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सोमवार, १६ मार्च २००९

काफ़िया पर एक विमर्श [ग़ज़ल : शिल्प और संरचना] - सतपाल 'ख्याल',

विमर्श से पूर्व मेरी बात: 

मैं कोई बहुत बड़ा विशेषज्ञ नही हूँ लेकिन जो भी बज़ुर्गों , किताबों और अनुभव से सीखा वही कह रहा हूँ . कहीं कुछ ग़ल्त हो तो ज़रूर बताएँ.बाकी हमारे आर.पी शर्मा जी जैसे पिंगलाचार्य हैं और द्विज जी जो मेरे आदरणीय गुरु हैं जब भी दुविधा होती है तो ये मेरी शंका का समाधान कर देते हैं.अपनी ग़ज़ल के मतले से शुरू करता हूँ : 

तालिबे-इल्म हूँ हर्फ़े-आखिर नही
फ़न से वाकिफ़ तो हूँ फ़न मे माहिर नहीं 
आज हम काफ़िये पर चर्चा करेंगे :
----------------------------------------- 

काफ़िया क्या है 

काफ़िया या तुक वो शब्द है जो मतले मे दो बार रदीफ़ से पहले और हर शे’र के दूसरे मिसरे के अंत मे रदीफ़ से पहले आता है। अब ये काफ़िया या तुकबंदी भी आसान काम नही है इसके लिए भी कायदे कानून हैं जिनका ज़िक्र ज़रूरी है। अब दो शब्द आपस मे तभी हम-काफ़िया होंगे अगर उनमे कोई साम्यता होगी और इसी साम्यता की वज़ह से वो काफ़िया बनेंगे। इसी साम्यता के आधार पर काफ़िये दो तरह के हो सकते हैं :

स्वर साम्य काफ़िये
वो शब्द जिनमे स्वर की साम्यता हो। ऐसे काफ़िये अमूमन उर्दू मे इस्तेमाल किये जाते हैं लेकिन अब देवनागरी मे भी ये चलन हो गया है। मसलन: देखा, सोचा, पाया, आता, पीना,पाला,नाना आदि.

इनमे स्वर :" आ " की एकता है बस, व्यंजन की नहीं, व्यंजन अलग है सबके जैसे: देखा-सोचा मे ’ख" "च" अलग है इनमे कोई एकता नही। तो ये स्वर साम्य काफ़िये हैं और इनका इस्तेमाल खूब होता है।

रचनाकार परिचय:-

सतपाल ख्याल ग़ज़ल विधा को समर्पित हैं। आप निरंतर पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होते रहते हैं। आप सहित्य शिल्पी पर ग़ज़ल शिल्प और संरचना स्तंभ से भी जुडे हुए हैं तथा ग़ज़ल पर केन्द्रित एक ब्लाग आज की गज़ल का संचालन भी कर रहे हैं। आपका एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन है। अंतर्जाल पर भी आप सक्रिय हैं।

न रवा कहिये न सज़ा कहिये
कहिये कहिये मुझे बुरा कहिये

ये स्वर साम्य है यहाँ "आ" की एकता है व्यंजन "ज" और " र" अलग हैं.
जैसे "आ" का ये उदाहरण:

आरजू है वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तो क्या करे कोई
गर मर्ज़ हो दवा करे कोई
मरने वाले का क्या करे कोई

"ई" साम्य काफ़िये देखिए द्विज जी की ग़ज़ल से

मिली है ज़ेह्न—ओ—दिल को बेकली क्या
हुई है आपसे भी दोस्ती क्या

कई आँखें यहाँ चुँधिया गई हैं
किताबों से मिली है रौशनी क्या

यहाँ भी स्वर की साम्यता है व्यंजन कि नही.

स्वर और व्यंजन की साम्यता 
आब बात आगे बढ़ाते हैं, हम काफ़िया शब्दों मे जो व्यंजन रिपीट होता है मसलन:चाल-ढाल-खाल-दाल-डाल इनमे "ल" हर्फ़े-रवि कहलायेगा। जो हर काफ़िये के अंत मे आयेगा.और आना, जाना, पाना, खाना,गाना आदि.

जैसे द्विज जी के अशआर देखें:

जब भी अपने आपसे ग़द्दार हो जाते हैं लोग
ज़िन्दगी के नाम पर धिक्कार हो जाते हैं लोग

सत्य और ईमान के हिस्से में हैं गुमनामियाँ
साज़िशें बुन कर मगर अवतार हो जाते हैं लोग

उस आदमी का ग़ज़लें कहना क़ुसूर होगा
दुखती रगों को छूना जिसका शऊर होगा

यहाँ "र" हर्फ़े-रवी है.

वास्तव मे काफ़िया या तुक स्वर और व्यंजन की आंशिक एकता से बनते हैं.

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इसके बाद बात करते हैं कि -- ग़ज़ल मे मतले मे जो पाबंदी लगा दी जाती है उसे पूरी ग़ज़ल मे निभाना पड़ता है सो जो पाबंदी आप काफ़िये मे लगा लेते हो वो पूरी ग़ज़ल मे निभानी पड़ती है.

अब आर.पी शर्मा जी के हवाले से बात आगे बढ़ाते है..

काफ़िये दो तरह के होते हैं या आप यूँ भी कह सकते हैं कि शब्द दो तरह के होते हैं एक विशुद्द और दूसरे योजित. योजित माअने जिनमे कोई अंश जुड़ा हो मसलन:

शुद्द शब्द से योजित शब्द या काफ़िये के उदाहरण:

सरदार से सरदारी (ई) का अंश बढ़ा दिया यहाँ शुद्द शब्द है सरदार और योजित है सरदारी .ऐसे ही:दुश्मन से दुशमनी, यहाँ ई का इज़ाफ़ा हुआ.

सर्दी से सर्दियाँ...यहाँ याँ का
गर्मी से गर्मियाँ...यहाँ याँ का
किलकारी से किलकारियाँ....यहाँ याँ का
होशियार से होशियारी....यहाँ ई का इज़ाफ़ा हुआ
दोस्त से दोस्ती...........यहाँ ई का इज़ाफ़ा हुआ
वफ़ा से वफ़ादार... यहाँ दार का
सितम से सितमगर.....यहाँ गर का.

ऐसे सारे काफ़िये योजित काफ़िये कहलाते हैं जिनमे कुछ अंश जोड़ा गया हो.
शुद्द शब्द तो शुद्द है ही जैसे ज़िंदगी, दोस्त, खुश,खेल आदि.

श्री आर.पी शर्मा जी ने जैसा कहा है कि:

1.पहली शर्त ये है कि मतले मे अगर दोनो काफ़िये योजित हैं तो वो सही काफ़िये इस सूरत मे होंगे कि अगर हम उनके बढ़े हुए अंश निकाल दें तो भी वो आपस मे हम-काफ़िया हों, जैसे:

यँ बरस पड़ते हैम क्या ऐसे वफ़ादारों पर
रख लिया तूने जो अश्शाक को तलवारों पर

नुमाइश के लिए गुलकारियां दोनो तरफ़ से हैं
लड़ाई की मगर तैयारियां दोनो तरफ़ से हैं.

अब अगर खिड़कियों से तलवारों का कफ़िया बांधेगे तो गल्त हो जाएगा, क्योंकि खिड़की और तलवार से अगर "यों " निकाल दें तो खिड़की और तलवार आपस मे हम काफ़िया नहीं हैं.ऐसे काफ़ियों को मतले मे बांधने से मतला इता दोश युक्त हो जाता है.योजित काफ़िये को मतले मे बांधने से पहले अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिये.अगर मतले मे दोनो काफ़िये योजित रखने हों तो योजित अंश निकालने पर भी शब्द हम-काफ़िया होने चाहिए.जैसे वफ़ादारों और तलवारों मे "ओं" निकाल देने पर भी तलवार और वफ़ादार हम-काफ़िया हैं.

वैसे तो गुलाब और शराब का काफ़िया बांधने पर भी मनाही है लेकिन अहमद-फ़राज़ साहेब कि ग़ज़ल का मतला देखें:

बदन मे आग सी चेहरा गुलाब जैसा है
कि ज़हरे-ग़म का नशा भी शराब जैसा है.

जब मैने इस बात का ज़िक्र आर.पी शर्मा जी से किया तो उन्होने कहा कि इसके भी आगे भी कई और नियम हैं और बाल की खाल निकालने से कोई फ़ायदा नहीं.सो शायरी मे भी कई घराने हैं जो इता को दोश मानते हैं और कई नही मानते अब मै इस दुविधा मे हूँ कि मै किस घराने से जुड़ूँ.

द्विज जी की ग़ज़ल का मतला देखें:

हज़ूर आप तो पहुँचे हैं आसमानो पर
सिसक रही है अभी ज़िम्दगी ढलानो पर.

यहाँ अगर बढ़े हुए अंश "ओं" को निकाल दें तो आसमान और ढलान हम-काफ़िया हैं.

या फिर एक विशुद्द एक योजित काफ़िया ले लें:जैसे:

है जुस्तज़ू कि खूब से है खूबतर कहाँ
अब ठैरती है देखिए जाकर नज़र कहाँ.

खूबतर योजित है और जाकर शुद्द तो बात बन गई.नही तो इसमे एक और कानून है कि अगर बढ़ा हुआ अंश निकाल देने पर शब्द आपस मे हम-काफ़िया नही है लेकिन उनमे व्याकरण भेद है तो वो दोषमुक्त हो जाएंगे, जैसे : 

देख मुझको न यूँ दुशमनी से
इतनी नफरत न कर आदमी से

यहाँ पर "ई" दोनो काफ़ियों मे बढ़ा हुआ अंश है और इसे निकाल देने से दुशमन और आदम हम-आवाज़ या हम-काफ़िया नही है लेकिन दोनो मे व्याकरण भेद है दुशमन भाववाचक है और आदमी जाति वाचक है तो ये सही मतला है.लेकिन अगर ऐसे हो:


आपसे दोस्ती,
आपसे दुशमनी

तो क्योंकि दोनो भाववाचक हैं और बढ़ा हुआ अंश ई’ निकाल देने से हम-काफ़िया नही है सो ये गल्त हो जायेगा.

अब अगर दोनो शुद्द हों तो झगड़ा ही खत्म.

देख ऐसे सवाल रहने दे
बेघरों क ख्याल रहने दे (द्विज)

कुछ और उसूल:

1.एक ही शब्द बतौर काफ़िया मतले मे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए बशर्ते कि उनके अर्थ जुदा-जुदा हों. ऐसा करने से काफ़िया रदीफ़ सा बन जाता है.एक शब्द बस इस सूरत मे इस्तेमाल कर सकते हैं जो
उनके अर्थ अलग हों जैसे:

हुई है शाम तो आँखों मे बस गया फिर तू
कहां गया मेरे शहर के मुसाफिर तू.

यहाँ फिर के माने 'बाद' और दूसरे मिसरे मे मुसाफिर का अंश है फिर.जैसे सोना और सोना एक मेट्ल है दूसरा सोना. या फिर जैसे कनक का एक अर्थ धतूरा एक कनक सोना.

अगर आपने काफ़िया "हम" बांधा है और रदीफ़ ’न होंगे" और आपने हम मतले के दोनो मिसरों मे ले लिया तो ये उस ग़्ज़ल का काफ़िया न होकर रदीफ़ बन जायेगा.

हम न होंगे.

लेकिन एक बात बड़ी दिलचस्प है :

अब दिल है मुकाम बेकसी का
यूँ घर न तबाह हो किसी का.

यहाँ ई का काफ़िया है लेकिन व्यंजन "स’ रिपीट हो गया लेकिन क्योंकि काफ़िया स्वर का है इसलिए ये छूट है या फिर शायद कोई और नियम हो.

एक और देखे:

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां
याद आता है चौंका -बासन चिमटा फुकनी जैसी मां.

यहाँ भी ’नी’ रिपीट हुआ है लेकिन काफ़िया "ई’ का है.

2.कुछ शब्द उच्चारण मे हम आवाज़ लगते हैं लेकिन लिखने मे नही जैसे - पड़ और पढ़, खास और यास, आग और दाग़ इन्हें मलफ़ूज़ी काफ़िये कहते हैं और इस दोष को इक्फ़ा कहते हैं. और उर्दू भाषा मे कुछ शब्द ऐसे है जो लिखे तो एक से जाते हैं लेकिन उच्चारण अलग होता है मसलन - 

सह’र और स’हर एक का मतलब सुबह अए जादू, सक़फ़ और सक्फ़( सीन, काफ़,फ़े) इनके अर्थ अलग हैं इन्हे मक़तूबी काफ़िये कहते हैं. लेकिन हिंदी मे ये भेद नही है.

3.अगर काफ़िये मे आप खफ़ा, वफ़ा लेते हैं तो ज़रूरी नहीं कि आप अशआर मे नफ़ा आदि लें आप नशा, देखा, सोचा.. ले सकते हैं.

जैसा आर. पी शर्मा जी ने ये उदाहरण दिया है
डा॰ इकबाल अपनी एक ग़ज़ल में लाये हैं,

फिर चिराग़े-लाल से रौशन हुए कोहो-दमन
मुझको फिर नग्मों पे उकसाने लगा मुर्गे-चमन।
मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं
तन की दौलत छाँव है, आता है धन जाता है धन।

यहाँ इकबाल जी ने च+मन और द+मन मतले मे बांधे लेकिन आगे जाके ये बंधिश तोड़ दी .इसे" धन" कर दिया तो ये छूट है:

4. एक और कमाल देखें

पुरखों की तहज़ीब से महका बस्ता पीछे छूट गया
जाने किस वहशत मे घर का रस्ता पीछे छूट गया.

यहाँ पर रस्ता , बस्ता काफ़िये मतले मे बांधे और इसके हिसाब से आगे.. सस्ता, या खस्ता आदि आने चाहिए लेकिन..

अहदे-ज़वानी रो-रो काटा मीर मीयां सा हाल हुआ
लेकिन उनके आगे अपना किस्सा पीछे छूट गया.

ये सब चलता है.शायर को इन पेचीदा दलीलों मे न फ़ंस कर उतने से काम रखना चाहिए जिससे वो ग़ज़ल दोषमुक्त लिख सके.ये काम ज़ियादा अरूज़िओं का है लेकिन इन सब का इल्म लाज़िम है कई सरफ़िरों से बहस करने के काम आता है..हा.हा.हा.

5. अगर आप मतले मे कामिल और शामिल का काफ़िया बांधा है तो आगे आपको शामिल, आमिल आदि बांधने पड़ेंगे कातिल गल्त हो जायेगा. सो ये सब है ...लेकिन द्विज जी की एक बात से इस बहस को यहीं विराम देता हूँ कि शायरी मे कुछ भी हर्फ़े-आखिर नही होता. लकीर के फ़कीर होना भी सही नही लेकिन इल्म भी लाज़िम है.

दर्द को दिल में जगह दो "अकबर"
इल्म से शायरी नहीं आती

लेकिन इल्म एक समझ पैदा ज़रूर करता है और दर्द, इल्म की रौशनी मे नगी़ने सा चमकता है.

36 comments:

महावीर १६ मार्च २००९ ८:२० PM  

सतपाल जी आप ने आरंभ में ही कहा है कि 'कहीं कुछ ग़ल्त हो तो ज़रूर बताएँ।
आपने एक मतला दिया है:

मिली है ज़ेह्न—ओ—दिल को बेकली क्या

हुई है आपसे भी दोस्ती क्या


बेकली और दोस्ती काफ़िए ग़लत हैं:

१) बेकल (अर्थ: व्याकुल) और दोस्त शुद्ध शब्द हैं।
२) दोनों में 'ई' बढ़ा दिया है।
३) इसलिए बेकल और दोस्त भी हम-काफ़िये होने चाहिए जिस का ध्यान नहीं रखा गया है।
इसी तरह 'चलती' और 'गिरती' योजित शब्दों में भी 'चल' और 'गिर' शुद्ध शब्दों में क़ाफ़ियों
की साम्यता होनी आवश्यक है।
उदाहरण देते हुए इन बातों का ध्यान जरूरी है जिससे सीखने वाले भ्रमित न हों।
-------------------------------
"अब दिल है मुकाम बेकसी का

यूँ घर न तबाह हो किसी का".

यहां बेकसी और किसी के काफ़िए सही नहीं लगते। ५०वें अंतिम दशक की बात है, गूरू प्राण शर्मा जी अपनी एक ग़ज़ल मशहूर शायर द्वारिका दास 'निष्काम' के पास लेगए जिसका मतला था:

जीवन व्यतीत करता हूं किस बेकसी से मैं

उल्लेख इसका करता नहीं हर किसी से मैं

निष्काम साहेब ने मतला को सराहा तो मगर छापने से इनकार कर दिया। कहा कि बेकसी और किसी दोनों काफ़िए ग़लत हैं। प्राण साहेब इस बात से खिन्न नहीं हुए बल्कि बहुत ख़ुश हुए और उनका धन्यवाद किया कि कुछ
नया सीखने को मिला। प्राण साहेब की यह नम्रता ही उनकी महानता का द्योतक है।


यह भी सोचना पड़ता है कि यह लेख एक विशेष और गंभीर विषय पर है। लेखक को नियमों के तोड़ने का मशवरा देना शोभा नहीं देता। पाठक इस लेख को इसलिए पढ़ना चाहते हैं कि क़ाफिए को हर सूरत से, हर नियमों से मतले को कैसे निखारा जाए। आप ने लिखा है -
“ये सब चलता है.शायर को इन पेचीदा दलीलों मे न फ़ंस कर उतने से काम रखना चाहिए जिससे वो ग़ज़ल दोषमुक्त लिख सके.ये काम ज़ियादा अरूज़िओं का है लेकिन इन सब का इल्म लाज़िम है कई सरफ़िरों से बहस करने के काम आता है..हा.हा.हा.”
ख़�

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

dear nandan !
yojit kafie ki zaroorat kya hai is savaal ka to koi jawab nahi hai, ye to shayar ko hi tai karna hota hai ki yojit ya shudh kaun sa kafia istemal kare kai baar mazboore ho jatee hai.
baaki jaise maine kaha ke kai gharane "ita " dosh mante hain kai nahi,aap chahen to na manne waloN se juR sakte haiN, ha ha ha.
thanks

Udan Tashtari २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

बहुत जानकारीपूर्ण और ज्ञानवर्धक आलेख. आभार!!

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

आपकी बात से यह तो समझ में आता है कि योजित काफ़िया अनिवार्य नीयम नहीं है? और काफ़ियों में हेर फेर की भी गुंजायिश है। जो बात स्पष्ट नहीं होती कि किन परिस्थितियों में एक काफ़िया ख़ारिज माना जायेगा?

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

A good article.

Alok Kataria

नंदन २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

"मतले मे अगर दोनो काफ़िये योजित हैं तो वो सही काफ़िये इस सूरत मे होंगे कि अगर हम उनके बढ़े हुए अंश निकाल दें तो भी वो आपस मे हम-काफ़िया हों" एसी सूरत में योजित काफ़िये की आवश्यकता क्या है? तुम मिलाने के लिये ही आम तौर पर योजित काफ़िये का प्रयोग होता है जबकि अर्थ में अधिक फर्क नहीं आता।

अन्य स्वरों के उदाहरण भी देते तो बात और स्पष्ट होती।

Kewal Krishna २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

काफ़िया पर जानकारीपूर्ण आलेख है। काफ़िया के कुछ प्रकारों को आपने उदाहरण सहित प्रस्तुत किया है इससे आपका आलेख महत्वपूर्ण हो गया है।

mehek २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

bahut detail jankari kafiye pe,shukriya

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

चलता और गिरता में काफिया है - ता।
इन शब्दों से - ता हटानें पर चल और गिर बच रहे हैं जो समान तुक नहीं हैं एसे काफ़िये बहुत प्रयोग में देखे हैं। इन्हे दोष मानेंगे या जायज हैं?

अनिल कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

सतपाल जी काफिये पर आपका आलेख बहुत अच्छा है। सभी स्वरों के उदाहरण से और स्पष्टता आती। सबसे बडा कंफ्युजन होता है हिन्दी और उर्दू के शब्द प्रयोगों को ले कर इस लिये इस तरह के उदाहरण बढायें।

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

dear ananya,
aap lekh ko dhyan se paRen baki sab sharton ke baare me likha hai jin se kafia khariz ho jata hai.

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

पंकज जी,
अगर चलता और गिरता मतले मे बाँधे हैं तो इनमे इता दोष है.ये सही होंगे अगर आप चलता के साथ जलता लें और आगे पलता, खलता आदि.

दूसरा अगर "चलता" के साथ "सबका" मतले में बाँधे और आगे देखा, सोचा आदि लें तो भी सही है .
और जैसा की आर.पी शर्मा जि ने कहा कि इस नियम का सखताई से पालन नहीं होता और कई लोग हैं जो इसे नज़रंदाज़ करके लिख रहे हैं.

बाकी जो उदाहरण के लिए जो कहा गया तो..

स्वर आ: देखा, सुना,सोचा,पाला,समझा,आया,गया आदि.
ई के काफ़िए
ज़िंदगी,सोची,समझी,परखी,मिली आदि
ओ..
आओ, देखो, सोचो, समझो,जानो,पालो आदि.

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

बहुत अच्छा आलेख है सतपाल जी, बधाई।

नीरज गोस्वामी २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

सतपाल जी आपका ये लेख हम जैसे नौसिखिये शायरी सीखने वालों के लिए बेहतरीन तोहफे की तरह है...आप का तहे दिल से शुक्रिया.
नीरज

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

Neeraj ji
aap bahut nek insaan haiN aur sabse baRee khoobee aap me yeh hai ki hamesha binamr rahte haiN aur phaldaar peR ke tarah jhuke rahte haiN.
mai bhi nausikhia hi hooN ye jo kripa hai vo Sh dwij ji ki hai aur Maa Saraswati ki .
bhagwan se dua karta hoon ki aap jaise binamrta sab ko de.

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

काफ़िये पर उत्कृष्ट उदाहरों से समझया गया आलेख है। आपके इस गंभीर प्रयास के लिये बधाई।

दृष्टिकोण २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

सतपाल जी मुझे लगता है कि सभी स्वरों पर आपको उदाहरण सहित उसके तकनीकी पहौओं को प्रस्तुत करना चाहिये। हम बहुत कच्चे विद्यार्थी हैं धीरे धीरे बात भीतर जायेगी।

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

तालिबे-इल्म हूँ हर्फ़े-आखिर नही
फ़न से वाकिफ़ तो हूँ फ़न मे माहिर नहीं

बडी सादगी का परिचय देते हुए आपने जो कुछ सिखाया उसके लिये आप धन्यवाद के पात्र हैं। इस विषय को अगली कडी में भी जारी रखें।

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

Dear Nidhi,

ye subject to aaj khatm hai aap agar kuch janna ya batana chahte hain to kaheN ya pooCheN.
these subjects are like tediuous arguments and one should not get trapped as a ghazalgo you should pick which is necessery and should leave rest for critics like i did.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

काफिया पर आपने क्रमबद्ध तरीके से उदाहरणों सहित उपयोगी जानकारी दी है. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद. एक जिज्ञासा- क्या ग़ज़ल के हर मिसरे में काफिया और रदीफ़ रखने की इजाजत है? अगर हाँ तो ऐसी ग़ज़ल का क्या कोई खास नाम है?

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

गजल सुनने में जितनी आसान और आकर्षक लगती है उसकी रचना उतनी ही जटिल है.. यह बात गजल के जानकारों द्वारा कडी बद्ध लेखों से मिल रही है.. बहुत कुछ सीखना अभी बाकी है

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

हर शे’र मे काफ़िया रदीफ़ रखने से हर शे’र मतला
बन जायेगा और एक ग़ज़ल मे अनेकों मतले हो सकते हैं ऐसा कुछ खास नाम तो नहीं है आप बेझिझक कहें और इसी मंच पर ले आएँ.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

मैनें यह प्रश्न दोहा ग़ज़ल का सिलसिले में किया. दोहा में दोनों पदों का सम पदान्ती और सम तुकान्ती होना ज़रूरी है. इसलिए दोहा ग़ज़ल का हर मिस्र समान काफिये-रदीफ़ वाला होता है. आजकल कई रचनाकार दोहा ग़ज़ल के पहले शेर को शुद्ध दोहा लिखकर बाकी शेरों में ग़ज़ल की तरह एक मिस्र छोड़कर काफिया-रदीफ़ मिलते हैं. ऐसी रचना में पहले को छोड़कर बाकी शे'र दोहा नहीं रह जाते. फिर ऐसी रचना को दोहा ग़ज़ल कैसे कहा जा सकता है? हर शे'र शुद्ध दोहा लिखें तो हर मिसरे में काफिया-रदीफ़ होगा. ऐसी रचना खारिज तो न कर दी जायेगी?

PRAN SHARMA २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

SHREE MAHAVIR JEE KEE SAAREE
BAATEN VICHAARIY HAIN.SACH KAHUN
TO SATPAL JEE KE BHRAMIT AUR
AAPATTIJANAK LEKH NE MUJHE BHEE
NIRAASH KIYAA HAI.CHHAND SHASTRA
KAA GYAAN DENE WAALON PAR "HA,HA"
KARNA YAA FIQRE KASNAA ACHCHHA
NAHIN LAGAA HAI.YAH AAJ KEE SHIKSHA
PADDHATI HAI.
ACHAARYA SANJEEV JEE,AGAR GAZAL
MEIN 5 MATLEN HAIN TO BHEE VAH
GAZAL KAHLAAYEGEE.ITNA DHYAAN
RAKHIYE KI QAAFIA BADAL JAATAA HAI
LEKIN RADEEF NAHIN."KAHAA JAAYE",
"BAHAA JAAYE","RAHAA JAAYE","SAHAA
JAAYE" AADI KAA PRAYOG AAP HAR
MISRA YAANI PANKTI MEIN KAR SAKTE
HAIN.MEREE EK GAZAL HAI ,USMEIN
5 MATLEN HEE HAIN.KABHEE DHOONDH
KAR AAPKO BHEJUNGAA.

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

गुरुजनों नें बहुत कुछ अपनी चर्चा में कहा जो सीखने में सहायक होगा। सतपाल जी आपका आलेख अच्छा है। महावीर जी की बात पर भी ध्यान दीजियेगा।

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

अब दिल है मुकाम बेकसी का
यूँ घर न तबाह हो किसी का".
बज़ुर्गों को प्रणाम और उनका कहा सर माथे लेकिन उपर दिया शे’र मिर्ज़ा दाग़ का है जो कई शायरों के उस्ताद थे,इन पर ऊंगली उठाना या ग़ल्त कहना सही नही है.
दूसरा इता का पालन सख्ती से नही होता, आप चाहो तो करो या रहने दो.दूसरा ये मै ये सही मानता हूँ कि शायर को ज़ियादा अरूज़ी नही होना चाहिए उतना इल्म काफ़ी है जिससे वो ग़ज़ल कह सके.बाकी मैं छंद शास्त्रियों की इज़्ज़त करता हूँ लेकिन ये लोग कभी-कभी बाल की खाल निकालना शुरू कर देते हैं जैसे शहर और शह्र पर बवाल खड़ा कर देते हैं.
रही बात दूसरे नियमों की मै उन्मे जाना नही चाहता और ये बात खुद आर.पी जी भी मानते है कि शायर को ज़ियादा अरूज़ी नही होना चाहिये बाकी राये सबकी अलग हो सकती है.
राजीव जी से अनुरोध करता हूँ कि आगे से कोइ भी article आदरणीय प्राण जी को और हो सके तो महावीर जो को दिखा लिया करेम ताकि ऐसे लेख इस मंच पर न आएँ.

गौतम राजरिशी २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

साहित्य-शिल्पी के इन तमाम आलेखों की सबसे खास बात ये होती है कि आलेख जितना ज्ञानवर्धक होता है , टिप्पणियां भी उतना ही इज़ाफा करती हैं हम छात्रों को सीखाने में। सतपाल जी की गज़ल-विधा की उत्कृष्ठता पे किसी को सुबहा नहीं हो सकता, किंतु हाँ ये विशेष आलेख कहीं-कहीं हम जैसे नये छात्रों के लिये भ्रम पैदा करता है। वैसे भी जिन छूट की बात सतपाल जी कर रहे हैं, वो बस उस्तादों के लिये ही जायज है, मेरी समझ से। हम जैसे नौ-सिखिये को तो अभी कोई भी छूट लागू नहीं होनी चाहिय।
शेष परम आदरणीय प्राण जी और महावीर जी ने खुलासा कर ही दिया है।
सतपाल जी से आग्रह है कि इस कड़ी को कृपया विराम न दें। खास कर कुछ प्रकाश डालें उर्दू के नुक्ते वाले शब्दों का सामान्य हिंदी के शब्दों के साथ कफ़िये मिलाने के बारे में। जैसे कि दाग़ को आग या बैराग के साथ जैसे उदाहरणों को लेकर। श्रद्धेय महरिष जी इन्हें हिंदी में जायज मानते हैं। लेकिन इससे फिर वही गज़ल को हिंदी-उर्दू में बाँटने का विवाद छिड़ जाता है। आदरणीय महावीर जी और प्राण जी से भी अनुग्रह है कि कुछ इस विषय पे कहें।

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

"CHHAND SHASTRA
KAA GYAAN DENE WAALON PAR "HA,HA"
KARNA YAA FIQRE KASNAA ACHCHHA
NAHIN LAGAA HAI.YAH AAJ KEE SHIKSHA
PADDHATI HAI."

respected pran ji maine sarphire aroozioN ke baare me kaha tha jo baal ki khaal nikalte hain sabke liye nahi, aap agar aahat hue hon to muafi chahta hooN.
baaki shiksha paddatee me koi dosh nahi hai aisa kahne se aap mere saath-saath mujhse juRe kai logon par unglee utha rahe hain jo sahi nahi hai, mai ghalat ho sakta hooN mujhe shiksha dene wale nahi.
saadar
khyaal

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

Dear gautam !
Mahavir ji ne pathakon ke liye ek matavpooran link dia hai.
http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2005/ghazal/ghazal01.htm

aap vahaN jaeN.

PRAN SHARMA २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

Gautam jee,
Maine apne lekh mein likha
hai ke swar bhinntaa ke kaaran
"Daag" ke qaafiaa ke saath "aag"
aur "Aawaaz" ,"Saaz","Raaz" aadi
qaafion ke saath "Taaj" aur "laaj"
ke qaafiye baandhna anuchit hai.
Urdu waalon ko ye maanya nahin hoga.

सतपाल २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

जीवन व्यतीत करता हूं किस बेकसी से मैं
उल्लेख इसका करता नहीं हर किसी से मैं
Pran sharma
aur
"अब दिल है मुकाम बेकसी का
यूँ घर न तबाह हो किसी का".
Mirza Daagh dehlavi

mai Mahavir ji se anurodh karta hoon ki vo dubaaraa in ashaar par apne vichaar den kyonki agar us vaqat aap ye ashaar quote karte to Pran ji ki ghazal Chap gayee hotee.
saadar
khyaal

dheer २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

Namaste aur aadaab!
yakeenan meraa ilm maujood maaHir e fan shaksiyatoN ke saamne yuN hai keh saagar ke aagey qatr'ah! isliye apnee baat kahne se pahle dast bastah vintee kartaa huN keh ise kisee kism kee tanqeed nah samjhaa jaaye.
अब दिल है मुकाम बेकसी का
यूँ घर न तबाह हो किसी का
Maulana Hasrat Mohani ne apnee kitaab niqaat e sukhan meN qafiya kee saaree shartoN ko vistaar se bataayaa hai.
Mirza Daagh ke is sher ke qafiye meN koee ghaltee naheeN hai. maiN ustaad e mohataram Sarwar Alam Raz saHeb kee kahee gayee baat ko rakh rahaa huN. yuN aap behtar jaante haiN.
sarwarraz says: (1) bekasee aur kisee aawaaz meN to ek haiN hee. matlab bhee donoN kaa alag alag hai. is liye qaafiyah ek ho gaa. ab baat sirf is peh reh gayee keh bakasee meN :ka: hai yanee :kaaf: par zabar (:a: kee maatraa) hai aur :kisee: meN :chhoTee ee kee maatraa:! Urdu shaa,iree meN is kee ijaazat hai keh aisee Harakat (movement) alag alag ho saktee hai jaise Gham = ranj kaa qaafiyah gum = kho jaanaa yaa kam = thoRaa ho saktaa hai! Gham meN Gh par zabar hai, gum meN gaaf par pesh (oo) hai, lekin donoN ek qaafiyah hain! isee tarah 'kal' aur 'gul' bhee ham qafiya haiN! aisaa kam hotaa hai magar Ghalib ke yahaaN yeh aam hai!
Shamsur Rehman Farooqui apnee kitaab Dars-e-Balaaghat: meN likhte haiN keh "qaafiyah us waqt qaa,im hotaa hai jab do lafz^oN meN kam se kam ek Harf mushtarak ho aur woh Harf aaKhiree ho aur us ke pehle jo Harakat ya'nee zabar, zer yaa pesh aaYe woh bhee mushtarak ho lihaaz^ah :sitam, dam, alam: yeh sab qaafiYe SaHeeH haiN.---agar :Harf-e-rawee: ke pehle aane waale Harf meN donoN jagah Harakat ho to is baat kee ijaazat hai keh woh HarkateN muKhtalif ho saktee haiN. chunaan.ch :Khush: kaa qaafiyah :shash: (ba-ma'nee 6) aur :kam: kaa qaafiyah :gum: ho saktaa hai.
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qafiye par Sarwar saHeb ke ek mazmoon kaa link chaspaa kar rahaa huN.
http://www.sarwarraz.com/adabipage_en.php?id=355&pageid=7&title=Nikaat-e-SuKhan%20#7:

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dhanyavaad!

साहित्य-शिल्पी २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

ग़ज़ल पर विमर्श के लिये आरंभ इस स्तंभ में विचार भिन्नता नें अनेकों आयाम प्रस्तुत किये हैं। मेरा विनम्र अनुरोध है कि हम व्यक्तिगत न हो कर उन मुद्दों को रेखांकित कर लें जिन पर सार्थक चर्चा को आगे बढाया जा सके।

साहित्य शिल्पी अपने पाठकों से यह वायदा करती है कि विवादित विषयों व संदर्भों पर अनेकों विद्वानों की राय ली जायेगी व उनके आलेखों को प्रस्तुत किया जायेगा। यहाँ हमारा मक्सद किसी बात को स्थापित करना नहीं है अपितु उन विद्यार्थियों के लिये सोच का मुक्ताकाश देना है जो किसी विषय के हर पहलु को देख समझ सकें।

पिछले कुछ समय से देखा गया कि एक "खास मंच" से जुडे लोग/लोगों नें जान बूझ कर साहित्य शिल्पी पर अभी बेनाम और कभी अपने नाम से टिप्पणी कर साहित्य शिल्पी पर प्रकाशित हो रहे माननीय विद्वानों/लेखकों के खिलाफ अभद्र टिप्पणियाँ की हैं। हम इसे गंभीरता से ले रहे हैं।

हमने कई टिप्पणियाँ समय समय पर मिटायी हैं व व्यक्तिगत अनुरोध के मेल भी भेजे हैं कि कृपया अपनी असहमति जतायें, अपनी बात रखें, आलोचना करें लेकिन किसी लेखक को अपमानित करने का हक किसी को भी नहीं है।

dwij २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

सतपाल ख़याल का आलेख देखा है और उस पर हुई चर्चा को भी बहुत ही ध्यान से पढ़ा भी है.

मुझे खुशी इस बात की है कि सतपाल जी ग़ज़ल की पाठशाला के एक बहुत ही गम्भीर और विनम्र विद्यार्थी के रूप में हमारे सामने आ रहे हैं.मुझे खुशी इस बात की भी है कि
इस आलेख के माध्यम से कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण
बातें सामने आई हैं.
सतपाल को जितना मैं जानता हूँ ,उसके आधार पर बड़े विश्वास सके साथ कहना चाहता हूँ कि उनका इरादा आदरणीय गुरुओं की भावनाओं को आहत करना कभी नहीं रहा होगा.महावीर जी ने ठीक ही कहा है कि ऐसा कहना शोभा नहीं देता.
लेकिन बहुत से स्वनाम धन्य गुरू हमारे यहाँ हैं जो कम पूंजी पर बड़ा व्यापार खड़ा
करना चाहते हैं.खैर ऐसे लोगों का ज़िक्र भी बज़्मे-ग़ज़ल में लाना बज़्म का सरूर खराब करने के लिए काफी है.


बहुत-से ग़ज़लकार ऐसे हैं जो समीक्षक के नाते जो लिखते हैं उसका पालन अपनी रचना में नहीं कर पाते.


मुझ जैसे लोगों को भी भ्रम कभी-कभी ज़रूर होता है कि बड़े मकबूल शायर भी जो छूट अपनी ग़ज़ल के मिसरों में ले लेते हैं वो नए लोग अगर लें तो आपत्ति क्यों? फिर जवाब भी मुझे मिल ही जाता आपत्ति शायद इसलिए भी कि कहीं छूट ही नियम
न बन जाए.


इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए बधाई.

hemjyotsana २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

achcha lekh likha hai, kai baar vivaad mein kai aur gyaanvardhak baat pataa chalti hai,
main savya ghazal ke niyam kaanoon ko nahi jaanti sirf basic niyam hi pataa hai, aaj is lekh ko 2baar padhane aur sabhi comments ko kai baar padhaa to nayaa gyan mila ,
lekhak aur comment dene wale sabhi ka dhanyewaad,
vivaad bahut kuch deta bas use behas banne se rokna chahiye

saadar
hem jyotsana

Devi Nangrani २३ नवम्बर २००९ ७:०१ PM  

Very Interseting topic jismein kai nazakatei hain jinmein cookne ki sambhavta rahti hai.
Gazal ke liye kafia aur radeef aniwarya hai..haan jahan Eeta dosh hai vo kafia shri sharmaji katai sahi nahin maante
jaise: bekali-dosti..galat hai
meri ek gazal ka sher

अपने ही घर ही में गैर सा रहना पड़ा मुझे
खुद के लिए भी अजनबी बनना पड़ा मुझे
sahi lagta hai par hai nahin. gazal ki bareekion ko janna aur unpar amal karna zaroori hai.bawajood iske navodit hone ke karan kahin kahin galti ho jati hai, par sudhar ke sare darwaze khule hain .

This had eeta dosh aur do saal ke baad ise yoon Original word itna se replace kiya tab jaakar unki nazar mein thik laga

बर्दाश्त ख़ुद को भी मुझे इतना पड़ा मुझे
खुद के लिए भी अजनबी बनना पड़ा मुझे

Seekhna to safar hai, main shri mahavir ji ki jaankari ke saath poori tarah sahmat hoon aur pran sharma ji bhi is vidha mein humse bahut agge hai. Haan apni rai pesh karna koi galat baat nahin, par galat ko sahi sidh karna galat hoga..
ek baat hai vaad vivaad se seekhne mein izaafa zaroor hota hai...
sadar
Devi Nangrani

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