मैं मानता हूँ कि लेखक या साहित्यकार कभी पेशेवर नहीं हो सकते। शायद मेरी इस बात से बहुत से सरोकार नहीं रखते होंगे; लेकिन मैं ये नहीं समझ सकता कि दिहाड़ी पर कोई लेखन कैसे कर सकता है। मेरे खयाल से वो सिर्फ जॉब-वर्क हो सकता है। जैसे पिछले सात सालों से अलग अलग मीडिया संस्थानों में मैंने किया है। साहित्य के लिए लिखना आना जरूरी नहीं है। अनुभव करना अहम है। पछिले दिनों जब मैं ई.टी.वी. का चुनावी प्रोग्राम "सेंट्रल हॉल" तैयार कर रहा था तब मेरी मुलाकात जैन टीवी के एक सीधे-सादे से शख्स शिवा तोमर से हुई। लेकिन जब उसके बारे में जाना तो हैरत से भर गया। शिवा तोमर कोई जाने माने लेखक नहीं है। 11.6.99 से 17.12.2004 यानी साढे पांच साल एक हत्या के आरोप में वो तिहाड़ में सजा काट चुका व्यक्ति है। लेकिन जब उसकी डायरियाँ मैंने उलटीं तो उसके अंदर छिपा साहित्यकार मुझे मिल गया। पेश है उसकी डायरी के कुछ पन्ने:

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सब लोग शीर्षक पढ़कर ही अचम्भित हो रहे होंगे कि तिहाड़ तो एक ऐसी जेल है जहाँ पर लोग जघन्य अपराध करके सजा काटते हैं। हर व्यक्ति के जेहन में तिहाड़ का नाम आते ही उन खतरनाक अपराधियों के चेहरे नजरो के समक्ष नाचने लगते हैं जो आये दिन हम टीवी या अखबार में देखते हैं। कि ये तो इतने निर्दयी क्रूरकर्मी और अत्याचारी हैं जिनके दिल में दया नाम की चीज है ही नहीं। फिर यह कैसी अनोखी बात लिख रहा है की तिहाड़ में गीता मंथन......... गीता तो अधर्मी को धर्मी और नास्तिक को आस्तिक बना देती है। कैसे किया तिहाड़ में गीता मंथन??????????? जी हाँ, यह बिलकुल सत्य है कि तिहाड़ में गीता मंथन हो रहा है। किसी की सुनी या पढ़ी हुई बात नहीं है। यह मेरा अपना अनुभव है। मेरा नाम शिवा तोमर है। एक हत्या के अपराध के अन्तर्गत 1999 में तिहाड़ जेल चला गया। 

जैसा सुना था उतना तो नहीं; पर फिर भी जेल तो जेल है। वहाँ का माहौल, लोगों का रहने का तरीका, बात करने का तरीका ऐसा कि देखकर लगे कि यह कोई अलग ही समाज है। अलग ही देश है। बिलकुल ही आम आदमी के जीवन शैली से भिन्न; कहीं किसी भी तरह से कोई तुलना नहीं। मुझे ऐसा लगा जैसे कि किसी अलग ही देश में आ गया। जहाँ मुझे कोई नहीं जानता। किसी के अन्दर कोई प्रेम नही, कोई भाईचारा नही, बस अपना काम निकालना। मेरा एक एक दिन बड़ कष्टमय व्यतीत हो रहा था। मुझे वहाँ के माहौल के साथ स्वयं को मिलाना बड़ा कष्टमय महसूस हो रहा था। लेकिन समय के अनुसार चलना पड़ रहा था। जिससे भी बात करता कोई दो कत्ल में, कोई तीन में, तो कोई बलात्कार में, कोई अपहरण में तो कोई बम धमाको में। मुझे लगा कि यह तो अपराध की राजधानी है या फिर अपराध का विश्वविद्यालय।

इसी तरह मेरे दो माह बीत गये। एक दिन सायं को मैं करीब 3.30 बजे बाहर घूम रहा था। अचानक मेरे कानों में कीर्तन के स्वर पड़े- श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवाय:। मैंने सोचा कि यहाँ पर भगवान का कीर्तन! तो मैं अनायास यंत्रवत सा उस ओर खिंचा चला गया। वहाँ पर एक सज्जन चंदन का तिलक लगाये कीर्तन करा रहे थे। मैं भी बैठ गया। कीर्तन समाप्ति के बाद उन्होंने पूछा कि किसी का कोई सवाल, कोई समस्या??????? जबाब गीता से मिलेगा............................

पता नहीं कौन सी ताकत मुझे खींच रही थी कि मैं उठा और एक सवाल किया कि "भाई साहब, क्या हम जेल से निकल सकते हैं कभी?" उस महानुभाव ने बड़ी गम्भीरता से सुना और मुझसे पूछा की आप कितने पढ़े हो? क्या नाम है? किस अपराध में हो? मैने सब कुछ बताया। उन्होंने मुझे कहा कि गीता के 9वें अध्याय का 22वाँ श्लोक पढ़ो तो मैने पढ़ा। उसमें लिखा था जो अनन्य प्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरूषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ। उन सज्जन ने उसको कुछ इस तरह से परिभाषित किया कि यह जेल तो कुछ भी नहीं है। भगवान ने सत्य घोषणा की है कि मेरा चिन्तन कर; मैं अपने भक्त को वह हर वस्तु दूँगा जिसकी उसे जरूरत है और रक्षा भी करूँगा। तुम्हें यहाँ से अवश्य ही मुक्ति मिलेगी। उनका चिन्तन करना है.... "चिन्तन करना कैसे है?" तो उन्होंने फिर वही पूरी मस्ती के साथ कीर्तन शुरू किया "श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवाय" और मुझे गीता दे दी। कहा कि रोज पढ़ना, दूसरों को भी सुनाना। मैंने दूसरी एक बात और पूछी कि क्या बिना गुरू बनाये हम पूजा पाठ कर सकते हैं? मेरे दिमाग में वही एक पुरानी बात थी कि गुरू बिना ज्ञान नहीं। तो उन्होंने कहा कि कृष्ण से बड़ा कोई गुरू नहीं है। कृष्णं वन्दे जगदगुरूं। बस उसका चिन्तन कर और सब चिंता छोड़ दे। बंशीवाला सब ठीक करेगा। मैने सारी रात उनकी बात पर विचार किया। अब मेरे समक्ष कोई दूसरा चारा भी नही था। क्या करूँ जेल में????? खाली पड़े सोचा कि शायद भगवान सुन ही ले। मैं अगले दिन उठा तो दो बात मेरे दिल में थी कि गीता पढ़ूँगा, पूजा करूँगा तो यहाँ पर लोग काम के लिये भी तंग नहीं करेंगे और भगवान रिहा भी करा देंगे। मैंने नहा धोकर 8 बजे गीता का पहला अध्याय प्रारम्भ किया। करीब आधा घण्टा लगा होगा कि वह मैंने पूर्ण कर दिया और भगवान का कीर्तन करके प्रार्थना की कि "हे भगवान! मुझे इस नरक से मुक्त करो। मैं यहाँ बहुत दुखी हो गया हूँ। जो मुझसे जाने-अनजाने में गलती हुई हो, उसे क्षमा करो।" उस रोज सायं तक मुझे अपने अन्दर कुछ अलग सी ही अनुभुति होती रही। हल्कापन सा और एक बात विशेष सी भी लगी कि उस दिन मैं स्वयं को सबसे अलग सा अनुभव कर रहा था। मैंने विचार किया तो बुद्धि में बात आई कि बस तेरा अपना ही वहम है और कुछ नहीं। इसी तरह मैंने एक बार संपूर्ण गीता यानि कि 18 अध्याय पूरे किये। अब पढ़ने में मजा सा आने लगा था। 

एक दिन फिर वार्ड में घोषणा हुई की बैरिक न0 2 में गीता पाठ होने जा रहा है। जो भी भाई इच्छुक हो, वहाँ शांति से बैठकर श्रवण कर सकता है। मैं भी जाकर बैठ गया तो कुछ समय बीतने के उपरान्त वो ही सज्जन एक जेल के अधिकारी के साथ आ गये। उन्होने सबको जय श्री कृष्ण कहा और बैठ गये। क्या चल रहा है?????? भाइयो! बताओ कुछ नया अपना अनुभव। उस दिन उन्होने एक बात महत्वपूर्ण बताई कि "गीता सिर्फ पूजा और रिहाई के लिये नहीं है। वरन हमारे जीवन की मार्गदर्शक भी है। जब कभी कहीं भी ऐसी स्थिति आ जाये कि कोई रास्ता ही ना दिखाई दे; हर तरफ अन्धकार ही अन्धकार नजर आये तो गीता से रास्ता पूछना। वही हमारे पथ-प्रदर्शक का काम करती है। यह हमारी गुरू है।" उन्होंने मुझसे पूछा कि "शिवा! आप बताओ कि गीता कितनी पढ़ी और कैसा लगा?" मैने सच सच बताया कि साहब अच्छा लग रहा है। लेकिन मैंने अभी तक सिर्फ रिहाई की उम्मीद से ही पढ़ी है। उन्होंने मुझसे कहा कि "तुम्हारे अन्दर अच्छे संस्कार हैं। तुम गीता को अपने जीवन से जोड़कर अध्ययन प्रारम्भ करो। स्वयं को अर्जुन समझकर। जैसे भगवान आपको ही गीता ज्ञान दे रहे हैं। फिर देखो किस तरह आपके जीवन को मोड़ती है भगवदगीता।"

वो तो चले गये लेकिन मेरे मन में यह सवाल छोड़ दिया और मै बैचेनी सी अनुभव कर रहा था। इतना बड़ा ज्ञानी तो मैं था नहीं। विचार करता रहा कि किस प्रकार स्वयं को अर्जुन बना सकता हूँ। मैंने गीता का दूसरा अध्याय प्रारम्भ किया। दूसरा श्लोक कि "हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ।" बस इसी बात पर चिन्तन कि किस तरह यह श्लोक हमारे लिये कहा है भगवान ने। मेरा बचपन से ही स्वभाव है कि जो भी बात सोचता हूँ, गहरा ही चिन्तन करता हूँ। जितना चिन्तन करता उतनी ही बुद्धि सूक्ष्म होती जा रही थी। अचानक पता नहीं कहाँ से ऐसा विवेक प्राप्त हुआ कि कुछ बात जो अभी तक अन्धकार में प्रतीत हो रही थी, उसकी थोड़ी सी झलक दिखाई दी कि हमें यहाँ असमय में कैसा मोह है? जो इसको उचित नही बता रहे हैं। अन्दर से जवाब मिला कि जेल में रहकर इस समय घर के प्रति मोह, परिवार के प्रति मोह यह अच्छा नही है। भगवान कह रहे है अर्जुन से कि यह श्रेष्ठ पुरूषों द्वारा आचरित नहीं है। अगर हम यहाँ जेल में बैठकर अपने घर परिवार को याद करके रोये तो लोग कैसा मजाक उड़ायेगे? भगवान ने अर्जुन को माध्यम बनाकर यह गीता ज्ञान हर मनुष्य को इसलिए दिया कि जीवन को किस तरह से जीये और वह मानव जीवन को सफल सार्थक बनाये। इसी तरह गीता पढ़ते हुये मुझे कई महीने बीत गये। जिस दिन किसी कारण से नही पढ़ पाता तो ऐसा लगता कि जैसे कुछ रह गया है। अब गीता मानो मेरे जीवन का एक हिस्सा सा बन गयी। अब लोग मेरे पास बैठने लगे। जो पहले मजाक उड़ाकर कहते थे कि जब ऊँट पहाड़ के नीचे आता है तो ऐसे ही करता है। बाहर तो कभी भगवान का नाम लिया नहीं, यहाँ आकर भक्त बनता है। वो ही लोग मेरे पास बैठकर गीता श्रवण करने लगे। हम सब मिलकर घंटो चर्चा करते।

1 दिसम्बर 1999 को चक्कर से घोषणा की गयी की वार्ड न0 1 मे 18 दिवसीय गीता ज्ञान यज्ञ का कार्यक्रम हो रहा है। जो भी श्रद्धा से श्रवण करना चाहता है, अपने वार्ड के मुन्शी को नाम लिखवा दे। तो मैंने अपना नाम लिखवा दिया। 2 दिसम्बर 1999 को 11:30 बजे करीब 50 आदमियों को वार्ड न0 1 की बैरिक न0 8 में बैठाया गया। सामने एक तख्त पर कपड़ा बिछाकर गीता रखी हुई थी। कुछ समय पश्चात करीब 12:15 बजे सुपरीटैंडेट श्री इन्दुशेखर मिश्रा जी के साथ वही सज्जन यानि कि राम कृष्ण गोस्वामी जी आये। सबको जय श्री कृष्ण कहा और बैठ गये। जेलर साहब भी कुर्सी पर बैठ गये। वहाँ पर नित्य गीता पढ़ने वाला सिर्फ मैं ही था। तो स्वामी जी ने सर्वप्रथम मुझे ही बुलाया और कीर्तन करने के लिये कहा।

मैंने डरते डरते कीर्तन कराया। पहली बार में इतने व्यक्तियों के समक्ष बोलने का काम कर रहा था तो पैर काँपने लगे, जीभ तुतलाने लगी, सारा शरीर पसीने-पसीने हो गया।

स्वामी जी ने कहा कि "शिवा! जितने लोग भी आये हैं, सबका नाम लिख लो।" उस दिन मैंने सबके नाम लिखे।

वहाँ कार्यक्रम में जलबीर, जयबीर, लीलू, रविन्द्र चैयरमैन, आर डी भारती, राकेश हरिजन, मा0 उत्तम कुमार, प्रेमपाल प्रधान जी, जगदीश, जितेन्द्र, जयपाल फौजी, जयपाल पहलवान, लाल सिंह, लखन सिंह, योगेन्द्र त्यागी, राजबीर पहलवान आदि थे। स्वामीजी ने कहा कि ये जो 18 दिन का कार्यक्रम है, वह गीता की प्रयोगशाला है। इन 18 दिनों में हमें इसमें खोज करनी है कि किस तरह से गीता हर वर्ग के लोगों के लिये सहायक है? विद्यार्थी हो या शिक्षक, पुलिस हो या पब्लिक, न्यायाधीश हो या फिर वकील, किसान हो य़ा जवान, अनपढ़ हो या शिक्षित, औरत हो या पुरूष, गरीब हो या अमीर गीता ज्ञान तो सभी का कल्याण करने के लिये ही है। बस वो विवेक चाहिए; ऐसे ज्ञान के चक्षु की जरूरत है जिससे हम वह रास्ता खोज सकें। जब अर्जुन युद्ध के मैदान में, जहाँ धर्म और अधर्म का फैसला होना था; वहाँ अपने सगे-सम्बंधियों को देखकर मोह ग्रस्त हो गया और कर्म से पलायन करने के लिये बड़ी बड़ी ज्ञान की बाते भगवान को सुनाकर युद्ध से बचाव सोचने लगा था। लेकिन भगवान तो अन्तर्यामी हैं, घट-घट की जानने वाले हैं। तो उन्होंने अर्जुन को माध्यम बनाकर ऐसा सन्देश दिया जिससे लोग किसी भी कारण से अपने कर्तव्य से न डगमगा सके। ये बात स्वामी जी ने समझाई उस दिन।

इन 18 दिनों में गीता को हमने ऐसा समझा कि कभी कल्पना भी नहीं की थी कि श्रीमदभगवदगीता का ऐसा रूप हमारे समक्ष आयेगा। इस कार्यक्रम के बाद कई वार्डों में नित्य गीता पाठ होने लगा।समय-समय पर जेल के अधिकारियों ने जैसे सुभाष शर्मा जी जेलर साहब, जी. सुधाकर सुपरीटैंडेंट, वैलफेयर अधिकारी श्री चरणसिंह जी ने बहुत सहयोग किया।

जेल में होती तो हर प्रकार की पूजा है- ध्यान-साधना, योग आदि लेकिन जिस तरह से बिना किसी बाहर के व्यक्ति की मदद से गीता अध्ययन नित्य सुबह होता था बाकी का नहीं।लोगो में इतनी उत्सुकता कि गीता के एक-एक टोपिक पर काफी देर तक वाद-विवाद चलता रहता। ऐसा मंथन मैंने कभी भी बाहर नहीं देखा था।

एक दिन मैं वार्ड न0 11 में सुबह चला गया तो वहाँ पर जितेन्द्र, जगदीश, जयपाल और करीब 20-22 लोग बैठे होंगे और अध्याय 2 के 62वें श्लोक पर वाद में लगे पड़े। मुझे देखते ही कहने लगे कि शिवा बाबा बतायेंगे। अब लोग मुझे शिवा से शिवा बाबा कहने लगे थे। मैंने पूछा कि क्या हुआ भाई? तो जितेन्द्र ने कहा कि बाबा आप यह श्लोक समझाओ जरा। मैने पढ़ा.......... विषयों का चिन्तन करने वाले पुरूष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध आता है, क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव पैदा होता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम पड़ जाता है, भ्रम हो जाने से ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है और यह पुरूष अपनी स्थिति से गिर जाता है।मैने यह श्लोक कई बार पढ़ा। मैं भी रोज गीता पढ़ता था लेकिन इतना गहरा चिन्तन करने का मौका पहली बार मिला और जो लोग वहाँ मौजूद थे; मुझसे आयु में भी बड़े और अनुभव में ज्यादा थे। लेकिन सब मुझे ही कुछ अलग सा समझते थे कि शिवा बाबा सही समझा सकते हैं। मैंने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की कि "हे भगवान! मुझे ऐसा विवेक दो जिससे मैं इन सबको सन्तुष्ट कर सकूँ।" फिर मैंने बताया कि भाइयो! यह सवाल किसी एक व्यक्ति के जीवन का नहीं है। बल्कि प्रत्येक के जीवन पर आधारित है। बढ़ते अपराध, आपाधापी, मारा-मारी, हिंसा, व्यभिचार का यही कारण है। मुझे नहीं पता था कि कौन जवाब दे रहा है? कौन मेरी इस घड़ी में मदद कर रहा है? बस अंत में सब लोग कहने लगे कि बाबा सही कहा; बहुत अच्छा। 

मेरे आचरण और ध्यान साधना में लगन देखकर जेल अधिकारियों ने मुझे जेल-पंचायत का मेडीटेशन पंचायत मैम्बर बना दिया। जिससे मैं सारी जेल में घूमकर ध्यान साधना और गीता के विषय में और लोगो को बताने लगा। मैने विपश्यना के 10 शिविर, आर्ट आफ लिविंग, सहज योग और प्राणायाम किये। सबसे जेल में लोगो को शारीरिक और मानसिक लाभ मिल रहा है। लेकिन जैसा अध्ययन गीता से लोगों ने अपने जीवन को जोड़कर विशलेषण किया कि किस तरह से हम ज्ञान को जीवन में उतारकर अपने आचरण व्यवहार और गीता सन्देश से व्यक्ति, समाज और देश में बढ़ती हिंसा, अलगाव, अशांति, असुरक्षा और भय से मुक्त करा सकते है? जेल से बाहर जगह-जगह गीता, भागवत, रामकथा, आदि धर्मसभाओं का आयोजन होता रहता है लेकिन गोस्वामी जी जेल के अन्दर पड़े बेबस, मजबूर, दुखी लोगो के मनोबल को बढ़ाने के लिये बड़े-बड़े विलक्षण प्रतिभाओ को ले जाकर उनके बेजान जीवन में जान डालकर गीता का संदेश देते थे।

जो व्यक्ति मेरे सामने आये उनका में वर्णन करना चाहता हूँ। 2000 में डा0 आई.पी. सिंह ( भूतपूर्व उच्चायुक्त इंगलैंड), 2001 में श्री एन. बिठठल (केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त), 2002 में जस्टीस रंगनाथ मिश्र (प्रथम अध्यक्ष, राष्टीय मानवाधिकार आयोग), 2003 में डा0 वाई.पी. सिंह (डायरैक्टर गांधी संग्रहालय), 2004 में अनिल देव सिंह (उपनिदेशक गांधी संग्राहलय) और भी कई लोग आये। जिन्होंने जेल जैसी जगह जहाँ पर लोग आना तो क्या दर्शन भी अच्छे नहीं समझते।; वहीं पर आकर बन्द पड़े लोगों का मनोबल बढ़ाया और गीता मंथन में अपना सहयोग किया है।
मैं 2003 के बाद रोज सायं को 3:30 के बाद मुलाहजा वार्ड में जहाँ पर नित्य नये लोग आते थे, वहाँ जाकर गीता पाठ करता था। इसमें मेरा सहयोग नरेन्द्र लाला भाई ने भी किया।मुलाहजा में प्रतिदिन नये लोग आते है। जो बहुत ही तनाव में व परेशान होते हैं। वहाँ पर गीता; भगवान श्री कृष्ण की दिव्यवाणी का ऐसा चमत्कार देखकर लगता था जैसे बंशी वाले ही आ गये हो। जो रोते-रोते आते वो मुस्कुराने लगते, हँसने लगते। मुझे बड़ा सुकून सा मिलता। बाहर मैंने देखा कि जगह जगह संत-महात्मा कथा कहते रहते है लेकिन इतने चाव से इतनी श्रद्धा से कोई श्रवण नहीं करता। लेकिन जेल में लोगो का एक ही सहारा है भगवान। कई बार लोग मुझसे कहते कि "शिवा बाबा, आपको इतने वर्ष हो गये यहाँ। तो बंशी वाला अपकी नहीं सुनत॥ अभी तक आपकी जमानत नहीं हुई।" मैं हँसकर जवाब देता कि कृष्ण का काम भी तो कोई करने वाला होना चाहिए ना; यहाँ पर मुझे कोई दुख नही होता है। एक दिन ऐसा हुआ कि एक लड़का था करण; बीस एक वर्ष का होगा। वहाँ जेल में हममें सबसे छोटा था। उससे कोई गलती हो गयी तो वहाँ उसको चक्कर पर ले जाकर बहुत पिटाई की। मैं अगले दिन अपने समय पर पहुँचा तो उसके सारे मुँह पर चोट के निशान थे। वह मुझे देखते ही रोने लगा। मैंने पूछा, "क्या हुआ?" उसने सारी घटना बताई। मैने गीता-पाठ कराया। कीर्तन के बाद करीब 60 आदमियों को कहा कि सब भगवान कृष्ण से प्रार्थना करो कि करण को रिहा करा दो और प्रसाद बँटवाकर अपने वार्ड में चला गया। अगले दिन अपने समय पर गया तो सब लोग बैठे हुये इन्तजार कर रहे थे। मुझे देखते ही कई लोग एक साथ बोले कि बाबा! करण कल रात को रिहा हो गया। मुझे भी बहुत खुशी हुई और मैंने कृष्ण-कृपा बताकर कहा कि बंशी वाला कुछ भी कर सकता है। ये बात मैं सिर्फ इस लिये लिख रहा हूँ कि गीता-मंथन से लोगों की श्रद्धा और आस्था का भी चमत्कार दिखाई दे रहा था।

मुझे जेल में 5 वर्ष से ज्यादा हो गये थे यानि कि अब अंत समय था। केस का फैसला होने जा रहा था। मुझे खुशी तो थी कि एक-आध महीने में बाहर चला जाऊँगा। लेकिन दिल में एक बात बार-बार आती कि गीता-पाठ कौन करायेगा। फिर भगवान के द्वारा कहा गया एक श्लोक कि "हे अर्जुन! तू हो या ना हो; लेकिन यह युद्ध तो होना निश्चित है। अगर तू भी नहीं होगा तो युद्ध तो अवश्य होगा।" तो मेरे भी दिमाग में आता कि शिवा गीता-पाठ तो यहाँ अगर होना निश्चित है तो होगा ही। 

बस मुझे तो भगवान की एक ही बात याद थी। जो गीता में ही कही है कि जो भी मेरे इस सन्देश को मेरे भक्तो में कहेगा, उससे प्रिय कार्य करने वाला कोई दूसरा नहीं है। बस मैं हर समय यही विचार करता रहता कि कैसे मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस मानव कल्याण सन्देश को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक कैसे पहुँचा सकूँ............

6 दिसम्बर 2004 को जज साहब ने कहा कि 8 दिसम्बर को फैसला सुना देंगे। हमारा केस हमारे खिलाफ ही था क्योंकि सारी गवाहियाँ हमारे विरूद्ध ही हुई थीं। हमें एक प्रतिशत भी उम्मीद नहीं थी कि यहाँ से निकल सकते हैं। हमने तो सोच रखा था कि नीचे की अदालत से सजा हो जायेगी। हाई-कोर्ट अपील पर जमानत हो सकती है।

8 दिसम्बर 2004 को मैं सुबह 5 बजे उठा, नहा-धोकर पूजा किया और तारीख के लिये निकल लिये। उस दिन हमारी जिंदगी का फैसले का दिन था। तो मन में तनाव सा हो रहा था। ना किसी से बात करने का मन कर रहा था, बस खारजे में चुपचाप एक कोने में अपने नाम बोलने का इंतजार कर रहे थे। करीब 10:15 बजे हमारा नाम बोला गया। हम 5 वर्ष से ज्यादा तारीख पर जा रहे थे लेकिन आज पता नहीं क्यों इतनी घबराहट हो रही थी कि जैसे-जैसे अदालत नजदीक आ रही थी, वैसे-वैसे ही हमारे दिल की धड़कन तेज हो रही थी। हम अदालत पहुँचे तो उस समय तक जज साहब नहीं आये थे। उनके रीडर ने कहा कि 2 बजे के बाद लेकर आना। हमारे वारंट पर दो बजे का समय डालकर वापिस भेज दिया।

अब हम वपिस खारजे में आकर बैठ गये। अब मेरे मन में लगातार एक भजन आ रहा था, "जब कोई नहीं आता, मेरे श्याम आते हैं, दुख के दिनों में वो बड़े काम आते हैं।" मेरे साथी घबरा रहे थे। उन दोनों में झगड़ा भी हो गया था कि आजीवन कारावास की सजा होगी। मैंने उन्हें समझाया कि कुछ नहीं होगा, बस चुप बैठ जाओ। डर तो मुझे भी लग रहा था। लेकिन मेंरा डर उन लोगो को महसूस नहीं हो रहा था। हमें इंतजार करते-करते 3 बज गये। करीब 3:30 बजे फिर हमारा नाम बोला। जब हम अदालत गये तो जज साहब, वकील, रीडर सब लोग बहुत व्यस्त थे। हमें कटघरे में खड़ा कर दिया। हमारी साँसे रूक सी गयीं थी। मन में पता नहीं क्या क्या बात आ रही थी कि पता नहीं क्या होगा? मेरे दिमाग में अचानक 10वें अध्याय का अंतिम श्लोक याद आया कि "हे अर्जुन! मैं इस सम्पूर्ण जगत को अपनी योग शक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।" तो जब हर जगह भगवान ही हैं तो जज में, सरकारी वकील में, पुलिस, रिडर सब में ही वही है, तो हमें फैसले की चिन्ता नहीं है और मेरी आँखों से दो आँसू टपककर गालों पर आ गये। आधा घंटे बाद अचानक जज साहब ने हमारी ओर देखा। देखता ही रहा पता नही क्या हुआ? कहने लगा कि 10 दिसम्बर को फैसला होगा। और हम लोग मायूस कदमों से फिर जेल की तरफ चल दिये। एक-एक दिन की तारीख के बाद आखिर वह दिन आ ही गया जिस दिन हमारी किस्मत का फैसला होना था यानि कि 17 दिसम्बर 2004 को खारजे में हमें इन्तजार करते करते सायं के तीन बज गये और हमें डर चढ़ने लगा। क्योंकि जिनके भी केस के फैसले सायं को देर से होते हैं, उनको प्राय: सजा ही होती है। 4 बजे के करीब हमारा वारन्ट आया। हम सहमे कदमों से अदालत की ओर बढ़े। पूरा विश्वास तो था ही कि सजा होनी है। जाकर एक कोने में खड़े हो गये। आज मैंने एक खास चीज देखी जो आज तक नहीं देखी थी। बिलकुल जज साहब के पीछे एक बंशी वाले का छोटा सा फोटो जिसमें मक्खन खा रहे हैं और एक हाथ से ऐसा लगा जैसे कि मेरी तरफ कर रहे हों। बस मेरी आँखों में खुशी सी आ गयी। लगा जैसे कि शिवा यहाँ तो तुझसे पहले ही कृष्ण आये हुऐ हैं। तो क्यों चिंता करते हो? जज साहब करीब 15 मिनट बड़े व्यस्त रहने के बाद जज ने हमें देखा। ऐसा लगा जैसे आँखो में ही सब कुछ पढ़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। अचानक पूछा कि शिवा कौन है? मुझे लगा जैसे सबसे पहले मुझे ही सजा देंगे। मैंने कहा कि "सर! मैं हूँ।" जज साहब ने कहा कि आपको केस से मुक्त किया जा रहा है। मेरी आँखों में एक दम खुशियों के आँसू छलक आये। सामने बंशी वाले का भी फोटो भी ऐसा लग रहा था जैसे हँस रहे हो कि शिवा तू तो बेकार चिन्ता कर रहा था। मैं तो तेरे साथ ही था। रिहाई के बाद मुझे और अटल विश्वास हो गया। मैं बाहर आकर अपने काम में व्यस्त हो गया। एक दिन 28 दिसम्बर 2006 को मैंने अचानक गोस्वामी जी के पास फोन किया कि स्वामी जी गीता जयंती पर क्या विचार है? स्वामी जी ने मुझसे कहा कि गीता जयंती पर गीता-यात्रा करेंगे 18 जेलों में। मेरे अन्दर से बिना किसी विलम्ब के निकला कि मैं भी चल सकता हूँ क्या? तो उन्होने हाँ कह दी।

1 दिसम्बर 2006 को मैं स्वामीजी के पास आ गया। गीता के माध्यम से अपराध मुक्ति अभियान के लिये जेल से बाहर पहली बार चल रहा था। आत्मविश्वास की मेरे पास कोई कमी नहीं थी। हम इस यात्रा में दिल्ली, हरियाणा, यू.पी., राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश की 18 जेलों में गये। मुझे बहुत अच्छा लगा और पहली बार मुझे इतना सम्मान प्राप्त हुआ कि बड़े-बड़े अधिकारी भी मुझसे; गीता के मेरे चिन्तन से बहुत प्रभावित थे। भरतपुर जेल में जेल के डी.आई.जी. श्री एस.एस. बिस्सा जी जो गीता के बहुत अच्छे जानकार थे; उन्होंने मेरा बहुत मनोबल बढ़ाया। मैंने उनको एक छोटी गीता भी भेंट की थी। दूसरे अधिकारी गुजरात जेल के आई.पी.एस. अधिकारी के.जी. भाटी साहब तो मुझसे बहुत ज्यादा प्रभावित हुए थे। कहने लगे कि "शिवा, तू बता कि जेल में किस तरह से हम गीता को और अच्छी तरह से चला सकते हैं।" मुझे अपने अन्दर कुछ अलग सी ही अनुभूति होने लगी कि शिवा तु अब पहले वाला शिवा नहीं है। गीता मंथन से बहुत अलग बन गया है। 

इस यात्रा के बाद जैन टी.वी. न्यूज चैनल पर एक कार्यक्रम हुआ। अपराध मुक्त समाज निर्माण यानि कि मुजरिम कौन। इसमें गोस्वामी जी के कहने पर उन लोगों ने मुझे भी बुलाया। उस समय मैं फार्मेसी में काम करता था। उसके माध्यम से मेरा समाज और गीता पर चिन्तन-मनन और मेरे आचरण को देखकर जैन टी.वी. के बोस श्री अंकुर जैन ने मुझे कहा कि तुम हमारे पास आ जाओ। और अब में जैन टी.वी. में ही काम कर रहा हूँ और इसके साथ साथ गीता-गोष्ठी, सम्मेलन, सेमीनार, गीता मार्च और जेल में गीता के माध्यम से लोगों को अपराध मुक्ति की प्रेरणा देने के लिये भी जाता हूँ। और अपना उदाहरण देकर समझाता हूँ कि अगर हम चाहें तो अपने आप को यहाँ रखते हुये भी समाज की धारा में जोड़कर चल सकते है। जो अपमान जेल से बाहर जाकर सहना पड़ता है; जैसे मैं बाहर गया तो जो लोग मेरे अच्छे दोस्त थे, वे भी किस तरह कट रहे थे। मेरे पास कोई खड़ा नही होता था। सब लोगों के घर वाले कहते थे कि इससे दूर ही रहना। मुझे देखते ही चल पड़ते थे। लेकिन जब लोगों को पता लगा कि शिवा को इसके जेल के अच्छे आचरण के कारण ही न्यूज-चैनल में काम मिल गया और गीता के माध्यम से 25-26 जेलों में लोगों को अपराध-मुक्ति का सन्देश देने के लिये जा चुका है तो वही लोग अब मुझसे अपने काम के बारे में सलाह लेते हैं। 

मैं इस अभियान के दौरान उपायुक्त मीनू चौधरी, सहायक पुलिस आयुक्त भरत सिंह, मा0 मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी, उ0 प्र0 मंडलायुक्त श्री एल. वैक्टेश्वरलू जी से मिल चुका हूँ। मैंने यरवदा जेल में संजयदत्त के पास भी भगवदगीता भेजी थी। राहुल गाँधी के पास भी पत्र भेजा था। मुझे अब जेल जाकर कोई पश्चाताप नहीं है बल्कि अच्छा ही लग रहा है जो आज मुझे इतना सम्मान मिल रहा है। अब मैं जिससे भी बात करता हूँ बस गीता जी को ही साक्षी मानकर करता हूँ। यही है मेरा तिहाड़ मंथन; मेरे जीवन का अनमोल पहलू।

जय श्री कृष्ण
शिवा तोमर

15 comments:

  1. साहित्य कथा के काग़ज़ पर उतर आने के दो कारण होते हैं | या तो लिखने वाले की सोच और कल्पना बहुत गहरी हो या फिर उसने जीवन में इतना कुछ देखा और समझा हो जिस की हम लोग कल्पना भी नहीं कर पाते ..
    खबरी जी की बात सही है की "साहित्य के लिए लिखना आना जरूरी नहीं है। अनुभव करना अहम है। ".....
    एक कैदी का भावपूर्ण और आस्था से ओतप्रोत संस्मरण | आम तौर पर लोग जेल में कैदी बन कर जाते हैं और टूटे हुए मनुष्य की तरह बाहर आते हैं.. पहली बार देखा की जेल में जा कर कोई स्वतंत्र हो गया हो.. आत्मा से | ये संस्मरण सिद्ध करता है की आत्मिक स्वतंत्रता के समक्ष शारीरिक स्वतंत्रता , कितनी छोटी और महत्वहीन है | संस्मरण ने नब्बे के दशक में बनी महान फिल्म "Shawshank Redemption " की भी याद दिला दी |
    इसे सामने लाने के लिए खबरी जो कोई बधाई और शुक्रिया |

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  2. शिवा तोमर नें दिल की गहरायी से गीता को आत्मसात किया और उनके जीवन में क्रांति घट गयी। देवेश जी आप इस प्रस्तुति के लिये धन्यवाद के पात्र हैं। इस संस्मरण में बहुतों का जीवन बदलने की ताकत है।

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  3. बहुत अच्छा संस्मरण है, बधाई।

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  4. गीता मनुष्य को आगे बढने का साहस तो देती ही है मुश्किल घडी में उससे बेहतर साथी भी नहीं। देवेश जी प्रस्तुति का आभार।

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  5. शिवा तोमर जी नें अपनी मन: स्थिति को बहुत सुलझा कर प्रस्तुत किया है। प्रेरक लेख है।

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  6. बहुत अच्छा संस्मरण.. आभार और बधाई...

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  7. बहुत सही चीज खोज के लाये आप भी...वाकई आप खबरी हैं

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  8. aap ka abhar ki aap ne itna prerna dayak sansmaran prastut kiya .sach maniye bahut hi achchha laga padh ke
    saader
    rachana

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  9. गीता ऐसा ही ग्रंथ है, सब बंधनों और चिन्ताओं से मुक्त कर देने वाला।

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  10. गीता भगवान कृष्ण के वचन हैं जो कि केवल चिन्तन और मनन ही नहीं अपने जीवन में भी उतारना चाहिये ।

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  11. सही मायने कोई अगर दिल से 'गीता' को आत्मसात कर ले तो क्या नहीं हो सकता?....

    साहित्य शिल्पी पर इतने प्रेरक लेख के लिए देवेश जी को बहुत-बहुत बधाई

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  12. अनुभूति यदि कागज पर शब्दों में उतर आये तो निश्चय ही साहित्य का रूप है और अनुभूति तो हर मनुष्य करता है हां कागज पर सहेजने का प्रतिशत नगण्य है...
    सुन्दर आलेख के लिये आभार.

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  13. अनुपम संस्म्रण ..... प्रस्तुतीकरण के लिये आभार देवेश जी

    उत्तर देंहटाएं
  14. देवेश जी के लिये तमाम शुक्रिया कम पड़े गी...

    अद्‍भुत प्रस्तुती

    उत्तर देंहटाएं
  15. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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