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शनिवार, २३ मई २००९

विचारो की श्रंखला [कविता] - सुनीता चोटिया "शानू"



रचनाकार परिचय:-

सुनीता चोटिया (शानू) होम-साइंस में स्नात्त्कोत्तर श्रीमती सुनीता चोटिया ’शानू’ का जन्म पिलानी (राजस्थान)में हुआ। 

लेखन (कविता, कहानी, लेख),चित्रकला, तैराकी व दूरगामी-यात्राओं की शौकीन शानू दिल्ली में स्वयं का चाय निर्यात का व्यापार चलाती हैं।

पिछले काफी समय से वे विभिन्न कवि-गोष्ठियों में भी भाग लेती रहीं हैं और रेडियो से भी उनका काव्य-पाठ प्रसारित हुआ है। 

अपने चिट्ठे " " के माध्यम से अंतर्जाल पर भी वे सक्रिय हैं।

विचारो की श्रंखला
टूटती ही नही
एक आता है एक जाता है
दिन भर हावी रहते है
लड़ते रहते है
अपने ही वजूद से
और
विचारो का आना-जाना
नींद मे भी पीछा नही छोड़ता
रात भर स्वप्न में
पिंघलते रहते है
और नींद खुलने पर
हावी हो जाता है एक नया विचार

पूरे दिन की कशमकश में
जीतता वही है
जो ताकतवर होता है
वकीलो की तरह
झूठी सच्ची दलीलों की तरह

सरकारी वकील की तरह
आत्मा विरोध भी करती है
मगर सबूतों के अभाव में
दिन-भर की लड़ी हुई
थकी माँदी निर्बल आत्मा से
झूठी बेबुनियाद दलीले
जीत जाती है

जैसे बीमारी के कीटाणु
बीमार शरीर को ही
जल्दी शिकार बनाते हैं
और शरीर को सजा हो जाती है
मनोविकारों से पीड़ित रोगी
जो दिमाग का संतुलन खो बैठते है
खुद को पाते है...
शून्य में!!!

16 टिप्पणियाँ:

देवेश वशिष्ठ ' खबरी ' May 23, 2009 6:28 AM  

जिस विषय पर कविता वैसी ही कविता...
कई सारी बातों की एक साथ मुंह से निकलने की ख्वाहिश जैसी...
बहुत दिनों से बात नहीं हुई आपसे... कैसी हैं दी...
खबरी
http://deveshkhabri.blogspot.com/

राजीव तनेजा May 23, 2009 7:59 AM  

विचारों के भंवर में गोते खाती आपकी कविता पसन्द आई...
बधाई स्वीकार करें

श्यामल सुमन May 23, 2009 7:56 AM  

सुन्दर प्रस्तुति। शानू जी को बधाई।

पिघल रहे हैं स्वप्न में अच्छा लगा विचार।
भाव जगत से देह का होता नित संचार।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
[email protected]

Vijay Kumar Sappatti May 23, 2009 11:16 AM  

sunita ji ,

bahut acchi kavita hai , vichaar bahut hi shashakt ban pade hai aur bhaavpoorn bhi hai .

aapko badhai .


viijay

Udan Tashtari May 23, 2009 9:09 AM  

एक सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति!!

Shastri May 23, 2009 11:15 AM  

आपकी कलम आजकल हडताल पर है क्या??

कविता अच्छी लगी! सशक्त.

इसमें एक निष्कर्ष और जोड दें तो दुगनी सशक्त हो जायगी.

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) May 23, 2009 2:54 PM  

बहुत अच्छी कविता वैसे तो आप हमेशा बहुत ही अच्छा लिखती है परन्तु ये कुछ जयादा ही अच्छी बन पड़ी है बहुत बहुत बधाई

दिगम्बर नासवा May 23, 2009 12:58 PM  

शशक्त और भावुक अभिव्यक्ति है...........

अनिल कुमार May 23, 2009 3:23 PM  

जैसे बीमारी के कीटाणु
बीमार शरीर को ही
जल्दी शिकार बनाते हैं
और शरीर को सजा हो जाती है
मनोविकारों से पीड़ित रोगी
जो दिमाग का संतुलन खो बैठते है
खुद को पाते है...
शून्य में!!!

बहुत खूब।

Dr. Sudha Om Dhingra May 23, 2009 6:30 PM  

सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति.
शानू जी बधाई

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र May 23, 2009 8:07 PM  

बहुत अच्छी भावपूर्ण कविता..

राजीव रंजन प्रसाद May 23, 2009 7:39 PM  

बहुत खूब सुनीता जी। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करती है आपकी कविता...बधाई।

मोहिन्दर कुमार May 23, 2009 9:14 PM  

सुंदर भाव भरी अभिव्यक्ति ... बधाई

nitesh May 24, 2009 7:21 AM  

सुन्दर भावाभिव्यक्ति, प्रभावी कविता।

Kiran Sindhu May 25, 2009 9:24 PM  

सुनीता जी,
मन की सूक्ष्म गतिविधियों को पढ़ना अपने आप में एक कारीगरी है. आपने इसे शब्दों के माध्यम से अत्यंत सफलतापूर्वक ब्यक्त किया है. विचारों की तारतम्यता की सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई,
किरण सिन्धु

आनंदकृष्ण June 8, 2009 2:41 PM  

आदरणीय सुनीता जी,
एक लम्बे अरसे के बाद आपके भाव, और शब्द कविता के रूप में दिखे. बहुत अच्छी कविता कही है आपने. सारे बिम्ब बिलकुल नए और यथार्थपरक .........
एक अच्छी, समर्थ और जीवंत कविता पढने के बाद उस पर बधाई देना महज औपचारिकता सा लगता हैं ना- !!!!!!

सादर-
आनंदकृष्ण, जबलपुर
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