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शुक्रवार, १६ जनवरी २००९

महान संगीतकार ओ पी नैयर [आलेख] - श्रद्धा जैन


ओ.पी. नैयर नाम सुनते ही एक पतली काया और टोपी पहने हुए इंसान की छवि सामने आती है। नैयर साहब का जन्म 16 जनवरी १९२६ में लाहौर जो कि अब पाकिस्तान का हिस्सा है, में हुआ। दबंग, निरंकुश और हमेशा नये प्रयोग करने वाले इस सितारे का नाम माता पिता ने ओंकार प्रसाद रखा। पाकिस्तान के विभाजन के बाद ये लाहौर से अमृतसर आ गये। ओंकार प्रसाद ने संगीत की सेवा करने के लिए अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। अपने संगीत के सफ़र की शुरूआत इन्होंने आल इंडिया रेडियो से की।

इनकी पत्नी सरोज मोहनी नैयर एक बहुत ही अच्छी गीत कार थी। सरोज के द्वारा लिखे गये ‘प्रीतम आन मिलो’ ने ओपी को सिने जगत में नयी ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया। सिने जगत में ओ. पी. नैयर का नाम ओपी प्रसिद्ध हुआ। थोड़े ही दिनो के बाद एक रिकॉर्डिंग कंपनी ने इनके गाने ‘प्रीतम आन मिलो’ और ‘कौन नगर तेरा दूर ठिकाना’ को लेकर एक संगीत का एल्बम निकाला, जो लोगों के द्वारा बहुत पसंद किया गया और नैयर साहब के काम को लोगों ने पहचाना। कुछ ही दिनों बाद हिन्दी फिल्मों में अपने नसीब को आज़माने ये मुंबई आ गये।

१९४९ में ‘कनीज़’ से इन्हें सिने जगत में काम मिलना शुरू हुआ जब इसके निर्देशक कृष्ण केवल ने इन्हें फिल्म में बैक ग्राउंड संगीत देने का काम दिया। बतौर संगीतकार "आसमान" (१९५२) इनकी पहली फिल्म थी। इस तरह इन्होंने अपने संगीत साधना के सफ़र की शुरूआत की । फिर छम छमा छम, बाज़ आदि फिल्मों में संगीत दिया और इनकी सभी फिल्में एक के बाद एक असफल रही। नैयर साहब निराश होकर लौट जाने का सोच ही रहे थे कि गुरु दत्त जी द्वारा निर्देशित ‘आर पार’ सुपरहिट रही और इनके संगीत ने लोगों के दिल और ज़ुबान पर जगह बना ली। हिन्दी धुन के साथ पाश्चात्य संगीत, पंजाबी ताल संगम लोगों ने पहले कभी नहीं सुना था। ओ. पी. नैयर की अनूठी संगीत शैली ने लोगों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ना शुरू कर दिया। नैयर साहब ने अपने संगीत में सारंगी और पियानो का बहुत अच्छा प्रयोग किया।

आइए सुनें "आर पार" फिल्म का गीत "कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र":



आर−पार, सी. आई. डी., तुमसा नहीं देखा आदि एक के बाद एक लगातार हिट फिल्में देते हुए ये सिने जगत में सबसे महँगे संगीतकार बने। १९५० में एक फिल्म में संगीत देने के १ लाख रुपये लेने वाले पहले संगीतकार थे। “नया दौर” इनकी सबसे लोकप्रिय फिल्म रही। इस फिल्म के लिए उन्हें 1957 में फिल्म फेयर अवॉर्ड भी मिला।

आइए सुनते हैं इस फिल्म का एक सुपरहिट गाना "उड़े जब जब जुल्फ़े तेरी" :



सिर्फ़ कुछ ही फिल्मों में अपनी कला का लोहा मनवा देने वाले ये संगीतकार ज़िद्दी और एकांतप्रिय स्वभाव के कारण भी चर्चा में रहे। कुछ लोग इन्हें घमंडी, दबंग और निरंकुश स्वभाव के भी कहते थे, हालाँकि नये एवम् जूझते हुए गायकों के साथ ये बहुत उदार रहे। पत्रकार हमेशा से ही इनके खिलाफ रहे और इनको हमेशा ही बागी संगीतकार के रूप में पेश किया गया ।
पचास के दशक के दौरान आल इंडिया रेडियो ने इनके संगीत को आधुनिक कहते हुए उस पर प्रतिबंध लगा दिया और इनके गाने रेडियो पर काफ़ी लंबे समय तक नहीं बजाए गये । इस बात से उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ बल्कि वे अपनी धुन बनाते रहे और वे सभी देश में बड़ी हिट रही। उस समय सिर्फ़ श्री लंका के रेडियो पर ही इनके नये गाने सुने जा सकते थे। बहुत जल्दी ही अँग्रेज़ी अख़बारों में इनकी तारीफ के चर्चे शुरू हो गये और इन्हें हिन्दी संगीत में उस्ताद कहा जाने लगा, तब ये बहुत जवान थे।

गीता दत्त जी, आशा भोंसले जी और मोहम्मद रफ़ी के साथ इन्होंने सबसे ज़्यादा काम किया। मोहम्मद रफ़ी से अलग होने के बाद ओपी महेंद्र कपूर के साथ काम करने लगे। महेंद्र कपूर जी ओपी के लिए दिल से गाते थे। उनकी आवाज़ और एहसास की गहराई ने ओपी के गानों में भावनाओं को उभारा और लोगों के दिलों तक ओपी के विचारों की गहराई पहुँचाई।
आशा भोंसले के साथ ओपी ने लगभग सत्तर फिल्मों में काम किया। सिने जगत के लोगों ने आशा भोंसले को उनकी ही खोज बताया। ऐसा लगता था कि नैयर साहब आशा जी के लिए विशेष धुन बनाते हों, जिन्हें आशा बिना किसी मेहनत के गा लेती। ओपी ने लता मंगेशकर जैसी सुर सम्राज्ञी के साथ कभी काम नहीं किया। ये सिने जगत में हमेशा ही चर्चा का विषय रहा। ओपी कहते थे कि उनके गाने लता की आवाज़ से मेल नही खाते। वे ज़्यादातर पंजाबी धुन के साथ मस्ती भरे गाने बनाते थे। लेकिन मुकेश के दवारा गया हुआ बहुत गंभीर गाना ‘चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला’ ओ. पी नैयर की चहूँमुखी प्रतिभा को दर्शाता है।

तो आइए सुनते हैं ये गीत:




चल अकेला का संगीत एवम् बोल टेगोर के बंगाली गाने से लिया था। मुकेश के इस गाने के सूपरहिट होने बाद ओपी ने साबित कर दिया की वो किसी के साथ भी आसानी से काम कर सकते हैं। ओपी ने हास्य कलाकारों द्वारा तीन मिनट के पूरे गाने गाये जाने का नया रिवाज़ शुरू किया, जो सिने जगत में किसी हीरो के गाने से भी ज़्यादा प्रसिद्ध हुआ। किशोर कुमार की प्रतिभा को ओपी ने शुरू में ही पहचान लिया। ‘बाप रे बाप’ में किशोर कुमार और ओपी की जुगलबंदी ने खूब धूम मचाई और फिल्म के गाने सूपरहिट रहे।

ओपी की पसंदीदा हीरोइन मधुबाला रही। हालाँकि मधुबाला की मृत्यु के बाद ओपी ने शर्मिला टेगर, पद्‍मिनी, आशा पारेख, वेजेयंतीमाला आदि हीरोइन के लिए गाने बनाए। ओपी अपने गानों का चयन बहुत ध्यान से करते थे हालाँकि नयी चीज़ों का प्रयोग उनकी विशिष्टता थी। जाँ निसार अख़्तर, कमर जलालाबादी, शमशुल हुदा बिहारी, अहमद वासी आदि शायर जैसे उनकी धुन और उनकी लय के हिसाब से लिखते, जो कि उनके संगीत को जवान और तरंगित बनाता। साहिर लुधियानवी और ओपी ने मिलकर लोगों को कुछ कभी न भूलने वाले गीत दिए, जिनकी महक इतने सालों बाद भी ताज़ी है। ओपी को शायर की गहराई और शब्दों का बेजोड़ तालमेल बहुत प्रभावित करता था।

तलत महमूद साहब की मखमली आवाज़ में एक और गीत; फिल्म "सोने की चिड़िया" से भी सुनते चलें:




1960 तक आते−आते ओपी साल में सिर्फ़ एक ही फिल्म में काम करने लगे। 1961 में ओपी की कोई फिलम नहीं आई हालाँकि 1962 में ओपी ने एक ‘एक मुसाफिर, एक हसीना’ जैसी सुपरहिट फिलम देकर लोगों के दिलों में पुरानी यादें ताज़ा कर दी। ओपी ने हिन्दी फिल्मों के अलावा तमिल फिल्मों में भी संगीत दिया।

1974 में आशा से अलग होने के बाद ओपी के सुनहरे गीतों को जैसे ग्रहण लग गया हो। सिने जगत के लोगों ने इस अलगाव को ओपी के करियर का अंत भी लिखा। बहुत कोशिशों के बाद भी ओपी दूसरी आशा नहीं बना पाए। ओपी ने दिलराज कौर, कृष्णा काले, वाणी जयराम, कविता कृष्णमूर्ति आदि के साथ काम किया लेकिन कोई भी ओपी के धुन के जादू को नहीं जगा सका।

अपने संगीत जगत से अवकाश लेने के बाद ओपी बहुत ही कम दोस्तों के संपर्क में रहे। एक दोस्त गज़ेंद्र सिंह जिनके कहने पर ओपी ने ‘सा−रे−गा−मा−पा’ में नयी पीढ़ी के गायकों मार्गदर्शन दिया। दूसरे अहमद वासी जिन्होंने विविध भारती पर इनका साक्षत्कार कार्यक्रम ‘मुझे याद है सब ज़रा ज़रा’ छ: एपीसोड (हर एपीसोड एक घंटे का था) में प्रस्तुत किया। 28 जनवरी 2007 को जब उनकी मौत हुई तब वे अहमद वासी के लिखे हुए गाने को संगीत दे रहे थे।

तीन बेटियों और एक बेटे के पिता ओपी अपने परिवारिक मतभेदों और घरेलू झगड़ो से तंग आकर अपने दोस्त के घर विरार मुंबई में रहने चले गये जबकि इनका पूरा परिवार मरीन ड्राइव मुंबई में ही रहता है। देहावसान के लगभग एक महीने पहले ही वे थाने में रहने वाले अपने एक दोस्त के यहाँ चले गये थे, जो कि मरीन ड्राइव से और भी दूर था। उनके अंतिम संस्कार में उनका परिवार शामिल नहीं हुआ। यह नैयर साहब की ही इच्छा थी कि उनकी अंतिम यात्रा में उनके परिवार का कोई शामिल नहीं हो।

ओ पी नैयर का नाम हिन्दी संगीत जगत में सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ है। आज नैयर साहब की पुण्य तिथि पर हम ऐसे महान संगीतकार को अपने श्रद्धा के सुमन अर्पित करते हैं। संगीत जगत में इनका योगदान युगों तक याद रहेगा।

अंत में आइये सुनते हैं, मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में एक मस्ती भरा गीत "तारीफ़ करूँ क्या उसकी..." (फिल्म: कश्मीर की कली):


27 comments:

अनिल कुमार १६ जनवरी २००९ ७:४६ पूर्वाह्न  

ओ. पी नैय्यर साहब और उनकी कम्पुजिशंस को याद करना बहुत अच्छा लगा।

बेनामी १६ जनवरी २००९ ८:२९ पूर्वाह्न  

Thanks. Nice article.

Alok Kataria

रचना सागर १६ जनवरी २००९ ८:४८ पूर्वाह्न  

ओ.पी. नैयर पर श्रद्धा जी नें बहुत महत्वपूर्ण आलेख लिखा है। उनके व्यक्तित्व पर बेहद प्रभावशाली लेख है यह।

seema gupta १६ जनवरी २००९ ९:२८ पूर्वाह्न  

ओ. पी नैय्यर साहब जी के जीवन और कैरियर से जुड़ी घटनाओ और उनके गीत सुनवाने के लिए बहुत बहुत आभार..

Regards

कथाकार १६ जनवरी २००९ १०:२७ पूर्वाह्न  

मनभावन गीतों को सुनते सुनाते अपने प्रिय संगीतकार को याद करना और उन्‍हें श्रद्धांजलि देना; आपका ये तरीका अच्‍छा लगा; ओपी मेरे प्रिय संगीतकार है;रोज़ सुनता हूं

सुशील कुमार छौक्कर १६ जनवरी २००९ ११:१३ पूर्वाह्न  

ओ.पी. नैयर पर श्रद्धा जी का लेख पढ़कर अच्छा लगा। गीत तो सुन नही पाए पर सारे गीत है ही लाजवाब।

निधि अग्रवाल १६ जनवरी २००९ ११:२५ पूर्वाह्न  

नैय्यर जी को श्रद्धा जी नें बडी शिद्दत से याद किया है। उनका पूरा संगीत सफर ही यादगार है और अमर है। उनके अंतिम दिनों पर जो कुछ जाना वह दु:खद है।

Vidhu १६ जनवरी २००९ २:१९ अपराह्न  

ओपी नय्यर पर जानकारी भरा लेख अच्छा लगा है उन्हें सुनना परन्तु उनके कई गाने में से फिर वोही दिल लाया हूँ भी पापुलर हुए थे ...उनकी सरलता ही लाजवाब थी ...आशा जी की आवाज मैं तो उनके गाने कमाल करतें हैं उन्हें आदरांजलि

नंदन १६ जनवरी २००९ २:२३ अपराह्न  

नैय्यर जे को याद करना अच्छा लगा। उनका संगीत अविस्मरणीय है। उनके जीवन पर यह प्रस्तुति बहुत अच्छी प्रकार प्रकाश डालती है।

सागर नाहर १६ जनवरी २००९ ३:५५ अपराह्न  

लेख के बीच बीच में गाने सुनना बहुत अच्छा लगा। स्व. ओ पी नैयर जी को बहुत बढ़िया तरिके से आपने याद किया।
बधाई।
गीतों की महफिल

दृष्टिकोण १६ जनवरी २००९ ४:२२ अपराह्न  

नैयर साहब को याद करना व उनके गानों का इस प्रस्तुति के लिये चयन बहुत अच्छा लगा। श्रद्धा जी नें बहुत मेहनत से लिखा है।

PRAN SHARMA १६ जनवरी २००९ ४:२६ अपराह्न  

MAHAAN SANGEETKARON MEIN THE O.P.
NAYYAR.YUN TO UNKE DWAARA SWARBADDH
KIYE SAIKDON GEET AVISMARNIY HAIN
LEKIN C.H.ATMA KAA GAAYAA -"PRITAM
AAN MILO" KEE BAAT HEE KYA HAI!
SHRADDHA JAIN KEE PRAKHAR LEKHNEE
NE UNKE SANGEET PAR ACHCHHA PRAKASH
DAALAA HAI.MUBAARAK.

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" १६ जनवरी २००९ ६:४८ अपराह्न  

पी नैयर जी से सम्बंधित आलेख के माध्यम से आपने उनके बारे में, गीतों के बारे में विस्तृत जानकारी दी है
बधाई.
-विजय

राजीव तनेजा १६ जनवरी २००९ ७:३१ अपराह्न  

महत्तवपूर्ण आलेख ......

मोहिन्दर कुमार १६ जनवरी २००९ ८:४१ अपराह्न  

श्रद्धा जी,
आपने जीवन की पुराणी यादों में पहुँचा दिया. ओपी नय्यर जी पैर सुंदर लेख के लिए आभार

Vijay Kumar Sappatti १६ जनवरी २००९ ९:५१ अपराह्न  

wah ji shraddha ji ,

apne to beete hue dino ki yaad dila di .. wah
jaayiye aap kahan jaayenge , inki behatreen composition hai .. inke music men drums aur saxophone aur table ka jo behtar use hua hai , wo aur kahin nahi.. behtreen orchestra... aur sabe badi baat , unke shabdo men ,unhone sangeet ki shiksha hi nahi li..

wah ji wah , aaj ye bhi pata chal gaya ki aapko music men bhi dilchaspi hai , ab to aapse phir baat karni hongi..

aapko bahut badhai ..

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

yogesh samdarshi १६ जनवरी २००९ १०:१४ अपराह्न  

वाह भई वाह यह तो विविध भारती हो गया... मजा आगया क्या पेशकश है जनाब... बधाई....

जी.के. अवधिया १७ जनवरी २००९ ८:५५ पूर्वाह्न  

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतीकरण! ओ पी नैयर जैसे महान संगीतकार के विषय में एक ही लेख में इतनी विस्तृत जानकारी देकर आपने बहुत ही अच्छा कार्य किया है।

NirjharNeer १७ जनवरी २००९ ९:३९ पूर्वाह्न  

bahot mehnat ki hai aapne.
kabil-e-tariif
ati sundar
..

कुश १७ जनवरी २००९ ११:०८ पूर्वाह्न  

कल ही नैयर साहब पर एक स्पेशल प्रोग्राम देख रहा है.. जो कुछ उसमे छूटा वो आपके लेख में मिल गया... इस लिंक को सेव करके रख लिया है.. बहुत बहुत धन्यवाद आपका इस लेख को पढ़वाने के लिए..

masoomshayer १७ जनवरी २००९ ११:१५ पूर्वाह्न  

मैएँ सोचा था नैयर साहब को मैं ही अधिक जनता हूँ पर मुझे बहुत सी नयी और अच्छी जानकारी मिली इस लेख से धन्यवाद श्रद्धा

अनिल मासूमशायर

manish..... १७ जनवरी २००९ ११:२४ पूर्वाह्न  

श्रद्धा जी का लेख पढ़ा ..नैयर जी के जीवन के बारे मे काफ़ी कुछ जानने को मिला . हम केवल उनके गीतो को ही सुनते आए थे .नैयर जी के बारे मे इतना सारगर्भीत और जानकारीपरक लेख लिखने के लिए श्रद्धा जी को साधुवाद ...

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) १७ जनवरी २००९ ११:३० पूर्वाह्न  

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतीकरण.

बहुत बहुत धन्यवाद

डॉ. श्रीकृष्ण मित्तल १७ जनवरी २००९ ३:०७ अपराह्न  

ओ पी नैयर जैसे महान संगीतकार के विषय में एक ही लेख में इतनी विस्तृत जानकारी देकर आपने बहुत ही अच्छा कार्य किया है।ओ.पी. नैयर पर श्रद्धा जी का लेख पढ़कर अच्छा लगा।
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतीकरण!

shashi sagar १७ जनवरी २००९ ३:२३ अपराह्न  

sharadha ji .....
bahut bahut shukriya......
naiyar sahab ek kabhi na bhulaye jane wale purodha hain.....prasansniye aalekh likha hai aapne......
bahut achha laga padh kar...

संत शर्मा १७ जनवरी २००९ ३:२७ अपराह्न  

Bahut mehnat ki hai aapne is article ko likhne me, aapka prayas achcha laga, aur isi bahane O.P. Nayer sahab ke jivan ko karib se janne ka mauka mila Good work.

PrakashYadav १९ जनवरी २००९ ६:४१ अपराह्न  

मनभावन गीतों को सुनते सुनाते अपने प्रिय संगीतकार को याद करना और उन्‍हें श्रद्धांजलि देना बहुत अच्छा लगा। श्रद्धा जी की तरह यह लेख बहुत भावपूर्ण है।

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