विचारो की श्रंखला [कविता] - सुनीता चोटिया "शानू"
रचनाकार परिचय:-
विचारो की श्रंखला
टूटती ही नही
एक आता है एक जाता है
दिन भर हावी रहते है
लड़ते रहते है
अपने ही वजूद से
और
विचारो का आना-जाना
नींद मे भी पीछा नही छोड़ता
रात भर स्वप्न में
पिंघलते रहते है
और नींद खुलने पर
हावी हो जाता है एक नया विचार
पूरे दिन की कशमकश में
जीतता वही है
जो ताकतवर होता है
वकीलो की तरह
झूठी सच्ची दलीलों की तरह
सरकारी वकील की तरह
आत्मा विरोध भी करती है
मगर सबूतों के अभाव में
दिन-भर की लड़ी हुई
थकी माँदी निर्बल आत्मा से
झूठी बेबुनियाद दलीले
जीत जाती है
जैसे बीमारी के कीटाणु
बीमार शरीर को ही
जल्दी शिकार बनाते हैं
और शरीर को सजा हो जाती है
मनोविकारों से पीड़ित रोगी
जो दिमाग का संतुलन खो बैठते है
खुद को पाते है...
शून्य में!!!








16 टिप्पणियाँ:
जिस विषय पर कविता वैसी ही कविता...
कई सारी बातों की एक साथ मुंह से निकलने की ख्वाहिश जैसी...
बहुत दिनों से बात नहीं हुई आपसे... कैसी हैं दी...
खबरी
http://deveshkhabri.blogspot.com/
विचारों के भंवर में गोते खाती आपकी कविता पसन्द आई...
बधाई स्वीकार करें
सुन्दर प्रस्तुति। शानू जी को बधाई।
पिघल रहे हैं स्वप्न में अच्छा लगा विचार।
भाव जगत से देह का होता नित संचार।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
[email protected]
sunita ji ,
bahut acchi kavita hai , vichaar bahut hi shashakt ban pade hai aur bhaavpoorn bhi hai .
aapko badhai .
viijay
एक सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति!!
आपकी कलम आजकल हडताल पर है क्या??
कविता अच्छी लगी! सशक्त.
इसमें एक निष्कर्ष और जोड दें तो दुगनी सशक्त हो जायगी.
सस्नेह -- शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
बहुत अच्छी कविता वैसे तो आप हमेशा बहुत ही अच्छा लिखती है परन्तु ये कुछ जयादा ही अच्छी बन पड़ी है बहुत बहुत बधाई
शशक्त और भावुक अभिव्यक्ति है...........
जैसे बीमारी के कीटाणु
बीमार शरीर को ही
जल्दी शिकार बनाते हैं
और शरीर को सजा हो जाती है
मनोविकारों से पीड़ित रोगी
जो दिमाग का संतुलन खो बैठते है
खुद को पाते है...
शून्य में!!!
बहुत खूब।
सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति.
शानू जी बधाई
बहुत अच्छी भावपूर्ण कविता..
बहुत खूब सुनीता जी। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करती है आपकी कविता...बधाई।
सुंदर भाव भरी अभिव्यक्ति ... बधाई
सुन्दर भावाभिव्यक्ति, प्रभावी कविता।
सुनीता जी,
मन की सूक्ष्म गतिविधियों को पढ़ना अपने आप में एक कारीगरी है. आपने इसे शब्दों के माध्यम से अत्यंत सफलतापूर्वक ब्यक्त किया है. विचारों की तारतम्यता की सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई,
किरण सिन्धु
आदरणीय सुनीता जी,
एक लम्बे अरसे के बाद आपके भाव, और शब्द कविता के रूप में दिखे. बहुत अच्छी कविता कही है आपने. सारे बिम्ब बिलकुल नए और यथार्थपरक .........
एक अच्छी, समर्थ और जीवंत कविता पढने के बाद उस पर बधाई देना महज औपचारिकता सा लगता हैं ना- !!!!!!
सादर-
आनंदकृष्ण, जबलपुर
मोबाइल : 09425800818
http://www.hindi-nikash.blogspot.com
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