मिथ्या-बोध [मोहिन्दर कुमार का कविता-पाठ] - स्वर शिल्पी

पिछले दो सप्ताह से स्वर-शिल्पी पर कविता के स्वरों के रूप में साहित्य शिल्पी द्वारा गाज़ियाबाद में आयोजित कराये गये कवि-सम्मेलन में पढ़ी गई रचनायें सुनवाई जा रही हैं। इसी क्रम को ज़ारी रखते हुये, आज प्रस्तुत है श्री मोहिन्दर कुमार जी की आवाज़ में उनकी एक रचना "मिथ्याबोध"।
| मिथ्या-बोध |
गगन छूने की मंशा में
तने पर्वत-शिखर पर कहीं
एक चुलबुली सूर्य-किरण
सफ़ेद बर्फ़ को टटोलती
धीमे से कान में कुछ बोलती
जाने क्या बात थी बर्फ़
भीतर ही भीतर पिघल
इक धार सी बनकर बहने लगी
ढलानों पर इक सरसराहट हुई
जड़ चेतन हुआ, राह बनने लगी
धारा झरना बनी और झरने लगी
शांत सोईं घाटियां सुगमुगाने लगी
टकरा पत्थरों से जल शोर करने लगा
धारा से धारा मिली रूप हुआ कुछ बड़ा
तलहटी तक पहुँचते बन गयी इक नदी
घौर गर्जन समेटे और उफ़नती हुई
बल खाती हुई, लहराती हुई
जो सामने आ गया, साथ बहाती हुई
जहां कोई वाधा मिली, झील सी हो गई
फ़िर सिर से गुजर, सब बहा ले गयी
रचनाकार परिचय:- अब तो किनारे भी उससे डरने लगे
जो फ़ंलाग जाते थे उछालों से उसको कभी
अब दूर जा कर पुलों पर से गुजरने लगे
फ़िर और कुछ नदियों से संगम हुआ
आ गया उफ़ान मैदानों तक बहता हुआ
नदी अब एक महानदी हो गई
पाट चौड़े हुए मगर गति मध्यम हुई
शुद्ध शीतल धारा का रूप अब न रहा
रसायनो की झाग स्तह पर थी तैरती
किनारे दल दल बने, इक बू सी फ़ैलती
शहरी गंदगी के परनाले और मिल गये
उजला जल भी सियाह सा लगने लगा
हर पल आगे बढ़ती हुई वो थी सोचती
छोड़ पर्वत शिखर वो यहां क्यों आ गई
इस गति से तो थी वो जड़ ही भली
क्यों सूर्य-किरण की सलाह उसे भा गई
बस एक बहने के उन्माद से मात खा गई
था अन्तिम चरण सागर से मिलन की घड़ी
कई धाराओं में इक महानदी बंट गयी
न पहले सा वेग, न कोई भयावह गर्जना
न अपनी विराटता का कोई ओज था
समक्ष सागर के थी वो मात्र इक धार सी
कुछ देर में बनेगी भूतकाल का एक अंश
यही अस्तित्व विहीनता दे रही थी एक दंश
वो स्वतंत्रता व विशालता का बोध
आज शून्य सा था उसे लग रहा
इस पड़ाव पर विलय के वो थी सोचती
वो बहाव उसका नहीं..... ढलानों का था
वो शोर उसका नहीं.... चोट खाई चट्टानों का था
वो तो जड़ थी.. जो वेग था
वो था..सूर्य-किरण का दिया
विशालता उसकी न अपने कारण से थी
कई धाराओं ने स्वंय को, उसमें था खो दिया
जो शिथिलता उसे अन्त में थी आ कर मिली
वो सब उसकी बहायी हुई रेत और मिट्टी से थी
दोषी कोई नहीं, स्वंय के मिथ्याबोध थे
सागर में मिलना उसकी नियति ही थी




14 comments:
बहुत अच्छी कविता, बधाई।
जन्म से लेकर मरण तक की यात्रा को आपने कविता के रूप में बहुत ही अच्छे ढंग से पिरोया है...इसके लिए बधाई...
इस पड़ाव पर विलय के वो थी सोचती
वो बहाव उसका नहीं..... ढलानों का था
वो शोर उसका नहीं.... चोट खाई चट्टानों का था
वो तो जड़ थी.. जो वेग था
वो था..सूर्य-किरण का दिया
विशालता उसकी न अपने कारण से थी
कई धाराओं ने स्वंय को, उसमें था खो दिया
जो शिथिलता उसे अन्त में थी आ कर मिली
वो सब उसकी बहायी हुई रेत और मिट्टी से थी
दोषी कोई नहीं, स्वंय के मिथ्याबोध थे
सागर में मिलना उसकी नियति ही थी
गहन कथन है कविता में। मोहिन्दर जी बहुत अच्छी कविता है।
एक परिपक्व और प्रभावी कविता।
Nice poem.
Alok Kataria
स्वर शिल्पी बहुत अच्छा प्रयास है। मोहिन्दर जी की यह दार्श्निक दृष्टिकोण वाली कविता भी प्रभावी बन पडी है। मेरा सुझाव है कि साहित्य शिल्पी इस स्तंभ के लिये ऑन-लाईन कवि-सम्मेलन जैसे विकल्पों पर भी विचार करे।
कविता बहुत अच्छी है लेकिन इसने सुनने में सफलता नहीं मिली।
BHAVON KEE SUNDAR AUR PRABHAASHALEE
ABHIVYAKTI.MOHINDER JEE KO MEREE
BADHAAEE.
मोहिन्दर जी से इस कविता को साक्षात सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। एसी अनुभव से पगी गंभीर कविता लिखने सा सामर्थ्य बहुत कम लेखनियों में होता है।
बहुत सुन्दर रचना और बेहतरीन लगा सुनना भी. बधाई.
सुंदर अभिव्यक्ति --बधाई!
सुँदर !
दीर्घ फलक लेकर
लिखी कविता
पसँद आई मोहिँदर जी -
बधाई !
- लावण्या
सुन्दर और प्रभावी कविता।
मोहिन्दर जी
बधाई।
mohinder ji bahut hi yogay kavi hai ..unki rachnao ka sansaar apne aap me bahut gahrai liye hue hota hai ... is kavita me bhi wahi baat hai ..ek gahri arthpoorn kavita jo jeevan ko samarpit hai ...
mera salaam is lekhan ko ...
dil se badhai sweekar karen ..
vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/
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