उर्दू की एक बहर है-

मफ ऊ लु फा इ ला त म फा ई ल फा इ लुन
2 2 1 2 1 2 1 1 2 2 1 2 1 2


इस बहर में उर्दू के हजारों ही ग़ज़लें कही गयी हैं। कुछ मिसरे प्रस्तुत हैं-
आए बहार बन के लुभा कर चले गए - राजेंद्र कृष्ण
जाना था हम से दूर बहाने बना लिए - राजेंद्र कृष्ण
मिलती है जिंदगी में मुहब्बत कभी-कभी - साहिर लुधिआनवी
हम बेखुदी में तुम को पुकारे चले गए
- मजरूह सुलतानपुरी
इस बहर से मिलती-जुलती एक बहर है-

मफ ऊ ल म फा ई ल म फा ई ल फ ऊ लुन
2 2 1 1 2 2 1 1 2 2 1 1 2 2


इस बहर में भी सैकडों ग़ज़लें उर्दू में कही गयी हैं। जैसे –

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
बाज़ार से गजरा हूँ खरीद दार नहीं हूँ -अकबर इलाहाबादी

बदनाम न हो जाए मुहब्बत का फसाना
ओ दर्द भरे आंसुओं आंखो में न आना
-राजा मेहंदी अली खान

कई हिन्दी गज़लकारों ने भी इन दोनों बहरों में ग़ज़लें कही हैं। अनभिज्ञता के कारण कुछ ने इन बहरों का घालमेल कर दिया है। मसलन-

अफ़सोस किया पहले-पहल वार उसीने
आया था जो हमदर्द हमारे बचाव को
-ओमकार गुलशन

पहला मिसरा २२१ १२ २१ १२ २१ १२२ जो की सही वज़न में है। दूसरा मिसरा सही नहीं है। "बचाव को" ने गड़बड़ कर दिया है।
एक शेर है-

जिस नाम के हमनाम हों उस नाम के लिए
हिस्से में कभी देश निकाले भी पड़ेंगे
- शलभ श्री राम सिंह

यह शेर भी पहले शेर के दोष के समान खारिज है। शेर के दोनों मिसरों के अन्तिम शब्दों "के लिए" और "पड़ेंगे" के वज़न में तालमेल नहीं है। "के लिए" में २१२ मात्राएँ हैं और "पड़ेंगे"में १२२
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मफ ऊ ल म फा ई ल म फा ई ल फ ऊ लुन
2 2 1 1 2 2 1 1 2 2 1 1 2 2


इस बहर में गोबिंद मिश्र की ग़ज़ल का मतला देखिये -

ठहरा है जहाँ वक़्त वो माजी की घड़ी है
फैंको इसे दरिया में ये बंद पडी है


पहला मिसरा वज़न में है लेकिन दूसरा मिसरा "दरिया" के कारण बेवज़न हो गया है। शब्द "दरिया" के स्थान पर "दयार" शब्द के वज़न का कोई शब्द आता तो वज़न सही होता। गोबिंद मिश्र की ग़ज़ल के अधिकाँश शेर बेवज़्न हैं।
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मफ ऊ ल फा इ ला त म फा ई ल फा इ लुन
2 2 1 2 1 2 1 1 2 2 1 2 1 2


इस बहर में लक्ष्मी शंकर वाजपेयी का शेर है-

एक रोज़ फिर उडेगा कि मर जायेगा घुट कर
इतना कठिन सवाल परिंदे को क्या पता


इस शेर का दूसरा मिसरा वज़न में हैं लेकिन पहला मिसरा "घुट कर" के कारण वज़न में नहीं। "घुट कर" को अगर "घटक" ही पढा जाए तो मिसरा वज़न में हैं।
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एक बहर है- १२१ २१ १२२ १ २ १२ २२
इस बहर में लक्ष्मी शंकर वाजपेयी का शेर है-

अजीब शौक है जो क़त्ल से भी बदतर है
तुम किताबों में दबा कर न तितलिआं लिखना


"तुम किताबों" की वज़ह से मिसरे का वज़न सही नहीं बैठता है।
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एक बहर है- २१ २ २१ २ २२१ १२ २२२
इस बहर में साहिर लुधिआनवी के बोल हैं-

रंग और रूप की बारात किसे पेश करूँ

इस बहर में गोपाल दस नीरज के भी बोल हैं-

इसी उम्मीद में कर ली है आज बंद जबान
कल को शायद मेरी आवाज़ जहाँ तक पहुंचे


"आज "शब्द ने पहले मिसरे का वज़न ही गडबडा दिया है। "आज" को उलटा कर "जआ"
के रूप में पढ़ें तो मिसरा सही वज़न में है।
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एक बहर है-
फा इ ला तुन मु फा इ लुन फै लुन
2 1 2 2 1 2 1 2 2 2


फ़िर वो भूली सी याद आयी है - शैलेन्द्र

इस वज़न में राम कुमार कृषक का शेर भी देखिये-

हमने इस तौर मुखौटे देखे
अपना चेहरा उतार कर देखो


पहला मिसरा शब्द "मुखौटे" के कारन वज़न में नहीं रहा है।
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यह हिन्दी का मात्रिक छंद "ताटंक" है। इस छंद के नियमानुसार प्रत्येक पंक्ति के दो टुकड़े होते हैं। पहले टुकड़े में १६ और दूसरे टूकडे में १४ मात्राएँ होती हैं. इस छंद को पहचानने का सरल तरीका है। १६ मात्राओं के बाद आपने आप यति आ जाती है। यति का अर्थ है विराम। जैसे -"चिडिया सोने की है लेकिन"। लेकिन पर विराम आ गया है। ज़बान थोड़ी देर के रुकती है। भ्रमर की पहली पंक्ति तो छंद में है लेकिन दूसरी नहीं हैं क्योंकि दूसरी पंक्ति के पहले टुकड़े में १४ मात्राएँ हैं और दूसरे टुकड़े में १६ मात्राएँ।

एक और बहर देखिये-
म फा ई लुन म फा ई लुन फ ऊ लुन
1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2


इस बहर में संजय मासूम का शेर है-
असर अब भी है मुझ पर राम जी का
कोई नारा नया मत दो मुझे


दूसरे मिसरे के अन्तिम शब्द "मुझे"के बाद दो मात्राओं की कमी है।
केवल मात्राएँ गिन लेने से शेर में वज़न नहीं आता है। रविन्द्र भ्रमर का शेर है --

चिडिया सोने की है लेकिन अलस्सुबह बोलेगी क्या
उसका पिंजरा तो देखो पूरा मुर्दा घर लगता है


यह हिन्दी का मात्रिक छंद "ताटंक" है। इस छंद के नियमानुसार प्रत्येक पंक्ति के दो टुकड़े होते हैं। पहले टुकड़े में १६ और दूसरे टूकडे में १४ मात्राएँ होती हैं. इस छंद को पहचानने का सरल तरीका है। १६ मात्राओं के बाद आपने आप यति आ जाती है। यति का अर्थ है विराम। जैसे -"चिडिया सोने की है लेकिन"। लेकिन पर विराम आ गया है। ज़बान थोड़ी देर के रुकती है। भ्रमर की पहली पंक्ति तो छंद में है लेकिन दूसरी नहीं हैं क्योंकि दूसरी पंक्ति के पहले टुकड़े में १४ मात्राएँ हैं और दूसरे टुकड़े में १६ मात्राएँ।

हस्ती मल हस्ती के निम्नलिखित शेर में भी यही दोष है-

आसानी से पहुँच न पाओगे इंसानी फितरत तक
कमरे में होता है कमरा कमरे में तहखाना भी


पहले मिसरे के पहले टुकड़े में १८ मात्राएँ हैं और दूसरे टुकड़े में १२ मात्राएँ। दूसरे मिसरा सही है।
पढिये, आप स्वयं अन्तर महसूस करेंगे।

मिसरों में मात्राओं का सही प्रयोग

जैसे दो मिसरों के मेल से शेर बनता है वैसे ही उर्दू और हिन्दी के कुछ छंद ऐसे हैं जिनमें नियमानुसार मिसरे के दो टुकड़े होते हैं। कोई भले ही इस नियम का पालन नहीं करे लेकिन उसके इस्तेमाल से शेर में निखार आ जाता है। मिसरे का संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि उसके पहले टुकड़े का का अंतिम शब्द यानि पर, का, की, के, को, भी, ही, है आदि मिसरे के दूसरे टुकड़े में नहीं जाने पाये। जैसे-

हम बुलबुले हैं इसकी
ये गुलिस्ताँ हमारा


लाली मेरे लाल की
जित देखू तित लाल


"की"शब्द उपयुक्त टुकड़े में आने से मिसरे की गेयता में सुगमता पैदा हो गयी है। बालस्वरूप राही की ग़ज़ल के दो मिसरे हैं-

उसकी सोचो जो जंगल को
ही अपना घरबार कहें

सीधे -सच्चे लोगों के दम
पर ही दुनिया चलती है


पहले मिसरे के दूसरे टुकड़े में "ही" शब्द है। इसको मिसरे के पहले टुकड़े में आना चाहिए। इसी तरह दूसरे मिसरे के दूसरे टुकड़े में "पर ही" शब्द हैं। इनको भी मिसरे के पहले टुकड़े में आना चाहिए। दोनों मिसरे लय -सुर में होते और छंद में सौन्दर्य उत्पन्न करते, यदि वे इस तरह लिखे जाते--

चूँकि ग़ज़ल का सम्बन्ध राग-रागनियों से है, इसलिए शेर के किसी मिसरे में किसी मात्रा घट या बढ़ जाने के बारे में एक कुशल गज़लकार सदा ही सजग व सतर्क रहता है, फ़िर भी उसके घटने -बढ़ने के दोष मिल ही जाते हैं, कभी गज़लकार की असावधानी और कभी ग़ज़ल-गायक की नासमझी से। साठ के दशक में हबीब वाली ने बहादुर शाह ज़फर की ग़ज़ल "लगता नहीं है दिल मेरा उजडे दयार में" गाई थी। इस ग़ज़ल का एक मिसरा है -"कह दो ये हसरतों से कहीं और जा बसें"। लेकिन उनहोंने गाया-"कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें"; "ये"शब्द की जगह "इन" शब्द को गाने से मिसरे का वज़न बढ़ गया है।


उसकी सोचो जंगल को ही
जो अपना घरबार कहें

सच्चे लोगों के दम पर ही
सारी दुनिया चलती है


मंगल नसीम का शेर है ---

पैसा हो तो यूँ फैंकेगे जैसे इनका दुश्मन हो
फिर झोली फैलाये फिरते हैं ऐसे खर्चीले लोग


शेर यूँ होता तो बेहतर लगता-

पैसा हो तो यूँ फैंकेगे जैसे इनका दुश्मन हो
झोली फैलाए फिरते हैं फ़िर ऐसे खर्चीले लोग


चूँकि ग़ज़ल का सम्बन्ध राग-रागनियों से है, इसलिए शेर के किसी मिसरे में किसी मात्रा घट या बढ़ जाने के बारे में एक कुशल गज़लकार सदा ही सजग व सतर्क रहता है, फ़िर भी उसके घटने -बढ़ने के दोष मिल ही जाते हैं, कभी गज़लकार की असावधानी और कभी ग़ज़ल-गायक की नासमझी से। साठ के दशक में हबीब वाली ने बहादुर शाह ज़फर की ग़ज़ल "लगता नहीं है दिल मेरा उजडे दयार में" गाई थी। इस ग़ज़ल का एक मिसरा है -"कह दो ये हसरतों से कहीं और जा बसें"। लेकिन उनहोंने गाया-"कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें"। "ये"शब्द की जगह "इन" शब्द को गाने से मिसरे का वज़न बढ़ गया है। मिसरा सही होता अगर इसको इस तरह भी गाया जाता-

कह दो न हसरतों से कहीं और जा बसें
या
इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें
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नए छन्दों की रचना

बीस-पच्चीस साल पहले दिल्ली में एक ग़ज़ल संग्रह छपा था। उसको देखने का अवसर मुझे मिला था। ग़ज़लकार का नाम मैं भूल गया हूँ। उन्होंने नए छंद रचे थे। किसी शेर का एक मिसरा २४ मात्राओं का था और दूसरा मिसरा ३२ मात्राओं का। मात्राओं में भिन्नता होने के कारण ग़ज़लें अपनी प्रभावोत्पादकता में असमथर् रहीं। मनोभावों के अनुरूप नए छंद भी रचे जा सकते हैं बशर्ते वे रचनाओं में सौंदर्य उत्पन्न करने में सक्षम हों।

नये छंदों की सृष्टि कुशल कवि की रचनात्मकता का परिचायक है। पहले ही कहा जा चुका है कि ऐसा रचनात्मक परिचय ’निराला’ ने अपनी अनेक रचनाओं में दिया है। “परिमल का निवेदन” शीर्षक कविता की पंक्ति “एक दिन थम जायेगा रोदन तुम्हारे प्रेम-अंचल में” उनके ऐसे ही प्रयास का फल था। यह छंद हिंदी के २८ मात्राओं के विधाता-छंद तथा उर्दू की बहर मफ़ाइलुन, मफ़ाइलुन, मफ़ाइलुन, मफ़ाइलुन (उठाए कुछ वरक लाले ने कुछ नरिगस ने कुछ गुल ने) के साम्य पर बनाया गया है; किन्तु पहले शब्द 'एक' के 'ए' में दो मात्राएं अलग से जोड़ देने से छंद की गंभीरता बढ़ गई है। (रामधारी सिंह 'दिनकर') इस छंद में स्वर्गीय शंभुनाथ 'शेष' ने साठ के दशक में कोमलकांत शब्दावली में सुंदर ग़ज़ल लिखी थी। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि वह एक अच्छे ग़ज़लकार थे। उनका नाम हम हिंदी ग़ज़लकारों की चर्चा में अक्सर भूल जाते हैं। ग़ज़ल से उनका आत्मीय संबंध था। उनका ज़िक्र न करना हिंदी ग़ज़ल के साथ बेइंसाफ़ी है। ग़ज़ल के प्रति वह समर्पित थे। उन्होंने अनेक ग़ज़लें लिखी थीं। उनके असामयिक निधन से ग़ज़ल को काफ़ी क्षति हुई। उर्दू का रंग उनको छू नहीं पाया था, हालाँकि वह उर्दू से हिंदी में आए थे। उनकी हर ग़ज़ल हिंदी का संस्कार लिए हुए है। भावों के अनुरूप उनकी ग़ज़ल का रस लीजिए-

नये छंदों की सृष्टि कुशल कवि की रचनात्मकता का परिचायक है। पहले ही कहा जा चुका है कि ऐसा रचनात्मक परिचय ’निराला’ ने अपनी अनेक रचनाओं में दिया है। “परिमल का निवेदन” शीर्षक कविता की पंक्ति “एक दिन थम जायेगा रोदन तुम्हारे प्रेम-अंचल में” उनके ऐसे ही प्रयास का फल था। यह छंद हिंदी के २८ मात्राओं के विधाता-छंद तथा उर्दू की बहर मफ़ाइलुन, मफ़ाइलुन, मफ़ाइलुन, मफ़ाइलुन (उठाए कुछ वरक लाले ने कुछ नरिगस ने कुछ गुल ने) के साम्य पर बनाया गया है; किन्तु पहले शब्द 'एक' के 'ए' में दो मात्राएं अलग से जोड़ देने से छंद की गंभीरता बढ़ गई है। (-रामधारी सिंह 'दिनकर') इस छंद में स्वर्गीय शंभुनाथ 'शेष' ने साठ के दशक में कोमलकांत शब्दावली में सुंदर ग़ज़ल लिखी थी।


चाँदनी है चाँद के संसार की बातें करें।
शुभ्र लहरी, शांत पारावार की बातें करें।

रो चुके हैं हम जगत-व्यवहार का रोना बहुत
कर सकें तो प्रेम की और प्यार की बातें करें।

कल्पना सी बह रही रश्मियों की निर्झरी
भावनाओं के मधुर अभिसार की बातें करें।

अप्सरा सी है थिरकती स्वप्न की सुकुमारता
आज भावलोक के विस्तार की बातें करें।

'शेष' मधुबन, वल्लरी, यमुना, कदम मधु बाँसुरी
प्राण, आओ अब इन्हीं दो चार की बातें करें।

यदि कवियों की नई पीढ़ी नए भावों और नए विचारों के अनुरूप नए छंद रचे तो ग़ज़ल विधा को चार चाँद लग सकते है लेकिन देखा जाता है कि नई पीढ़ी के अधिकांश कवि पुरानी बहरों, पुराने छंदों पर ही आश्रित हैं।

अच्छी ग़ज़ल का जन्म तभी होता है जब भावों के नए आयामों को स्थापित करने वाले ग़ज़लकार को छंदों के साथ-साथ सही उच्चारण व वज़न का सही-सही ज्ञान हो। एक समृद्ध उन्नत व परिष्कृत भाषा के शब्दों का अशुद्ध उच्चारण करना या उनको ग़लत वज़न में लिखना उनके सौंदर्य को बिगाड़ना है। यह धारणा कि शब्द को तोड़ना मरोड़ना कवि का जन्मसिद्ध अधिकार है, निर्मूल है। 'यह माना कि कभी-कभी किसी भाषा का शब्द दूसरी भाषा में जा कर अपना रूप बदल लेता है लेकिन उसको जबरन तोड़-मरोड़ कर शायरी में इस्तेमाल करना उससे खिलवाड़ करना है। यह खिलवाड़ दिखाई देता है उर्दू ग़ज़ल में भी और हिंदी ग़ज़ल में भी।

उस्ताद शायर बेकल ’उत्साही’ ने ठीक ही कहा है - 'उर्दूवाले न हिंदी व्याकरण जानते हैं न ही हिंदी वाले उर्दू कवायद। दोनों बेचारे उच्चारण या तलफ़्फ़ुस से ही वाकिफ़ नहीं हैं।' अब देखिए न उर्दू शायरी में हिंदी के शब्द ब्राह्मण, शांति, क्रांति, प्रीत, प्रेम, पत्र, कृष्ण आदि को बरहमन, शानती, करानती, परीत, परेम, पत्तर, करीशन के रूप में लिखा जाता है। उसमें हिंदी के कई शब्दों के विकृत रूप मिलते ही हैं, उर्दू के भी कुछ एक शब्द जिनको तोड़ा-मरोड़ा जाता है। शब्द हैं- आईना, सियाह, ख़ामोशी आदि। इनको आइना, सियह, ख़ामुशी या ख़ामशी के वज़नों में भी इस्तेमाल किया जाता है। 'बरसात' के काफ़िए के संग 'साथ' का काफ़िया स्वीकार्य है जबकि 'त' और 'थ' दो भिन्न ध्वनियां है। अंग्रेज़ी शब्द 'स्टेशन' को 'इस्टेशन' लिखना आम बात है। पढ़िए निदा फाज़ली का शेर -

जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
बच्चों के इस्कूल में शायद तुमसे मिली नहीं है दुनिया


दलील दी जाती है कि उर्दू ग़ज़ल में कुछ शब्दों के तोड़ने-मरोड़ने के नियम हैं। नियम कुछ भी हों लेकिन मेरे विचार में शब्दों को बदलना उपयुक्त नहीं है। चूँकि अच्छा शायर शब्द की खूबसूरती को बरकरार रखता है इसलिए सवाल पैदा होता है कि इसके सही रूप व वज़न को बदला ही क्यों जाए? गद्य में उसका रूप-वजन सुरिक्षत है तो फिर पद्य में क्यों नहीं? खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग पकड़ता है। हिंदी ग़ज़ल उर्दू ग़ज़ल के इस प्रभाव को अपनाए बिना नहीं रह सकी है। सच तो यह है कि वह दो कदम आगे ही है। उसमें हृदय, उदय, लहर, उमड़, तड़प, सड़क, नज़र, सफ़र, महक, निकल, चलन, सदन, कदम, मधुर, चमक आदि शब्दों के ग़लत उच्चारण व वज़न देखकर हैरानी होती है। हृदय और उदय के सही उच्चारण हैं- हृ दय और उ दय। इनके वज़न दया शब्द के वज़न के समान है। इनको याद शब्द के वज़न में लिखना ठीक नहीं है। शब्दों को गलत वज़नों में लिखने की इस प्रवृति को हिंदी के निम्नलिखित शेरों में देखा जा सकता है।

पलते हैं फिर भी शहर में खूँखार जानवर
माना शहर की रोशनी जंगल नहीं कुँअर
– कुँअर बेचैन

'शहर' शब्द 'याद' शब्द के वज़न में आता हैं। शेर को ज़रा ध्यान से पढ़ने पर ही भास हो जाता है कि पहले मिसरे में 'शहर' शब्द 'याद' शब्द के वज़न में और दूसरे में 'दया' शब्द के वज़न में लिखा गया है। दोनों मिसरों में 'शहर' शब्द के वज़न में भिन्नता है।

आदमी में ज़हर भी है और अमृत भी मगर
इन दिनों विषदंत उभरे हैं ज़हर हावी हुआ
- चंद्रसेन विराट

ज़हर का वज़न है- 'याद'। पहले मिसरे में इसका वज़न सही है लेकिन दूसरे मिसरे में गलत क्योंकि इसमें इसका वज़न 'दया' शब्द के वज़न के समान है।

'उमड़ना' और 'घुमड़ना' शब्द 'जागना' वज़न में आते हैं। इनको 'जगाना' शब्द के वज़न में लिखना अनुचित है। रामदरश मिश्र के निम्नलिखित दो मिसरों में 'उमड़ते' शब्द तो सही वज़न में हैं लेकिन घुमड़ते शब्द का वज़न 'जागना' शब्द के वज़न में हो जाने के कारण गलत है-

आँसू उमड़ते तो हैं बहाता नहीं हूँ मैं
घुमड़ते ही रहें बादल सावनी आकाश में


अजब, सफ़र और नज़र शब्दों के वजन 'दया' शब्द के वज़न के बराबर है। निम्नलिखित शेरों में इनके दो भिन्न रूप वज़न देखिएः-

अजब मुसाफिर हूँ मेरा सफ़र अजब
मेरी मंज़िल और है मेरा रास्ता और
- राजेश रेडडी

पहले मिसरे में 'सफ़र' शब्द के साथ प्रयुक्त 'अजब' शब्द सही वज़न में है लेकिन 'मुसा़फिर' शब्द के साथ प्रयुक्त 'अजब' शब्द 'याद' शब्द के वज़न में होने के कारण सही वज़न में नहीं है। 'सफ़र' शब्द का वज़न भी गलत है क्योंकि वह 'याद' शब्द के वज़न में है।

किश्तों में सब स़फर किए है किश्तों में आराम
दूर गई, बैठी फिर चल दी थोड़ा रुक कर धूल - हरजीत

राह में आके मैंने सोचा तो
जाने कितने स़फर निकल आए
- हरजीत

दोनों शेरों में 'स़फर' शब्द के वज़न में भिन्नता है

सहमी हुई ऩजर लगता है
बिल्कुल मेरा घर लगता है - विज्ञान वर्त

कुछ भी ऩजर नहीं आता
आइना पत्थर लगता है
- विज्ञान वर्त

पहले शेर में 'नज़र' शब्द 'दया' के वज़न में पढ़ा जाता है और दूसरे शेर में 'याद' शब्द के वज़न में।

'अगर', 'ग़ज़ल' और 'समय' शब्दों के वज़न 'दया' शब्द के समान है। निम्नलिखित मिसरों में इन शब्दों के वज़न सही इसलिए नहीं क्योंकि ये 'याद' शब्द के वज़न में है। पढ़िए-

अगर किसी पर बुरा वक़्त पड़ता सूरज - सूरजभानु गुप्त

यह ग़जल मेरे भीतर अब नाचने लगी है - उदभ्रांत
चाहे जितना रोले कोई समय कौन लौटाए भाई
- सुमन सरीन

'अगर', 'ग़ज़ल' और 'समय' शब्दों के वज़न सही लिखें जा सकतें थे यदि ग़ज़लकार थोड़ा परिश्रम करते। 'समय' शब्द को ही लीजिए। 'कौन समय लौटाए भाई' लिखा जाता तो 'समय' शब्द का वज़न सही होता।

'ज़हन' शब्द 'याद' शब्द के वज़न में है। उसको दया शब्द के वज़न में लिखना सरासर अनुपयुक्त है। 'दया' शब्द के वज़न में आने वाले 'बदन' शब्द को भी 'याद' शब्द के वज़न में लिखना ग़लत है। निम्नलिखित अशआर 'ज़हन' 'बदन' और ' 'कुँअर' शब्द क्रमशः 'दया' और 'याद' शब्दों में आने से बेवज़न हो गए:-

काम चाहे ज़हन से चलता है
नाम दीवानग़ी से चलता है -बालस्वरूप 'राही'

आते ही तेरे ओठों पे बजती है अपने आप
फूलों से बदन वाली वो पत्थर की बाँसुरी - कुँअर बेचैन

मुझको आ गए हैं मनाने के सब हुनर
यूँ मुझसे 'कुँअर' रूठ कर जाने का शुक्रिया
- कुँअर बेचैन

'कुँअर' शब्द का सही वज़न यूँ लिखने से होता -

'मुझसे 'कुँअर' यूँ रूठ के जाने का शुक्रिया'

शब्द के सही वज़न व सही उच्चारण से संबद्ध एक उस्ताद शायर ने अपने मंज चुके शागिर्द से प्रश्न किया- 'हम कदम-कदम चलते है राहें निहार कर' और 'कदम-कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा' में कदम लफ़्ज़ का सही वज़न किस मिसरे में है? पहले मिसरे में या दूसरे मिसरे में? शागिर्द को दोनों मिसरों में प्रयुक्त 'कदम' लफ़्ज़ के वज़न का अंतर समझने में देर नहीं लगी। वह झट बोला, दूसरे मिसरे में।'

'वो कैसे?' उस्ताद ने फिर पूछा।

'क्योंकि 'कदम' लफ़्ज़ का सही वज़न है क दम यानि कि 'वफ़ा' लफ़्ज़ के वज़न के बराबर।'

'पहले मिसरे में 'कदम' लफ़्ज़ के वज़न में क्या गलती नज़र आई तुम्हें?

यहाँ 'कदम' दोनों बार ही कद म यानि की 'याद' लफ़्ज़ के वज़न में इस्तेमाल हुआ है।'

उत्तर सुन कर उस्ताद के मुखमंडल पर जैसे चांदनी छिटक उठी। शागिर्द को गले से लगाकर वह गर्व से बोले, 'वाह उस्ताद की लाज रखी है तुमने। तुम्हारा अल्फ़ाज़ का इल्म अब वाकई लाजवाब है। आगे तुम्हें इसलाह लेने की ज़रूरत नहीं है। तुम लफ़्ज़ की खूबसूरती को अपनी शायरी में ढालोगे, ये मुझे यकीन हो गया है।' उस्ताद का आशीर्वाद पाकर शागिर्द खुशी से फूला नहीं समाया।
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38 comments:

  1. लेख महाउपयोगी है

    हमारे काव्‍य में भी

    ग़ज़लों की प्राण प्रतिष्‍ठा

    अब संभव हो सकेगी

    बस थोड़ा सा ध्‍यान
    पढ़ कर देना होगा।


    ऐसे ही सिखाते चलिये।

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  2. आपके आलेख को पढने के बाद आज सुबह से अपनी लिखी पुरानी अपरिपक्व ग़ज़ल के साथ बैठा। मुश्किल यह है कि वज़न सही करता हूँ तो कह्न चला जाता है और कहन से संतुष्ट होता हूँ तो वज़न चला जाता है। लेकिन कोशिश जारी है। आपके आलेख का आज प्रिंट ले कर फिर बैठूंगा कोशिश में।

    उत्तर देंहटाएं
  3. जब ग़ज़ल का सीधा संबंध गेयता से है तो उच्चारण के आधार पर शब्दों में थोडे बहुत हेरफेर जो वज़न को बराबर रखने की कवायद के लिये हो क्या जायज नहीं है?

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  4. बहुत अच्छा आलेख है, विशेष कर आपने जो उदाहरण प्रस्तुत किये हैं।

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  5. Verywell composed article with examples. Thanks.

    Alok Kataria

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  6. बंद घड़ी को दरिया के बजाय दयार में फेंकने पर केवल शेर का वजन बढ़ रहा है ....बात का कम हो रहा है...
    "शेर ही खाली नहीं मोहताज़ होता वज्न का,
    २-१२११ , बात को भी वज्न की दरकार है "

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  7. फेंको इसे दरिया में "के" ये बंद पड़ी है

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  8. इतनी मूल्यवान जानकारियाँ सहेज कर रखने लायक हैँ
    शुक्रिया प्राण जी का
    - लावण्या

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  9. बहुत ही लाभकारी लेख। इसका प्रिंटेड वर्शन कहाँ मिलेगा? या तो हम ही प्रिंट कर लें। सेव कर के रखने वाला लेख, नि:संदेह।

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  10. निस्संदेह इस तरह से समझाया गया है कि बहुत सी गुत्थियाँ सुलझ गयीं।

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  11. इस तरह की जानकारियों भरे औरों के भी लेख हैं। पर ग़ज़ल विधा को लेकर प्राण जी का यह एक बेहद महत्वपूर्ण लेख है।

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  12. शायद इसी लिये कहा जाता है कि बिना गुरु ज्ञान नहीं मिलता। मैने हमेशा उर्दू बहरों को हिन्दी की मात्राओं में निकामने की कोशिश की है और असफल रही हूँ। आज जैसे आँख खुली। क्या एसा कोई विशुद्ध उदाहरण है जहाँ हिन्दी के किसी छंद परंपरा को आधार रख कर ग़ज़ल लिखी गयी हो? इससे मेरा समाधान हो जायेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहूत दिनों बाद ब्लॉग जगत में एक अच्छा पोस्ट देखने को मिला .... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  14. ग़ज़ल को "देवनागरी ग़ज़ल" या "गीतिका" कहने वाले और अपने आप को ग़ज़ल सम्राट या विराट कहने वाले शायरों ने ही बेड़ा ग़र्क किया है इस विधा का.ये नही जानते कि नज़’र और न’ज़र मे क्या फ़र्क है.आज मुझे आभास होता है क्यों फ़िराक इन को बुरा-भला कहते थे. बाग़ को उपवन कहने से ग़ज़ल मे नयापन नही आता.

    प्राण जी का तहे-दिल से शुक्रिया लेकिन एक बात है कि जब ये अपने को पहली पंक्ति का शायर कहने वालों का ये हाल है तो हम नये शायरों से क्या उम्मीद रखेंगे.

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  15. बहुत अच्छी और उपयोगी जानकरी दी है। बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  16. इन लेखों को पढ कर लगता है कि आज तक हमने जो लिखा व गजल कतई नहीं थी.. सहेजने तथा बार बार पढने योग्य सामाग्री है.. निश्चय ही इसे आत्मसात कर कुछ पढाने योग्य लिख पायेंगे

    आभार

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  17. पंकज सक्सेना5 जनवरी 2009 को 2:26 pm

    ग़ज़ल को संवारने में आपका यह आलेख महत्वपूर्ण होगा। सवाल कम निकले इस आलेख से अपितु समाधान अधिक हुआ। बहुत धन्यवाद प्राण जी।

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  18. हर बार जब भी मैं किसी भी ग़ज़ल की कक्षा में उपस्थित होता हूँ हिन्दी उर्दू का झगडा सा नजर आता है। यह भी सच है कि बज़न को बराबर करने के लिये शायर शब्दों में हेरफेर करते रहते हैं। यह भी देखा गया है कि मात्रा को भी आगे पीछे किया गया है लेकिन इस तरह के परिवर्तन तो सामान्य तौर पर स्वाभाविक है अन्यथा कथ्य के साथ तोड फोड करनी पडती है?

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  19. ग़ज़ल की अवधारणा अब समझ में आने लगी है। आदरणीय प्राणशर्मा जी का धन्यवाद।

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  20. DRISHTIKON JEE,GAZAL MEIN SAHEE
    BAHAR ,CHHAND AUR SHUDH BHASHA
    KAA ISTEMAAL KIYAA JAANAA MAHATTAV-
    POORN KAHLAATAA HAI .KAVI KAA KAAM
    BHASHA KO MAANJNA HAI BIGADNA NAHIN.
    ANONYMOUS JEE,SHER KO EK BAAR PHIR
    PADHIYE,"DARAAR" VAZAN KE KOEE
    SHABD SE MISRA SAHEE BANTAA HAI.IS
    MISRE MEIN "MEIN"KO GIRAA KAR 1
    KIYAA GAYAA HAI.
    SATPAL JEE,AAPNE GAZAL SEEKHNE KE
    LIYE USTAAD DWIJ KEE MAAR KHAAYEE
    HAI.AAP BHALEE BHANTI JANTE HAIN KI
    KI GAZAL KAHNA KOEE AASAAN NAHIN
    HAI.GAZAL KAHNE KEE KHOOBION KO
    JANNE KE LIYE URDU KE MASHHOOR
    SHAAYAR NARESH KUMAR "SHAAD"KO TEEN-TEEN USTAAD SHAYRON KEE MAAR
    KHANEE PADEE THEE.

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  21. NIDHI AGARWAL JEE,HINDI KE DO
    CHHAND HAIN-"BHUJANGPRAYAAT"AUR
    "BHUJANGEE".BHUJANG PRAYAAT KEE
    PANKTI BANEGEE--
    SAVERE SAVERE KAHAN JAA RAHE HO
    1 S S 1 S S 1 S S 1 S S
    AUR URDU KE HISAAB SE
    1 2 2 1 2 2 1 2 2 1 2 2
    BHUJANGEE CHHAND MEIN ANTIM
    DO MAATRAAYEN NAHIN HAIN.JAESE
    SAVERE SAVERE KAHAN JAA RAHE
    1 S S 1 S S 1 S S 1 S
    1 2 2 1 2 2 1 2 2 1 2
    URDU KE HISAB SE ,AB TO
    HINDI KE HISAB SE BHEE "MEIN","HAI","HO" AADI KO GIRAA KAR UNKAA EK MAATRAA MEIN
    ISTEMAAL KIYAA JAA SAKTA HAI.
    AAP IN HINDI KE IN DO CHHANDON
    MEIN GAZAL KAHNE KAA PRAYAAS KAREN.

    उत्तर देंहटाएं
  22. प्राण जी को सादर प्रणाम...बहुत ही उपयोगी आलेख...आँखें खुल गयी
    एक सवाल था किंतु ...इस लिहाज से फिर तो "मेरा" "तेरा" "कोई" वगैरह जैसे आम शब्दों को तो लगभग सभी शायरों ने तोड़ा-मरोड़ा है ,क्या ये जायज है?

    उत्तर देंहटाएं
  23. GAUTAM JEE,AAPKE PRASHN KAA LEKH
    KEE AGLEE KADEE MEIN PADHIYE.

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  24. प्राण जी को सादर प्रणाम...
    बहोत ही अच्छी और ज्ञानवर्धक जानकारी मिली आपसे आपको बहोत बहोत बधाई .........

    अर्श

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  25. गजलों में

    प्राण प्रतिष्‍ठा

    अब हो सकेगी

    संभव

    प्राण जी

    विजयी भव।

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  26. सबसे पहले तो आदरणीय प्राण साहेब को नव वर्ष की शुभ कामनाएं...उम्मीद करता हूँ की उनका आशीर्वाद सदा की भांति मिलता रहेगा...ऐसे गुरु से मार्गदर्शन पा कर हम सब धन्य हुए...कितनी आसानी से कितनी मुश्किल बातें समझाई हैं हमें...मैंने इस लेख का प्रिंट ले कर रख लिया है ताकि हर ग़ज़ल लेखन से पहले इसे पढ़ लिया करूँ...आगामी कड़ी का इंतज़ार है...सतपाल जी सही कहते हैं जब सिद्ध हस्त शायर गलती कर बैठते हैं तो हम जैसे अनाडियों का तो खुदा ही मालिक है...
    नीरज

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  27. आज इंटरनेट का कनेक्शन खराब होने के कारण, यह लेख अब पढ़ा। मैं सुभाष नीरव
    जी से पूरणतयः सहमत हूं कि "इस तरह की जानकारियों भरे औरों के भी लेख हैं। पर ग़ज़ल विधा को लेकर प्राण जी का यह एक बेहद महत्वपूर्ण लेख है।"
    'साहित्य शिल्पी के संपादक इस लेख के 'नई छन्द रचना' के भाग को यदि आगामी अंक में रखते तो अच्छा था। लेख बहुत लंबा हो गया है।
    इस लेख को पढ़ने वाले २ प्रकार के पाठक हैं:
    १) वे लोग जिन्हें ग़ज़ल सीखने की तीव्र इच्छा है। उनके लिए ५० पृष्ठ पोस्ट में लगा दें तो वे बहुत ख़ुश होंगे।
    २) दूसरे वे पाठक हैं जिन्हें कुछ अनिवार्य कार्यों में इतना व्यस्त होना पड़ता है कि इतने लंबे लेख को आत्मसात करने में रुचि होते हुइ भी लाचार हो जाते हैं। यद्यपि वे प्रिंट कर सकते हैं, किंतु समयाभाव के कारण अल्प समय में एक लंबा लेख पचाना कठिन हो जाता है। उन लोगों के लिए भी सहानुभूति का रवैया रखना चाहिए।
    प्राण जी का यह अनुपम लाभदायक पूरे लेख
    (पिछले और आगामी भागों) को अधिक भागों में बांट दिया जाए तो अधिक लोगों को लाभ होगा।
    लेखक जिस परिश्रम से अपना अर्जित ज्ञान पाठकों को देता है, वह यह भी आशा करता है कि अधिक से अधिक हर प्रकार के लोगों को इसका लाभ मिले जैसे एक कुशल गुरू विभिन्न योग्यता,क्षमता और सामर्थ्य के बच्चों का ध्यान रखता है।

    उत्तर देंहटाएं
  28. प्राण जी का लेख महत्वपूर्ण है. प्राण जी स्वयं अच्छे ग़जलकार हैं गजल पर उनके लेख पले भी पढ़े हैं. आप और शर्मा जी को बधाई.

    चन्देल

    उत्तर देंहटाएं
  29. प्रणाम गुरुवर्य!
    अपनी स्लेट पौंछी नही,वरन गीले कपड़े से साफ़ करदी है । सीखने मे सुख अब मिलेगा।

    काश!पहला हरफ़ लिख सकूं।

    नतशीश।
    प्रवीण पंडित

    उत्तर देंहटाएं
  30. आदरणीय प्राण जी नें ग़ज़ल पर बहुत से संदेहों को मिटा कर इस विधा में कुछ लिख पाने का साहस तो दे ही दिया है।

    आपके मार्गदर्शन में इस विधा को सीखने का प्रयास है, आशीर्वाद दीजियेगा।

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  31. pran saheb,

    aapki ye tutorials pad raha hoon par ,bahut si baaten samajh nahi aati ...koshish kar raha hoon..

    aapko is lekh ke liye bahut bahut badhai ..

    aapka
    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  32. प्राण जी नमस्कार
    आपका आलेख पढ़ा
    आपने इस पोस्ट को लिखने के लिए जो मेहनत की है वो साफ़ झलकती है
    जब पढ़ना शुरू किया था तो पोस्ट जानकारी का पिटारा भर लगी मगर जब रामधारी सिंह दिनकर व स्वर्गीय शंभुनाथ 'शेष' जी का प्रसंग आया तो मैं चमत्कृत हो गया
    वास्तम में हमें गजल उस भाषा में लिखनी चाहिए जो भाषा हमें आती हो हिन्दी के शब्दों के प्रयोग पर हमारे गुरु जी श्री पंकज सुबीर जी भी ज़ोर देते हैं और प्रोत्साहित करते है

    फ़िर लगा की पोस्ट ख़त्म होने वाली है

    मगर आगे जो पढने को मिला उसने पोस्ट को अमूल्य बना दिया पढ़ कर पता चला की पारखी वो नही जो कांच और हीरे में फर्क कर सके बल्कि असली परख तो उसको होती है जो हीरे की अशुद्धियों को पकड़ सके


    अब आखरी में एक बात संकोच के साथ कहना चाहता हूँ आप जो भी ज्ञान यहाँ पर बाँट रहें है वो सारी की सारी उस व्यक्ति के लिए व्यर्थ है जिसे बहर की जानकारी न हो और आपकी पोस्ट उस व्यक्ति के किसी काम नही आ पायेगी जो नया लिखने वाला हो या जो गजल लिखना सीखना चाहता हो
    आपसे गुजारिश है की कृपया पहले काफिया रदीफ़ को तो पक्का करवा दे बहर तो बहुत आगे का पाठ है और आप जो पोस्ट लगा रहे हैं वो तो बहर के भी बाद का है

    एक निवेदन है अच्छा लगे तो ठीक नही तो बच्चे की नासमझी समझ कर भूल जायें

    वीनस केसरी

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  33. मैं तो बस इतना ही कहूँगा बहुत से लोग ग़ज़ल लिखने के लिए किताबें खोज रहे थे, उनकी तलाश यहीं आके ख़त्म हुई!

    उत्तर देंहटाएं
  34. आदरणीय!
    लेख अनुपम और आवश्यक जानकारी से परिपूर्ण है. आपने ही शब्द को अलग-अलग वजन में प्रयोग को उर्दू के नियमों के हिसाब से ठीक ही गलत कहा है. क्या हिन्दी में भी ऐसी बंदिश है? अगर नहीं तो जिस गजल को उर्दूवाले बहर से खारिज कहेंगे उसी को हिंदीवाले सही मानेंगे. क्या हिन्दिग्ज्ल और उर्दू गजल में अंतर उनकी भाषिक-व्याकरणिक भिन्नता ही नहीं है?

    उत्तर देंहटाएं
  35. यक़ीनन बढ़िया लेख है। कई बड़े लोगों की रचनाओं पर आपने ठीक जगह उँगली रखी है। हिन्दी के लहज़े को बचाने की आपकी बात का मैं भी समर्थन करता हूँ, पर आपके लेख में भी 'वह' शब्द कई बार उर्दू लहज़े में इस्तेमाल हुआ है। मेरे ख़याल से ऐसे मसलों पर भी ध्यान देना चाहिए। हिन्दी व्याकरण का तरीक़ा यह है कि बहुवचन क्रिया के साथ एकवचन का सर्वनाम इस्तेमाल नहीं किया जाता। जैसे कि अकसर लोग ‘वह बड़े प्यारे व्यक्ति हैं’, ‘वह वहाँ रोज़ जाते हैं’, ‘वह तो आएँगे ही’...टाइप के वाक्य लिख देते हैं। उर्दू के माहौल से आए लोग तो लिखते ही हैं, बड़ों की देखा-देखी आम पाठक भी लिखने लगे हैं। वास्तव में हिन्दी में किसी व्यक्ति को सम्मान देना हो तो हम उसके व्यक्तित्व को कई गुना बढ़ा देते हैं, या कहें उसे बहुवचन बना देते हैं। यह हमारी संस्कृति की भी एक विशेषता है और अङ्ग्रेज़ी की शैली से कुछ अलग है। ‘कलाम साहब बड़े सरल व्यक्ति थे’...इस वाक्य में कलाम साहब को सम्मान देने के लिए बहुवचन क्रिया ‘थे’ का इस्तेमाल किया गया है। यहाँ यदि कलाम साहब के नाम की जगह सर्वनाम इस्तेमाल किया जाय तो वाक्य बनेगा.. ‘वे बड़े सरल व्यक्ति थे’..न कि.. ‘वह बड़े सरल व्यक्ति थे।’ ‘थे’ के साथ ‘वे’ होना चाहिए ‘वह’ नहीं, लेकिन अगर आप ‘वह’ कहना चाहते हैं तो इसके साथ ‘थे’ के बजाय ‘था’ ही जायज़ होगा। क्रिया बहुवचन तो सर्वनाम भी बहुवचन में। बहरहाल, आपके उम्दा लेख के लिए आपको साधुवाद।

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  36. यक़ीनन बढ़िया लेख है। कई बड़े लोगों की रचनाओं पर आपने ठीक जगह उँगली रखी है। हिन्दी के लहज़े को बचाने की आपकी बात का मैं भी समर्थन करता हूँ, पर आपके लेख में भी 'वह' शब्द कई बार उर्दू लहज़े में इस्तेमाल हुआ है। मेरे ख़याल से ऐसे मसलों पर भी ध्यान देना चाहिए। हिन्दी व्याकरण का तरीक़ा यह है कि बहुवचन क्रिया के साथ एकवचन का सर्वनाम इस्तेमाल नहीं किया जाता। जैसे कि अकसर लोग ‘वह बड़े प्यारे व्यक्ति हैं’, ‘वह वहाँ रोज़ जाते हैं’, ‘वह तो आएँगे ही’...टाइप के वाक्य लिख देते हैं। उर्दू के माहौल से आए लोग तो लिखते ही हैं, बड़ों की देखा-देखी आम पाठक भी लिखने लगे हैं। वास्तव में हिन्दी में किसी व्यक्ति को सम्मान देना हो तो हम उसके व्यक्तित्व को कई गुना बढ़ा देते हैं, या कहें उसे बहुवचन बना देते हैं। यह हमारी संस्कृति की भी एक विशेषता है और अङ्ग्रेज़ी की शैली से कुछ अलग है। ‘कलाम साहब बड़े सरल व्यक्ति थे’...इस वाक्य में कलाम साहब को सम्मान देने के लिए बहुवचन क्रिया ‘थे’ का इस्तेमाल किया गया है। यहाँ यदि कलाम साहब के नाम की जगह सर्वनाम इस्तेमाल किया जाय तो वाक्य बनेगा.. ‘वे बड़े सरल व्यक्ति थे’..न कि.. ‘वह बड़े सरल व्यक्ति थे।’ ‘थे’ के साथ ‘वे’ होना चाहिए ‘वह’ नहीं, लेकिन अगर आप ‘वह’ कहना चाहते हैं तो इसके साथ ‘थे’ के बजाय ‘था’ ही जायज़ होगा। क्रिया बहुवचन तो सर्वनाम भी बहुवचन में। बहरहाल, आपके उम्दा लेख के लिए आपको साधुवाद।

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