जिस काव्य में वर्ण और मात्रा की गणना के अनुसार विराम, तुक आदि के नियम हों, वह छंद है। काव्य के लिए छंद उतना ही अनिवार्य है जितना भवन के निर्माण के लिए गारा पानी। चोली दामन का संबंध है दोनों में। यह अलग बात है कि आजकल अनेक कवियों की ऐसी जमात है जो इसकी अनिवार्यता को गौण समझती है। भले ही कोई छंद को महत्व न दे किन्तु इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि इसके प्रयोग से शब्दों में, पंक्तियों में संगीत का अलौकिक रसयुक्त निर्झर बहने लगता है। सुर-लय छंद ही उत्पन्न करता है, गद्य नहीं। गद्य में पद्य हो तो उसके सौंदर्य में चार चाँद लग जाते हैं किंतु पद्य में गद्य हो तो उसका सौंदर्य कितना फीका लगता है, इस बात को काव्य-प्रेमी भली-भांति जानता है।

छंद के महत्व के बारे में कविवर रामधारीसिंह 'दिनकर' के विचार पठनीय हैं "छंद-स्पंदन समग्र सृष्टि में व्याप्त है। कला ही नहीं जीवन की प्रत्येक शिरा में यह स्पंदन एक नियम से चल रहा है। सूर्य, चंद्र गृहमंडल और विश्व की प्रगति मात्र में एक लय है जो समय की ताल पर यति लेती हुई अपना काम कर रही है। ऐसा लगता है कि सृष्टि के उस छंद-स्पंदनयुक्त आवेग की पहली मानवीय अभिव्यक्ति कविता और संगीत थे।" (हिंदी कविता और छंद)

छंद-स्पंदन समग्र सृष्टि में व्याप्त है। कला ही नहीं जीवन की प्रत्येक शिरा में यह स्पंदन एक नियम से चल रहा है। सूर्य, चंद्र गृहमंडल और विश्व की प्रगति मात्र में एक लय है जो समय की ताल पर यति लेती हुई अपना काम कर रही है। ऐसा लगता है कि सृष्टि के उस छंद-स्पंदनयुक्त आवेग की पहली मानवीय अभिव्यक्ति कविता और संगीत थे। - रामधारी सिंह ’दिनकर’

प्रथम छंदकार पिंगल ऋषि थे। उन्होंने छंद की कल्पना (रचना) कब की थी, इतिहास इस बारे में मौन है। किन्तु छंद उनके नाम से ऐसा जुड़ा कि वह उनके नाम का पर्याय बन गया। खलील-बिन-अहमद जो आठवीं सदी में ओमान में जन्मे थे; के अरूज़ छंद की खोज के बारे में कई जन श्रुतियां है। उनमें से एक है कि उन्होंने मक्का में खुदा से दुआ की कि उनको अद्भुत विद्या प्राप्त हो। क्योंकि उन्होंने दुआ सच्चे दिल से की थी, इसलिए वह कबूल की गई। एक दिन उन्होंने धोबी की दुकान से 'छुआ-छु, छुआ-छु’ की मधुर ध्वनि सुनी। उस मधुर ध्वनि से उन्होंने अरूज़ की विधि को ढूँढ निकाला। अरबी-फ़ारसी में इन्कलाब आ गया। वह पंद्रह बहरें खोजने में कामयाब हुए। उनके नाम हैं- हजज, रजज, रमल, कामिल, मुनसिरह, मुतकारिब, सरीअ, मुजारह, मुक़्तजब, मुदीद, रूफ़ीफ़, मुज़तस, बसीत, बाफ़िर और तबील। चार बहरें- मुतदारिक, करीब, मुशाकिल और ज़दीद कई सालों के बाद अबुल हसीन ने खोजी। हिंदी में असंख्य छंद है। प्रसिद्ध हैं - दोहा, चौपाई, सोरठा, ऊलाल, कुंडिलया, बरवै, कवित्त, रोला, सवैया, मालती, मालिनी, गीतिका, छप्पय, सारंग, राधिका, आर्या, भुजंगप्रयात, मत्तगयंद आदि।

राग-रागनियाँ भी छंद हैं। यहाँ यह बतलाना आवश्यक हो जाता है कि उर्दू अरू़ज में वर्णिक छंद ही होते हैं जबकि हिंदी में वर्णिक छंद के अतिरक्त मात्रिक छंद भी। वर्णिक छंद गणों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं और मात्रिक छंद मात्राओं द्वारा।

गणों को उर्दू में अरकान कहते हैं। गण या अरकान लघु और गुरु वर्णों के मेल से बनते हैं। लघु वर्ण का चिह्न है - । (एक मात्रा) और गुरु वर्ण का- २ (दो मात्राएं) जैसे क्रमशः 'कि' और 'की'। गण आठ हैं- मगण (२२२), भगण (२।।), जगण (।२।) सगण(।।२) नगण (।।।) यगण (।२२) रगण (२।२) और तगण (२२।)।

उर्दू में दस अरकान हैं- फऊलन (।२।।), फाइलुन (२।-।।), मु़फाइलुन (12211), फाइलातुन (21211), मुसतफइलुन (1111111), मुतफाइलुन (112111), मफ़ाइलुन (।२।-।।।), फ़ाअलातुन ( २-।।), मफ़ऊलान (11221) और मसतफअलुन (।।।।-।-।।)।

शंकर, निराला, त्रिपाठी, बिस्मिल तथा अन्य कवि शायर छंदों की लय-ताल में जीते थे एवं उनको नित नई गति देते थे, किन्तु अब समस्या यह है कि अपने आप को उत्तम गज़लकार कहने वाले वतर्मान पीढ़ी के कई कवि छंद विधान को समझने में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं, उससे कतराते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भवन की भव्यता उसके अद्वितीय शिल्प से आँकी जाती है।


"प्रथम दो अरकान - फऊलन क्रमश "सवेरा" या "संवरना" तथा "जागना" या "जागरण" पाँच मात्राओं के शब्दों के वज़नों में आते हैं और शेष आठ अरकान सात मात्राओं के शब्दों के वज़नों में; जैसे-सवेरा है, जागना है। ये गण और अरकान शेर में वज़न कैसे निर्धारित करते हैं इसको समझना आवश्यक है। हिन्दी में एक वर्णिक छंद है- भुजंग प्रयात। इसमें चार यगण आते हैं। हर यगण में पहले लघु और फिर दो गुरु होते हैं यानी- (१२२)। लघु की एक मात्रा होती है और गुरु की दो मात्राएँ होती हैं। चार यगणों के छंद ’भुजंग प्रयात’ की पंक्ति यूँ होगी-
सवेरे सवेरे कहाँ जा रहे हो
१२२ १२२ १ २ २ १२ २
इन मात्राओं का जोड़ है =२०
लेकिन वर्णों का जोड़ है =१२

उर्दू में इस छंद को मुतकारिब कहते हैं लेकिन मुतकारिब और भुजंग प्रयात में थोड़ा अन्तर है। भुजंग प्रयात की प्रत्येक पंक्ति में वर्णों की संख्या १२ है और मात्राओं की २० लेकिन उर्दू मुतकारिब में वर्णों की संख्या १८ या २० भी हो सकती है। मसलन-
इधर से उधर तक ,उधर से इधर तक -१८
या
इधर चल उधर चल ,उधर इधर चल - २०

यूँ तो उर्दू के छंद वर्णिक कहलाते हैं लेकिन ठहरते हैं मात्रिक ही। क्योंकि एक गुरु के स्थान पर दो लघु भी आ सकते हैं उसमें।

क्योंकि उर्दू गज़ल फ़ारसी से और हिन्दी गज़ल उर्दू से आई है, इसलिये फ़ारसी और उर्दू अरूज़ का प्रभाव हिन्दी गज़ल पर पड़ना स्वाभाविक था। इसके प्रभाव से भारतेंदु हरिश्चंद्र, नथुराम शर्मा शंकर, राम नरेश त्रिपाठी, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला आदि कवि भी अछूते नहीं रह सके। रामनरेश त्रिपाठी ने तो हिंदी-उर्दू छंदों व उससे संबद्ध विषयों पर 'काव्यकौमुदी' पुस्तक लिखकर अभूतपूर्व कार्य किया। कविवर शंकर और निराला के छंद के क्षेत्र में किए गए कार्यों के बारे में दिनकर जी लिखते हैं- 'हिन्दी कविता में छंदों के संबंध में शंकर की श्रुति-चेतना बड़ी ही सजीव थी। उन्होंने कितने ही हिंदी-उर्दू के छंदों के मिश्रण से नए छंद निकाले। अपनी लय-चेतना के बल पर बढ़ते हुए निराला ने तमाम हिंदी उर्दू-छंदों को ढूँढ डाला है और कितने ही ऐसे छंद रचे जो नवयुग की भावाभिव्यंजना के लिए बहुत समर्थ है। (हिन्दी कविता और छंद)

उस काल में एक ऐसे महान व्यक्ति का अवतरण हुआ जो अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्व और प्रेरक कृतित्व से अन्यों के लिए अनुकरणीय बना। हिंदी और उर्दू के असंख्य कालजयी अशआर के रचयिता व छंद अरूज़ के ज्ञाता पं रामप्रसाद बिस्मिल के नाम को कौन विस्मरण कर सकता है? मन की गहराइयों तक उतरते हुए उनके अशआर की बानगी तथा बहरों की बानगी देखिए-
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है।


जैसे कि गालिब के बारे में कहा जाता है कि 'गालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और' ठीक वैसे ही 'बिस्मिल' के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि 'बिस्मिल' का भी अंदाजे-बयाँ शायरी के मामले में बेजोड़ है, उनका कोई सानी नहीं मिलता है। उनकी रचनाओं का प्रभाव अवश्य ही मिलता है; उन तमाम समकालीन शायरों पर जो उस ज़माने में इश्क-विश्क की कविताएं लिखना छोड़कर राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत रचनाएं लिखने लगे थे। कितनी विचित्र बात है कि बिस्मिल के कुछ एक शेर तो ज्यों के त्यों अन्य शायरों ने भी अपना लिए और वे उनके नाम से मशहूर हो गए। - मदनलाल वर्मा 'क्रांत'

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा

वतन की गम शुमारी का कोई सामान पैदा कर
जिगर में जोश, दिल में दर्द, तन में जान पैदा कर

नए पौधे उगें, शाखें फलें-फूलें सभी बिस्मिल
घटा से प्रेम का अमृत अगर बरसे तो यूँ बरसे

मुझे हो प्रेम हिंदी से, पढूँ हिंदी, लिखूँ हिंदी
चलन हिंदी चलूँ, हिंदी पहनना ओढ़ना खाना

मदनलाल वर्मा 'क्रांत' ने 'सरफ़रोशी की तमन्ना' पुस्तक मे ठीक ही लिखा है, "जैसे कि गालिब के बारे में कहा जाता है कि 'गालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और' ठीक वैसे ही 'बिस्मिल' के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि 'बिस्मिल' का भी अंदाजे-बयाँ शायरी के मामले में बेजोड़ है, उनका कोई सानी नहीं मिलता है। उनकी रचनाओं का प्रभाव अवश्य ही मिलता है; उन तमाम समकालीन शायरों पर जो उस ज़माने में इश्क-विश्क की कविताएं लिखना छोड़कर राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत रचनाएं लिखने लगे थे। कितनी विचित्र बात है कि बिस्मिल के कुछ एक शेर तो ज्यों के त्यों अन्य शायरों ने भी अपना लिए और वे उनके नाम से मशहूर हो गए।"

शंकर, निराला, त्रिपाठी, बिस्मिल तथा अन्य कवि शायर छंदों की लय-ताल में जीते थे एवं उनको नित नई गति देते थे, किन्तु अब समस्या यह है कि अपने आप को उत्तम गज़लकार कहने वाले वतर्मान पीढ़ी के कई कवि छंद विधान को समझने में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं, उससे कतराते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भवन की भव्यता उसके अद्वितीय शिल्प से आँकी जाती है। कुछ साल पहले मुझको दिल्ली में एक कवि मिले जो गज़ल लिखने का नया-नया शौक पाल रहे थे। उनके एक-आध शेर में मैंने छंद-दोष पाया और उनको छंद अभ्यास करने की सलाह दी। वह बोले कि वह जनता के लिए लिखते हैं, जनता की परवाह करते हैं; छंद-वंद की नहीं। मैं मन ही मन हँसा कि यदि वह छंद-वंद की परवाह नहीं करते हैं तो क्या गज़ल लिखना ज़रूरी है उनका? गज़ल का मतलब है छंद की बंदिश को मानना, उसमें निपुण होना। गज़ल की इस बंदिश से नावाकिफ़ को उर्दू में खदेड़ दिया जाता है। मुझको एक वाक्या याद आता हैं। एक मुशायरे में एक शायर के कुछ एक अशआर पर जोश मलीहाबादी ने ऊँचे स्वर में बार-बार दाद दी। कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी (जो उनके पास ही बैठे थे) ने उनको अपनी कुहनी मार कर कहा- 'जोश साहिब क्या कर रहे हैं आप? बेवज़्न अशआर पर दाद दे रहे हैं आप? कयामत मत ढाइए।' जोश साहिब जवाब में बोले- 'भाई मेरे दाद का ढंग तो देखिए।'

आधुनिक काव्य के लिए छंद भले ही अनिवार्य न समझा जाए किन्तु गज़ल के लिए है। इसके बिना तो गज़ल की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। लेकिन हिंदी के कुछ ऐसे गज़लकार हैं जो छंदों से अनभिज्ञ हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो उनसे भिज्ञ होते हुए भी अनभिज्ञ लगते हैं।

39 comments:

  1. प्राण भाई साहब
    इस कडी मेँ आपकी विद्वत्ता और कविता / गज़ल कहने की बारीकियोँ के बारे मेँ जानकारी मिली है
    बहुत अच्छा लिखा है आपने
    इसी भाँति ज्ञान वर्धन करवाते रहीयेगा -
    विनीत्,
    -लावण्या

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  2. कृपया फाइलातुन की गिनती , मुफाईलुन की गिनती को
    पहले वाली के हिसाब से चेक करें ......

    मुझे शायद शक है

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  3. पंकज सक्सेना29 दिसंबर 2008 को 8:20 am

    हिन्दी और उर्दू दोनों को सामने रख कर इस जटिल विषय को आपने समझाया है। समझनें में बहुत आसानी हुई, कुछ प्रयोग कर देखता हूँ कि कितना सफल हुआ।

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  4. अगर अरकानों के आगे दी गयी लघु-गुरु मात्राओ को आधार बना कर ग़ज़ल लिखी गयी तो क्या सही है? ध्वनि और मात्रा की दिक्कत तो नहीं होगी। कुछ लोगों का मानना है कि उच्चारण से ग़ज़ल की मात्रायें निर्धारित होती हैं?

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  5. Nicely composed article.

    Alok Kataria

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  6. प्राण शर्मा जी

    आपके आलेख की मात्र दो कड़ियों में विधाओं की लगभग विलुप्तप्रायः जानकारी की इतनी बारीकी और गहराई से उपलब्धता, समस्त पाठकों के लिए अनुभव है. इस कड़ी के माध्यम से आपने साहित्य शिल्पी पर सचमुच प्राण डाल दिये हैं.

    साधुवाद

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  7. आपकी बरगद सरीखी छांह मिल रही है।इस सौभाग्य पर गदगद हूं।
    काश ! कुछ सीख सकूं।

    प्रवीण पंडित

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  8. bahut achhi jankari rahi,shayad jyada samjhne ke liye hame ek baar aur gaur se padhna padega, aur jarur padhenge.

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  9. परम आदरणीय प्राण साहब,
    तुलनात्मक्ता के साथ, लिखा गया आपका यह सुन्दर लेख वाक़ई, कविता और ग़ज़ल के विषय में ब्ला॓गजगत के कई चिट्ठाकारों के लिए, मील का पत्थर साबित होगा । सख़्त ज़ुरूरत है इधर, इन जानकारियों की ।

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  10. बहर और छंद के एक साथ विवरण से मैं एक शंका से घिर गयी हूँ, क्या जो बहरें खोजी गयी हैं उनमें ही बंध कर ग़ज़ल लिखना अनिवार्य है।

    क्या रदीफ काफिया के बंधन को मानते हुए हिन्दी की किसी छंद प्रणाली को आधार बना कर ग़ज़ल लिखी गयी तो वह ख़ारिज हो जायेगी?

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  11. Nidhi ji
    Kewal radeef aur kafiya ka bandhan hi jaroori nahin hai sabase adhik jaroori hai sher ka bahar men hona.Bahar ke arkaan aur radeef kafiyon ka nirdharan ghazal ke pahale sher (matala) men hi ho jata hai.Jo arkaan (bahar) aapne matale men liye hain unhen poori ghazal men nibhana aawashyak hai. Yadi aage ke sheron men bahar nahin nibhati hai to wah bahar se khariz kahi jaayegi.
    Chandrabhan Bhardwaj

    उत्तर देंहटाएं
  12. Nidhi ji
    Kewal radeef aur kafiya ka bandhan hi jaroori nahin hai sabase adhik jaroori hai sher ka bahar men hona.Bahar ke arkaan aur radeef kafiyon ka nirdharan ghazal ke pahale sher (matala) men hi ho jata hai.Jo arkaan (bahar) aapne matale men liye hain unhen poori ghazal men nibhana aawashyak hai. Yadi aage ke sheron men bahar nahin nibhati hai to wah bahar se khariz kahi jaayegi.
    Chandrabhan Bhardwaj

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  13. आलेख से बहर पर महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। कुछ और उदाहरण होने चाहिये थे। चंद्रभान जी की बात से भी कुछ स्पष्टता आयी है। कृपया यह भी स्पष्ट कर दीजिये कि ग़ज़ल के पहले शेर में निभाया गया हिन्दी का कोई छंद-प्रकार (रोला/दोहा/सोरठा आदि) जिसका भली प्रकार निर्वाह संपूर्ण ग़ज़ल में उसके विधान के अनुसार हुआ हो तो क्या गलत है? यह एक खटक है जो अगर आप समझा सकें तो संभव है मैं इस विधा में हाथ आजमा सकूं।

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  14. बिस्मिल का जो आपने उद्धरन दिया वह मेरे लिये एकदम नया तथ्य था। ग़ज़ल पर यह स्तंभ बहुत अच्छा बन पढा है।

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  15. जानकारीपूर्ण आलेख प्रस्तुत करने के लिये प्राण शर्मा जी का धन्यवाद।

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  16. हिन्दी-हिन्दु-हिन्दुस्तान29 दिसंबर 2008 को 4:34 pm

    बहर में दुष्यंत कुमार के संशोधन (तोड-फोड) को किस नजर से देखा जाना चाहिये। प्राण शर्मा जी प्रसंग के साथ इसे भी बतायें। जब ग़ज़ल की परिभाषा ही समय के साथ बदल गयी तो क्या और कितना परिवर्तन हो सकता है जिससे यह छंद जिन्दा भी रहे और सीखा भी जा सके (हम जैसे मोटी बुद्धी के कवि भी लिख सकें)।

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  17. आदरणीय गुरु देव
    शब्द शब्द आप के इस लेख का सदा स्मरण में रखने योग्य है....कोटिश धन्यवाद इस कृपा के लिए.
    नीरज

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  18. CHUNKI GAZAL URDU SE HINDI MEIN
    AAYEE HAI ISLIYE URDU KEE BAHRE
    BHEE SAATH-SAATH AA GAYEE HAIN.
    GAZAL HINDI CHHANDON MEIN BHEE
    KAHEE JAA SAKTEE HAI.KUCHH SAAL
    PAHLE MAINE COVENTRY MEIN BASE
    EK URDU KE SHAYAR KO SANT KABEER
    KAA DOHA EK-DO PARIVARTON KE SAATH
    SUNAAYA-------
    LAALEE MERE LAAL KEE
    JAB DEKHUN TAB LAAL
    LAALEE DEKHNE MAI GAYEE
    MAI BHEE HO GAYEE LAAL
    VE SUN KAR JHOOM UTHE.KAH UTHE,
    "Wah,kyaa sufiaanaa andaaz hai".
    jab maine unhe bataayaa ki ye
    sher nahin,sainkdon saal pahle likha Kabeer Dass jee kaa doha hai.
    Sun kar ve aur bhee jhoom uthe.
    Ab dekhiye mahakavi Maithlee
    Sharan Gupt jee kee vaarnik chhand
    "bhujangee" mein likhee nimnlikhit
    do panktian kisee sher yaa sher ke
    matle se kam nahin hain---
    Bhale hee n ho ek bhee sampdaa
    Rahe aatm vishwas poora sadaa
    Aapkee jigyaasaa ke liye main
    bataa doon ki Bhujangee chhand mein
    teen yagan aur ant mein ek laghu
    aur ek guru hote hain.Ek aur guru
    lagaane se Bhujang prayat chhand
    ban jayega.Maslan---
    Savere savere kahan jaa rahe ho
    Bahar ko ghataayaa-badhaayaa
    jaa sakta hai ,lekin misra vazan se nahin girnaa chaahiye.Is se
    sambandhit jaankaaree lekh ke
    aagaamee anshon mein padhiye.

    उत्तर देंहटाएं
  19. धन्यवाद प्राण जी इस स्पष्टीकरण के लिये। वस्तुत: मात्रिक छंद में ग़ढना आसान होता है, स्कूल के दिनों से ही अध्यापकों नें मात्रायें गिनवा गिनवा कर ठोस कर दिया है। मैं प्रयास करूंगी और यदि सफल होती हूँ तो इसका श्रेय आपका होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  20. HINDI,HINDU,HINDUSTAN JEE,GAZAL KE
    BAHAR YAA CHHAND KAA HONA BAHUT
    AAVASHYAK HAI.KAYEE SHAYARON NE
    AAZAAD GAZLEN BHEE KAHEE LEKIN VE
    KAMYAAB NAHIN HO SAKE.KAYEEON NE
    "MAHIYA"YAA"TAPPA"KEE TARAH TEEN
    MISRON KE ASHAAR BHEE KAHE ,UNKO
    BHEE KAMYABEE HAASIL NAHIN HO SAKEE.
    DUSHYANT KUMAR BAHUT ACHCHH
    SHAYAR THE.GAZAL MEIN UNKEE DEN
    ATULNIYA HAI.KAHIN-KAHIN BAHRON SE
    UNHONE CHHED-CHHAD KEE HAI,YAH
    UNKEE ANBHIGYATAA THEE.

    उत्तर देंहटाएं
  21. प्राण शर्मा जी !


    बहुत अच्छी जानकारी आप दे रहे हैं...

    बहुत आवश्यकता थी..ऐसे लेखों की....

    आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  22. माफ़ कीजिये .दो नहीं अधिक गलतियां हैं.....नाप तौल में.....थोडा जल्दी चेक करके बता दें तो महरबानी होगी ...अगर नहीं हैं तो भी बता दीजिये के महसूस क्यूं हो रही हैं..??
    भाषा चाहे जो भी हो ..जबान को तो बोलते वक्त लफ्ज़ के हलके भारी होने का अहसास हो ही जाता है .................मैं सुबह से जवाब के इंतज़ार में हूँ .....
    कम से कम सवाल तो खारिज ना कीजिये ....

    उत्तर देंहटाएं
  23. BHAI MANU JEE,KAEE BAAR TYPE KARNE
    SE KOEE AKSHAR BADH YAA CHHOOT
    JAATAA HAI.IN RUQNON KEE GANNA
    IS PRAKAAR HAI---
    MFAAEELUN-12211
    FAILATUN--21211
    MUSTFAILUN-1111111
    MUTFAILUN--112111
    MAFOOLATU--11221

    उत्तर देंहटाएं
  24. प्राण जी को सादर प्रणाम...इस भाग-२ की बेसब्री से प्रतिक्षा थी...ढ़ेर सारे शक दूर हुये.
    मगर मैं पिछले अंक के अपने सवाल को लेकर अभी तक उतावला हूँ.
    अनुकंपा होगी सर यदि कुछ कहें...

    उत्तर देंहटाएं
  25. GAUTAM JEE,MUJHE KHED HAI KI PICHLE
    ANK MEIN AAPKE PRASHN KAA UTTAR N
    DE SAKA.
    AAM BOLCHAAL KEE BHASHA SE MATLAB
    HAI-AASAN BHASHA.BAHUT SE SHABDON
    KAA UCHCHAARAN HUM GALAT KARTE HAIN
    JAESE-NAHIN KO NAEEN BOLTE HAIN
    AUR MAALOOM KO MAALUM.LEKIN LIKHENGE HUM NAHIN AUR MAALOOM HEE.
    JO JAESAA SHABD HAI USKO VAESAA HEE
    LIKHNA CHAAHIYE,YUN TO SAINKDON
    SHABD "SLANG"BAN GAYE HAIN

    उत्तर देंहटाएं
  26. प्राण जी के इस लेख का दूसरा भाग पढ़ कर और भी बहुत बातें सीखने को मिलीं और आगामी
    अंकों में अगले भागों का इंतज़ार है। ग़ज़ल की उत्पत्ति, संस्कृत और हिंदी छंद सम्मत ग़ज़ल की बहरें और अनेक आवश्यक जानकारियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह लेख हिंदी ग़ज़ल साहित्य में अद्वितीय है।
    अगले भाग की प्रतीक्षा है।

    उत्तर देंहटाएं
  27. halkaa saa fark ab bhi hai....
    zabaan ke lihaaz se yaa premi hraday ki gungunaahat ke hisaab se......aap dekh lijiyegaa ....sawere fir aayenge aapse seekhne.....aur apni kuchh kahne....

    उत्तर देंहटाएं
  28. Manu jee,jo halkee see kamee nazar
    aayee aapko,vo mujhe bhee samjha den.Bhalaee kaa kaam hai.Main aabhaaree hoongaa aapkaa.Mujhse kuchh chhoot bhee sakta hai.

    उत्तर देंहटाएं
  29. ji,
    asal mein main baahar waale lekh se aur bheetar waale comment se...aapas me taal mel naheen baitha paa rahaa hoon...
    ho sakta hai ke lekh ko abhi theek se naa sudhaara ho ...jaise ke savere FAILATUN kuchh aur tha ab kuchh aur hai....
    khair...
    likhne me aur bolne me koi maamooli firk ko likh ke bayaan karnaa mere liye bhi mushkil kaam hai...

    aapne lekh mein KHADED DIYE JAATE HAIN ..jaise shabd kahe to aa gayaa tha...kyunke ye shabd aaj tak dushman senaa yaa aawara pashuon ke liye sune the.....ab ADAB me bhi chalan hone lagaa hai maloom naa tha...???

    उत्तर देंहटाएं
  30. प्राण शर्मा जी ,

    मुझे तो वैसे ग़ज़ल लिखना नही आता , पर आपने कहा है तो मैं कुछ सीखने की कोशिश करता हूँ , इस लेख के माध्यम से नई जानकारियां मिली

    बहुत ही अच्छी प्रस्तुती , साहित्य शिल्पी की टीम को बधाई .

    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  31. Mai kya kahu is lekh ke vishay me.

    Excellent Excelllent and Excellent.

    Sabhee ko dhanyvaad.



    -- Avaneesh tiwari

    उत्तर देंहटाएं
  32. माफी चाहता हूँ देर से आया, प्राण जी को प्रणाम.
    सर, एक शंका है कि आप फ़ाइलातुन को 2122 के वजाए 21211 मे क्यों लिख रहें है. ये "लुन " ko aap 11 क्यों लिख रहें है ?
    क्या ये "11" 2 kaa subsitute है?
    आभारी रहूँगा.
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  33. PRIY SATPAL JEE,AAPTO GAZAL KEE
    SAAREE BAREEKION KO JAANTE HAIN.
    AAPKO KUCHH BATAANAA SOORAJ KO
    DEEPAK DIKHAANE WAALEE BAAT HO
    JAAYEGE.PHIR BHEE AAPNE SHAYAD
    LEKH KEE IN PANKTION PAR DHYAAN
    NAHIN DIYA HAI"YUN TO URDU KE CHHAND VAARNIK KAHLAATE HAIN LEKIN
    THAHATE MAATRIK HEE HAIN KYONKI EK
    GURU KE STHAAN PAR DO LAGHU BHEE AA
    SAKTE HAIN"AAPNE FAILATUN KEE BAAT
    KEE HAI.SAITAANTIK TAUR PAR "TUN"
    MEIN DO LAGHU HAIN AUR DO LAGHUON
    SE EK GURU BANTAA HAI.AAPKA KAHNA
    SAHEE HAI KI "TUN" YANI 11 KAA 2
    SUBSTITUTE HAI.

    उत्तर देंहटाएं
  34. sir,
    Namaste,
    sir aap itna mat ooper chaRao ki neeche na aa sakeN, ye aapka baRapan haijo mujhe aap shayar samjhate haiN. aapki baat sahi hai ,lekin phir kyon na hum faa-i-laa-tun ko 11 1 11 11 hii likhen phir ye to matra ginne vali hi baat ho gayee.
    do laghu ke sthaan par ek guru to ek tarah ke छoot hai niyam nahi, vo bhi kuch ek baharoN me.
    ab agar hum aise koshish kareN. ki faa-i-laa-tun ko 11' 1' 11' 11 x2
    to ye likha jayega:
    जन गण मन है, सब अनबन है
    11 11 11 1, 11 11 11 1,
    ab ye to phir
    2221,2221 vazan ho jayega, behar hii badal jayegee.Hum kyon bahroN ko matrik banayeN.varnoN me kya gadbad hai.
    hum jab hindi ke chandoN se comparison karte haiN to sab mix ho jata hai, "ghachol pai janda".
    aap baRe ustad shayar haiN me to adna sa student hooN. kripya merii shankaa ka samadhaan kareN.
    kind regards
    khyaal

    उत्तर देंहटाएं
  35. PRIY SATPAL JEE,PATHKON KO
    SAMJHAANE KAA MAINE SARAL TAREEKA
    YEHEE DHOONDA HAI Hindi ke hisaab
    se ki jahan "FA"AAYA HAI USKO
    GURU LIKHUN AUR JAHAN "TUN"aayaa
    hai do laghu likhun.Pathkon ko
    samajhne mein suvidha rahegee.ye
    to aap bhee jaante hai ki do
    laghuon ke jod se ek guru bantaa
    hai.
    Agar aap chaahte hain ki "TUN"
    KO GURU likhun to mujhe koee
    aetraaz nahin.

    उत्तर देंहटाएं
  36. प्राण जी!
    लेख वाकई जानदार है. हिंदी छंदों को गजल में ढालने से कुछ समस्याएं उत्पन्न होती हैं दोहा-गजल को लेकर मतभेद है. दोहा के दोनों पदों के अंत में गुरु-लघु हों अनिवार्य है. दोहा-गजल में इस नियम का पालन करें तो हर शे'र दोनों मिसरों में काफिया-रदीफ़ एक सा होगा. क्या गजल में इसकी अनुमति है. यदि हाँ तो ऐसी गजल का कोइ खास नाम है क्या? यदि नहीं तो एक पंक्तो को छोड़कर एक पंक्ति में सम तुकांत होने पर उसे दोहा-गजल कैसे कहेंगे? क्या दोहा गजल के हर शे'र को दोहा नहीं होना चाहिए? कृपया मार्ग दर्शन कीजिये.

    उत्तर देंहटाएं
  37. तू गाता चल ए यार कोई कायदा न देख,
    कुछ अपना ही अन्दाज़ हो तो प्यारी गज़ल होती है।

    उत्तर देंहटाएं
  38. शर्मा सर जी,
    ग़ज़ल के वज़न को नापने का नियम मुझे विस्तार से सीखना है. क्या आप मुझ जैसे निरक्षर को सिखाने का प्रयत्न करेंगें?
    अगर आप मुझ पर कृपा करेंगें तो मैं आपकी आभारी रहूँगीं.
    धन्यवाद सहित
    उषा

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