साहित्य सदैव अपने समाज का दर्पण रहा है। समय विशेष की सामाजिक परिस्थितियाँ तत्कालीन साहित्य की दिशा निर्धारित करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारतीय इतिहास का उत्तर-मध्यकाल भी इसका अपवाद नहीं है। इस समय तक आते-आते बाहर से आने वाले मुसलमान शाषकों का देश के बहुत बड़े भाग पर आधिपत्य हो चुका था। इसका प्रभाव सिर्फ राजनैतिक न रह कर सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में भी महसूस किया जाने लगा था। अनेक हिन्दू (जिनमें मुख्यतय: दलित व शिषित वर्ग शामिल था) विभिन्न कारणों से इस्लाम स्वीकार कर रहे थे। अत: हिन्दू जनता के लिये अपने शौर्य व धर्म पर अभिमान करने का कोई कारण नहीं बचा था। अपितु इस्लाम के बढ़ते प्रभाव ने प्रबुद्ध हिन्दू धर्मोपदेशकों को अपने धर्म में सुधार के विषय में सोचने पर मज़बूर कर दिया था ताकि सामान्य जनता को धर्म-विमुख होने से बचाया जा सके।

यद्यपि भक्ति संबंधी कुछ रचनायें पूर्व में होती चली आ रहीं थीं जिनमें जयदेव का गीत-गोविंद और विद्यापति के मैथिली गीत बहुत लोकप्रिय भी हुये थे; परन्तु अब इन्होंने अधिक व्यवस्थित रूप धारण कर लिया। भक्ति की यह धारा दक्षिण भारत से आरंभ हुई और धीरे-धीरे इसने सारे भारतवर्ष को अपने में समेट लिया। सामान्य हिन्दू ही नहीं अपितु सहृदय मुस्लिम जनता भी इसके प्रभाव से अछूती न रह सकी। इसी समय प्रेममार्गी सूफ़ी मत का भी भारत में प्रवेश हुआ और उसने भी हिन्दू-मुस्लिम दोनों वर्गों के लोगों को प्रभावित किया।

भक्ति की इस पावन सुरसरि में एक ओर निर्गुण ब्रह्म को मानने वाले थे तो दूसरी ओर सगुण ईश्वर के अनन्य उपासक। आदिगुरु शंकराचार्य ने यद्यपि बहुत पहले ही अद्वैतवाद के रूप में निर्गुण ब्रह्म का स्वरूप स्पष्ट करने की शुरुआत कर दी थी और उत्तर में नाथ और सिद्ध योगी भी सगुण भक्ति के विरुद्ध अपने तरीके से प्रचार कर रहे थे, परन्तु सर्वप्रथम सगुण भक्ति ने ही जनसामान्य के बीच एक आंदोलन की तरह अपनी छाप छोड़ी। इस क्रम में श्री रामानुजाचार्य ने ईसा की ग्यारहवीं सदी में सगुण भक्ति का शाष्त्रीय ढंग से निरूपण किया। इन्हीं की शिष्य परंपरा में आगे चलकर रामानंद (पन्द्रहवीं शताब्दी) हुये जिन्होंने राम-भक्ति को प्रधान मानते हुये एक बड़ा भारी संप्रदाय खड़ा किया। इसी प्रकार गुजरात में स्वामी मध्वाचार्य (१४वीं शताब्दी) ने द्वैतवाद पर आधारित वैष्णव संप्रदाय की नींव रखी तो विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक स्वामी वल्लभाचार्य ने प्रेमलक्षणा कृष्ण-भक्ति को श्रेष्ठ माना। सगुणोपासक भक्त-कवियों में जहाँ राम-भक्ति धारा में गोस्वामी तुलसीदास और संत नाभादास जैसे नाम हैं वहीं कृष्ण-भक्ति धारा में सूरदास, रसखान, मीरा आदि अनेक भक्त-कवि हैं।

शंकराचार्य जी के अद्वैतवाद से आरंभ हुई निर्गुण भक्ति धारा के भी दो प्रमुख उपभेद सामने आये - ज्ञानमार्ग और प्रेममार्ग। ज्ञानमार्ग का प्रवर्तन जहाँ प्राचीन भारतीय ब्रह्मवाद व वेदांत पर आधारित था, वहीं प्रेममार्ग सूफी फ़कीरों के प्रभाव से अस्तित्व में आया। ज्ञानमार्गी निर्गुण शाखा का उद्भव महाराष्ट्र के प्रमुख संत नामदेव जी से माना जा सकता है पर इसका पूर्ण प्रसार हमें सर्वप्रथम कबीर में देखने को मिलता है। ज्ञानमार्गी संतों में कबीर, रैदास (रविदास), गुरु नानक, दादूदयाल आदि प्रमुख हैं तो प्रेममार्गी शाखा में मलिक मुहम्मद जायसी, कुतुबन, मंझन आदि अनेक सूफी कवि हैं।

आगामी अंकों में हम इन सभी भक्ति-धाराओं के प्रमुख भक्त-कवियों की रचनाओं का संक्षिप्त अवलोकन करने का प्रयास करेंगे।

हिन्दी साहित्य के इतिहास के अन्य अंक : १) साहित्य क्या है? २)हिन्दी साहित्य का आरंभ ३)आदिकालीन हिन्दी साहित्य ५)कबीर और उनका साहित्य ६)संतगुरु रविदास ७)ज्ञानमार्गी भक्ति शाखा के अन्य कवि ८)प्रेममार्गी भक्तिधारा ९)जायसी और उनका "पद्मावत"

15 comments:

  1. अच्छा आलेख, बधाई

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  2. लेख पड़कर आनद आ गया , भक्ति रस से भरपूर है तथा ,जानकारी भी बहुत सटीक व सही है .
    भक्ति को spirituality से जोड़ दे तो आनंद आ जाता है .

    बहुत सुंदर प्रयास .

    विजय

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  3. अजय जी,
    बहुत ही अच्छी जानकारी... यह स्थायी स्तंभ अच्छी जानकारी प्रदान करती

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  4. अगले अंकों की प्रतीक्षा रहेगी। भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग है, काफी कुछ समाविष्ट हो सकता है आपके स्तंभ में।

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  5. भारतीय साहित्य के इतिहास में जुडती एक जानकारी से लबालब एक और कडी..निश्चय ही सहेजने लायक.

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  6. पंकज सक्सेना17 नवंबर 2008 को 11:23 am

    अजय जी, भक्ति साहित्य के विकास पर आपके आगामी आलेखों की अभी से प्रतीक्षा हो गयी है, कडी संग्रहणीय है।

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  7. अच्छा आलेख। बहुत बधाई अजय जी।

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  8. आलेख बहुत अच्छा है। भक्ति साहित्य पर जानकारी का आगाज अच्छा है, अन्य आलेखों की प्रतीक्षा है।

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. Very Nice. Informative. Thanks.

    Alok Kataria

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  11. बन्धु अजय जी

    साहित्य कि अजस्र धारा से परिचय कराने का आपका यह प्रयास नमन करने योग्य है. कई बार ऐसा लगता है कि साहत्यिक संगम में निर्मल आचमन का सुख मिल रहा हो ... आपके निरंतर प्रयासों के लिए साधुवाद

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  12. आपने भूख जगा दी !
    सुंदर आलेख, अतिरिक्त जानकारी की प्रतीक्षा मे --
    प्रवीण पंडित

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