शक्ति-आराधना और विजयदश्मी [विशेष आलेख] -शोभा महेन्द्रू
मनुष्य जीवन में उत्कर्ष पर तभी पहुँच सकता है जब वह शारीरिक, आर्थिक, बौद्धिक और सामाजिक शक्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक शक्ति से भी सम्पन्न हो। शक्ति के बिना मनुष्य का कोई भी कार्य ठीक से संपादित नहीं हो सकता। शक्ति के बिना तो शिव भी शव के समान हैं। भारत में सनातन काल से शक्ति की आराधना की जाती है। शक्ति के उपासकों ने मातृ- शक्ति को ही सर्वाधिक महत्व दिया है। सृष्टि के सभी जीव-जन्तु तथा भौतिक पदार्थ इसी शक्ति की देन हैं। भारतीय संस्कृति में महाशक्ति को सर्वोपरि माना जाता है। वह समस्त संसार की चेतना शक्ति रही है। महाशक्ति की पूजा के लिए ही नवरात्र पर्व मनाया जाता है।
यह महोत्सव नौ देवियों की शक्तियों से संयुक्त है। इसकी एक-एक तिथि को एक-एक शक्ति के पूजन का विधान है। पुराणों के अनुसार इनका नामकरण शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्र घंटा, कूष्टमाँडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री के रूप में है। इन नौ रूपों को ही नव दुर्गा कहा जाता है।
नवरात्र में देवी के उपासक इन्हीं नवदुर्गा का पूजन-अर्चन आध्यात्मिक , मानसिक व शारीरिक शक्ति का संचय करने के उद्देश्य से करते हैं। भगवती दुर्गा ने इन्हीं दिनों महिषासुर का बध किया था और भगवान राम ने भी रावण के साथ युद्ध से पहले शक्ति की आराधना की थी। शक्ति की आवश्यकता हम सभी को है क्योकि जगत में निर्बल को कोई नहीं पूछता। मेरे भारत को आज जिस आतंक ने आतंकित किया है उसको पराजित करें तभी हम शक्ति के उपासक कहलायेंगें। आइए मिलकर कहें- या देवी सर्व भूतेषु शक्तिरूपेण संस्थितः नमस्तस्यै -नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
नौ दिन देवी पूजा के बाद आता है दशहरा जिसे हम विजय दशमी के नाम से भी जानते हैं। इस त्यौहार के साथ आता है बहुत सारा उत्साह और आत्म विश्वास। कहते हैं इस दिन भगवान् राम ने अहंकारी रावण का वध किया था, इसी कारण इस दिन जगह-जगह रावण के पुतले भी जलाये जाते हैं। रावण यद्यपि एक बहुत ही शक्तिशाली और बुद्धिमान राजा था, उसके दस सिर उसकी बुद्धिमानी के ही प्रतीक हैं। अधिक शक्ति की प्राप्ति से वह अहंकारी हो गया था। इसीलिए हर अहंकारीए की तरह उसका भी नाश हुआ। यह त्यौहार हमको यही संदेश देता है कि हम अपने भीतर अंहकार को कभी न आने दें और सदा सच्चाई के रास्ते पर चलें।
दशहरे पर रावण का पुतला जला कर हम बुराई को समाप्त करते हैं, किंतु प्यारे बच्चों! ये केवल प्रतीक हैं। हम सबको त्योहारों के मूल तत्व को जान उसके सच्चे संदेश को समझना चाहिए।
शक्ति की आराधना और रावण का पुतला जलाने के साथ ही हम माँ से प्रार्थना करें कि हममे भी वहीं शक्ति और पराक्रम पैदा कर दे कि हम अपने समाज को बुराई से मुक्त करें, मानवता की स्थापना करें और न्याय तथा प्रेम की स्थापना करें। बच्चों आज दशहरे के त्यौहार को पूरे उत्साह से मानना किंतु याद रखना कि तुम्हे ही राम का चरित्र बनाना है।




17 comments:
ये सब खामाखा की बातें हैं.....कम से कम अब तो ये तमाशे बंद होने चाहिए
दुनिया में सबसे ज्यादा कन्याएं हमारे यहां ही गर्भ में आने से पहले मार दी जाती हैं...फिर भी हर वर्ष नवरात्रि का त्यौहार और ज्यादा जोर-शोर से मनाया जा रहा है...बलात्कारों की दर भी शायद हमारे देश में ही सबसे ज्यादा है..और स्त्री की सामाजिक स्थिति पर तो चर्चा करना ही क्या
भ्रष्टाचार में हमने नये-नये विश्व कीर्तिमान बना डाले, किसान रोज मर रहे हैं, सड़कों पर कचरा बीनकर भी बच्चे अपना पेट नहीं भर पा रहे हैं, धर्म,जाति के नाम पर हम लड़े जा रहे हैं और भगवान को भी पता है कि वह चाहे भी तो इस देश का कुछ नहीं कर सकता
फिर भी अपने दिल को झूठी तसल्ली देने के लिए हम इन प्रतीकों से चिपके हुए हैं जबकि इतिहास गवाह है जिन्हें हमने पूज्य बनाया उनका और उनके विचारों का उतनी ही जल्दी खात्मा भी कर दिया....गंगा को हम पूज्य मानते हैं, गंगा भले गंदी बनी रहे पर उसमें नहाकर हम खुद को पवित्र समझने लगते हैं बाद में गंगा जाय भाड़ में, राम की बात हम करते हैं पर राम का सबसे ज्यादा मखौल हमारे समाज ने ही बनाया है, कृष्ण की बात हम करते हैं पर कृष्ण के उपदेशों के साथ हमारा समाज कभी आगे नहीं बढ़ा....
हम हिंदुस्तानियों को मुगालते में जिंदगी बिताने की आदत पड़ गई है....पूजा-पाठ करो, तमाशे करो और हर गलत काम करते हुए भी रामराज्य की कल्पना करो
मनुष्य जीवन में उत्कर्ष पर तभी पहुँच सकता है जब वह शारीरिक, आर्थिक, बौद्धिक और सामाजिक शक्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक शक्ति से भी सम्पन्न हो। शक्ति के बिना मनुष्य का कोई भी कार्य ठीक से संपादित नहीं हो सकता। शक्ति के बिना तो शिव भी शव के समान हैं।......
आर्थिक कोई जरूरी नही है महात्माओं के पास धन नही होता है फिर भी उनके पास शक्ति है इत्यादि आगे फिर कमेंट करूगा.
कन्या पूजन तभी अच्छा लगता है जब कन्या वध न हो ...आपने सही लिखा है .शोभा जी .बुराई का नाश जरुरी है ..
"मनुष्य जीवन में उत्कर्ष पर तभी पहुँच सकता है जब वह शारीरिक, आर्थिक, बौद्धिक और सामाजिक शक्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक शक्ति से भी सम्पन्न हो। शक्ति के बिना मनुष्य का कोई भी कार्य ठीक से संपादित नहीं हो सकता"
apke vicharo se shat pratishat shamat hun. dashahara parv ki hardik shubhakamana .
विजय दशमी सत्य की असत्य पर जीत का पर्व है इस पर्व पर सुरुचिपूरण लेख के लिए आपका आभार. विजय दशमी के पर्व की आपको शुभकामनायें.
विजय दशमी पर्व की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.
आपको विजया दशमी की बधाई एवँ शुभकामना, परिवार सह:
- लावण्या
आलेख और तस्वीरें दोनों ही बहुत अच्छी हैं। दशहरे की शुभकामनायें।
दशहरे की सभी को शुभकामनायें। तस्वीरें बोलती हुई लगायी गयी हैं। शक्ति की उपासना एक प्रतीक है। मैं शोभा जी के विचारों से सहमत हूँ।
Happy Dussehra. Nice presentation.
Alok Kataria
शोभा जी को इतनी महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत करने का धन्यवाद साथ में विजय दशमी की बधाई।
शोभा जी,
बहुत सारगर्भित आलेख, बच्चों को ध्यान में रख कर आपने बहुत खूबसूरती से कथ्य को बीच बीच में विवरण के साथ जोडा है जो इस आलेख को बहुआयामी बना रहा है। विजय दशमी की बधाई।
***राजीव रंजन प्रसाद
दशहरा मंगलमय हो। अच्छी प्रस्तुति है, बधाई।
शोभा जी,
जीवन में शक्ति की महत्ता पर प्रकाश डालता आपका लेख अच्छा लगा.
बधाई.
या देवी सर्वभूतेषु ...... आपका यह लेख निसंदेह हम सभी के लिए बहुत सारे भूले विसरे संस्कारों का स्मरण कराने के लिए पर्याप्त है
bahut sunder sankalan
shakti ki upasana
regards
naya likha he
pacemaker
आलेख ....
तस्वीरें
दोनों ही बहुत अच्छी
आभार...
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