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बुधवार, १५ अप्रैल २००९

अलंकार ही काव्य है [काव्य का रचना शास्त्र : ६] - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

अलंकारवादियों के अनुसार काव्य की आत्मा अलंकार है. वे काव्य-सौदर्य में वृद्धिकारक सभी तत्वों को अलंकार मानते हैं. भामह , दंडी , उद्भट , रुद्रत , जयदेव आदि आचार्य अलंकार को काव्य का अनिवार्य तत्व मानते हैं. वे अलंकारहीन रचना को वे काव्य ही नहीं मानते. इस सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य भामह से पूर्व भी अलंकारों की परम्परा का उल्लेख मिलता है- निरुक्त और पाणिनि के व्याकरण में भी शब्दालंकारों का उल्लेख है, किन्तु काव्य के सन्दर्भ में अलंकारों को मुख्यता देने का कार्य सर्वप्रथम आचार्य भामक ने ही किया. उनके समय में अलंकारवादियों के दो वर्ग थे - एक वर्ग शब्दालंकारों को प्रमुखता देता था तो दूसरा वर्ग अर्थालंकारों को. भामह ने दोनों की ही प्रमुखता मानी है, क्योंकि काव्य में दोनों का ही समान महत्व है. वे कहते हैं- जैसे स्त्री का मुख सुंदर होते हुए भी आभूषणों के बिना सुशोभित नहीं होता , उसी प्रकार शोभा संपन्न होते हुए भी अलंकारहीन काव्य व्यर्थ है! 

"न कान्तगपि निर्भूषम विभाति वनिता मुखं "

अर्थात :-
अलंकार बिन ज्यों नहीं, ललना मुख कमनीय. 
अलंकार बिन त्यों नहीं, कविता हो रमणीय. 

आचार्य दंडी ने अलंकारों की महत्ता प्रतिपादित की है. अलंकारों के स्वरूप का विवेचन करते हुए वे लिखते हैं - काव्य की शोभा के कारण धर्मो को अलंकार कहते हैं, 

" काव्य शोभाकरान धर्मान अलंकारानप्रचक्षते"

अर्थात:-         
जिन गुण-धर्मों से सतत, शोभा पता काव्य.
अलंकार उन सभी में, होता है संभाव्य.

दंडी उन सभी को अलंकार मानते हैं जिनसे काव्य की शोभावृद्धि होती है. शास्त्रों में जितने भी संधि , संधि के अंग , वृत्ति के अंग लक्षण आदि के वर्णन हैं , वे सभी दंडी के अनुसार, अलंकार ही हैं. उनके दृष्टिकोण की व्यापकता उनके निम्नलिखित श्लोक में अभिव्यक्त है-

" यच्च संध्यंगवृत्यंग लक्षणाद्यगमानरे.
व्यावर्णीनभिदम चेष्टं अलंकार तयैव नः..'' 

अर्थात:-
संधि वृत्ति लक्षण सभी, अलंकार हैं मीत.
अलंकार बिन काव्य की, हुई असंभव रीत.

अल्न्कर्वदी रस को भी अलंकार ही मानते हैं. उनके अनुसार काव्य रचना के पीछे कवि का उद्देश्य अपनी अनुभूति को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करना होता है, अलंकार द्वारा काव्य में शक्ति और चमत्कार उत्पन्न होकर सौंदर्य की वृद्धि होती है. 'शुष्को ढूंढो तिष्ठति अग्ने' अर्थात 'सूखी लकडी आग भरे है' में कोइ सौंदर्य नहीं है, यह एक कथन मात्र है. इसके विपरीत यदि कहें 'नीरस तरुरिह विलसित अग्ने' अर्थात 'रसविहीन तरु किये समाहित अग्निदेव को' तो इसमें भाषा का सौन्दर्य कथ्य को अधिक ग्राह्य बना देता है. यह प्रभाव वृद्धि कथन भेद के कारण है. 

किसी को सुन्दर बताने के लिए 'वह सुन्दर है' मात्र कहा जाये तो इसमें किसी प्रकार का वोशिश्त्य न होने से रूचि उत्पन्न नहीं होती किन्तु इसी को 'राधा-वदन चन्द्र सों सुन्दर', 'मीनाक्षी कमनीय रूपसी' आदि कहा जाये तो उक्ति-वैचित्र्य के कारण अर्थ में रमणीयता उत्पन्न होती है जो पाठक/श्रोता के मन में उत्सुकता जगाती है. 'चंद्रलोककार जयदेव के अनुसार-

अंगीकरोति यह काव्यः शब्दार्थावनलंकृति.
असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलंकृति..

अर्थात:- 
अलंकार बिन काव्य को, जो कहते संभाव्य. 
अग्नि उष्णता बिन हुई, क्यों न कहें उद्भाव्य.. 
----
                                                                                                                क्रमश:.. 

12 comments:

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

आचार्य जी, इस विषय की प्रतीक्षा थी। अलंकार को ले कर अनेक भ्रांतियाँ भी हैं। आपसे एसे ही छोटे छोटे आलेखों की अपेक्षा है जिससे यह गूढ विषय समझने में सरलता हो।

nitesh २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

अलंकार जैसे व्यापक विषय की सुन्दर भूमिका आचार्य जी नें तैयार की है। शब्दालंकारों व अर्थालंकारों को भी सोदाहरण प्रस्तुत कीजियेगा।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

बहुत अच्छा आलेख है, धन्यवाद।

अवनीश एस तिवारी २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

अलंकार के विषय में शुरुवात के लिए धन्यवाद |
आपसे और विस्तृत जानकारी की अपेक्षा है |
इस बार का लेख सुन्दर है |


अवनीश तिवारी

नंदन २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

अलंकार आज की कविता का आभूषन नहीं है साथ ही ग़ज़ल में अलंकार का प्रयोग बहुधा काव्य दोष में गिना जाता है। एसे में अलंकार की उपादेयता आज के संदर्भ में क्या है?

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

Nice article, Thanks.

Alok Kataria

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

यह विषय आज की कविता के संदर्भ में भी यदि आप समझायें तो अच्छा विमर्श हो सकेगा। प्राचीन कविता और अलंकार तो चोली दामन के साथी हैं लेकिन नयी कविता और अलंकार पर आपके मंतव्यों की प्रतीक्षा रहेगी। कृपया अलंकार और उनके प्रकारों को अलग अलग विस्तार से समझाये जिससे सामग्री संग्रहणीय हो सके।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

नंदन जी!
अलंकार की प्रासंगिकता तब तक समाप्त नहीं हो सकती जब तक मनुष्य में सौंदर्य बोध है. कविता परंपरागत हो या प्रगतिवादी वह किसी न किसी कोण से सत्य को उद्घाटित करती है, कभी प्रत्याक्षतः कभी परोक्षतः. हर कवी अपने कथ्य को सटीक और प्रभावी बनाना चाहता है और अलंकार इसमें उसकी सहायता करता है. अभी तो प्रवेश मात्र है यथा समय विस्तृत चर्चा होगी ही

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

अनन्या जी!.
आदेश शिरोधार्य, विषय के साथ अपनी बल बुद्धि के अनुसार न्याय करते हुए आपकी अपेक्षा पर खरा उतरने का प्रयास होगा. भूल-चूक की और ध्यान निस्संकोच दिलाएं तथा प्रतिक्रिया अवश्य दें.
निधि जी!
मुझे भी आलेख छोटे रखने से सुविधा होती है पर विषय इतना व्यापक है कि न चाहते हुए भी...
नितेश जी !
शब्दालंकारों व अर्थालंकारों पर ही नहीं उनके भेदों पर भी हम बात करेंगे...अभिषेक जी, अवनीश जी , आलोक जी आप की प्रतिक्रिया ही टोनिक का काम करती है...आँखों में कुछ कष्ट के कारण यह आलेख संक्षिप्त है, शेष सामग्री अगली बार...

सभी से एक अनुरोध... हिंदीतर भाषों/बोलियों के साहित्य से अलंकारों संबन्धी उदाहरण उपलब्ध करिए...ताकि विषय को नव आयाम मिले...

अनिल कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

सलिल जी आपने अनेकों शंकाओं पर अपनी बात कह कर अगले आलेख की प्रतीक्षा बढा दी है।

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

आदरणीय आचार्य संजीव सलिल जी द्वारा चलायी जा रही यह नीयमित श्रंखला काव्य को उसके अतीत-वर्तमान की दृष्टि से समझने के लिये ही महत्वपूर्ण नहीं है अपितु कविता की वे बारीकियाँ भी जो नजरंदाज होने लगी हैं, जिनमें अलंकार प्रमुख हैं।

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

आचार्यवर !

आपके प्रत्येक आलेख का प्रभाव सभी साहित्यप्रेमियों में कितनी उत्कंठा उत्पन्न करता है यही आपके लेखॊं की स्पष्ट प्रासंगिकता है. इस मंच पर लेखों की निरंतरता बनाये रखने के लिये आभार.

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