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बुधवार, १५ जुलाई २००९

बिन कारण का कार्य ही, है विभावना मीत [काव्य का रचना शास्त्र: १९] - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

सामान्यतः हर कार्य के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है किन्तु काव्य में जहाँ किसी कारण के बिना अथवा कारण के विपरीत किसी कार्य का वर्णन हो वहाँ 'विभावना' अलंकार होता है.

बिन कारण का कार्य ही, है विभावना मीत.
ज्यों प्रेयसी के दर्श बिन, जाग उठी हो प्रीत..

उदाहरण:
१. बिनु पद चले, सुने बिनु काना,
कर बिनु कर्म करे विधि नाना. - तुलसी

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है।

आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है।

आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि।

वर्तमान में आप म.प्र. सड़क विकास निगम में उप महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं।

२. सखि! इन नैनन ते घन हारे.
बिन ही ऋतु बरसत निशि-बासर,
सदा मलिन दोउ तारे.

३. नाचि अचानक ही उठे,
बिनु पावस वन मोर.

४. आनन रहित सकल रस भोगी.

५. नीर लिये नयनों के नभ में
कल्पित सपने टांक रहा हूं - दीपक गुप्ता

६.वो ख़त के पुर्जे उड़ा रहा था,
हवाओं का रुख दिखा रहा था. -गुलज़ार

७.किस्मत हमको रो लेवे है,
हम किस्मत को रो ले हैं. - फिराक गोरखपुरी

८.दर्दे दरिया में आँसू भरे हुए
फरेबे आरजू ये हाथों धरे हुए
तब्दील हुई, शहर की तासीर
जज्बात भी पत्तों से झरे हुए
आए जब तूफां भरे हालात
सोच पुख्ता हौसले खरे हुए
खौफ तारी हर सूरतो कदम
धड़क रहे दिल आँखें डरे हुए
तेग थामेंगे हाथ कैसे सुरेश
मेरे ही दोस्त अदू हो परे हुए - डॉ. सुरेश तिवारी

९. उसको देखा भी नहीं, दे बैठे दिल हाय.
कलियों को देखे बिना भँवरा गीत सुनाय..-सलिल

15 comments:

Udan Tashtari २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

उसको देखा भी नहीं, दे बैठे दिल हाय.
कलियों को देखे बिना भँवरा गीत सुनाय..

बेहतरीन.

सुन्दर जानकारी दी और एक से एक उदाहरण.आभार.

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

इस श्रंखला की सबसे खास बात है सलिल जी के दोहे में कही गयी परिभाषा तथा उदाहरण।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

Nice Article. Thanks.

Alok Kataria

सुषमा गर्ग २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

ज्ञानवर्धन के लिये धन्यवाद।

PRAN SHARMA २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

ITNEE SARAL JAANKAAREE SHAYAD HEE
KAHIN AUR UPLABDH HO.

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

सलिक जी का ज्ञान अनुकरनीय है और प्रस्तुति प्रसंशनीय। आपके उदाहरण ही विषयवस्तु को समझा पाने में सक्षम होते हैं।

nitesh २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

बिन कारण का कार्य ही, है विभावना मीत.
ज्यों प्रेयसी के दर्श बिन, जाग उठी हो प्रीत..

धन्यवाद सलिल जी।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

बहुत अच्छा आलेख, धन्यवाद।

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

सलिल जी आपके उदाहरण वैसे तो संमझाने में सफल होते हैं लेकिन आलेख इन दिनों अधिक संक्षिप्त हो गये हैं।

हवा से अनायास

पलट गया

डायरी का वो पन्ना

तुम्हारी याद आयी।

क्या इन पंक्तियों को मैं विभावना का उदाहरण मान सकती हूँ?

दृष्टिकोण २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

संग्रहणीय। आपके स्तंभ की हमेशा प्रतीक्षा रहती है।

अनिल कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

सच है कि एसी जानकारी नेट पर अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। सलिल जी को महति कार्य के लिये आभार।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

आत्मीय पाठकों!

आपकी रूचि हेतु धन्यवाद.

अनन्या जी!

आलेख के आकार से अधिक महत्व इस बात का है कि जो कहा जा रहा है वह संप्रेषित हो सका या नहीं? अब तक के किसी पाठ में पाठकों ने कथ्य स्पष्ट न होने की शिकायत नहीं की. केवल विस्तार के लिए लिखना उचित होगा क्या?

गद्य-पद्य में परिभाषा संक्षिप्त इसलिए है कि रुचिवान पाठक या शिक्षक उसका विस्तार अपने शब्दों में करें तथा सामान्य पाठक को अधिक लम्बा न लगे.

उदाहरण अधिक इसलिए कि हर पक्ष स्पष्ट हो तथा अलग-अलग काल व् कवियों की भाषा से पाठक परिचित हों. रचनाकार इनसे स्वयं की रचनाओं के लिए पर्याप्त मार्गदर्शन पा सकें.

बहुधा प्रश्न ऐसे नहीं होते कि अधिक लम्बे उत्तर दिए जाएँ. आपके आदेश का पालन इस उत्तर को लम्बा कर कर दे रहा हूँ.

आपका उदाहरण पन्ना पलटने और याद आने में कोई अंतर्संबंध न हो तो ठीक है.

बार-बार अनुरोध किया है कि पाठक इन अलंकारों के नए उदाहरण स्वयं अथवा अन्य कवियों कि रचनाओं से लेकर भेजें, उर्दू तथा अन्य हिंदीतर भाषाओँ के उदाहरण भेजें तो यह श्रृंखला अधिक रोचक, शोधपूर्ण व पूर्ण होगी पर यह अनुरोध अब तक अनसुना ही है.

अवनीश एस तिवारी २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

इसे मानना तो बड़ा कठिन है कि बिना कारण भी कुछ होता है | फिर भी काव्य इसे करने की छुट देता है तो बड़ा अच्छा है |

मैं भी चाहता हूँ कि लेख और बड़ा हो जाये | लेकिन इससे लेख कि गुणवत्ता पर सवाल नहीं उठा रहा हूँ |
आपके लेख किसी विज्ञान के लेख की तरह सार पूर्ण और मुद्दे पर ही होतें हैं | इसे साहित्य और विज्ञान का मिलन कहूंगा |

एक प्रयास इस विषय पर -

कल देर रात तक ,
चांदनी में जगता रहा,
सितारों को गिनता रहा,
सुबह सूरज की रोशनी में खो गया,
रात का जगा सुबह को सो गया ,
न जाने क्या होगया ?

अवनीश तिवारी

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

रात का जगा सुबह को सो गया ,

यहाँ तो आपने सुबह सोने का कारण रात में जागने को बता दिया जबकि कारण न होना ही 'विभावना की शर्त है. शेष ठीक है.

आकांक्षा~Akanksha २३ नवम्बर २००९ ७:१४ PM  

Lajwab likha hai apne...!!

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