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रविवार, ३० नवम्बर २००८

किस उलझन में उलझा आजा [बाल - साहित्य] - सुषमा गर्ग

चन्दा देखे धरती पे
धरती पे लाखों चुनमुन हैं
चुनमुन प्यारे प्यारे हैं
सारे जग से न्यारे हैं

एक दिन चाँद के मन में आयी
उसने माँ को बात सुनायी

सर्दी के दिन आऐ रे
मुझको ठँड सताऐ रे
सन सन करके पवन चले है
ठिठुर ठिठुर कर रात कटे है
मुझको ऊनी ड्रेस मँगा दे
सुंदर सी एक कैप लगा दे
नन्हे नन्हे मौजे ला दे
काले काले बूट मँगा दे

चन्दा की सुन बात रे
माता सोच के बोली रे

घटता बढता रोज तू
और कभी ना दिखता तू
कौन नाप की ड्रेस मँगायें
ये ना मेरी समझ में आये

किस उलझन में उलझा आजा
तू है नील गगन का राजा
मेरे प्यारे लाल लाडले
तेरा यूँ ही रूप सलोना
मेरी लाख दुआएँ तुझको
लगे कभी ना जादू टोना
तेरा रुप लुभाता है
तू मामा कहलाता है
*****

10 comments:

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:४४ PM  

Nice poem for childrens. Liked it.

Alok Kataria

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:४४ PM  

बहुत अच्छी कविता है सुषमा जी, बधाई।

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:४४ PM  

अच्छी बाल कविता।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:४४ PM  

सरदी और मौसम के अनुकूल कविता। बच्चों को बहुत पसंद आयेगी।

"अर्श" २३ नवम्बर २००९ ६:४४ PM  

बहोत खूब लिखा है आपने ढेरो बधाई आपको...

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:४४ PM  

बधाई स्वीकार कीजिये। बाल मन की आपको समझ है, सुन्दर प्रस्तुति।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:४४ PM  

बाल सुलभ मन भाती कविता.. बधाई

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ६:४४ PM  

अच्छी प्रस्तुति।

सुषमा जी, बधाई।

राजीव तनेजा २३ नवम्बर २००९ ६:४४ PM  

मौसम के अनुरूप सुन्दर बाल-कविता

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:४४ PM  

रचना ने बच्चा बन जाने का अहसास करा दिया।
और सुख किसे कहते हैं।

प्रवीण पंडित

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