........साहित्य शिल्पी एक पूर्ण वेबसाईट में परिवर्तित हो चूका है। अब हमारी रचनाये यहाँ पढ़े... - www.sahityashilpi.in तथा कृपया हमें अपनी प्रतिक्रिया एवं सुझावों से अवश्य अवगत करायें जिससे हम आवश्यक सुधार कर सकें.....

साहित्यशिल्पी पर नवीनतम प्रस्तुतियाँ

लोड हो रहा है. . .

रविवार, ५ अक्तूबर २००८

डॉ. राही मासूम रजा - जीवनवृत्त एवं कृतित्व [आलेख] - डॉ० फीरोज अहमद


डॉ. राही मासूम रजा का जन्म १ अगस्त १९२७ को एक सम्पन्न एवं सुशिक्षित शिआ परिवार में हुआ। उनके पिता गाजीपुर की जिला कचहरी में वकालत करते थे। राही की प्रारम्भिक शिक्षा गाजीपुर में हुई और उच्च शिक्षा के लिये वे अलीगढ़ भेज दिये गए जहाँ उन्होंने १९६० में एम०ए० की उपाधि विशेष सम्मान के साथ प्राप्त की। १९६४ में उन्होंने अपने शोधप्रबन्ध “तिलिस्म-ए-होशरुबा” में चित्रित भारतीय जीवन का अध्ययन पर पी०एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात्‌ उन्होंने चार वर्षों तक अलीगढ़ विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य भी किया।

अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे।

१९६८ से राही बम्बई में रहने लगे थे। वे अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखते थे जो उनकी जीविका का प्रश्न बन गया था। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। कलम के इस सिपाही का निधन १५ मार्च १९९२ को हुआ।

राही का कृतित्त्व विविधताओं भरा रहा है। राही ने १९४६ में लिखना आरंभ किया तथा उनका प्रथम उपन्यास मुहब्बत के सिवा १९५० में उर्दू में प्रकाशित हुआ। वे कवि भी थे और उनकी कविताएं ‘नया साल मौजे गुल में मौजे सबा', उर्दू में सर्वप्रथम १९५४ में प्रकाशित हुईं। उनकी कविताओं का प्रथम संग्रह ‘रक्स ए मैं उर्दू’ में प्रकाशित हुआ। परन्तु वे इसके पूर्व ही वे एक महाकाव्य अठारह सौ सत्तावन लिख चुके थे जो बाद में “छोटे आदमी की बड़ी कहानी” नाम से प्रकाशित हुई। उसी के बाद उनका बहुचर्चित उपन्यास “आधा गांव” १९६६ में प्रकाशित हुआ जिससे राही का नाम उच्चकोटि के उपन्यासकारों में लिया जाने लगा। यह उपन्यास उत्तर प्रदेश के एक नगर गाजीपुर से लगभग ग्यारह मील दूर बसे गांव गंगोली के शिक्षा समाज की कहानी कहता है। राही नें स्वयं अपने इस उपन्यास का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा है कि “वह उपन्यास वास्तव में मेरा एक सफर था। मैं गाजीपुर की तलाश में निकला हूं लेकिन पहले मैं अपनी गंगोली में ठहरूंगा। अगर गंगोली की हकीकत पकड़ में आ गयी तो मैं गाजीपुर का एपिक लिखने का साहस करूंगा”।

राही मासूम रजा का दूसरा उपन्यास “हिम्मत जौनपुरी” मार्च १९६९ में प्रकाशित हुआ। आधा गांव की तुलना में यह जीवन चरितात्मक उपन्यास बहुत ही छोटा है। हिम्मत जौनपुरी लेखक का बचपन का साथी था और लेखक का विचार है कि दोनों का जन्म एक ही दिन पहली अगस्त सन्‌ सत्तईस को हुआ था।

उसी वर्ष राही का तीसरा उपन्यास “टोपी शुक्ला” प्रकाशित हुआ। इस राजनैतिक समस्या पर आधारित चरित प्रधान उपन्यास में भी उसी गांव के निवासी की जीवन गाथा पाई जाती है। राही इस उपन्यास के द्वारा यह बतलाते हैं कि सन्‌ १९४७ में भारत-पाकिस्तान के विभाजन का ऐसा कुप्रभाव पड़ा कि अब हिन्दुओं और मुसलमानों को मिलकर रहना अत्यन्त कठिन हो गया।

सन्‌ १९७० में प्रकाशित राही के चौथे उपन्यास “ओस की बूंद” का आधार भी वही हिन्दू-मुस्लिम समस्या है। इस उपन्यास में पाकिस्तान के बनने के बाद जो सांप्रदायिक दंगे हुए उन्हीं का जीता-जागता चित्रण एक मुसलमान परिवार की कथा द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

सन्‌ १९७३ में राही का पांचवा उपन्यास “दिल एक सादा कागज” प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के रचना-काल तक सांप्रदायिक दंगे कम हो चुके थे। पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया था और भारत के हिन्दू तथा मुसलमान शान्तिपूर्वक जीवन बिताने लगे थे। इसलिए राही ने अपने उपन्यास का आधार बदल दिया। अब वे राजनैतिक समस्या प्रधान उपन्यासों को छोड़कर मूलतः सामाजिक विषयों की ओर उन्मुख हुए। इस उपन्यास में राही ने फिल्मी कहानीकारों के जीवन की गतिविधियों आशा-निराशाओं एवं सफलता-असफलता का वास्तविक एवं मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है।

सन्‌ १९७७ में प्रकाशित उपन्यास “सीन ७५” का विषय भी फिल्मी संसार से लिया गया है। इस सामाजिक उपन्यास में बम्बई महानगर के उस बहुरंगी जीवन को
विविध कोणों से देखने और उभारने का प्रयत्न किया गया है जिसका एक प्रमुख अंग फिल्मी जीवन भी है। विशेषकर इस उपन्यास में फिल्मी जगत से सम्बद्ध व्यक्तियों के जीवन की असफलताओं एवं उनके दुखमय अन्त का सजीव चित्रण किया गया है।

सन्‌ १९७८ में प्रकाशित राही मासूम रजा के सातवें उपन्यास “कटरा बी आर्जू” का आधार फिर से राजनैतिक समस्या हो गया है। इस उपन्यास के द्वारा लेखक यह बतलाना चाहते हैं कि इमरजेंसी के समय सरकारी अधिकारियों ने जनता को बहुत कष्ट पहुंचाया।

राही मासूम रजा की अन्य कृतियाँ है - मैं एक फेरी वाला, शीशे का मकां वाले, गरीबे शहर, क्रांति कथा (काव्य संग्रह), हिन्दी में सिनेमा और संस्कृति, लगता है बेकार गये हम, खुदा हाफिज कहने का मोड़ (निबन्ध संग्रह) साथ ही उनके उर्दू में सात कविता संग्रह भी प्रकाशित हैं। इन सबके अलावा राही ने फिल्मों के लिए लगभग तीन सौ पटकथा भी लिखा था। इन सबके अतिरिक्त राही ने दस-बारह कहानियां भी लिखी हैं। जब वो इलाहाबाद में थे तो अन्य नामों से रूमानी दुनिया के लिए पन्द्रह-बीस उपन्यास उर्दू में उन्होंने दूसरों के नाम से भी लिखा है। उनकी कविता की एक बानगी देखिये जिसे “मैं एक फेरी बाला” से साभार उद्धरित किया गया है: 

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
मेरे उस कमरे को लूटो
जिस में मेरी बयाज़ें जाग रही हैं
और मैं जिस में तुलसी की रामायण से सरगोशी कर के
कालिदास के मेघदूत से ये कहता हूँ
मेरा भी एक सन्देशा है

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहु से चुल्लु भर कर
महादेव के मूँह पर फ़ैंको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढा, गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है।

राही जैसे लेखक कभी भुलाये नहीं जा सकते। उनकी रचनायें हमारी उस गंगा-जमनी संस्कृति की प्रतीक हैं जो वास्तविक हिन्दुस्तान की परिचायक है। 

17 comments:

शोभा २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहु से चुल्लु भर कर
महादेव के मूँह पर फ़ैंको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढा, गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है।
वाह! मज़ा आ गया पढ़कर. बहुत विस्तार से और बहुत बढ़िया लिखा है. फिरोज़ जी - बहुत बधाई.

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

बहुत अच्छा आलेख है, डॉ. फीरोज़ तथा साहित्य शिल्पी को बधाई।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

राही साहब के फिल्म पटकथा लेखन और महाभारत धारावाहिक के संवाद लेखन वाले पहलुओं पर भी प्रकाश डाले जाने की आवश्यकता थी। वैसे आलेख अपने आप में बहुत अच्छा है। बधाई..

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

डॉ. राही मासूम रज़ा के विषय में बहुत सी एसी जानकारियाँ आपने प्रदान की जिनसे अब तह मैं अनभिज्ञ थी।

cartoonist ABHISHEK २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

डॉ. राही मासूम रजा को
जितना भी पढो कम लगता है.
उनका कोई भी उपन्यास ले लो..
आधा गाँव ,
टोपी शुक्ला,
ओस की बूँद,
दिल एक सादा कागज़,
कटरा बी आरजू .....
बार बार पढने को जी चाहता है..
महाभारत के संवाद आज भी कानो में गूंजते हें.

sidheshwer २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

सबसे पहले तो एक बेहद अच्छी पत्रिका निकालने के लिए बधई स्वीकार करें. मैं अक्सर यहां का फ़ेरा लगाता हूं लेकिन आज डा०राही मासूम रज़ा पर डा० फ़ीरोज अहमद का लेख देखकर खिंचा चला आया. रही पर फ़ीरोज भाई का परिचयात्मक लेख अच्छा है. एकाध जगह वर्तनी की गलतियां जरूर हैं , जिन्हें सुधारा जाना चाहिए. एक बात और संभवत: टाइपिंग/कट/पेस्ट में कहीं हुई चूक के कारण यह छपा है -
" वे एक महाकाव्य अठारह सौ सत्तावन लिख चुके थे जो बाद में “छोटे आदमी की बड़ी कहानी” नाम से प्रकाशित हुई। "

आपसे अनुरोध है कि इसको सुधारने का कष्ट करें. राही का महाकाव्य '१८५७'बाद में 'क्रान्ति कथा' के नाम से छपा. रही बात “छोटे आदमी की बड़ी कहानी” की तो यह यह अब भी उसी नाम से है .यह पुस्तक गाजीपुर के सपूत परमवीर अब्दुल हमीद की जीवनी है.

बधाई और शुभकामनाये.

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

राही मासूम रज़ा की कृतियाँ तो पढी थीं किंतु उन्हे जानने का मौका मिला डॉ फीरोज के इस आलेख से। आभार।

Udan Tashtari २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

बहुत ही उम्दा अलेख. टोपी शुक्ल कुछ रोज पहले ही फिर से पढ़ी.

आभार इस आलेख के लिए.

अजय यादव २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

सुंदर और जानकारी से परिपूर्ण आलेख के लिये डॉ. फीरोज़ अहमद जी का आभार!

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

डॉ. फ़ीरोज,

साहित्य शिल्पी पर आपके इस बेहतरीन प्रस्तुतिकरण का आभार। रज़ा के विषय में बहुत सी अच्छी जानकारी है व आपनें उन सभी पहलुओ को छुआ है जिससे इस लेखक का कृतित्व उभर कर सामने आता है। आभार।

***राजीव रंजन प्रसाद

अनूप भार्गव २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

सुन्दर लेख के लिये आभार लेकिन राही साहब का ज़िक्र ’महाभारत’ की पटकथा की चर्चा के बिना अधूरा सा लगता है । इतनी जटिल कहानी को इतनी खूबसूरती के साथ एक पटकथा में पिरोना और अपनी बात को कह पाना ’राही’ ही कर सकते थे ।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

well composed, appreciable.

Alok Kataria

दिव्यांशु शर्मा २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

राही मासूम रज़ा साहब , एक ईमानदार और खरे लेखक थे | उनकी साम्यवादी विचारधारा और लेखन क्षमता का मैं कायल हूँ | वे पाठक के साथ एक सीधा संवाद स्थापित करते थे जो दिल में उतर जाता था | उन के उपन्यासों के पात्र बहुत ही असली और ज़िंदगी के करीब रहे , ठीक रज़ा साहब की तरह..
उन की लिखी कुछ कविताओ के टुकड़े भी आलेख में लिए जा सकते थे.. जानकारी के लिए बहुत शुक्रिया |

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

डॉ. फीरोज़ अहमद जी,

जीवन में जितने भी सत्य हैं उनका कोई धर्म नहीं होता... न वह हिन्दू, न मुस्लिम न ही ईसाई होते हैं वह तो बस ईस्वर का एक रूप होते हैं..राही मासूम रजा साहब को अपनी रचना के माध्यम से और करीव लाने के लिये आभार

विश्व दीपक ’तन्हा’ २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

डॉ. राही साहब की प्रतिभा का अद्भुत उदाहरण महाभारत की पटकथा और संवाद के रूप में हम सबके सम्मुख है। सुलझे शब्दों में कितने हीं गुढ अर्थ.....सच में इनकी लेखनी का कोई सानी नहीं।

मैं तहे-दिल से फीरोज साहब का शुक्रिया अदा करता हूँ, जिनके कारण इतने महान फनकार के बारे में जानने को मिला।

बधाई स्वीकारें।

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:३६ PM  

मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहु से चुल्लु भर कर
महादेव के मूँह पर फ़ैंको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,

वाह!

बहुत बढ़िया आलेख ..

फिरोज़ जी,
बधाई

Zakir Ali 'Rajneesh' २३ नवम्बर २००९ ६:३७ PM  

राही मासूम रजा उन बिरले लेखकों में से हैं, जिन्होंने साहित्य के साथ साथ फिल्म जगत में भी अपनी धाक जमाई। उनका स्मरण कराने के लिए आभार। हाँ, उनकी कविता बहुत जोरदार है। यह कविता सम्प्रदायवादियों के मुंह पर एक करारा तमाचा है।

नवीनतम काव्य प्रस्तुतियाँ

लोड हो रहा है. . .

नवीनतम कथा प्रस्तुतियाँ

लोड हो रहा है. . .

अन्य नवीनतम प्रस्तुतियाँ

लोड हो रहा है. . .

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP