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सोमवार, २९ दिसम्बर २००८

बहर और छंद [उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल - २] - प्राण शर्मा



जिस काव्य में वर्ण और मात्रा की गणना के अनुसार विराम, तुक आदि के नियम हों, वह छंद है। काव्य के लिए छंद उतना ही अनिवार्य है जितना भवन के निर्माण के लिए गारा पानी। चोली दामन का संबंध है दोनों में। यह अलग बात है कि आजकल अनेक कवियों की ऐसी जमात है जो इसकी अनिवार्यता को गौण समझती है। भले ही कोई छंद को महत्व न दे किन्तु इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि इसके प्रयोग से शब्दों में, पंक्तियों में संगीत का अलौकिक रसयुक्त निर्झर बहने लगता है। सुर-लय छंद ही उत्पन्न करता है, गद्य नहीं। गद्य में पद्य हो तो उसके सौंदर्य में चार चाँद लग जाते हैं किंतु पद्य में गद्य हो तो उसका सौंदर्य कितना फीका लगता है, इस बात को काव्य-प्रेमी भली-भांति जानता है।

छंद के महत्व के बारे में कविवर रामधारीसिंह 'दिनकर' के विचार पठनीय हैं "छंद-स्पंदन समग्र सृष्टि में व्याप्त है। कला ही नहीं जीवन की प्रत्येक शिरा में यह स्पंदन एक नियम से चल रहा है। सूर्य, चंद्र गृहमंडल और विश्व की प्रगति मात्र में एक लय है जो समय की ताल पर यति लेती हुई अपना काम कर रही है। ऐसा लगता है कि सृष्टि के उस छंद-स्पंदनयुक्त आवेग की पहली मानवीय अभिव्यक्ति कविता और संगीत थे।" (हिंदी कविता और छंद)


छंद-स्पंदन समग्र सृष्टि में व्याप्त है। कला ही नहीं जीवन की प्रत्येक शिरा में यह स्पंदन एक नियम से चल रहा है। सूर्य, चंद्र गृहमंडल और विश्व की प्रगति मात्र में एक लय है जो समय की ताल पर यति लेती हुई अपना काम कर रही है। ऐसा लगता है कि सृष्टि के उस छंद-स्पंदनयुक्त आवेग की पहली मानवीय अभिव्यक्ति कविता और संगीत थे। - रामधारी सिंह ’दिनकर’

प्रथम छंदकार पिंगल ऋषि थे। उन्होंने छंद की कल्पना (रचना) कब की थी, इतिहास इस बारे में मौन है। किन्तु छंद उनके नाम से ऐसा जुड़ा कि वह उनके नाम का पर्याय बन गया। खलील-बिन-अहमद जो आठवीं सदी में ओमान में जन्मे थे; के अरूज़ छंद की खोज के बारे में कई जन श्रुतियां है। उनमें से एक है कि उन्होंने मक्का में खुदा से दुआ की कि उनको अद्भुत विद्या प्राप्त हो। क्योंकि उन्होंने दुआ सच्चे दिल से की थी, इसलिए वह कबूल की गई। एक दिन उन्होंने धोबी की दुकान से 'छुआ-छु, छुआ-छु’ की मधुर ध्वनि सुनी। उस मधुर ध्वनि से उन्होंने अरूज़ की विधि को ढूँढ निकाला। अरबी-फ़ारसी में इन्कलाब आ गया। वह पंद्रह बहरें खोजने में कामयाब हुए। उनके नाम हैं- हजज, रजज, रमल, कामिल, मुनसिरह, मुतकारिब, सरीअ, मुजारह, मुक़्तजब, मुदीद, रूफ़ीफ़, मुज़तस, बसीत, बाफ़िर और तबील। चार बहरें- मुतदारिक, करीब, मुशाकिल और ज़दीद कई सालों के बाद अबुल हसीन ने खोजी। हिंदी में असंख्य छंद है। प्रसिद्ध हैं - दोहा, चौपाई, सोरठा, ऊलाल, कुंडिलया, बरवै, कवित्त, रोला, सवैया, मालती, मालिनी, गीतिका, छप्पय, सारंग, राधिका, आर्या, भुजंगप्रयात, मत्तगयंद आदि।

राग-रागनियाँ भी छंद हैं। यहाँ यह बतलाना आवश्यक हो जाता है कि उर्दू अरू़ज में वर्णिक छंद ही होते हैं जबकि हिंदी में वर्णिक छंद के अतिरक्त मात्रिक छंद भी। वर्णिक छंद गणों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं और मात्रिक छंद मात्राओं द्वारा।

गणों को उर्दू में अरकान कहते हैं। गण या अरकान लघु और गुरु वर्णों के मेल से बनते हैं। लघु वर्ण का चिह्न है - । (एक मात्रा) और गुरु वर्ण का- २ (दो मात्राएं) जैसे क्रमशः 'कि' और 'की'। गण आठ हैं- मगण (२२२), भगण (२।।), जगण (।२।) सगण(।।२) नगण (।।।) यगण (।२२) रगण (२।२) और तगण (२२।)।

उर्दू में दस अरकान हैं- फऊलन (।२।।), फाइलुन (२।-।।), मु़फाइलुन (12211), फाइलातुन (21211), मुसतफइलुन (1111111), मुतफाइलुन (112111), मफ़ाइलुन (।२।-।।।), फ़ाअलातुन ( २-।।), मफ़ऊलान (11221) और मसतफअलुन (।।।।-।-।।)।

शंकर, निराला, त्रिपाठी, बिस्मिल तथा अन्य कवि शायर छंदों की लय-ताल में जीते थे एवं उनको नित नई गति देते थे, किन्तु अब समस्या यह है कि अपने आप को उत्तम गज़लकार कहने वाले वतर्मान पीढ़ी के कई कवि छंद विधान को समझने में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं, उससे कतराते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भवन की भव्यता उसके अद्वितीय शिल्प से आँकी जाती है।


"प्रथम दो अरकान - फऊलन क्रमश "सवेरा" या "संवरना" तथा "जागना" या "जागरण" पाँच मात्राओं के शब्दों के वज़नों में आते हैं और शेष आठ अरकान सात मात्राओं के शब्दों के वज़नों में; जैसे-सवेरा है, जागना है। ये गण और अरकान शेर में वज़न कैसे निर्धारित करते हैं इसको समझना आवश्यक है। हिन्दी में एक वर्णिक छंद है- भुजंग प्रयात। इसमें चार यगण आते हैं। हर यगण में पहले लघु और फिर दो गुरु होते हैं यानी- (१२२)। लघु की एक मात्रा होती है और गुरु की दो मात्राएँ होती हैं। चार यगणों के छंद ’भुजंग प्रयात’ की पंक्ति यूँ होगी-
सवेरे सवेरे कहाँ जा रहे हो
१२२ १२२ १ २ २ १२ २
इन मात्राओं का जोड़ है =२०
लेकिन वर्णों का जोड़ है =१२

उर्दू में इस छंद को मुतकारिब कहते हैं लेकिन मुतकारिब और भुजंग प्रयात में थोड़ा अन्तर है। भुजंग प्रयात की प्रत्येक पंक्ति में वर्णों की संख्या १२ है और मात्राओं की २० लेकिन उर्दू मुतकारिब में वर्णों की संख्या १८ या २० भी हो सकती है। मसलन-
इधर से उधर तक ,उधर से इधर तक -१८
या
इधर चल उधर चल ,उधर इधर चल - २०

यूँ तो उर्दू के छंद वर्णिक कहलाते हैं लेकिन ठहरते हैं मात्रिक ही। क्योंकि एक गुरु के स्थान पर दो लघु भी आ सकते हैं उसमें।

क्योंकि उर्दू गज़ल फ़ारसी से और हिन्दी गज़ल उर्दू से आई है, इसलिये फ़ारसी और उर्दू अरूज़ का प्रभाव हिन्दी गज़ल पर पड़ना स्वाभाविक था। इसके प्रभाव से भारतेंदु हरिश्चंद्र, नथुराम शर्मा शंकर, राम नरेश त्रिपाठी, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला आदि कवि भी अछूते नहीं रह सके। रामनरेश त्रिपाठी ने तो हिंदी-उर्दू छंदों व उससे संबद्ध विषयों पर 'काव्यकौमुदी' पुस्तक लिखकर अभूतपूर्व कार्य किया। कविवर शंकर और निराला के छंद के क्षेत्र में किए गए कार्यों के बारे में दिनकर जी लिखते हैं- 'हिन्दी कविता में छंदों के संबंध में शंकर की श्रुति-चेतना बड़ी ही सजीव थी। उन्होंने कितने ही हिंदी-उर्दू के छंदों के मिश्रण से नए छंद निकाले। अपनी लय-चेतना के बल पर बढ़ते हुए निराला ने तमाम हिंदी उर्दू-छंदों को ढूँढ डाला है और कितने ही ऐसे छंद रचे जो नवयुग की भावाभिव्यंजना के लिए बहुत समर्थ है। (हिन्दी कविता और छंद)

उस काल में एक ऐसे महान व्यक्ति का अवतरण हुआ जो अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्व और प्रेरक कृतित्व से अन्यों के लिए अनुकरणीय बना। हिंदी और उर्दू के असंख्य कालजयी अशआर के रचयिता व छंद अरूज़ के ज्ञाता पं रामप्रसाद बिस्मिल के नाम को कौन विस्मरण कर सकता है? मन की गहराइयों तक उतरते हुए उनके अशआर की बानगी तथा बहरों की बानगी देखिए-
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है।

जैसे कि गालिब के बारे में कहा जाता है कि 'गालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और' ठीक वैसे ही 'बिस्मिल' के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि 'बिस्मिल' का भी अंदाजे-बयाँ शायरी के मामले में बेजोड़ है, उनका कोई सानी नहीं मिलता है। उनकी रचनाओं का प्रभाव अवश्य ही मिलता है; उन तमाम समकालीन शायरों पर जो उस ज़माने में इश्क-विश्क की कविताएं लिखना छोड़कर राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत रचनाएं लिखने लगे थे। कितनी विचित्र बात है कि बिस्मिल के कुछ एक शेर तो ज्यों के त्यों अन्य शायरों ने भी अपना लिए और वे उनके नाम से मशहूर हो गए। - मदनलाल वर्मा 'क्रांत'

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा

वतन की गम शुमारी का कोई सामान पैदा कर
जिगर में जोश, दिल में दर्द, तन में जान पैदा कर

नए पौधे उगें, शाखें फलें-फूलें सभी बिस्मिल
घटा से प्रेम का अमृत अगर बरसे तो यूँ बरसे

मुझे हो प्रेम हिंदी से, पढूँ हिंदी, लिखूँ हिंदी
चलन हिंदी चलूँ, हिंदी पहनना ओढ़ना खाना

मदनलाल वर्मा 'क्रांत' ने 'सरफ़रोशी की तमन्ना' पुस्तक मे ठीक ही लिखा है, "जैसे कि गालिब के बारे में कहा जाता है कि 'गालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और' ठीक वैसे ही 'बिस्मिल' के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि 'बिस्मिल' का भी अंदाजे-बयाँ शायरी के मामले में बेजोड़ है, उनका कोई सानी नहीं मिलता है। उनकी रचनाओं का प्रभाव अवश्य ही मिलता है; उन तमाम समकालीन शायरों पर जो उस ज़माने में इश्क-विश्क की कविताएं लिखना छोड़कर राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत रचनाएं लिखने लगे थे। कितनी विचित्र बात है कि बिस्मिल के कुछ एक शेर तो ज्यों के त्यों अन्य शायरों ने भी अपना लिए और वे उनके नाम से मशहूर हो गए।"

शंकर, निराला, त्रिपाठी, बिस्मिल तथा अन्य कवि शायर छंदों की लय-ताल में जीते थे एवं उनको नित नई गति देते थे, किन्तु अब समस्या यह है कि अपने आप को उत्तम गज़लकार कहने वाले वतर्मान पीढ़ी के कई कवि छंद विधान को समझने में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं, उससे कतराते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भवन की भव्यता उसके अद्वितीय शिल्प से आँकी जाती है। कुछ साल पहले मुझको दिल्ली में एक कवि मिले जो गज़ल लिखने का नया-नया शौक पाल रहे थे। उनके एक-आध शेर में मैंने छंद-दोष पाया और उनको छंद अभ्यास करने की सलाह दी। वह बोले कि वह जनता के लिए लिखते हैं, जनता की परवाह करते हैं; छंद-वंद की नहीं। मैं मन ही मन हँसा कि यदि वह छंद-वंद की परवाह नहीं करते हैं तो क्या गज़ल लिखना ज़रूरी है उनका? गज़ल का मतलब है छंद की बंदिश को मानना, उसमें निपुण होना। गज़ल की इस बंदिश से नावाकिफ़ को उर्दू में खदेड़ दिया जाता है। मुझको एक वाक्या याद आता हैं। एक मुशायरे में एक शायर के कुछ एक अशआर पर जोश मलीहाबादी ने ऊँचे स्वर में बार-बार दाद दी। कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी (जो उनके पास ही बैठे थे) ने उनको अपनी कुहनी मार कर कहा- 'जोश साहिब क्या कर रहे हैं आप? बेवज़्न अशआर पर दाद दे रहे हैं आप? कयामत मत ढाइए।' जोश साहिब जवाब में बोले- 'भाई मेरे दाद का ढंग तो देखिए।'

आधुनिक काव्य के लिए छंद भले ही अनिवार्य न समझा जाए किन्तु गज़ल के लिए है। इसके बिना तो गज़ल की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। लेकिन हिंदी के कुछ ऐसे गज़लकार हैं जो छंदों से अनभिज्ञ हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो उनसे भिज्ञ होते हुए भी अनभिज्ञ लगते हैं।

36 comments:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

प्राण भाई साहब
इस कडी मेँ आपकी विद्वत्ता और कविता / गज़ल कहने की बारीकियोँ के बारे मेँ जानकारी मिली है
बहुत अच्छा लिखा है आपने
इसी भाँति ज्ञान वर्धन करवाते रहीयेगा -
विनीत्,
-लावण्या

manu २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

कृपया फाइलातुन की गिनती , मुफाईलुन की गिनती को
पहले वाली के हिसाब से चेक करें ......

मुझे शायद शक है

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

हिन्दी और उर्दू दोनों को सामने रख कर इस जटिल विषय को आपने समझाया है। समझनें में बहुत आसानी हुई, कुछ प्रयोग कर देखता हूँ कि कितना सफल हुआ।

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

अगर अरकानों के आगे दी गयी लघु-गुरु मात्राओ को आधार बना कर ग़ज़ल लिखी गयी तो क्या सही है? ध्वनि और मात्रा की दिक्कत तो नहीं होगी। कुछ लोगों का मानना है कि उच्चारण से ग़ज़ल की मात्रायें निर्धारित होती हैं?

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

Nicely composed article.

Alok Kataria

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

प्राण शर्मा जी

आपके आलेख की मात्र दो कड़ियों में विधाओं की लगभग विलुप्तप्रायः जानकारी की इतनी बारीकी और गहराई से उपलब्धता, समस्त पाठकों के लिए अनुभव है. इस कड़ी के माध्यम से आपने साहित्य शिल्पी पर सचमुच प्राण डाल दिये हैं.

साधुवाद

mehek २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

bahut achhi jankari rahi,shayad jyada samjhne ke liye hame ek baar aur gaur se padhna padega, aur jarur padhenge.

बवाल २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

परम आदरणीय प्राण साहब,
तुलनात्मक्ता के साथ, लिखा गया आपका यह सुन्दर लेख वाक़ई, कविता और ग़ज़ल के विषय में ब्ला॓गजगत के कई चिट्ठाकारों के लिए, मील का पत्थर साबित होगा । सख़्त ज़ुरूरत है इधर, इन जानकारियों की ।

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

आपकी बरगद सरीखी छांह मिल रही है।इस सौभाग्य पर गदगद हूं।
काश ! कुछ सीख सकूं।

प्रवीण पंडित

chandrabhan bhardwaj २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

Nidhi ji
Kewal radeef aur kafiya ka bandhan hi jaroori nahin hai sabase adhik jaroori hai sher ka bahar men hona.Bahar ke arkaan aur radeef kafiyon ka nirdharan ghazal ke pahale sher (matala) men hi ho jata hai.Jo arkaan (bahar) aapne matale men liye hain unhen poori ghazal men nibhana aawashyak hai. Yadi aage ke sheron men bahar nahin nibhati hai to wah bahar se khariz kahi jaayegi.
Chandrabhan Bhardwaj

निधि २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

बहर और छंद के एक साथ विवरण से मैं एक शंका से घिर गयी हूँ, क्या जो बहरें खोजी गयी हैं उनमें ही बंध कर ग़ज़ल लिखना अनिवार्य है।

क्या रदीफ काफिया के बंधन को मानते हुए हिन्दी की किसी छंद प्रणाली को आधार बना कर ग़ज़ल लिखी गयी तो वह ख़ारिज हो जायेगी?

chandrabhan bhardwaj २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

Nidhi ji
Kewal radeef aur kafiya ka bandhan hi jaroori nahin hai sabase adhik jaroori hai sher ka bahar men hona.Bahar ke arkaan aur radeef kafiyon ka nirdharan ghazal ke pahale sher (matala) men hi ho jata hai.Jo arkaan (bahar) aapne matale men liye hain unhen poori ghazal men nibhana aawashyak hai. Yadi aage ke sheron men bahar nahin nibhati hai to wah bahar se khariz kahi jaayegi.
Chandrabhan Bhardwaj

दृष्टिकोण २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

आलेख से बहर पर महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। कुछ और उदाहरण होने चाहिये थे। चंद्रभान जी की बात से भी कुछ स्पष्टता आयी है। कृपया यह भी स्पष्ट कर दीजिये कि ग़ज़ल के पहले शेर में निभाया गया हिन्दी का कोई छंद-प्रकार (रोला/दोहा/सोरठा आदि) जिसका भली प्रकार निर्वाह संपूर्ण ग़ज़ल में उसके विधान के अनुसार हुआ हो तो क्या गलत है? यह एक खटक है जो अगर आप समझा सकें तो संभव है मैं इस विधा में हाथ आजमा सकूं।

अनुज २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

जानकारीपूर्ण आलेख प्रस्तुत करने के लिये प्राण शर्मा जी का धन्यवाद।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

बिस्मिल का जो आपने उद्धरन दिया वह मेरे लिये एकदम नया तथ्य था। ग़ज़ल पर यह स्तंभ बहुत अच्छा बन पढा है।

हिन्दी-हिन्दु-हिन्दुस्तान २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

बहर में दुष्यंत कुमार के संशोधन (तोड-फोड) को किस नजर से देखा जाना चाहिये। प्राण शर्मा जी प्रसंग के साथ इसे भी बतायें। जब ग़ज़ल की परिभाषा ही समय के साथ बदल गयी तो क्या और कितना परिवर्तन हो सकता है जिससे यह छंद जिन्दा भी रहे और सीखा भी जा सके (हम जैसे मोटी बुद्धी के कवि भी लिख सकें)।

नीरज गोस्वामी २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

आदरणीय गुरु देव
शब्द शब्द आप के इस लेख का सदा स्मरण में रखने योग्य है....कोटिश धन्यवाद इस कृपा के लिए.
नीरज

PRAN SHARMA २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

CHUNKI GAZAL URDU SE HINDI MEIN
AAYEE HAI ISLIYE URDU KEE BAHRE
BHEE SAATH-SAATH AA GAYEE HAIN.
GAZAL HINDI CHHANDON MEIN BHEE
KAHEE JAA SAKTEE HAI.KUCHH SAAL
PAHLE MAINE COVENTRY MEIN BASE
EK URDU KE SHAYAR KO SANT KABEER
KAA DOHA EK-DO PARIVARTON KE SAATH
SUNAAYA-------
LAALEE MERE LAAL KEE
JAB DEKHUN TAB LAAL
LAALEE DEKHNE MAI GAYEE
MAI BHEE HO GAYEE LAAL
VE SUN KAR JHOOM UTHE.KAH UTHE,
"Wah,kyaa sufiaanaa andaaz hai".
jab maine unhe bataayaa ki ye
sher nahin,sainkdon saal pahle likha Kabeer Dass jee kaa doha hai.
Sun kar ve aur bhee jhoom uthe.
Ab dekhiye mahakavi Maithlee
Sharan Gupt jee kee vaarnik chhand
"bhujangee" mein likhee nimnlikhit
do panktian kisee sher yaa sher ke
matle se kam nahin hain---
Bhale hee n ho ek bhee sampdaa
Rahe aatm vishwas poora sadaa
Aapkee jigyaasaa ke liye main
bataa doon ki Bhujangee chhand mein
teen yagan aur ant mein ek laghu
aur ek guru hote hain.Ek aur guru
lagaane se Bhujang prayat chhand
ban jayega.Maslan---
Savere savere kahan jaa rahe ho
Bahar ko ghataayaa-badhaayaa
jaa sakta hai ,lekin misra vazan se nahin girnaa chaahiye.Is se
sambandhit jaankaaree lekh ke
aagaamee anshon mein padhiye.

निधि २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

धन्यवाद प्राण जी इस स्पष्टीकरण के लिये। वस्तुत: मात्रिक छंद में ग़ढना आसान होता है, स्कूल के दिनों से ही अध्यापकों नें मात्रायें गिनवा गिनवा कर ठोस कर दिया है। मैं प्रयास करूंगी और यदि सफल होती हूँ तो इसका श्रेय आपका होगा।

PRAN SHARMA २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

HINDI,HINDU,HINDUSTAN JEE,GAZAL KE
BAHAR YAA CHHAND KAA HONA BAHUT
AAVASHYAK HAI.KAYEE SHAYARON NE
AAZAAD GAZLEN BHEE KAHEE LEKIN VE
KAMYAAB NAHIN HO SAKE.KAYEEON NE
"MAHIYA"YAA"TAPPA"KEE TARAH TEEN
MISRON KE ASHAAR BHEE KAHE ,UNKO
BHEE KAMYABEE HAASIL NAHIN HO SAKEE.
DUSHYANT KUMAR BAHUT ACHCHH
SHAYAR THE.GAZAL MEIN UNKEE DEN
ATULNIYA HAI.KAHIN-KAHIN BAHRON SE
UNHONE CHHED-CHHAD KEE HAI,YAH
UNKEE ANBHIGYATAA THEE.

gita pandit २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

प्राण शर्मा जी !


बहुत अच्छी जानकारी आप दे रहे हैं...

बहुत आवश्यकता थी..ऐसे लेखों की....

आभार...

manu २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

माफ़ कीजिये .दो नहीं अधिक गलतियां हैं.....नाप तौल में.....थोडा जल्दी चेक करके बता दें तो महरबानी होगी ...अगर नहीं हैं तो भी बता दीजिये के महसूस क्यूं हो रही हैं..??
भाषा चाहे जो भी हो ..जबान को तो बोलते वक्त लफ्ज़ के हलके भारी होने का अहसास हो ही जाता है .................मैं सुबह से जवाब के इंतज़ार में हूँ .....
कम से कम सवाल तो खारिज ना कीजिये ....

PRAN SHARMA २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

BHAI MANU JEE,KAEE BAAR TYPE KARNE
SE KOEE AKSHAR BADH YAA CHHOOT
JAATAA HAI.IN RUQNON KEE GANNA
IS PRAKAAR HAI---
MFAAEELUN-12211
FAILATUN--21211
MUSTFAILUN-1111111
MUTFAILUN--112111
MAFOOLATU--11221

गौतम राजरिशी २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

प्राण जी को सादर प्रणाम...इस भाग-२ की बेसब्री से प्रतिक्षा थी...ढ़ेर सारे शक दूर हुये.
मगर मैं पिछले अंक के अपने सवाल को लेकर अभी तक उतावला हूँ.
अनुकंपा होगी सर यदि कुछ कहें...

manu २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

halkaa saa fark ab bhi hai....
zabaan ke lihaaz se yaa premi hraday ki gungunaahat ke hisaab se......aap dekh lijiyegaa ....sawere fir aayenge aapse seekhne.....aur apni kuchh kahne....

महावीर २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

प्राण जी के इस लेख का दूसरा भाग पढ़ कर और भी बहुत बातें सीखने को मिलीं और आगामी
अंकों में अगले भागों का इंतज़ार है। ग़ज़ल की उत्पत्ति, संस्कृत और हिंदी छंद सम्मत ग़ज़ल की बहरें और अनेक आवश्यक जानकारियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह लेख हिंदी ग़ज़ल साहित्य में अद्वितीय है।
अगले भाग की प्रतीक्षा है।

PRAN SHARMA २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

GAUTAM JEE,MUJHE KHED HAI KI PICHLE
ANK MEIN AAPKE PRASHN KAA UTTAR N
DE SAKA.
AAM BOLCHAAL KEE BHASHA SE MATLAB
HAI-AASAN BHASHA.BAHUT SE SHABDON
KAA UCHCHAARAN HUM GALAT KARTE HAIN
JAESE-NAHIN KO NAEEN BOLTE HAIN
AUR MAALOOM KO MAALUM.LEKIN LIKHENGE HUM NAHIN AUR MAALOOM HEE.
JO JAESAA SHABD HAI USKO VAESAA HEE
LIKHNA CHAAHIYE,YUN TO SAINKDON
SHABD "SLANG"BAN GAYE HAIN

PranSharma २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

Manu jee,jo halkee see kamee nazar
aayee aapko,vo mujhe bhee samjha den.Bhalaee kaa kaam hai.Main aabhaaree hoongaa aapkaa.Mujhse kuchh chhoot bhee sakta hai.

manu २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

ji,
asal mein main baahar waale lekh se aur bheetar waale comment se...aapas me taal mel naheen baitha paa rahaa hoon...
ho sakta hai ke lekh ko abhi theek se naa sudhaara ho ...jaise ke savere FAILATUN kuchh aur tha ab kuchh aur hai....
khair...
likhne me aur bolne me koi maamooli firk ko likh ke bayaan karnaa mere liye bhi mushkil kaam hai...

aapne lekh mein KHADED DIYE JAATE HAIN ..jaise shabd kahe to aa gayaa tha...kyunke ye shabd aaj tak dushman senaa yaa aawara pashuon ke liye sune the.....ab ADAB me bhi chalan hone lagaa hai maloom naa tha...???

Vijay Kumar Sappatti २३ नवम्बर २००९ ६:४८ PM  

प्राण शर्मा जी ,

मुझे तो वैसे ग़ज़ल लिखना नही आता , पर आपने कहा है तो मैं कुछ सीखने की कोशिश करता हूँ , इस लेख के माध्यम से नई जानकारियां मिली

बहुत ही अच्छी प्रस्तुती , साहित्य शिल्पी की टीम को बधाई .

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

अवनीश एस तिवारी २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

Mai kya kahu is lekh ke vishay me.

Excellent Excelllent and Excellent.

Sabhee ko dhanyvaad.



-- Avaneesh tiwari

PRAN SHARMA २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

PRIY SATPAL JEE,AAPTO GAZAL KEE
SAAREE BAREEKION KO JAANTE HAIN.
AAPKO KUCHH BATAANAA SOORAJ KO
DEEPAK DIKHAANE WAALEE BAAT HO
JAAYEGE.PHIR BHEE AAPNE SHAYAD
LEKH KEE IN PANKTION PAR DHYAAN
NAHIN DIYA HAI"YUN TO URDU KE CHHAND VAARNIK KAHLAATE HAIN LEKIN
THAHATE MAATRIK HEE HAIN KYONKI EK
GURU KE STHAAN PAR DO LAGHU BHEE AA
SAKTE HAIN"AAPNE FAILATUN KEE BAAT
KEE HAI.SAITAANTIK TAUR PAR "TUN"
MEIN DO LAGHU HAIN AUR DO LAGHUON
SE EK GURU BANTAA HAI.AAPKA KAHNA
SAHEE HAI KI "TUN" YANI 11 KAA 2
SUBSTITUTE HAI.

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

माफी चाहता हूँ देर से आया, प्राण जी को प्रणाम.
सर, एक शंका है कि आप फ़ाइलातुन को 2122 के वजाए 21211 मे क्यों लिख रहें है. ये "लुन " ko aap 11 क्यों लिख रहें है ?
क्या ये "11" 2 kaa subsitute है?
आभारी रहूँगा.
सादर

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

sir,
Namaste,
sir aap itna mat ooper chaRao ki neeche na aa sakeN, ye aapka baRapan haijo mujhe aap shayar samjhate haiN. aapki baat sahi hai ,lekin phir kyon na hum faa-i-laa-tun ko 11 1 11 11 hii likhen phir ye to matra ginne vali hi baat ho gayee.
do laghu ke sthaan par ek guru to ek tarah ke छoot hai niyam nahi, vo bhi kuch ek baharoN me.
ab agar hum aise koshish kareN. ki faa-i-laa-tun ko 11' 1' 11' 11 x2
to ye likha jayega:
जन गण मन है, सब अनबन है
11 11 11 1, 11 11 11 1,
ab ye to phir
2221,2221 vazan ho jayega, behar hii badal jayegee.Hum kyon bahroN ko matrik banayeN.varnoN me kya gadbad hai.
hum jab hindi ke chandoN se comparison karte haiN to sab mix ho jata hai, "ghachol pai janda".
aap baRe ustad shayar haiN me to adna sa student hooN. kripya merii shankaa ka samadhaan kareN.
kind regards
khyaal

Pran Sharma २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

PRIY SATPAL JEE,PATHKON KO
SAMJHAANE KAA MAINE SARAL TAREEKA
YEHEE DHOONDA HAI Hindi ke hisaab
se ki jahan "FA"AAYA HAI USKO
GURU LIKHUN AUR JAHAN "TUN"aayaa
hai do laghu likhun.Pathkon ko
samajhne mein suvidha rahegee.ye
to aap bhee jaante hai ki do
laghuon ke jod se ek guru bantaa
hai.
Agar aap chaahte hain ki "TUN"
KO GURU likhun to mujhe koee
aetraaz nahin.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ६:५८ PM  

प्राण जी!
लेख वाकई जानदार है. हिंदी छंदों को गजल में ढालने से कुछ समस्याएं उत्पन्न होती हैं दोहा-गजल को लेकर मतभेद है. दोहा के दोनों पदों के अंत में गुरु-लघु हों अनिवार्य है. दोहा-गजल में इस नियम का पालन करें तो हर शे'र दोनों मिसरों में काफिया-रदीफ़ एक सा होगा. क्या गजल में इसकी अनुमति है. यदि हाँ तो ऐसी गजल का कोइ खास नाम है क्या? यदि नहीं तो एक पंक्तो को छोड़कर एक पंक्ति में सम तुकांत होने पर उसे दोहा-गजल कैसे कहेंगे? क्या दोहा गजल के हर शे'र को दोहा नहीं होना चाहिए? कृपया मार्ग दर्शन कीजिये.

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