जब मौन पिघल जाता है [एक संवाद] - शेफ़ाली 'नायिका'

और नीचे खामोशी की नदी बह रही थी
न जाने कौन-सा शब्द बहुत भारी हो गया
कि जब चलने को हुए तो पुल टूट गया...
रचनाकार परिचय:-
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14 comments:
बडा काव्यात्मक गद्य है।
संवादों के पुल पर खड़े थे हम दोनों
और नीचे खामोशी की नदी बह रही थी
न जाने कौन-सा शब्द बहुत भारी हो गया
कि जब चलने को हुए तो पुल टूट गया...
संवेदनशील लेख लिखा है आपनें।
बहुत अच्छा आलेख है, बधाई।
बहुत सुन्दर और प्रभावी लिखा है।
दूरियों ने अपने कदम तेज कर लिए थे, लेकिन यादें और शिकायतें बहुत धीरे-धीरे चल रही थीं। कहीं सुना था- ‘स्लो एंड स्टडी ऑल्वेज़ वींस’, तो जो धीरे चल रहा था वह जीत गया और जो तेज कदमों से चलने के बाद रास्ते में सुस्ताने बैठ गया, वह हार गया।
संवेदना को यथोचित शब्द दिये हैं आपनें।
कुछ है शैफाली की रचनाओं में जो उन्हें अपने समकालीनों से अलग करता है।
सुंदर!
सुंदर लेख...
बधाई।
सच कहा आपने ....
शेफाली जी आपने एक कश्मकश को शब्दों में पिरो दिया है, पढ कर अच्छा लगा।
बहुत गहरी बात कह दी आपने अपने लेख के माध्यम से...
जब ठहरे हुये पानी में सडांध आ सकती है तो ठहरे हुये सम्बन्धों में क्यों नहीं आयेगी... शिकवा, शिकायतें..संवाद यही तो जिन्दगी की बहाव हैं.. इनकी जरूरत है जिन्दगी और प्यार को.
संवादों के पुल पर खड़े थे हम दोनों
और नीचे खामोशी की नदी बह रही थी
न जाने कौन-सा शब्द बहुत भारी हो गया
कि जब चलने को हुए तो पुल टूट गया…
बहुत खूब ! इतनी सुन्दर कविता पंक्तियाँ पहले कभी नहीं पढ़ीं। इन पंक्तियों ने ही इस तरह बाँध लिया कि बहुत देर तक आग बढ़कर पढ़ने को मन ही नहीं हुआ। फिर भी, बहुत मुश्किल से इन पंक्तियों के सम्मोहन से जब उबरा तो आगे पढ़ पाया। इस पोस्ट ने शायदा [ “मातील्दा” www.zubandaraz.blogspot.com] की पोस्टों की याद ताज़ा कर दी। बहुत खूब लिखा है शेफ़ाली जी ने। बधाई !
Deep Thoughts.
Alok Kataria
achha laga padkar
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