कमजोर कहा जिसको वो जोरदार रहा। जिसने कमजोर कहा वो जोरहीन,जोरविहीन साबित हुआ। वैसे भी कमजोर के साथ प्रधानमंत्री कहना उपयुक्‍त नहीं है। आप उसे मंत्रियों का प्रधान भी बतला रहे हैं और कमजोर भी कह रहे हैं। आपकी बात तो गले उतरने वाली नहीं थी इसलिए वोटर ने तय किया कि जो हमें पप्‍पू बनाने पर आमादा है क्‍यों न उसकी ही बेतेलीय चम्‍पी कर दी जाये और चम्‍पी भी ऐसी की चांद को और चरित्‍तर दोनों को जख्‍मों से सराबोर कर दे जिससे बुढ़ापे में अपने को लौह समान बतलाने का गरूर भी जाता रहे। जो तेजस्विता इस आयु में बिना मंत्रियों का प्रधान हुए सिर्फ वेटिंग में जमे रहकर जाहिर करने का मुगालता कराया जा रहा था उसने बेइज्‍जती के सारे कीर्तिमान तोड़ डाले। वाकई यही किया गया और स्‍वयंसिद्ध लौह पुरुष समझने वाले की वाणी ऑड हो गई। कोशिश तो पूरी की उसे लाउड करने की पर साउंड में वो खनक नहीं आ पाई और पहले राउंड में हुये धराशायी।

रचनाकार परिचय:-

अविनाश वाचस्पति का जन्म 14 दिसंबर 1958 को हुआ। आप दिल्ली विश्वविद्यालय से कला स्नातक हैं। आप सभी साहित्यिक विधाओं में समान रूप से लेखन कर रहे हैं। आपके व्यंग्य, कविता एवं फ़िल्म पत्रकारिता विषयक आलेख प्रमुखता से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपने हरियाणवी फ़ीचर फ़िल्मों 'गुलाबो', 'छोटी साली' और 'ज़र, जोरू और ज़मीन' में प्रचार और जन-संपर्क तथा नेत्रदान पर बनी हिंदी टेली फ़िल्म 'ज्योति संकल्प' में सहायक निर्देशक के तौर पर भी कार्य किया है। वर्तमान में आप फ़िल्म समारोह निदेशालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली से संबद्ध हैं।



मुहावरा है चित भी मेरी और पट भी। तो यह मुहावरा यहां पर अपनी व्‍यंजना में बिल्‍कुल सटीक बैठा। चित और पट ऐसी ऐसी तैसी की गई कि पूरा चित्र पटल के आगे बवंडर सा घूम गया और अब जो चकरा रहा है उसने बेतेजिता में लगे हुए सारे चांद उखाड़ डाले हैं सिर्फ चमचमाती चांद रह गई है जिसमें वो गौरव नहीं रहा, वो बल नहीं रहा जिसके बल पर चंदामामा बनने की पुरजोर कोशिश की गई। मामा भी वोटर ने दूर का बनाया। एक बेहद लोकप्रिय बाल फिल्‍मी गाना है न - चंदा मामा दूर के तो ये वही चंदा मामा बना डाले गये। वो गीत इन पर बवाल बनकर मंडराया और चंदा ये इस तरह से बनाये गये कि जिस तरह धरती से चंदा दूर, उसी तरह ये सत्‍ता से दूर फेंके गये और फेंकने वाले बेचारे नहीं, वोटर आजकल जिनकी तूती की आज जय जयकार हो रही है।

लंबे चौड़े दिखते हैं पर भीतर से कितने खोखले हैं इसका अहसास इन्‍हीं की जनता ने इनको करा दिया। इसी अपनेपन के बल पर ये आजकल धूल चाटने को बिना विश किये विवश हैं। स्‍वयं को वेटिंग में समझ समझा रहे थे, सनसनी फैला रहे थे, सनसनी फैलाने का गुर अवश्‍य ही कतिपय चैनलों से पाया होगा जो रोज ही बेबात ही सनसनी बिखराते रहते हैं। पर जनता जाग गई और उधर चैनलों की सनसनी भी अब वो टी आर पी नहीं बटोर पा रही है जो पहले बटोरती थी। वैसे भी काठ की हांडी एक बार चढ़ जाए तो गनीमत है। बार बार भी कितनी बार चढ़ेगी। जितना चढ़ेगी उतना अधिक राखत्‍व को प्राप्‍त हो अवश्‍य फूटेगी, सो फूट गई।

अब ये चाहे इसमें कितने ही फ्रूटत्‍व की तलाश करते रहें। फ्रूटत्‍व नहीं, वोट का क्रूरत्‍व इनके हिस्‍से आया। इन्‍हें सत्‍ता से इतनी दूर पहुंचाया कि वहां पर कड़ी धूप है तनिक भी छाया नहीं है। फ्रूटत्‍व मिला पर फ्रूट के राजा आम के समान मीठा नहीं, तरबूज के समान रसीला नहीं, जामुन के समान मन पर जामुनी छटा बिखेरने वाला भी नहीं - इस फ्रूटत्‍व में सड़ैलापन है आम का। इसलिए इसे समूह से बाहर निकाल दिया जाता है क्‍योंकि यह एक गंदी मछली के समान सारे तालाब को गंदा जो करता है। एक सड़ा आम बाकी सही आमों को भी सड़ा देता है इसलिए सड़े आम को निकालना ही एकमात्र निदान है और जागरूक वोटर इस तथ्‍य से भलीभांति परिचित। सड़े आम में से भी, सड़त्‍व से बचे आम का गूदा निकाल कर उसका आमपापड़ बना लिया जाता है तो वो भी दोगुना स्‍वाद देता है परन्‍तु अगर नेता को यह रोग लग जाये तो ...

सड़े फल को अपनाने की कामना नहीं की जाती, यह फल मन को मोहता भी नहीं है और कर्म भी ऐसे किए जायेंगे तो वोटर लुटने वाला नहीं है,उसने तो लूट ही लेना है जैसे अब लूटा है। कोशिश तो इन्‍होंने भरपूर की। इन कोशिशों के तहत खूब बकवास की, अनर्गल उगला कि वोट लुटेरे की भूमिका प्रभावी हो परन्‍तु इनकी मनोकामना को वोटर के मन की कामना ने धता दिया, कह सकते हैं धतूरा बना दिया। यह काठ की हांडी राखत्‍व को प्राप्‍त हो, रागत्‍व की ओर अग्रसर है। राग भी निराला वाला राग विराग। प्रसाद की कामायनी का सफलतम हीरो ‘एक पुरुष उत्‍तुंग शिखर पर’ - वही मनमोहन बना जिसके लतीफे गढ़ गढ़ कर वोटर के मन पर मढ़ने की भरपूर जोर आजमाईश की गई पर इससे अपने लिये वोटर के मन में गहरे गहरे उबड़-खाबड़ खड्ढे ही खुद गये और यह मीनाकारी भी रंग न दिखला पाई। नकारता को प्राप्‍त हुई।

अगर यही कमजोरत्‍व है तो अब इस विचार को बल मिल रहा है कि लौह पुरुष होने से तो ऐसा कमजोरत्‍व ही सुखकर है। लाईन में भी नहीं लगे, चुनाव भी नहीं लड़े और बन गये प्रधानमंत्री। ऐसा अहिंसक गांधीवादी तरीका भला किस मुन्‍नाभाई या पप्‍पू को नहीं लुभाएगा ?कौन इसे सोच सोच कर अपनी चांद नहीं खुजाएगा, बल्कि नोच नोच कर अपनी चांद में ही जख्‍म कर लेगा। जब नाव मे नहीं चढ़े तो डूबने का जोखिम भी नहीं रहा और मन पर चढ़कर विजयश्री पाना यही तो है और यह परमत्‍व जिन चंदों को हासिल होता है वे बंदे काम के होते हैं। सिर्फ और सिर्फ राम के ही नहीं होते हैं। और मांगते हैं सबकी खैर ...

अब भला लोहे के बंदे किस काम आयेंगे। वोटर ने ज्ञान प्राप्‍त किया होगा जो प्रधानमंत्री पद पाए बिना, वेटिंग में रहकर भी जब लौहत्‍व की प्राप्ति जतला रहा है तो चुने जाने के बाद भला कौन इस इस्‍पात को पिघला पायेगा और पिघला ही नहीं वो मन तक का सफर भला कैसे पूरा करेगा। सो वोटर द्वारा पूरे दलबदल सहित नकार दिया गया।

ऐसे कमजोर ही आज सत्‍ता की जरूरत हैं। वो लोहा नहीं चाहिए जो यह भय पैदा करे कि न जाने कब जंग लग जायेगी। सो अब आप देखेंगे कि लोहे को जंग कैसे लगती है और जंग चाहे लोहे की हो या अन्‍य कोई, किसी को भाती नहीं है जंगली बनाती है और देश की जनता न जंगली बनना और न बनाना ही चाहती है। जय हो के भरपूर साथ ने हाथ की हथेली में से भय हो वालों के लिए ठेंगा - तय हो कर ही दिया, जिससे सब मुदित हैं। बीमार सेंसेक्‍स में भी अब तो फिर से आई नई जवानी है - चढ़ते हुये सेंसेक्‍स की गर्माहट अब सबने जानी है - थोड़ा सा महंगाई में भी आएगी तो जनता उसे मानने में भी तनिक न सकुचाएगी।

9 comments:

  1. आदरणीय गुरु श्री अविनाश जी का ये व्यंग्य सही अर्थो में कई मायने रखता है .. आज देश को जो मजबूती चाहिए थी ,वो मनमोहन जी की सरकार ही दे सकती है और stability की ही निशानी है जिसकी वज़ह से sensex भी steadly move हो रहा है ..

    अविनाश जी का ये व्यंग्य रचना ,एक बात कह रही है कि ; देशवासी अब जाग गए है और देश कि सही जरुरत कौनसी सरकार में है ,ये बात जाहिर कर दी गयी है ..

    मैं अपने गुरु को उनकी सी बेहतरीन लेखन के लिए बधाई देता हूँ ...

    नमस्कार ..

    विजय

    उत्तर देंहटाएं
  2. सरदार, सरकार और सेंसेक्‍स तीनों का जोरदार हैं
    बात तो सही है। :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut khoob, Avinashji. zordaar rachana ke liye badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  4. अरे अविनाश जी..अब आप काहे को इत्ते हलकान हो अडवाणी जी की वाणी गायब करने को उतावले हो?....जनता ने तो पहले ही अपना फैसला दे उन्हें सबक सिखा दिया है


    बेहतरीन व्यंग्य...

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  5. जनता जानती है
    कौन असल
    कौन नक़ल
    कौन लौह
    कौन पीतल

    बहुत बढ़िया व्यंग्य है ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. koi asal hain...na koi nakal hail..... sab ek hi taile ke chatte batte hain....BJP ne bhagwa colour choda to bhagve mein vishwas karne wale naraz.....mulayam ne kalyaan ko shamil kiya to purane saathi naraz..... mayawati ne dalito ke saath sarvsamaj ko mudda banane ki sochi to dalit naraz....

    gandhi parwaad waad ka factor rang laya....sabhi jagah se naraz voter ne panje par haath jamaya.....nateeja samne.....

    gaddi par koi bhi ho kamaan to mahila shakti ke hi haath mein hain :-)

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  7. व्यंग्य भी जोड़दार है अविनाश भाई जी।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत ही सुंदर व्यंग,बधाई हो,

    लोग,लोभ के रोग मे डूबे,
    जनता को सब बात पता है,
    असर यही इस बार कर गयी,
    किसकी,कैसी,कहाँ खता है.


    जनतंत्र का मूल मंत्र है,
    काम करो या बात बनाओ,
    काम करे ना बढ़,चढ़ बोले
    ऐसा ही सरकार बनाओ.

    उत्तर देंहटाएं

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