भारतीय काव्य शास्त्र में काव्य का हेतु शिवता की प्राप्ति है. दोनों कालजयी महाकाव्यों रामायण और महाभारत में सांस्कृतिक संघर्षों का ऐतिहासिक इतिवृत्त प्रस्तुत किये जाने पर मौल्यिक टकराव के कारण, असत के निवारण तथा सत के वरण को वरीयता दी गयी. घटनाएँ तथा व्यक्ति दोनों सत-शिव-सुन्दर के लिए हैं जबकि पाश्चात्य साहित्य में मूल्य गौड़ तथा पारिस्थिक परिवर्तन एवं वैयक्तिक महिमा मंडन को वरीयता दी गयी.

चित्र: तमिल महाकवि तिरुवेल्लुवर
महाभारत के परवर्ती काल ( ८० ई.पू.) में रचित बौद्ध साहित्य में त्रिपिटिको ( विनय, सुत्त, अधिधाम्म) में भिक्षुओं के आचार-विचार, शिक्षा तथा बौद्ध दर्शन का समावेश है. विनय पिटक ( ४ ग्रन्थ: पातिमोक्ख, सुत्त्विभंग, खंधक, परिवार) में नैतिक-व्यावहारिक-सैद्धांतिक नियम, सुत्त पिटक ( ५ निकाय ; दीघ, मज्झिग, संयुक्त, अंगुत्तर, खुद्दक) में , ब्रम्हजाल, सामन्जल, तथा महापरिनिब्बान सूत्रों में धार्मिक. सामजिक, राजनैतिक समस्याओं, बुद्ध की नैतिक शिक्षाओं, बुद्ध-कथनों, जागतिक कुकर्मों से दुःख व यंत्रणा, थेर/थेरी गाथा में भिक्षु/भिक्षुणियों की कवितायें, घटीसम्मिदामग्ग में बौद्ध-सिद्धांत,, अपदान में सत्पुरुष-पराक्रम काव्य, बुद्ध-वंश में २४ बूढों की पद्म्गाथा तथा चरिया पिटक में जातकों का संकलन श्लोकों में है. अभिधम्म पिटक (धम्म स्न्गानी, विभंग, धातु कण, पुग्ग्ल-प्न्चती, कथा वत्थु, यमक, पट्ठान) में प्रश्नोत्तर शैली में दार्शनिक विषयों विवेचना है. विस्मय यह की गूढ़ से गूढ़ विषयों की व्याख्या में काव्य को वरीयता दी गयी.


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रचनाकार परिचय:-

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है। आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है। आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। वर्तमान में आप म.प्र. सड़क विकास निगम में उप महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं।
जैन आगम में १२ अंगों ( आयारंग सुत्त, सूत्र कृतांग, स्थानांग, सम्वायंग, व्याख्या-प्रज्ञप्ति, ज्ञाता धर्मकथा, उपासक दशा, अन्ताक्रिद्दशाः, अनुतरौपपादिक दशाः, प्रश्न व्याकरणानि, विपात श्रुतं तथा दृष्टिवाद) मेंजैं साधुओं हेतु नियमों, अन्य पंथों की आलोचना, जैन सिद्धांतों, महावीर तथा शिष्यों के कार्य, जैन धर्म सिद्धांत, जैन वणिकों की कथाएँ, तप से स्वर्ग प्राप्ति, पंच महावृतों- पंच गुणों, तथा कर्मफल संबन्धी कथाएँ वर्णित हैं. १२ उपांगों में औपपातिक, राजप्रश्नीय, जीवाभिगम, जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, चन्द्र प्रज्ञप्ति, सूर्ये प्रज्ञप्ति तथा निभावली सुत्तम(५ भाग) में क्रमशः मनुष्यों द्वारा देवलोक प्राप्ति, शरीर से आत्मा पृथक होने संबन्धी सिद्धांत, प्राणि-वर्गीकरण व ब्रम्हांड वर्णन, खगोल, भूगोल, सृष्टि व काल-विभाजन, तथा मृत्योपरांत कथाएँ वर्णित हैं. १० प्रकीर्ण (चतु:शरण, संस्तार, आतुर प्रत्याख्यान, भक्त प्ररिज्ञा, तंदुल वैतालिक, चन्द्र-वैद्यक, गणिविद्या, देवेन्द्रस्तव, वीरस्तव, महाप्रात्याख्यान) में जैन सिद्धांत वर्णित हैं. छेत्र सूत्र निशीथ में दैनिक नियमोल्लंघन हेतु दंड, महानिशीथ में प्रायाश्चित्य-तप व कथाएँ, व्यव्हार में दंड विधान, जिन-चरित में महावीर व अन्य जिनों की जीवनियाँ, थेरावली में गणों-शाखाओं व गणधरों की सूची, सामाचारी में तपस्वियों हेतु वर्षाकालीन नियम तथा कल्प में भिक्षु जीवन हेतु नियम वर्णित हैं. पञ्चकल्प अनुपलब्ध है. मूलसूत्र में shdav shayak में जैनियों के ६ दैनिक कर्त्तव्य, दशवैकालिक में विहार-नियम, पिंडनिर्मुक्ति a पवित्र जीवनानुशासन, नांदी व अनुयोगद्वार (जैन विश्वकोष) में लौकिक शास्त्र व् विद्याएँ वर्णित हैं.

हिंदी काव्य शास्त्र की आधारशिला संस्कृत साहित्य के अंतर्गत श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण, आगम, व् दर्शन ग्रन्थ गणनीय हैं. लौकिक साहित्य को सुभाषित, काव्य, नाटक व अलंकार में वर्गीकृत किया गया है. पाणिनी (५०० ई.पू.) द्वारा व्याकरण ग्रन्थ की रचना के पश्चात संस्कृत भाषा के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन हुआ. जन सामान्य की भषा प्राकृत व् अपभ्रंश तथा संभ्रांत जनों की भाषा संस्कृत हुई.३५

संस्कृत वांग्मय में अश्वघोष रचित महाकाव्य बुद्ध चरित व सौदरानंद अप्रतिम हैं. महाकवि कालिदास (१०० ई. पू.-सर विलियम जोन्स, २०० ई. पू. -लासेन, ४०० ई. पू.- स्मिथ व कीथ, ६०० ई.पू. मक्स्मूलर, मेक्डोनल) रचित ऋतुसंहार (६सर्ग, १५३ छंद), मेघदूत (खंडकाव्य, ११५ मंदाक्रांत छंद), मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीयम, तथा शाकुंतल इन ३ नाटकों के अतिरिक्त महकव्यद्वय कुमारसंभव (१७ सर्ग) व रघुवंश (१९ सर्ग) संस्कृत साहित्य ही नहीं विश्व वांग्मय के जाज्वल्यमान रत्न हैं. रघुवंश के प्राकृतिक सौंदर्य का उदाहरण अपनी मिसाल आप है-

अनेन उन सह पार्थ्वें रंभोरुह कच्चिन्मन्सो रुचिस्ते.
क्शिप्रतारंगा नील कम्पितासु विहार्तुमुद्यान्पराम्परासु. ३६

कदली खम्ब सदृश उरुवाली!,
है क्या यह अभिलाषा आले?
क्षिप्र-जल छू आये पवन से,
कंपित उद्यानों-उपवन में,
नृपति संग विचरो.

काव्य-कोष को श्रृंगार-रत्नों से समृद्ध करते हुए कविकुल भूषण कालिदास उमा के अनिंद्य सौंदर्य का शब्द-चित्र अंकित करते हुए कहते हैं-

तस्याः शलाकांजननिर्मितेव कन्तिर्भ्रुवोरायतलेखयोर्या .
तां वीक्ष्य लीलाचतुरामनंग स्व्चाप सौन्दर्यमदममुमोच. -३७

तूलिकांकित चित्ररेखा, सदृश आयत भ्रू युगल.
देख तज अभिमान धनु का, कामदेव हुए शिथिल.

भर्तृहरि रचित 'भट्टी काव्य' (२२ सर्ग) में राम चरित्र वर्णन के समांतर व्याकरण नियमों पर भी प्रकाश डाला गया है. भारवि कृत 'किरातार्जुनीयम' (१८ सर्ग) में शिवार्जुन समर का जीवंत वर्णन है. भारवि का प्रकृति वर्णन तथा सौंदर्य बोध अनूठा है.

तिरोहितामतानि नितांतमाकुलैर्याम विगाहांदलकैह प्रसारिभिः.
ययुर्व्धुनाम वदनानि तुल्यताम् द्विरेफवृन्दांतरितै; सरोरुहैह.- ३८

सलिल-स्नान-रत कामिनी, आनन घेरे केश.
भ्रमराच्छादित कमल सम, शोभित वदन विशेष.

माघरचित शिशुपाल वध (९००ई.पू., २० सर्ग), श्री हर्ष रचित नैषध चरित (१२००ई.) कश्मीरी कवी रत्नाकर कृत हरविजय, अज्ञात कश्मीरी कवि कृत नलोदय, कविराज (८००ई.) राघव् पांडवीय में अलंकारों पर अधिक जोर दिया गया है. शिशुपाल वध में अनूठा प्रकृति चित्रण जीवंत है-

उदयति विततोर्ध्वरश्मिरज्जाव्हिमरुचौ हिम्धाम्नियाति चास्तं.
वहति गिरिरयम विलम्बिघंटाद्वय परिवारित वारणेन्द्र लीलाम. ३९

रज्जु-रश्मि मय सूर्ये-शशि, जब हों उदित व अस्त.
रज्जु घंट दो दिश बंधे, नग दीखता नग पस्त.

संस्कृत खंड काव्यों में कालिदास कृत मेघदूत व् ऋतु संहार, घटकर्पर कृत घटकर्पर(२० छंद), कश्मीरी कवी बिल्हण (११००ई.) कृत चौर पंचाशिका (५० छंद), भरथरी कृत श्रृंगार शतक (१००छन्द), श्रृंगार तिलक (२३छन्द), अमरु शतक (१०० छंद) तथा जयदेव (१२००ई.) कृत गीत गोविन्द आदि मुख्य हैं..

प्रमुख द्रविण भाषा तमिल में ५०० ई. पू. से ५०० ई. के मध्य संगम साहित्य (कई कवियों की रचनाओं का एक संग्रह) की रहना की गयी. प्रथम संगम अनुपलब्ध है. 'तोल्काप्पियम' द्वितीय संगम व्याकरण ग्रन्थ है. तृतीय संगम के 'पट्टूप्पादु' में १० काव्यों का संग्रह है.' एहटठ-टोखाई' में श्रृंगार बहुल १८ पद संग्रहों का संकलन. तथा 'पविनेन किलकनककु' में ' शीलप्पदिकारं' महाकाव्य में सती के पति पर चोरी के आरोप, मृत्युदंड, सेट के शोक व शाप देने की रोमांचक कथा है. महाकाव्य 'मणिमेख्लाई' में एक सुन्दरी के प्रेम तथा अंत में बौद्ध भिक्षुणी होने की दर्दनाक कथा है.

तमिल वेद के नाम से प्रसिद्द 'कुरल' में राजाओं की वंशावली, लोक संस्कृति एवं जन-जीवन का समीचीन वर्णन है. तमिल साहित्य के कालिदास तिरुवल्लुवर मलियापुर ग्राम की वल्लुवर जाती के जुलाहे थे जिनका विवाह वेल्लाह जाती की 'वासुकी' से हुआ था. उनके कुरुल में १३३ अध्यायों में १३३० 'कुरुल वेणवा' (दोहों की तरह दो पंक्तियों की द्वि पदियाँ) हैं. कुरुल के ३ खंडों में धर्म, अर्थ तथा काम का सूक्ष्म व गहन विश्लेषण सरल-सहज संगीतमय शैली में है. रामचंद्र दीक्षित्तर दार्शनिक-नैतिक सिद्धांतों से परिपूर्ण कुरल को गीता सदृश्य मानते हैं. राजनीती, श्रृंगार, अर्थ नीति, दर्शन तथा नीति शास्त्र आदि के ज्ञान-भंडार कुरुल के हर पद की अनेकों व्याख्याये की गयी हैं. हिन्दू, जैन, बौद्ध, ईसाई सभी धर्मावलम्बी इसे अपना मानते हैं. नीलकंठ शास्त्री के अनुसार कुरुल ने 'तमिल प्रखंड में उत्तर की समृद्ध बहुरंगी संस्कृति का मैत्रीपूर्ण स्वागत कर भारतीय प्रायद्वीप के सांस्कृतिक विकास तथा समुद्र पार के पूर्वी देशों को सुसंस्कृत बनाने का कार्य किया. ४० संत तिरुवल्लुवर की भव्य प्रतिमा दक्षिण समुद्र तट पर स्थापित है. उत्तर भारत में किसी कवि को वह लोक मान्यता व सम्मान नहीं मिला जो तिरुवल्लुवर को मिला. उनके कुछ कुरुलों का आनंद लीजिये-

ओलुक्कुम विलुप्प्म तरअलान,
ओलुक्कुम उयिरिजुम ओम्पपडूम.

श्री-समृद्धि देता है सदाचरण.
यह मानें प्राणों से बढ़कर.

उल्हत्तोडू ओत्त आलुहल पलअ,
कटरुम कल्लार अलिविलात्वर.

साथ न चलते जो समाज के
वे ज्ञानी जन भी अज्ञानी.

भारतीय काव्य परंपरा का रचनाशास्त्र जिन काव्य परम्पराओं से प्रभावित हुआ है उनमें कुरुल का स्थान अनन्य है. अन्य भाषाओँ की साहित्यिक परंपराओं की संक्षिप्त जानकारी का स्वागत है. ऐसी सामग्री 'सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम' पर दें. उसका उल्लेख सन्दर्भ व आभार सहित किया जायेगा.

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प्रश्नोत्तर:

वे रचनायें जो किसी दृश्य का चित्रण या आत्मानुभूति का प्रस्तुतीकरण हैं, क्या साहित्य की परिभाषा में आयेंगी?

तुलसीदास के अनुसार- 'कीरति भनिति भूति भली सोई. सुरसरि सम सब कहं हित होई' तथा 'वर्णाना मर्थसंघानाम रसानां छंद सामपि' की कसौटी पर खरी उतरनेवाली रचना की विषयवस्तु कुछ भी हो वह साहित्य ही है. भारतीय परंपरा में सामान्यतः साहित्य से आशय सत्साहित्य से लिया जाता है शेष अप्साहित्य भी साहित्य तो है पर उसे उसे साहित्य उसी तरह नहीं मन गया जैसे देव और दानव मौसेरे भी होने पर भी वृत्ति के अंतर के कारण एक दूसरे से भिन्न हैं अस्तु...

काव्य सच्चिदानंद है, सबके हित का हेतु.
कंकर-शंकर मध्य है, सत्साहित्य सु-सेतु.

'मा निषाद...' को पहली कविता मानने का कारण?

केवल यह कि उससे पहले लिखे गए किसी काव्य का उल्लेख मेरी जानकारी में नहीं है. हिन्दी के प्रायः सभी विद्वान् इस पर एकमत हैं. .

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13 comments:

  1. भारतीय काव्य परंपरा पर संग्रहणीय आलेख है। आचार्य जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सही कहा आपने कि काव्य सच्चिदानंद है। आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी नें जितने उदाहरन पाठकों के लिये उपलब्ध कराये हैं उनसे भारतीय काव्य की यात्रा के विबिन्न सोपानों से परिचय हो जाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. पंकज सक्सेना25 मार्च 2009 को 9:55 am

    श्लोक और उनका अनुवाद सबसे अधिक प्रभावित करता है।

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  4. काव्य सच्चिदानंद है, सबके हित का हेतु.
    कंकर-शंकर मध्य है, सत्साहित्य सु-सेतु. इसे सही दृष्टिकोण कहते हैं।

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  5. काव्य रचना शास्त्र पर सलिल जी का आलेख उनके गूढ अध्यन को प्रमाणित करता है..

    सच्चिदानंद का अर्थ यदि सम्पूर्ण आनन्द दायक माना जाये तो निश्चय ही काव्य सर्व प्रथम इस नाम का अधिकारी है.. विभिन्न उदाहरणों सहित अपनी बात स्थापित करने के लिये सलिल जी का आभार

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस आलेख की सबसे बडी बात है कविता की यात्रा का वर्नन। तमिल कविता के अनुवाद नें हर्षित कर दिया है। इससे पुरातन कविता के प्रति समझ बढेगी। मेरा प्रश्न है कि क्या संस्क्ट्त कविता और तमिल कविता दो अलग धाराओं की तरह पनपे? इनमें क्या साम्य व क्या विविधतायें रहीं? यह प्रश्न मैने आपके उदाहरन से प्रभावित हो कर पूछा है, मुझे नहीं पता कि विषय के साथ मेरा प्रश्न सही है अथवा नहीं।

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  7. सहज एवं बोधगम्य भाषा में काव्यसरिता के सुमधुर
    प्रवाह में आचमन .....

    शनै: शनै: शिल्पी साहित्य की चर्चा का अग्रणी मंच बन गया है
    हार्दिक आभार

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  8. असीम सुखानुभूति हो रही है........अंतरजाल पर देवनागरी देखने की अभिलाषा तो पूर्ण हो गयी थी,पर इस तरह की उच्च स्तरीय पठनीय सामग्री मिलेगी इसकी आशा न थी...
    अपने भाग्य को सराह रही हूँ...

    हिंदी साहित्य तथा अंतरजाल पर हिंदी को समृद्ध प्रदान करने के सार्थक प्रयास हेतु आपका कोटि कोटि आभार और नमन..

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  9. गर्व होता है यह जानकर कि हम भी उस देश और विरासत के अंश हैं, जहाँ का इतिहास इतना समृद्ध है |
    आचार्यजी के यह सारे कार्य सब के लिए ज्ञानवर्धक हैं |
    धन्यवाद के साथ...

    अवनीश तिवारी

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  10. यह आलेख श्रंखला नेट पर साहित्य को स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर है।

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  11. आदरणीय आचार्य संजीव सलिल जी,

    काव्य का रचना शास्त्र साहित्य शिल्पी का महत्वपूर्ण स्तंभ है। काव्य का गौरव शाली अतीत जानना-समझना अच्छा लगा। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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