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Thursday, May 7, 2009

माँ [कविता] - प्राण शर्मा


माँ की निर्मल काया
उससे लिपटी है
सुन्दरता की छाया


युग--युग की क्षमता है
पूजा की जैसी
हर माँ की ममता है

रचनाकार परिचय:-

प्राण शर्मा वरिष्ठ लेखक और प्रसिद्ध शायर हैं और इन दिनों ब्रिटेन में अवस्थित हैं।
आप ग़ज़ल के जाने मानें उस्तादों में गिने जाते हैं। आप के "गज़ल कहता हूँ' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित हैं, साथ ही साथ अंतर्जाल पर भी आप सक्रिय हैं।


धन धान्य बरसता है
माँ के हंसने से
सारा घर हंसता है

मदमस्ती हरसू है
माँ की लोरी में
मुरली सा जादू है

दुनिया में न्यारी माँ
हंसती- हंसाती है
बच्चों की प्यारी माँ

हर बच्चा पलता है
सच है मेरे यारो
घर माँ से चलता है

मन ही मन रोती हैं
बच्चों के दुःख में
माएं कब सोती हैं

हर बात में कच्चा है
माँ के आगे तो
बूढा भी बच्चा है

माँ कैसी होती है
पारस सा मन है
माँ ऐसी होती है

कुछ कद्र करो भाई
बेटे हो फिर भी
क्यों पीड़ित है माई
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"माहिया" पंजाब का प्रसिद्ध लोक गीत है.यूँ तो इसमें श्रृंगार रस रहता है लेकिन अब अन्य रस भी शामिल किये जाने लगे हैं.यह तीन पंक्तियों का छंद है.पहली और तीसरी पंक्तियों में १२ मात्राएँ यानि २२११२२२ और दूसरी पंक्ति में १० मात्राएँ यानी २११२२२ होती हैं .तीनों पंक्तियों में सारे गुरु (२) भी आ सकते हैं
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28 टिप्पणियाँ:

अनन्या May 7, 2009 1:17 PM  

प्राण जी से बहुत कुछ सीखने को मिला है। आपकी ग़ज़ल की कक्षाये मैं मिस कर रही हूँ। माहिया के विषय में जान कर अच्छा लगा। रचना बहुत अच्छी है।

माँ के आगे तो
बूढा भी बच्चा है
माँ कैसी होती है
पारस सा मन है
माँ ऐसी होती है
कुछ कद्र करो भाई
बेटे हो फिर भी
क्यों पीड़ित है माई

रचना सागर May 7, 2009 1:45 PM  

हर बच्चा पलता है
सच है मेरे यारो
घर माँ से चलता है
मन ही मन रोती हैं
बच्चों के दुःख में
माएं कब सोती हैं

सुन्दर भाव।

दृष्टिकोण May 7, 2009 1:59 PM  

बहुत अच्छी कविता।

अवनीश एस तिवारी May 7, 2009 2:06 PM  

सुन्दर रचना के लिए बधाई |
सचमुच, माता - संतान का सम्बन्ध सर्वोत्तम मानवीय सम्बन्ध है|

अवनीश तिवारी

बेनामी May 7, 2009 3:24 PM  

Nice poem. thanks.

Alok Kataria

अनिल कुमार May 7, 2009 3:29 PM  

कुछ कद्र करो भाई
बेटे हो फिर भी
क्यों पीड़ित है माई

बहुत रोचक छंद है।

महामंत्री - तस्लीम May 7, 2009 3:47 PM  

मॉं के लालों की निष्‍ठा पर सटीक प्रहार किया है आपने।

-----------
SBAI TSALIIM

दिव्यांशु शर्मा May 7, 2009 4:32 PM  

जितनी सरल माँ होती है उतनी ही सरल और लाग लपट से दूर कविता .. सहज शब्दों में एक नए छंद से भी अवगत कराया और भावपूर्ण कविता भी कह डाली |
"माँ" से प्रेरित हो कर कई कवितायें लिखी गयीं हैं | साहित्य शिल्पी मंच पर ही काफी कवितायेँ हैं | आत्मा सब की सामान ही होती है और कई बार कुछ बातें दोहराई हुई लगती हैं पर फिर भी हर बार एक अलग ही अनुभूति होती है माँ से सम्बंधित कविताओं को पढ़ कर |

नीरज गोस्वामी May 7, 2009 5:02 PM  

अद्भुत रचना है माँ पर...ऐसी रचना जो सिर्फ प्राण साहेब जैसा सिद्ध हस्त ही लिख सकता है...एक एक शब्द दिल में उतर जाता है..वाह...
नीरज

"अर्श" May 7, 2009 5:08 PM  

ग़ज़ल पितामह सादर प्रणाम,
हमेशा ही आपसे कुछ ना कुछ सिखने को मिलता है इस बारगी ये माहिया इसकी मात्र और इसके बारे में बहोत ही खूबसूरती से आपने बताया है...

माँ क्या है तुम देखो
बच्चा जब रोये
माँ की ममता देखो ...


आपका
अर्श

अक्षर जब शब्द बनते हैं May 7, 2009 6:33 PM  

***सुबोध भाषा में, संश्लिष्ट भाव लिये -
....माँ की करुणा को प्रतिबिम्बित करती सहज-ग्राह्य और संवेदना के पुट से भरी हुई कविता। यहाँ देखने वाली बात है कि प्राण साहब की कविता में प्रच्छ्न्न रूप से गजल का रूप विद्यमान रहता है जो कविता को और भी जीवंत और पठनीय बनाता है। आज के कवि में ऐसे गुण विरल ही पाये जाते हैं। यह भी कि, उनके लोक में कविता अपने नियम से आबद्ध होकर भी अपनी सीमा से आगे जाती है और पाठकों को अभिभूत करती है। इस तरह की कविताओं को देखकर यह भी लक्ष्य किया जा सकता है कि अभी भी कविता मनुष्य के हृदय में उतने ही आब और भाव के साथ ज़िन्दा है जितने पहले हुआ करती थी। इस सुन्दर कविता के लिये प्राण साहब को बधाई देता हूँ। *** सुशील कुमार ।

Dr. Sudha Om Dhingra May 7, 2009 8:51 PM  

प्राण जी की हर रचना मुझे समृद्ध कर जाती है. ''माहिया'' बचपन से सुनती आ रही हूँ पर छंद, मात्राएँ मालूम नहीं थीं.साहित्य - शिल्पी का धन्यवाद! इतनी सुंदर कविता पढ़वाने का.
भाई साहब बहुत - बहुत बधाई...

रूपसिंह चन्देल May 7, 2009 9:03 PM  

’मां के हंसने से सारा घर हंसता है’ प्राण जी ’मां’ कविता कितनी यथार्थपरक और सटीक है. बहुत अच्छे भाव होते हैं उनकी कविताओं और गज़लों. प्राण जी हिन्दी कविता और गज़ल के वास्तव में प्राण हैं.

रूपसिंह चन्देल

Dr. Mahendra Bhatnagar May 7, 2009 9:20 PM  

छंद-प्रयोग सफल रहा है। दीर्घ को लघु करके पढ़ने में कोई हर्ज़ नहीं। 'दुख' 'दु:ख' छप गया। माँ के प्रति बड़ी मार्मिक अभिव्यक्‍तियाँ की है आपने। प्रभावी-प्रांजल कविता!
*महेंद्रभटनागर

PRAN SHARMA May 7, 2009 9:43 PM  

ANANYA,RACHNA SAAGAR,DRISHTIKON,
AVNEESH,ALOK KATARIA,ANIL KUMAR,
MAHAMANTREE-TASLEEM,DIVAANSHU
SHARMA,NEERAJ GOSWAMI,ARSH,SUSHEEL
KUMAR,SUDHA OM DHINGRA,ROOP SINGH
CHANDEL AUR MAHENDRA BHATNAGAR SAB
KAA MAIN AABHAAREE HOON JINHONE
APNEE-APNEE BEBAAQ TIPAANI SE MERA
HAUSLAA BANDHAYA HAI.MERE LIYE
YE SABHEE MAHAAN SAHITYAKAR MARG
DARSHAK HAIN.RAJEEV JEE KAA BEE
MAIN DHANYAVAADEE HOON.

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi May 7, 2009 11:13 PM  

प्राण शर्मा माँ से बढ कर कुछ नहीँ
माँ की ममता का नहीँ कोई हिसाब

आप के हैँ यह बहुत उत्तम विचार
माहिया यह आप का है लाजवाब

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

महावीर May 8, 2009 12:08 AM  

माँ का शब्द सुनते ही ऐसा आभास होने लागता है जैसे कानों में अनेक रस घोल दिए हों। प्राण जी की इस
माहिया में ऐसी ही अनुभूति होती है। माँ में बालक के प्रति ममता, प्यार , दुख-सुख आदि की परिकाष्ठा देखी
जा सकती है औ इन गुणों से कभी भी वँचित नहीं रहती। इसीलिए माँ के लिए सदैव ही बच्चा ही रहता है।
इस कविता में यह बड़े ही सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है:
हर बात में कच्चा है
माँ के आगे तो
बूढ़ा भी बच्चा है.
अंत की पंक्तियों में ऐसे लोगों पर प्रभावशाली शब्दों में कटाक्ष किया है जो माँ के प्रति अपने दायित्व को निभाने में आंखें चुराते हैं:
कुछ कद्र करो भाई
बेटे हो फिर भी
क्यों पीड़ित है माई.
पूरी कविता का एक एक शब्द हृदय को छूने वाला है। प्राण जी की लेखनी में ऐसा जादू है कि हर पंक्ति, हर शब्द बोलता है। इसी कारण उनकी रचनाओं की प्रतीक्षा बनी रहती है।

Udan Tashtari May 8, 2009 6:00 AM  

बहुत सुन्दर रचना..और विषय यूँ कि वैसे भी इस पर लिखा दिल छूता है, साथ आपकी कलम हो तो क्या कहने!! बहुत बधाई और आभार इतनी बेहतरीन रचना देने का.

नंदन May 8, 2009 7:12 AM  

कविता की महानता में कोई संदेह नहीं। माहिया छंद भी बहुत असरदार प्रतीत होता है। इसपर लिखने का अवश्य यत्न करूंगा।

nitesh May 8, 2009 7:20 AM  

इस रचना प्र मैं स्वयं को प्रतिक्रिया देने लायक नहीं समझता। प्रणाम प्राण जी।

dheer May 8, 2009 9:10 AM  
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
राजीव तनेजा May 8, 2009 9:12 AM  

माँ के ममत्व से भरपूर एक उम्दा रचना पढवाने के लिए प्राण शर्मा जी के साथ साथ साहित्य शिल्पी को भी आभार

dheer May 8, 2009 9:13 AM  

Pran jii ko naman!
is khoobsoorat kavita par daad naheeN apitu aapko dhanyavaad detaa huN.
-Dheeraj Ameta "Dheer"

मोहिन्दर कुमार May 8, 2009 1:55 PM  

प्राण जी की कविता और उसके ऊपर लगे पोस्टर ने दिल छू लिया... मां सा कोई नहीं.

मुकेश पोपली May 8, 2009 8:21 PM  

आप की सभी रचनाओं की तरह यह रचना भी अविस्‍मरणीय है । मां पर जितना लिखा जाए कम है, आखिर एक मां ही तो है जिससे कोई लोहा नहीं ले सकता ।

Priya May 8, 2009 11:33 PM  

humko sahitya ki vidhaye nahi aati..... kis prant ki kya cheez hain ye bhi nahi jante...par bhavo ki samajh hain.... Maa ko samarpit ye rachna man ko choo gai

श्रद्धा जैन May 12, 2009 8:19 PM  

माँ के आगे तो
बूढा भी बच्चा है
माँ कैसी होती है
पारस सा मन है
माँ ऐसी होती है
कुछ कद्र करो भाई
बेटे हो फिर भी
क्यों पीड़ित है माई


maa par aapki likhi hui kavita dil ko andar tak chhu gayi

Vijay Kumar Sappatti May 13, 2009 2:42 PM  

aadarniy pran ji

deri se aane ke liye maafi chahunga , main tour par tha..

mujhe ye pata nahi tha ki aap itni acchi kavita bhi likh lete hai , pahle to main aapko gazal ka shansha kahta tha , lekin ab aapki kavita padhkar to main bus aapke charan sparsh karna chahta hoon..

itni choti choti pankhtiyon me aapne itni badi badi baaten kah di hai ....
meri aankhen nam hai aur main nishabd hoon aapke lekhan par ..
ye to mera saubhagya hai ki , mujhe aapka aashirwad milte rahta hai ...

aapko aur aapki lekhni ko salam

aapka
vijay

जून -2009 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': काव्य का रचना शास्त्र: 13, काव्य का रचना शास्त्र: 14,
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क़ैफ़ी आज़मी पर आलेख श्रंखला- अजय यादव-4, क़ैफ़ी आज़मी पर आलेख श्रंखला- अजय यादव-3, पुरस्कारों की दौड़ और हिन्दी कविता - राम शिव मूर्ति यादव , वरुण यह मधुमय देश हमारा- डॉ. कुमार विश्वास ,
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अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,

जून -2009 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-तबादला - विभूति नारायण राय, >बस्तर की जनजातियाँ [पुस्तक-अंश-3] - शरद व कविता गौड़ ,
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