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बुधवार, १७ जून २००९

इससे उसका बोध ही, अन्योक्ति का ठौर..[काव्य का रचना शास्त्र: १५] {अलंकारों पर श्रंखला} - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

कहना था कुछ और पर, कहते हैं कुछ और.
इससे उसका बोध ही, अन्योक्ति का ठौर..

वर्णन हो उपमेय का, माध्यम हो उपमान.
व्यंग सखा अन्योक्ति का, सोच-समझ पहचान..


किसी एक व्यक्ति या वस्तु को लक्ष्य कर कही गयी बात यदि किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु पर घटित हो तो वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है. इसमें प्रतीक के रूप में बात कही जाती है जिसका दूसरा (अन्य) अर्थ भी निकलता है.

जहाँ अप्रस्तुत के वर्णन द्वारा प्रस्तुत का बोध कराया जाये वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है. इसमें अप्रस्तुत (उपमान) के वर्णन की सहायता से प्रस्तुत (उपमेय) का अथवा इसके विपरीत वर्णन किया जाता है तथा प्रायः व्यंग्य की प्रधानता होती है. अन्योक्ति में साधारण धर्म के साथ एक अन्य विशिष्ट अभीष्ट अर्थ भी ध्वनित होता है जिसे अन्योक्ति प्रशंसा कहते हैं.

उदाहरण:

१. है बिखेर देती वसुंधरा मोती सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होना पर.
और विरामदायिनी अपनी संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम तनु जिससे उसका नया रूप झलकाता है.
यहाँ ओस कणों को लक्ष्यकर मनोरम तथा सजीव प्रकृति चित्रण दृष्टव्य है.

२. माली आवत देखकर, कलियन करी पुकार.
फूले-फूले चुन लिए, काल्हि हमारी बार..
यहाँ माली और कलियों पर घटित हो रहा घटना क्रम काल और जीवों के सन्दर्भ में भी होने के कारण अन्योक्ति है.

३. केरा तबहि न चेतिया, जब ढिंग लागी बेरि.
अब के चेते का भयो, काँटनि लीन्हो घेरि..
यहाँ केले के वृक्ष से कहा गया है कि उसने पहले अपने निकट लगी बेरी की जड़ी की चिंता नहीं की, अब जब काँटों ने उसे घेर लिया है तब वह चिंतित है. वस्तुतः यहाँ व्यक्ति से कहा गया है कि उसने पहले तो अपने अन्दर उपजे अवगुणों की अनदेखी की और जब अवगुणों ने जकड लिया तो वह परेशान है.

३. घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो.
आज द्वार-द्वार पर यह दिया बुझे नहीं.
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है..

४. स्वारथ सुकृत न स्रम वृथा, देखि बिहंगु बिचारि.
बाज पराये पानि परि, तू पंछीनु न मारि..

५. जिन-जिन देखे वे कुसुम, गयी सुबीति बहार
अब अलि रही गुलाब में, अपत कटीली डार..

६. लछिमन बान सरासन आनू, सोषौं बारिधि बिशिखि क्रिषानू.

७. जल बिच मीन पियासी, सुनि-सुनि आवै हाँसी. -कबीर

८. इस बार जिसे चाट गयी धुप की ख्वाहिश.
फिर शाख पे उस फूल को खिलते नहीं देखा. - परवीन शाकिर.

९. चलो आज खिड़कियों से कुछ हवा तो आई,
कई दिनों से कमरे में घुटन सी बनी हुई थी। - शंभू चौधरी

१०. प्रेम बटी का मदवा पिलाय के,
मतबारी कर दीनी रे मोसे नैना मिलाय के. -खुसरो

११. न हो कमीज़ तो पांवों से पेट ढँक लेंगे.
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए. -दुष्यंत कुमार

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10 comments:

नंदन २३ नवम्बर २००९ ७:११ PM  

रोचक है। यह अलंकार कविता को प्रभावी बनानें में सक्षम है।

दृष्टिकोण २३ नवम्बर २००९ ७:११ PM  

कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना टाईप अलंकार है।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ७:११ PM  

सुन्दर उदाहरणों से सजा आलेख है। आलेख छोटे होने के कारण समझने में आसानी होती है।

nitesh २३ नवम्बर २००९ ७:११ PM  

मानो, जानो, जैसे, जनु आदि तुलना करने वाले शब्दों के बिना सीधे ही किंसी उपमान के माध्यम से पूरी बात कहने पर अलंकार बनेगा। क्या मैं सही हूँ?

अनिल कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:११ PM  

संजीव जी जिन उदाहरणों से लेख प्रस्तुत करते हैं वे SELF-EXPLANATORY होते हैं।

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:११ PM  

आपनें सही कहा। इस अलंकार को व्यंग्य में भरपूर इस्तेमाल किया जा सकता है। यानि कि गद्य में भी।

सुषमा गर्ग २३ नवम्बर २००९ ७:११ PM  

आलेख और प्रयास दोनो ही प्रशंसा योग्य हैं।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:११ PM  

बहुत अच्छा आलेख है, बधाई।

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:११ PM  

संग्रहणीय आलेख है, हमेशा की तरह ज्ञानवर्धन हुआ।

विश्व दीपक ’तन्हा’ २३ नवम्बर २००९ ७:११ PM  

संजीव जी!
मैं आपके आलेखों का हमेशा से हीं पाठक रहा हूँ, बस टिप्पणी करना भूल जाता हूँ। आप जो बढिया-बढिया उदाहरण लाते हैं,उसे पढकर दिल खुश हो जाता है और सीखने का भी मजा आता है। मेरी बस यही गुजारिश है कि जो भी छंद/दोहे हिंदी से अलग किसी भी भाषा के हों, मसलन अवधी,ब्रज, उसके अर्थ भी कृप्या बता दिया करें। आपने बस हिंदी वाले छंद का अर्थ बताया है :)

धन्यवाद-सहित,
विश्व दीपक

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