद ने यूँ फरमाया
उत्तम बादल को बताया
बादल जब नभ में छा जाएँ
तो वो मुझको भी ढँक जाएँ
जाओ तुम बादल के पास
वही होगा उसका वर खास

बादल पास अब आया साधु
बोला तुममे गजब का जादू
तुम ही तो हो सबसे महान
मेरी सुता का करो कल्याण
ठीक हो तुम बादल यूँ बोला
सकुचा के अपना मुँह खोला
मुझसे बड़ा तो पर्वत राज
उसके सिर ही सजेगा ताज
जब भी मैं उससे टकराऊँ
खाली होकर वापिस आऊँ

अब साधु पर्वत के पास
बोला तुम तो सबसे खास
मेरी पुत्री को अपनाओ
जीवन उसका सफल बनाओ
सुनकर कुछ ललचाया
पर साधु को यूँ फरमाया
मुझसे बड़े है चूहे राज
पहनाओ उसके सिर ताज
चीर के रख दे मेरा सीना
मुश्किल कर दे मेरा जीना
बड़ी-बड़ी जो बिल बनाए
तो कोई कुछ न कर पाए

साधु को बात समझ मे आई
चूहे को जा दी दुहाई
थाम लो मेरी सुता का हाथ
दो जीवन भर उसका साथ
बेटी को फिर चुहिया बनाया
चूहे-चुहिया का ब्याह कराया
...................
...................
बच्चो कभी न जाना भूल
नहीं छूटे कभी अपना मूल
इक दिन अपना रँग दिखाए
चाहे कोई कितना भी भरमाए

9 comments:

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ७:१२ PM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

mahender २३ नवम्बर २००९ ७:१२ PM  

bahut khoob aage bhi likhte raho
kafi aage tak jaoge

DARSHANIK २३ नवम्बर २००९ ७:१२ PM  

APNA astitva admi ko kabhi nahi bhoolana chahiye is kavita ke madhyam se apne ise bata kar hume abhibhoot kar diya

परमजीत बाली २३ नवम्बर २००९ ७:१२ PM  

बढिया प्रस्तुति।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ७:१२ PM  

आनंद आ गया। बिटिया नें बहुत चाव से सुना और आनंद लिया। धन्यवाद सीमा जी।

अजय यादव २३ नवम्बर २००९ ७:१२ PM  

एक सुंदर कथा को अच्छी तरह प्रस्तुत करने के लिये साधुवाद!

राजाभाई कौशिक २३ नवम्बर २००९ ७:१२ PM  

शायद इसीलिये बुधि के अधिष्ठाता श्री गणेश जी ने चूहे को अपना वाहन चुना हो.... साधुवाद्

nitesh २३ नवम्बर २००९ ७:१२ PM  

रोचकता से कहनी कयी कहानी जिसे कविता में प्रस्तुत कर चार चाँद लगा दिये हैं।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:१२ PM  

कवितात्मक कहानी पढ कर आन्नद आया.

नवीनतम काव्य प्रस्तुतियाँ

लोड हो रहा है. . .

नवीनतम कथा प्रस्तुतियाँ

लोड हो रहा है. . .

अन्य नवीनतम प्रस्तुतियाँ

लोड हो रहा है. . .

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP