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बुधवार, ८ अप्रैल २००९

काव्य का रचना शास्त्र : ५ काव्यात्मा नर्मदा-रस - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'


आत्मा मूलतः दार्शनिक शब्द है. वेदान्त, न्याय-दर्शन आदि में आत्मा को चेतना का पर्याय कहा गया है. शिव सूत्र के अनुसार 'चैतन्यमात्मा' अर्थात 'चेतन ही है आत्मा', अन्यत्र आत्मा को ज्ञान का अधिकरण या आधार भी कहा गया है - 'ज्ञानाधिकरणमात्मा' अर्थात 'आत्मा ही है ज्ञान का एकमात्र आधार.' यहाँ ज्ञान शब्द चेतना का ही वाचक है. न्याय दर्शन में इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख, ज्ञान, आदि आत्मा के लिंग (चिन्ह) मान्य हैं. इन्हीं से आत्मा की सता (अस्तित्व) का भान होता है. 'इच्छाद्वेशप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिंगम' अर्थात इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख, दुःख ज्ञान-आत्मा-चिह्न'. दर्शन में आत्मा से आशय शरीर के अधिष्ठाता एवं संचालक होने से है.. काव्य शास्त्र में काव्य की चेतना या प्राण शक्ति के रूप में 'काव्यात्मा' शब्द का प्रयोग हुआ है.

भरत मुनि साहित्यशास्त्र एवं काव्यानंद के आदि तत्वविद मान्य हैं. नाट्य-शास्त्र में रूपक के तत्वों की विवेचना करते हुए उन्होंने रस को प्रधान तत्व मानते हुए छठवें तथा सातवें अध्याय में रस का विस्तार से वर्णन किया है. रस सिद्धांत की महत्ता महर्षि भरत के समय में ही स्थापित हो गयी थी. अन्य सिद्धांतों के प्रतिपादक भी रस सिद्धांत का निषेध न कर सके. भले ही उन्होंने इसे रसवत अलंकार के रूप में देखा या माधुर्य गुण के रूप में. भामह, डंडी, उद्भट, रुद्रत, वामन, आनंदवर्धन आदि आचार्यों ने रस के प्रति हमेशा समादर भाव व्यक्त किया.

अग्निपुराणकार ने रस को समादृत करते हुए उसे काव्य की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित किया तथा कहा-

वाग्वैदग्ध्य प्रधानेपि रस एवात्र जीवितं.

अर्थात यदपि वाग वैदिग्ध्य है, कविता की पहचान
रस कविता की आत्मा है, यह सच लें जान.

भामह ने 'न कान्तमपि निर्मूष विभाति वनितामुखं' आर्थर ;रुचे न प्रिय को प्रिया का, मुख सौंदर्य विहीन' कहकर अलंकार की महत्ता प्रतिपादित की. उन्होंने सौंदर्य और अलंकार का मूल वक्रोक्ति को माना तथा रसों को भी अलंकारों में समाविष्ट कर लिया. उनके अनुसार काव्य में आल्हाद और चमत्कार की सृष्टि अलंकार से ही होती है. भामह ने उपमा, श्लेष आदि अलंकारों के अतिरिक्त रीति, गुण, रस आदि तत्वों को पहचाना किन्तु अलंकार में समाविष्ट मान लिया. उनकी दृष्टि अभिव्यंजना शेली पर आधृत थी.

दंडी ने 'काव्यादर्श' में शब्दार्थ के चमत्कार, काव्य के बाह्य रूप अर्थात अलंकार को काव्य माना- 'काव्यशोभाकरान धर्मान अलंकारान प्रचक्षते' अर्थात 'काव्य-धर्म सौंदर्य है, अलंकार पहचान.' अलंकार के मूल में भामह ने वक्रोक्ति को माना किन्तु दंडी ने अतिशयोक्ति को.

८वीं सदी में आचार्य उद्भट भट्ट ने 'काव्यालंकार सार संग्रह' में ७९ कारिकाओं में ४१ अलंकारों के लक्षण दिए तथा ९ रसों को मान्यता दी.

वामन ने ९ वीं सदी में सर्वप्रथम 'काव्यात्मा' शब्द का प्रयोग करते हुए 'काव्यालंकार सूत्र' में 'रीति' को काव्य की आत्मा बताया- 'रीतिरात्मा काव्यस्य' अर्थात- 'काव्यात्मा ही रीति है'. यहाँ रीति से आशय शब्दों और भावों की विशिष्ट योजना के आधार पर विशिष्ट पद-रचना से है. वे कश्मीर नरेश जयपीड के मंत्री थे. वामन ने रीति के पूर्व प्रचलित दो रूपों वैदर्भी तथा गौडी के अतिरिक्त 'पांचाली' रीति का आविष्कार किया तथा काव्य के १० प्रचलित गुणों के स्थान पर २० गुणों (१० शब्द गुण, १० अर्थ गुण) की उद्भावना की. उन्होंने रस को अधिक व्यापक, स्थाई तथा उपादेय बनाया.

रुद्रत ने 'काव्यालंकार' में रस-विधान का विस्तृत निरूपण किया. उन्होंने अलंकारों के भेद-प्रभेद, वास्तव्य, औपम्य, अतिशय, श्लेष आदि का वर्णन कर ५७ अलंकारों का वर्णन किया.

आनंदवर्धन ने भरत मुनि के पश्चात् पहली बार काव्य शास्त्र का निर्भ्रांत व मौलिक निरूपण किया. उन्होंने रस, ध्वनि और औचित्य तीन सम्बद्ध आत्मवादी सिद्धांतों का निरूपण किया, ध्वनि-रस सिद्धांत का प्रवर्तन तथा औचित्य का निरूपण कर रस व काव्य के विविध अंगों की रासनुकूल संयोजन की.

आनंदवर्धन ने ध्वनि को काव्य की आत्मा माना- 'ध्वनिरात्मा काव्यस्य' अर्थात ध्वनि है आत्मा काव्य की' तथा 'काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति' अर्थात 'काव्यात्मा ध्वनि मात्र है.' उन्होंने 'ध्वन्यालोक' में ध्वनि के ३ भेद- रस ध्वनि, अलंकार ध्वनि तथा वस्तु ध्वनि बताये.

अभिनव गुप्त (१० वीं सदी) ने 'अभिन भारती', 'ध्वन्यालोक लोचन' तथा 'काव्य कौतक विवरण' में पांडित्यपूर्ण टीकाएँ कीं. तत्पश्चात महाकवि राजशेखर और विश्वनाथ ने काव्य-पुरुष का रूप स्थिर कर रस को काव्य की आत्मा सिद्ध किया. विश्वनाथ ने तो काव्य का लक्षण रस पर आधारित कर कहा- 'रसात्मकं वाक्यम काव्यम' अर्थात 'रस परिपूरित वाक्य ही, कविता है लें मान्.'

राजशेखर ने कहा- 'शब्दार्थौ ते शरीर रस आत्मा.' अर्थात शब्द-अर्थ तन काव्य का, रस कविता का आत्म.' उन्होंने 'काव्य मीमांसा' तथा 'कवी रहस्य' ग्रन्थ रचे.

कुंतक ने उक्ति-वैचित्र्य, कथन का अनूठापन या वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा मानकर उसके लिए 'जीवित' शब्द का प्रयोग किया- 'वक्रोक्तिः काव्यजीवितम' अर्थात 'जीवित है वक्रोक्ति में, कविता मानें सत्य'.

महिम भट्ट (११ वीं सदी) ने 'व्यक्ति विवेक' मेंध्वानी सिद्दांत की आलोचना कर काव्य में दोषों का निरूपण कर अनौचित्य को प्रमुख दोष बताया तथा उसके अन्तरंग (अर्थ विषयक- रस अनौचित्य) व बहिरंग ( शब्द विषयक- विधेय, विमर्श, प्रक्रम भेद , पौनरुक्तेय, वाच्यावचन) भेद किये.

क्षेमेन्द्र ने 'औचित्य विचार चर्चा' में औचित्य को काव्य का विधायक तत्व सिद्ध कर रस-ध्वनि को काव्य का विधायक तत्व माना- 'औचित्यम रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितं' अर्थात 'जिसमें हो औचित्य-रस, कालजयी वह काव्य.' वे अनौचित्य को नकारते हुए कहते हैं-

अनौचित्यावृते नात्यद रस भंगस्य कारणं.
प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्यीह निष्त्परा:
अनौचित्य से ही सदा, होता है रसभंग.
रहे अगर औचित्य तो, काव्यानंद अभंग.

भोज ने 'सरस्वती कन्थाभारण' तथा 'श्रृंगार प्रकाश' ग्रंथों में श्रृंगार को काव्य का मूल माना- 'काव्यशोभाकरत्व' अर्थात 'काव्य वह जो करे सुन्दर' .

मम्मट ने 'काव्य प्रकाश' में तब याक विकसित सभी सिद्धांतों का यथावत विवेचन किया.

रुय्यक (१२ वीं सदी) ने 'अलंकार सर्वस्व' में 'अलंकारा एव काव्ये प्रधानमिति प्राच्यानाममतं'
अर्थात 'कहता है प्राचीन मत, सुनिए चतुर सुजान.
अलंकार ही काव्य में, होता प्रमुख-प्रधान.'
कहकर काव्य में अलंकार का महत्त्व प्रतिपादित किया है. उन्होंने 'विकल्प' तथा 'चित्रित' दो नए अलंकारों की उद्भावना की.
वाग्भट्ट ने ४ शब्दालंकार, ३५ अर्थालंकार व नायक-नायिका भेद पर विस्तृत चर्चा की.

जयदेव ने 'चंद्रलोक' में मम्मट के काव्य गुण 'तद्दोशौ शब्दार्थो सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि' अर्थात 'दोष न हो शब्दार्थ में, गुण हों कितु जरूर.

अलंकार हों या नहीं, तब हो काव्य सुरूर. का खंडन कर लिखा-
अंगीकरोति य काव्यः शब्दार्थावलंकृती .
असौ न मन्यते कास्मादनुष्णमनलंकृती

अर्थात- सु अलंकृत शब्दार्थ ही, बने काव्य का अंग.
अनलंकृत शब्दार्थ को, रखता काव्य न संग.

कविराज विश्वनाथ ने 'साहित्य दर्पण में' काव्य के दृश्य और श्रृव्य दो भेद किये तथा एक और रीति 'लाटी' का आविर्भाव किया. पंडित जगन्नाथ ने 'रस गंगाधर', 'ध्वन्यालोक' और 'काव्य प्रकाश' में रमणीयता को काव्य की आत्मा घोषित किया- 'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम/'

अर्थात- जिन शब्दों में अर्थ हैं, निहित मधुर-रमणीय.
वह ही कविता कामिनी, मनमोहक कमनीय

उक्त सभी सिद्धांतों का समन्वय करते हहुए विश्वनाथ ने लिखा- 'शब्द और अर्थ काव्य पुरुष का शरीर है, रस और भाव उसकी आत्मा, शूरता, दया, दाक्षिण्य अदि के सामान माधुर्य, ओज और प्रसाद इस काव्य पुरुष के गुण हैं और कर्णत्व, बधिरत्व, खन्जत्व आदि के सामान श्रुत कटुत्व, ग्राम्यत्व, आदि दोष हैं. वैदर्भी, पांचाली, गौडी और लाटी रीतियाँ उसके विविध अवयवों की गहन है. कुंडल, कंकण आदि आभूषणों की भांति काव्य के शब्दगत और अर्थगत अलंकार उस काव्य पुरुष की शोभा के विधायक हैं. उन्होंने प्रतिभा को काव्य का हेतु स्वीकार कर उसके चार भेद उत्तमोत्तम, उत्तम, मध्यम और अधम किये.

काव्य का प्रयोजन:
मानव का स्वभाव है कि वह बिना किसी उद्देश्य के किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता. काव्य रचना के कर्म में प्रवृत्त होने का प्रयोजन आचार्यों ने यश, धन, अमंगल से रक्षा, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति को माना है. वर्तमान में इन उद्देश्यों से कोई रचनाकार रचनाकर्म में प्रवृत्त नहीं होता. ये उद्देश्य अन्य उपायों से भी पूर्ण किये जा सकते हैं.

काव्य सृजन का उद्देश्य कवि को अपनी अनुभूतियों और विचारों को व्यक्त करने का अवसर मिलना है. वाल्मीकि और शेक्सपिअर दोनों कवि को अपनी भाव सृष्टि का ब्रम्हा मानते हैं यह करता भाव तथा यशार्जन भी काव्य सृजन के करक हो सकते हैं. जीवन संघर्ष से त्रस्त मानव काव्य का रसास्वादन कर आनंदित हो जाता है. तुलसी भी राम चरित मानस की रचना '

स्वान्तः सुखाय करते हैं. काव्य केवल आनंद ही नहीं देता वह रचनाकर और दर्शक/श्रोता को प्रभावित कर उनके आचरण को बदलता भी है. मम्मट काव्य से प्राप्त सम्मति को 'कांता सम्मति' कहते हैं आशय यह कि कविता कवि को स्वामी या सचालक की तरह नीरस आदेश नहीं देती अपितु पत्नी की तरह सरस, स्निग्ध, मधुर व्यव्हार कर औचित्य-अनौचित्य का आभास करा देती है.

पंडित जगन्नाथ ने रस को काव्य की आत्मा घोषित किया- 'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम/' अर्थात- जिन शब्दों में अर्थ हैं, निहित मधुर-रमणीय. कविता उनको जानिए, वे ही हैं मननीय.

7 comments:

PRAN SHARMA २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

EK AUR UTTAM AALEKH.Pt.JAGAN NATH
NE RAS KO KAVYA KEE ATMA MAANAA
HAI.URDU KE MASHHOOR SHAIR AKBAR
ALLAHBAADEE NE BHEE KABHEE KAHAA
THA---
MAANEE KO CHHODKAR JO HON
NAZUK BYAANIYAN
VO SHER NAHIN,RANG HAI
LAFZON KE KHOON KAA

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

बहुत ही सुंदर आलेख...बधाई

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

आशय यह कि कविता कवि को स्वामी या सचालक की तरह नीरस आदेश नहीं देती अपितु पत्नी की तरह सरस, स्निग्ध, मधुर व्यव्हार कर औचित्य-अनौचित्य का आभास करा देती है.

काव्य के बारे में अमृतमय लेखमाला की एक और कड़ी ... निरन्तरता के लिये आभार

अवनीश एस तिवारी २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

aapka lekh sundar hai.
dhanyvaad.

गीता पंडित (शमा) २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

बहुत सुंदर आलेख...


आदर्णीय सलील जी...

आभार...

अनिल कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

विषय में गहरे प्रवेश कराया है आपनें। अब इस विषय के विशलेषणों का इंतजार है।

दृष्टिकोण २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

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