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गुरुवार, ७ मई २००९

सरोज त्यागी के दोहे व कविता [कविता-पाठ] - स्वर शिल्पी

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पिछले दो-तीन सप्ताह से स्वर-शिल्पी पर कविता के स्वरों के रूप में साहित्य शिल्पी द्वारा गाज़ियाबाद में आयोजित कराये गये कवि-सम्मेलन में पढ़ी गई रचनायें सुनवाई जा रही हैं। इसी क्रम को ज़ारी रखते हुये, आज प्रस्तुत है श्रीमती सरोज त्यागी जी की आवाज़ में उनके कुछ दोहे और एक छोटी सी कविता।
सरोज त्यागी

तो पहले दोहे:

चुन चुन संसद में गये, हम पर करने राज।
सत्तर प्रतिशत माफ़िया, तीस कबूतरबाज॥

बहन मिली, भैया मिले, मिला सकल परिवार।
लाया मौसम वोट का, रिश्तों की बौछार॥

मँहगाई बढ़ती रही, घटती रही पगार।
चाँदी वही है काटता, जिसकी हो सरकार॥

अल्लाह के संग कौन है, कौन राम के साथ।
बहती गंगा में धुले, इनके उनके हाथ॥

विद्यालय में हो रहा, शिक्षा का आभाव।
घर पर ट्यूशन दे रहे, शिक्षक जी बेभाव॥

अंग-प्रदर्शन यूँ बढ़ा, गये सूट-सलवार।
घाटे में है जा रहा, कपड़ों का व्यापार॥

और कविता के बोल हैं:

आज द्रौपदी नहीं पुकारती है कृष्ण को;
कि नाथ आज लाज हाथ आपके हमारी है।
आज न बेचारी है, न आज दुखियारी है वो
और न लाचारी है, न कल वाली नारी है॥
आज द्रौपदी के तन नाम के हैं वस्त्र देखो
नारी बीच सारी है न सारी बीच नारी है;
आ गये जो कृष्ण चीर कहाँ से बढ़ा सकेंगे
आज की ये द्रौपदी तो सारी ही उघारी है॥

7 comments:

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:०७ PM  

सभी दोहे अच्छे हैं।

सीमा सचदेव २३ नवम्बर २००९ ७:०७ PM  

शायद किसी तकनीकी समस्या के कारण कविता सुन तो नहीं पाई लेकिन आपने आधुनिक परिधान की पोल खोल के रख दी । बहुत अच्छा व्यंग्य । मुझे कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं , बहुत समय पहले पढी थीं लेकिन कवि जी का नाम याद नहीं आ रहा । किसी को मालूम हो तो प्लीज बताईएगा
सारी बींच नारी है कि
नारी बींच सारी है
सारी ही की नारी है
कि नारी ही की सारी है

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:०७ PM  

Nice DOHA's and Poem.

Alok Kataria

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०७ PM  

चुन चुन संसद में गये, हम पर करने राज।
सत्तर प्रतिशत माफ़िया, तीस कबूतरबाज॥
सच है सरोज जी। सभी दोहे व कविता अच्छी है।

महावीर २३ नवम्बर २००९ ७:०७ PM  

प्लेयर से स्वर तो नहीं सुन पाए किंतु दोहे और कविता बहुत ही सुंदर हैं।

राजीव तनेजा २३ नवम्बर २००९ ७:०७ PM  

शायद किसी तकनीकी समस्या के चलते मैँ आपकी तीखे तेवरों को अपने में समेटे हुई इस रचना को यहाँ सुन नहीं पाया लेकिन गाज़ियाबाद के समारोह में मैँने ज़रूर इन्हें सुना था और आनन्द लिया था ...


बहुत-बहुत बधाई

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०७ PM  

जीवन के गंभीर पक्षों पर सशक्त व्यग्य करते दोहे और रचना...

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