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मंगलवार, २३ सितम्बर २००८

हिन्दी साहित्य का आरंभ [स्थायी स्तंभ] - अजय यादव

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किसी भाषा में लिखे गये साहित्य के विकास-क्रम को समझने के लिये उस भाषा की उत्पत्ति और विकास के विभिन्न चरणों को समझना भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि हर भाषा का साहित्य अपनी पूर्ववर्ती भाषा की साहित्यिक अवधारणाओं की विरासत को लेकर ही आगे बढ़ता है. हिन्दी साहित्य भी इसका अपवाद नहीं है. अत: हिन्दी-साहित्य के इतिहास के विवेचन से पहले, आइये एक नज़र हिन्दी-भाषा की उत्पत्ति पर भी डालते चलते हैं.

हिन्दी भारत-यूरोपीय भाषा परिवार से संबद्ध है. इस परिवार की अन्य भाषाओं में संस्कृत के अलावा अंग्रेज़ी, जर्मन आदि भाषाओं सहित यूरोप की अधिकांश भाषायें सम्मिलित हैं. इस भाषा-परिवार की प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद है जिसका लेखन-काल १००० ई०पू० के आसपास माना जाता है. यह पुरानी शैली की संस्कृत (जिसे कुछ विद्वानों ने ’छंदस’ नाम दिया है) में है.

ऋग्वेद-काल के काफी बाद तक संस्कृत सारे आर्य भारत की संपर्क-भाषा थी परंतु धीरे-धीरे उच्चारण की सरलता के आधार पर इसके शब्दों का रूप बदलता रहा और कालांतर में एक नई भाषा अपभ्रंष अस्तित्व में आई. जैसा कि नाम से ही विदित है; यह भाषा परिवर्तित (भ्रष्ट) रूप वाले संस्कृत-शब्दों से ही बनी थी. उत्तर-वैदिक काल तक आते-आते संपर्क-भाषा का स्थान अपभ्रंष ने ले लिया था परंतु शिक्षित समाज में बहुत समय तक इसे नीची नज़र से देखा जाता रहा. इसे प्रयोग करने वाले अधिकांशत: स्त्रियाँ तथा निम्न वर्ग के लोग ही थे. इसके बावज़ूद कई आचार्य व कवियों ने इस भाषा में उच्च-कोटि का साहित्य-सृजन किया. इस भाषा की प्रमुख कृतियों में पउम-चरिउ (पद्म-चरित), ढोला मारू रा दूहा, पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो आदि का नाम आता है.

इसी अपभ्रंष को प्राकृत समेत उत्तर भारत की अधिकांश आधुनिक भाषाओं की जननी माना जाता है. साहित्यिक भाषा के रूप में अपभ्रंष के पराभव के बाद जिन भाषाओं में सर्वाधिक साहित्य-रचना हुई, उनमें कबीर व सिद्धों की सधुक्कड़ी भाषा के अलावा ब्रज, अवधी, बांग्ला आदि सर्वप्रमुख हैं. इनमें प्रथम तीनों मूलत: हिन्दी के ही विभिन्न क्षेत्रीय रूप हैं. अत: इनके साहित्य को भी हिन्दी साहित्य के अंतर्गत ही रखते हुये हम अपनी विवेचना को आगे बढ़ायेंगे.

हिन्दी साहित्य की इस इतिहास-यात्रा के प्रारंभ में हम अपभ्रंष की कुछ प्रमुख कृतियों व साहित्यिक अवधारणाओं से परिचय प्राप्त करते हुये भक्ति व रीति-कालीन साहित्य के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण करेंगे. तत्पश्चात आधुनिक खड़ी बोली हिन्दी के भारतेंदु युग, आचार्य द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, नई कविता आदि का अध्ययन करते हुये हम समकालीन हिन्दी साहित्य तक अपना यह सफ़र ज़ारी रखेंगे. इसी क्रम में साहित्य की अन्य विधाओं यथा कहानी, उपन्यास, संस्मरण आदि के साथ-साथ हिन्दी गज़ल पर भी हम दृष्टिपात करेंगे. आशा है कि आप सब इस सफ़र में हमारे साथ रहते हुये अपने सुझावों व टिप्पणियों द्वारा हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे.

हिन्दी साहित्य के इतिहास के अन्य अंक : १) साहित्य क्या है? ३)आदिकालीन हिन्दी साहित्य ४)भक्ति-साहित्य का उदय ५)कबीर और उनका साहित्य ६)संतगुरु रविदास ७)ज्ञानमार्गी भक्ति शाखा के अन्य कवि ८)प्रेममार्गी भक्तिधारा ९)जायसी और उनका "पद्मावत"

15 comments:

शोभा २३ नवम्बर २००९ ६:३४ PM  

अजय जी,
बहुत सुंदर लिखा है आपने. हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने के लिए आपने काफी स्वाध्याय किया होगा. आभार. सस्नेह.

तेताला २३ नवम्बर २००९ ६:३४ PM  

अजय रहोगे विजय
जो लिखते रहोगे
सच्‍चाई
खोलोगे परत
बोलोगे शब्‍द
दर्ज है पहले भी
आगे भी होगा दर्ज
जान जायेंगे सभी
जो नहीं जानते अभी।

तेताला २३ नवम्बर २००९ ६:३४ PM  

अजय रहोगे विजय
जो लिखते रहोगे
सच्‍चाई
खोलोगे परत
बोलोगे शब्‍द
दर्ज है पहले भी
आगे भी होगा दर्ज
जान जायेंगे सभी
जो नहीं जानते अभी।

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:३४ PM  

सहित्य के इतिहास पर यह श्रंखला बहुत अच्छी बनी है। संदर्भ ग्रंथों को भी साथ में लिखें तो अच्छा रहेगा।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:३४ PM  

आलेख स्पष्ट है और भूमिका कहने की अपनी कोशिश में सफल है। बहुत अच्छा प्रयास है जो धीरे धीरे अच्छा संग्रह बनता जायेगा।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३४ PM  

साहित्य शिल्पी पर हिन्दी साहित्य पर अच्छी जानकारियाँ उपलब्ध हो रही हैं। अच्छा विवरण है।

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ६:३४ PM  

कडी कडी मिल कर एक एसी समंवित सामग्रे अंतर्जाल के लिये तैयार हो जायेगी जो बहु-उपयोगी होगी। आपका यह आलेख न केवल सार्थक है अपितु बहुत सादगी से सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को सामने भी लाता है। बधाई स्वीकारें..

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:३४ PM  

अजय जी,

बहुत ही संतुलित और सुरुचिपूर्ण शब्दों में लिखा गया यह लेख आने वाली कडियों की ठोस नींव है... आने वाली कडियों की प्रतीक्षा रहेगी.

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३४ PM  

अरे वाह इस तरह एक एक कडी मिलाकर हमे हिन्दी साहित्य की जानकारी पूरी तरह मिल जायेगी। बहुत बहुत बधाई

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:३५ PM  

बहुत सुंदर लिखा है आपने
सार्थक आलेख ......


अजय जी,

बधाई

विश्व दीपक ’तन्हा’ २३ नवम्बर २००९ ६:३५ PM  

आशा है कि आप सब इस सफ़र में हमारे साथ रहते हुये अपने सुझावों व टिप्पणियों द्वारा हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे.

अवश्य!!!!!!!!

ऎसे स्तम्भ आज की पीढि के लिए नितांत आवश्यक हैं। हिन्दी भाषा के इतिहास से हमारा यूँ हीं परिचय कराते रहें।

धन्यवाद और बधाईयाँ।

Balaga २३ नवम्बर २००९ ६:३५ PM  

Ajay jee,
aapka ye sarthak prayash khali nahin jayega. ke kaiyon ke liye upyogi sabin ho raha hai. bus aap nirantar likhte rahiye. dhanyawad. B.Appalnaidu,Bacheli,Chhattisgarh.

Balaga २३ नवम्बर २००९ ६:३५ PM  

Ajay jee,
aapka ye sarthak prayash khali nahin jayega. ke kaiyon ke liye upyogi sabin ho raha hai. bus aap nirantar likhte rahiye. dhanyawad. B.Appalnaidu,Bacheli,Chhattisgarh.

OMVEER CHAUHAN २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

ajay ji tumne bohat achha likha he
apki ap humesha aise hi likhte rahna ap bohat achha likhte ho
hindi sahity ka ithas parkar bohat achha laga
iske liye apko bohat mehnat karni pari hogi
me apka bohat bohat dhanyavad karna chahuga
ap aise hi likhate rahna
meri shubh kamnaye humesha apke sath he
dhanyavad ajay ji

OMVEER CHAUHAN २३ नवम्बर २००९ ६:३९ PM  

ajay ji ap bohat achha likhte ho
ap aise hi likhte raho hume itni rochak jankari ke liye bohat bohat shukriya
ajay ji ap aise hi likhte rahna
dhanyavad

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