इस वर्ष (2008) में हिंदी दिवस के सुअवसर पर "साहित्यशिल्पी" वेब पत्रिका अस्तित्व में आयी। तब से अनवरत यह एक समर्पित दैनिक पत्रिका के रूप में हिंदी साहित्य जगत में अपना अवदान दे रही है। इस पत्रिका के लिये काम करने वाले युवा कवि-लेखकों का समूह अति उत्साही है और इनमें हिंदी के नाम पर कुछ अच्छा कर-गुज़रने की ललक़ रखने वाले लोग हैं जिसका प्रतिफल यह हुआ कि सामान्य रचनाओं के साथ-साथ विशिष्ट कोटि, (और बीच-बीच में अति विशिष्ट कोटि की रचनायें भी) यहाँ निरंतर दृष्तिगत हो रही हैं। इतने अत्यल्प समय में हिंदी अंतर्जाल के उपर अपनी पकड़ बनाने वाली संभवत: यह इकलौती वेबपत्रिका है जिसने पाठकों में चाव पैदा किया है नेट पर हिंदी पढ़ने की। यह मैं स्वमुख प्रशंसा नहीं कर रहा बल्कि यह पाठकों की प्रतिकिया देखकर कोई स्वयं ही अनुभव कर सकता है। इससे लगता है कि नेट पर भी हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। यह हमारे लिये बड़ी सुखद अनुभूति है। प्रसंगवश मैं यह कहना चाहता हूँ कि राजीव रंजन प्रसाद जी की तीव्र इच्छा रही है कि मैं इस पत्रिका में कविता के लिये समीक्षा का एक स्तंभ आरंभ करूँ...। ....वैसे यह काम काफ़ी जोख़िम भरा होता है और कई बार लोगों की नाराज़गी भी झेलनी पड़ती है। और..., न मैं अपने-आपको कोई समीक्षक वगैरह ही मानता हूँ। पर उनके अनुरोध को मैं ज्यादा दिनों तक टाल न सका। यह तो राजीव रंजन जी का बड़प्पन है कि मुझे इतना ज़बाबदेहपूर्ण कार्य सौंपना चाहते हैं। भाई, मैं भी तो मूलत: कवि हूँ, वह भी उपेक्षित कवि, बाबा त्रिलोचन के शब्दों में "उस जनपद का जो अभी भूखा-दुखा है।" पर मेरा मानना है कि साहित्य के साथ-साथ साहित्यालोचना भी ज़रूरी है। ये ही वे आँखें हैं जो राहें दिखाती हैं कि हमें किधर जाना है, वर्ना हमारे लिये अँधेरे में गुम हो जाना और भटक जाना बहुत आसान है। लेकिन निस्पृह होकर कटाक्ष करने के बजाय कविता की समीक्षा करना भी उतनी ही कठिन विधा है। जहाँ तक सृजनात्मक और रचनाधारित आलोचना का प्रश्न है, हमारे आलोचकों की अध्ययन-परम्परा भी गहन-गंभीर और संदर्भमूलक नहीं रही है। जिनके पास रही भी है तो वहाँ रचनाकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व को माँजने और गुनने के बजाय आलोचकों द्वारा उनके संबंध में अपनी नकारात्मक टिप्पणी और निष्कर्ष ही अधिक दिये जाते हैं। जो काव्य के पारखी-आलोचक हैं वे भी अपने यशस्वी मायालोक से इतने ग्रस्त रहते हैं कि उनका आलोचना-विवेक भी लगभग आलोचना-अहंकार का पर्याय बन जाता है। अपने-अपने पूर्वग्रह, विवाद और सुविधाओं के लालच और दुराग्रहों के कारण वे आलोचना की खास ज़मीन और वज़ह खोजते हैं, इस कारण तटस्थ नहीं रह पाते। संभवत: इन्हीं कारणों से काव्य-संसार का अब तक न तो समग्र मूल्यांकन हो पाया है, न कवियों की वह प्रतिष्ठा ही हिंदी साहित्य में वह हो पायी है जिसके वे सही मानो में हक़दार थे या हैं जो हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य है। पर अब शायद आज़ादी के साठ साल बाद समालोचकों की नींद शनै:-शनै: खुल रही है। पुराने धाक़ वाले आलोचकों की जगह अब नये आलोचक भी ले रहे हैं, अभी इस क्षेत्र में कई प्रतिष्ठित हस्ताक्षरों का अभ्युदय हुआ हैं यथा; डा. जीवन सिंह, डा. रमाकांत शर्मा ,रेवती रमण इत्यादि। सबकी अपनी ज़मीन हैं और बहुत उर्वर भी हैं जहाँ हम कुछ सीख सकते हैं,समझ सकते हैं। यह हमें आशान्वित करता है कि आने वाले समय में साहित्यकारों के साथ न्याय हो सकेगा।

सच्चाई तो यह है कि खासकर, कविता की कोई सही आलोचना पद्धति होती ही नहीं। सुप्रसिद्ध समालोचक और हिंदी साहित्य के पुरोधा डा. नामवर सिंह का मत यहाँ ध्यातव्य है। जवाहर लाल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रथम पुनर्नवा पाठ्यक्रम में दि. 14 अक्तूबर, 1993 को उन्होंने भाषण देते हुए कहा कि "किसी सिद्धांत का सहारा लेकर यदि कविता को जाँचेगे तो खतरे हैं। चूक हो सकती है। गलतियाँ हो सकती है।....निष्कर्ष के रुप में मैं यही कहूँगा कि कुलमिलाकर मैंने आपको कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। आपको कोई 'केनन' नहीं दिया है। मैंने सिर्फ़ यह कहना चाहा है कि कविता के परख के जो निकष हैं, वह चाबी नहीं है कि हम आपको दे दें कि ताला खोल लीजिएगा। यह हस्तांतरित नहीं किया जाता। अर्जित किया जाता है। हर पाठक अर्जित करता है। यह टिकट 'नॉन ट्रांसफरेबल' है। फिर भी हमलोग ट्रांसफर कर दिया करते हैं । कविता का निकष 'नॉन ट्रांसफरेबल' होता है। हर पाठक, हर सहृदय पाठक स्वयं अर्जित करता है। और वह जजमेंट अपना हुआ करता है। दूसरों की दी हुई चाबी से खोले जाने वाले कमरे और होते हैं और ताले भी और हुआ करते हैं। कविता वह ताला है जिस ताले में हर आदमी किसी दूसरे की दी हुई चाबी नहीं लगाता है। बल्कि खुद अपने-आप खोलता है। अर्थ, रस भावबोध प्राप्त करके और अपना जजमेंट देता है कि मुझे ऐसा लगता है कि हर जजमेंट इस मामले में निहायत इंडीभिडुअल (व्यक्तिगत) होता है । और उस जजमेंट में, अपनी साधना में जितनी ताकत होती है उतनी ही उसको सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होगी।"

पर इस बात की कद्र तभी होगी जब समीक्षक जैसा कहते हैं वैसा करें भी। यानि उनकी कथनी और करनी में भेद न हो। पर होता यह आया है कि स्वार्थपरता और अन्यथा कारणों ( जिनका जिक्र अभी लाज़िमी नहीं होगा) से हमारे समालोचक संवाद की ज़गह विवाद को ही प्रश्रय दे जाते हैं। इस कारण बड़े-बड़े कवि भी गुमनामी के अँधेरे में चले जाते हैं।

मसला यह है कि अगर नामवर जी जैसे लोग कविता के विषय में इतने ईमानदार, सहृदय और उदार रहे हैं तो फिर उनके द्वारा कैसे त्रिलोचन, नागार्जुन, विजेन्द्र, कुमारेन्द्र, केदारनाथ अग्रवाल जैसे बड़े कवियों को समीक्षा की परिधि में लाना भूला दिया गया। उनके काव्य-सौष्ठव की व्याख्या से क्यों परहेज किया गया और सिर्फ़ भूलाया ही नहीं, बल्कि रुपवाद को प्रश्रय देने और अपने किये को उचित ठहराने के लिये निरंतर विचलित करने वाले स्पष्टीकरण भी दिया जाता रहा है, जिससे उनके आलोचना-कर्म के प्रति हिंदी-प्रेमियों में‍ आशंकायें दिनानुदिन गहनतर होती चली गयी क्योंकि छोटे और मँझोले कवियों को जो दर्ज़ा उनके द्वारा हासिल हुआ वह बड़े और कालजयी रचना के रचनाकारों को नहीं। हिंदी के आधुनिक काल मे‍ उनके रुपवादी झुकाव की त्रासद स्थिति यह भी रही है कि कविता की एक धारा सहज और संश्लिष्ट न होकर दु्र्बोध और जटिल हो गयी। निश्चय ही नामवर जी जैसे समालोचकों के द्वारा भी कवितालोचना के क्षेत्र में चूक बरती गयी है जिसे वे अब जाने-अनजाने स्वीकार कर चुके हैं पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि उनका हिंदी साहित्य को अवदान कम है। उन्हें फिर भी कमतर करके आँका नहीं जा सकता। उनके व्यापक अध्ययन और समालोचना -दृष्टि से, अवश्य ही कवियों को आगे आने में सहायता मिली है।

उपर्युक्त बातों से यह स्पष्ट है कि समालोचना और समीक्षा सदैव अनंतिम रहने वाली यात्रा है, कविता की तरह ही। "साहित्यशिल्पी" के कवियों पर माह बार (month-wise) समीक्षा करने से पहले यह बता देना भी यहाँ प्रासंगिक होगा कि यहाँ प्रकाशित सभी कवियों की कविताओं पर राय दे पाना संभव नहीं हो पायेगा, न गुणवत्ता के लिहाज से,न पृष्ठ के आकार के ख्याल से।फिर भी कोशिश महत्तर रूप से यही की जायेगी कि अच्छे कवि छूट न पायें। यहाँ कोई जजमेन्ट या निर्णय भी नहीं दिया जायेगा। यह कोई तुला या निकष नहीं कि अमूक रचना ठीक है या अमूक ख़राब और कमजो़र। इस स्तंभ को यहाँ लाने का मूल मक़सद अपने कवियों से सार्थक संवाद करना है, उनका उत्साह-वर्द्धन करना है। न कि विवाद और बहस खड़ा कर उनका हौसला कम करना। अर्थात हमें कुछ सीखना है, आगे बढ़ना है। आह -आह ,वाह -वाह, बेहरतरीन, मर्मस्पर्शी, मनभावन, इत्यादि शब्द पाठकों के होते हैं। कविताओं को पढ़कर उनके दिल में जो भावनाओं का गुबार उठता है, उसे वे व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। हालकि वे समीक्षक की तरह नहीं कह पाते पर उनकी ही प्रतिक्रिया का ही महत्व अहम होता है क्योंकि उनकी अभिव्यक्ति प्रायोजित नहीं होती। समीक्षा में तो उसके कारण विधान किये जाते हैं कि अमूक रचना की श्रेष्ठता और लोकप्रियता के कौन-कौन से कारक व तत्व हैं।

अगले स्तंभ में मैं साहित्य-विधा में कविता की प्रासंगिकता पर चर्चा करना चाहूँगा। फिर हमलोग यह देखेंगे कि "कविता किन तत्वों से महान बनती है? " तदूपरांत "साहित्य-शिल्पी " के पिछले माह के कवियों की रचनाओं पर चर्चा जिसकी आपको प्रतीक्षा है।

तब तक विश्राम और प्रणाम "साहित्य- शिल्पी" के सुधीजनों को।

24 comments:

  1. समीक्षा स्तंभ का आरंभ होना साहित्य शिल्पी पर नया मील का पत्थर होगा। प्रस्तुत आलेख में जिस तरह सुशील जी नें समालोचना के विभिन्न पहलिओं को छुआ है इससे इस स्तंभ की उपयोगिता का स्वत: अंदाजा जगाया जा सकता है।

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  2. I was waiting for this column, this was necessary.

    Alok Kataria

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  3. पंकज सक्सेना12 दिसंबर 2008 को 8:27 am

    "आह -आह ,वाह -वाह, बेहरतरीन, मर्मस्पर्शी, मनभावन, इत्यादि शब्द पाठकों के होते हैं। कविताओं को पढ़कर उनके दिल में जो भावनाओं का गुबार उठता है, उसे वे व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। हालकि वे समीक्षक की तरह नहीं कह पाते पर उनकी ही प्रतिक्रिया का ही महत्व अहम होता है क्योंकि उनकी अभिव्यक्ति प्रायोजित नहीं होती। समीक्षा में तो उसके कारण विधान किये जाते हैं कि अमूक रचना की श्रेष्ठता और लोकप्रियता के कौन-कौन से कारक व तत्व हैं।"

    सहमत हूँ आपसे।

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  4. प्रस्तावना उम्मीद जगाती है।
    यह पत्रिका को नया आयाम देगा
    शुभकामनाये

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  5. इस स्तंभ को आरंभ करने के लिये “साहित्यशिल्पी” और साथ में सुशील बाबू को धन्यवाद। आज नेट या प्रिंट में खराब कविताओं की भरमार है।इससे जनपक्षधरता की अच्छी कविताओं को आगे आने में मदद मिलेगी। आग्रह होगा कि कस्बाई और दूर-दराज के कवियों पर भी समीक्षक की बराबर नजर रहे ताकि उनकी रचनाओं का भी सही मूल्यांकन हो सके और उनके लेखन को सही दिशा मिल पाये।-अशोक सिंह,जनमत शोध संस्थान ,दुमका(झारखंड)

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  6. सिंह जी और पाण्डेय जी-अशोकद्वय को मेरा धन्यवाद ज्ञापित।

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  7. आपके इस स्तंभ से कवियों में भी बेहतर प्रस्तुत करने की स्पर्धा बढेगी जिसने अंतर्जाल पर साहित्य की प्रस्तुति को गंभीरता प्राप्त होगी और अंतत: साहित्य और हिन्दी का भला होगा।

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  8. इस सुकार्य के लिये धन्यवाद।इस स्तंभ से जहां एक ओर कविता के स्वभाव को समझने में सहुलियत होगी वहीं दूसरी ओर कवियों के कृत्य पर आलोचना भी पढ़्ने को मिलेगी।

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  9. समालोचना के इस स्तंभ के लिये धन्यवद। हमें प्रतीक्षा रहेगी इसकी आगामी कडियों की।

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  10. आपका आलेख पढते ही यह समझ आ गया कि कवियों के लिये कसौटी तैयार हो गही है।

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  11. बहुत बहुत धन्यवाद कि कविता पर एक अलग स्तभ आ रहा हैं। कविता की आलोचना तो सभी करते है आज्कल पर मैं यह जानना चाह्ता हूँ कि "कविता क्या होती है? कैसे लिखी जाती हैं?" क्या उसका कोई रुल होता हैं। और क्या कविता को किसी एक साँचे में ढाला जा सकता हैं। या फिर कविता विधा क्या होती हैं। यही सवाल मैंने मैने अपने सर भी पूछा था कि सर कविता क्या होती हैं? तो उन्होंने कहा कि जब तेरे को पता चल जाए तो मुझे भी बता देना मैं ऊपर जाकर शेक्सपीयर को बताऊँगा। ये सब मैं इसलिए पूछ रहा हूँ कि कुछ एक लोगो ने मेरी रचनाओं पर सवाल उठाए थे कि हम इन्हें क्या माने। विचार,सस्मंरण, ....।उम्मीद करता हूँ कि मेरी बात पर गौर किया जाऐगा। ऊतर की प्रतिक्षा में।

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  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  13. समीक्षा स्तंभ पर सारगर्भित लेख के लिये आभार. निश्चित रूप में यह एक चुनौती पूर्ण कार्य है. कवि जो कुछ भी लिखता है वह उसके स्वंय के मनोभावो का प्रतिरूप होता है और उसका एक दायरा होता है. पाठक और समालोचक उस दायरे को अपनी टिप्पणियों से बडा करते हैं अत: समालोचना से कवि का ही फ़ायदा है और उसके लिये यदि कुछ कडवे घूंट भी पीने पडें तो दवाई समझ कर गटकने में कोई बुराई नहीं है.

    अगले अंक की प्रतीक्षा रहेगी...

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  14. समीक्षा स्तंभ का ...
    अभिनंदन सुशील जी,


    आभार....


    प्रतीक्षा रत हैं ...
    अगले आलेख के लियें....

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  15. काव्यालोचना की निश्चित रूप से प्रासंगिकता है। अंतर्जाल को साहित्य सेवा का गंभीर माध्यम बनाने के लिये इसकी प्रासंगिकता है, इस मंच के स्तर की विवेचना के लिये इसकी आवश्यकता है, स्थापित रचनाकारों की रचनाओं की विशेषताओं से परिचित होने के लिये इस स्तंभ की आवश्यकता है साथ ही नये रचनाकारों को दिशा प्राप्त करने के लिये इस स्तंभ की आवश्यकता है।

    धन्यवाद सुशील कुमार जी इस महत्वपूर्ण आयोजन की जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिये।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  16. सुशील कुमार छोक्कर जी का यह सवाल बड़ा महत्वपूर्ण है कि“"कविता क्या होती है? कैसे लिखी जाती हैं?" क्या उसका कोई रुल होता हैं। और क्या कविता को किसी एक साँचे में ढाला जा सकता हैं। या फिर कविता विधा क्या होती हैं।” ये समस्त सवाल कविता के सौंदर्यशास्त्र से जुड़े सवाल हैं। वैसे मैं इस आलेख में भी कह चुका हूं कि खासकर, कविता की कोई सही,निर्णायक आलोचना पद्धति होती ही नहीं। प्रखर समालोचक और हिंदी साहित्य के पुरोधा डा. नामवर सिंह का मत यहाँ ध्यातव्य है। वैसे इस गुढ़ प्रश्न का एक सीमा तक उत्तर आपको सुप्रसिद्ध समालोचक स्व. आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के एक आलेख “कविता क्या है?” में मिल जायेगा जो उनकी लब्धप्रतिष्ठ आलोचना-पुस्तक ‘चिंतामणि’ का ग्यारहवाँ अध्याय है। आप इसे पढ़ सकते हैं। हमारे दूसरे और तीसरे आलेख में भी एक हद तक इसकी विवेचना की गयी है जिसके प्रकाशन तक आपको प्रतीक्षा करनी होगी। पर इतना तो आप अवश्य गिरह बाँध लें कि मनुष्यता की उच्च भाव-भूमि पर लिखी गयी कविता ही दृश्य में देर तक टिक पायेंगी।वैसे कवि स्वतन्त्र हैं,जो लिखना चाहें लिखें पर समय सबका हिसाब कर देता है।-सुशील कुमार।

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  17. कविता बहुत समय से लिखता रहा हूँ लेकिक कविता क्या होती है यह समझ मुझमें विकसित नही हो सकी है। छौंक्कर की के विचारों से और सुशील जी के उत्तर से यह आश्वासन मिल गया है कि इस स्तंभ से कुछ अवश्य हासिल होगा।

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  18. स्वागत ... इस स्तम्भ से काफ़ी उम्मीदें हैं ....

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  19. बहस चल रही है तो मैं भी अपना पक्ष रखना चाहता हूं... कविता क्या है? मैं समझ्ता हूं कि यह प्रशन ही बेमानी है... भाव जब स्वयं मे श्रंगारित हो कर कोई अर्थ पैदा करते है जिस्से उन भावों को कहने वाला आनदित होता है वही कविता है... कविता का कोई पैरामीटर तय नहीं... सच्ची अभिव्यक्ति सहज रूप से बाहर आये तो कविता हो जाती है... तुकांत कविता के अलावा अतुकांत कविताएं भी तो चलन में हैं ही.. रही बात आलोचना और समालोचना की तो यह टाईम पास की बात है... लकीर पीटने जैसा है... जिसने अपने भावों को जैसा कहना था कह दिया उसने उन भावों के प्रसव का आनंद उठा लिया अब पढने वाला चाहे जो माने, चाहे जो कहे... दोहा कहे, छंद कहे, कवित कहे या अकविता कह कर नई श्रेणी में रख दे... मूल बात है जो लिख रहा है वह सच्चे ह्र्दय से लिखे लोक लुभाने के च्क्कर मे ना पडे, किसी की बेमतलब प्रशंसा या आलोचना न करे , ज्यादा दिमाग जब भी किसी भी कला में लगता है तो वह कला न्याय से च्युत हो जाती है... आलोचना भी जैसा की सुशील जी न कहा की आलोचकों के अपने पूर्वाग्रह होते है के कारण कला का नुकसान ज्यादा और फायदा कम ही करती है... प्रशंसा, सम्मान सब अहंकार पैदा करते है और अहं के बाद कलाकार मर जाता है..... मेरी खोपडी में तो यह बात आती है....

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  20. स्वागत योग्य कदम ,विवेकपूर्ण विवेचना !

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  21. साहित्‍य शिल्‍पी पर कविताओं की समीक्षा का स्‍तंभ आरंभ होना बहुत ही अच्‍छा कदम होगा। हमें आगे की कडियो का इंतजार रहेगा।

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  22. बहुत शुक्रिया सुशील जी, अगले शनिवार को जाता हूँ लाईब्रेरी दिखता हूँ स्व रामचन्द्र शुक्ल जी की वो किताब। आपके आगे के लेखों इंतजार रहेगा जी वैसे मेरे से इंतजार नही होता खैर करना पडेगा।

    उत्तर देंहटाएं

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